भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 143 में से

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पृष्ठ 87

१५६ | भावप्रकाशनिघण्टुः सैंधव रुचिकारक, अग्निदीपक, पाचक, वातानुलोमक, नेत्र्य, व्रण रोपक एवं व्रण शोधक है। अल्प मात्रा से इससे पाचक स्रावों की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में आमाशयिक प्रक्षोभ होकर वमन एवं जलापकर्षण द्वारा कभी-कभी विरेचन होता है। अल्पबल लवणजल का प्रचूषण आसानी से हो जाता है लेकिन अन्यों का कम होता है। अतिबल लवणजल के सूचिकाभरण से ऑसमोटिक् क्रिया द्वारा रक्त की मात्रा बढ़ती है जिससे मूत्र एवं पसीना आदि की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ लोगों के मत से नमक का अधिक सेवन बहुत ही लाभदायक एवं आयु को बढ़ाने वाला होता है लेकिन आयुर्वेदानुसार नमक का अधिक उपयोग हानिकर है। (१) कुपचन, आध्मान एवं शूल आदि में अन्य औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। विसूचिका में जब शरीर से वमन एवं विरेचन के कारण बहुत सा द्रव तथा लवण निकल जाते हैं और शरीर ठण्डा होकर रोगी मरणासन्न हो जाता है ऐसी अवस्था में अतिबल लवणजल का सिरा द्वारा सूचिकाभरण बहुत ही आश्चर्यजनक लाभदायक होता है। इससे फिर से रक्त प्रवाह शुरू होकर रोगी बच जाता है। इसके लिये जिस घोल का उपयोग किया जाता है। उसके १ पाईंट परिस्रुत जल में शुद्ध नमक १२० ग्रे०, पोटैशियम् क्लोराइड् (Potassium chloride) ६ ग्रे. एवं कैल्शियम् क्लोराइड् (Calcium chloride) ४ ग्रे. रहता है। यदि शरीर में अम्लता अधिक हो तथा पोषण की भी आवश्यकता हो तो इसीमें सोडाबाईकार्ब (Soda bi carb) ४० ग्रे. एवं ग्लूकोज (Glucose) १४ ग्रे. मिलाया जाता है। अतिसार, रक्तातिसार एवं अत्यधिक रक्त स्राव आदि में जलापहरण के कारण निपात (Co- llapse) एवं स्तब्धता (Shock) आदि होने पर समबल लवणजल के सिरा द्वारा सूचिकां- भरण से बहुत लाभ होता है। इसी प्रकार मूत्र विषममयता (Uraemia), गर्भिणी विषममयता (Eclampsia) एवं कार्बन मॉनऑक्साइड् (Carbon monoxide) नामक कोयले के धूएँ के विषैले प्रभाव आदि अवस्थाओं में इसी प्रकार के समबल लवणजल (०.९%) का उपयोग विष की तीव्रता कम करने के लिये किया जाता है। शरीर अत्यधिक दुर्बल हