भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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१५८ भावप्रकाशनिघण्टुः करनेवाला ), पित्तजनक, तीक्ष्णोष्णवीर्य, सूक्ष्म, अभिष्यन्दी तथा विपाक में कटुरस युक्त होता है ॥ ४२-४३ ॥ ८७ साम्भरनमक । हि०-साम्बर नमक, साम्भरनोन, सांभर निमक। बं०-साम्बरलुण, शाम्भारि लवण । म०- सांभर मीठ, सांभर लोण। गु०-बड़ागरूं मीठ, साम्भरमीठ, सामरलून । क०-गाड़लबड, गाढ़ लवण । फा०-मिलहे अवकीर, नमक साम्भर । अ०-मलह उल अवकर । राजपूताना की झीलों के जल को सुखा कर जो नमक प्राप्त किया जाता है वह सांभर नमक कहलाता है। राजपूताना में सांभर नामक एक २० मील लम्बी तथा ५ मील चौड़ी झील है। इसमें ४ नदियां बहती हैं। बरसात में उसमें पानी जमा होता है। गर्मी में जल सूख जाता है। इसके २० भाग नमक में १५ भाग खाने का नमक, १ भाग सर्जिका (सोडियम् कार्बोनेट) तथा ३ भाग खारोनोन (सोडियम् सल्फेट) तथा अल्प मात्रा में आयोडीन एवं सोरे के लवण रहते हैं। यहां के जल को क्यारियों में जमा करते हैं जिसके सूर्य की गरमी से सूखने से उसमें का नमक अलग हो जाता है। जलमे अन्य अशुद्धियां रह जाती हैं जिसे फिर से झाल में डाल देते हैं। नमकीन जलको सुखा कर बनाये हुए नमकों में यह सबसे अच्छा होता है। इसका स्वाद कुछ कड होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण भी सेंधव की तरह होते हैं लेकिन वह उससे न्यून गुण वाला है। अथ सामुद्रं लवणं ( पाङ्गा ) तस्य नामगुणानाह सामुद्रं यत्तु लवणमक्षीवं वशिरञ्च तत् । समुद्रजं सागरजं लवणोदधिसम्भवम् ॥ २४४ ॥ सामुद्रं मधुरं पाके सत्तिक्तं मधुरं गुरु । नात्युष्णं दीपनं भेदि सक्षारमविदाहि च ॥ श्लेष्मलं वातनुत्तीक्ष्णं मारुचे नातिशीतलम् ॥ २४५ ॥ समुद्रनोन (पांगा) के नाम तथा गुण-समुद्रलवण के ही अक्षीव, वशिर, समुद्रज, सागरज और लवणोदधिसम्भव ये संस्कृत नाम हैं। समुद्र नमक-पाक में मधुररस युक्त, स्वाद में तिक्तरस मिश्रित मधुररस युक्त और गुरु होता है। यह अत्यन्त उष्णवीर्य नहीं होता है। यह दीपद, भेदी, क्षारगुण युक्त, अविदाही (दाह नहीं पैदा करने वाला), कफकारक, वातनाशक एवं तीक्ष्ण होता है। यह रूखा तथा अत्यन्त शीतल भी नहीं होता है ॥ २४४-२४५ ॥ ८८ समुद्रनमक हि०-पांगानिमक, पंगानोन, समुद्रनिमक, समुद्री नोन । बं०-पांगा । म०-मीठ । गु०-मीठुं, दरियाइ लूण। ते०, ता०-उप्पु । फा०-नमक, नमक दरिया । अ०-मिलह शोरी, मलहे उल् मुहीत । अं०-Salt (साल्ट ) । ले०-Sodii muras (सीडिआइ मुरास् )। समुद्र के खारे पानी से बनाये हुए नमक को समुद्र नमक कहते हैं। भारत में आवश्यक नमक का ३७% भाग बंबई के समुद्री तट से निर्मित होता है। नमक निकालने के लिये विभिन्न देशों में हवा की उष्णता के अनुसार विभिन्न पद्धतियां काम में लाई जाती हैं। समुद्र के किनारे पर छोटे-छोटे गढ़े बनाते हैं जिसमें समुद्र का जल धीरे-धीरे भरता है। सूर्य की गरमी से उसमें

( १ ) तिक्तेति पाठान्तरम् ।

हरीतक्यादिवर्गः १५६ का जलीय अंश सूखने लगता है। १०० भाग जल में ३७ भाग नमक घुलता है। नमक को घुलने के लिये जितने जल की आवश्यकता होती है उससे कम जल जब सूख कर रह जाता है तब उसमें का नमक अलग होकर नीचे जमने लगता है। जैसे-जैसे नमक जमता है वैसे-वैसे उसे निकल कर जमा करते जाते हैं। उस नमक की राशि में से मॅग्नेशियम् क्लोरायड (Magnesium chlo- ride) निस्यंदित होकर निकल जाता है। समुद्री जल में खाने के नमक के साथ पोटेशियम् क्लोराइड (Potassium chloride), मॅग्नेशियम् क्लोराइड् (Magnesium chloride), मॅग्नेशियम् सल्फेट् (Magnesium sulphate ) एवं कॅल्शियम सल्फेट् (Calcium sulphate) आदि द्रव्य रहते हैं जो खाने के नमक निकालने के बाद उस जल में रह जाते हैं। इस कड़वे जल में से इन पदार्थों को विभिन्न पद्धतियों से अलग कर लेते हैं। बाजारू समुद्री नमक कुछ आर्द्र रहता है उसका कारण यह है कि उसमें मॅग्नेशियम् एवं कॅल्शियम क्लोराइड्स के कुछ अंश रह जाते हैं। शुद्ध नमक आर्द्र नहीं होता तथा इसका १ भाग २ ३/८ भाग जल में घुल जाता है। गुण और प्रयोग-सामुद्र लवण के गुण सैंधव के समान होते हुये भी इसमें जो अन्य पदार्थ रहते हैं उनके कारण कुछ अंतर पड़ता है। ( १ ) समुद्र में स्नान करने से जो नुमचुमाहट होती है उसके कारण शरीर का रक्त प्रवाह बढ़ जाता है तथा उससे शरीर में स्फूर्ति मालूम पड़ती है। ( २ ) समुद्री जल का मांसपेश्यन्तर्गत सूचिकाभरण अजीर्ण, शोथ, जीर्ण चर्मविकार तथा बच्चों के पाचनसंस्थान के विकारों में लाभदायक माना जाता है। ( ३ ) समुद्री नमक में आयोडीन (Iodine) रहने के कारण गलगण्ड (Goitre) के प्रति- बंधन की दृष्टि से इसका उपयोग लाभदायक माना जाता है। ( ४ ) पाण्डु, आमाशयिक व्रण, प्रतिश्याय, वातनाड़ीशोथ, नाड्यवसन्नता एवं पाचनसंस्थान की दुर्बलता में समुद्री जल का उपयोग रोगनाशकरूप में किया जाता है। फ्रांस में बच्चों की जीवनी शक्ति (Vitality) बढ़ाने के लिये इसका प्रयोग करते हैं। अथ बिडलवणम् (बिरियासंचल) तस्य नामगुणानाह बिडं पाक्यञ्च कृतकं तथा द्राविडमासुरम् । बिडं सक्षारमूर्ध्वाधःकफवातानुलोमनम् ॥ २४६ ॥ बिरिया संचर नमक के नाम तथा गुण-बिड, पाक्य, कृतक, द्राविड़ तथा आसुर ये सब बिरिया संचर नमक के संस्कृत नाम हैं। बिरिया संचर नमक-क्षार गुण युक्त (विकृत त्वचा मांसादिकों को गला कर दूर करने वाला) होता है, तथा ऊपर (मुखादि) के मार्ग से कफ एवम् नीचे (गुदादि) के मार्ग से वायु का अनुलोमन करने वाला अर्थात् कफ को मुखादि से निकालने वाला और अपान वायु को अधोगामी करने वाला होता है ॥ २४६ ॥ ॐ ऊर्ध्वं कफमधो वातं सञ्चारयेदित्यर्थः ॥ २४६ ॥ यहां पर 'ऊर्ध्वाधःकफवातानुलोमनम्' का-'ऊपर मुखादि की ओर कफ को एवं नीचे गुदादि को ओर अपान वायु को संचारित करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ २४६ ॥ दीपनं लघु तीक्ष्णोष्णं रुच्यं रूक्ष्यं व्यवायि च । विबन्धानाहविष्टम्भहृद्रुग्गौरवशूलनुत् ॥ २४७ ॥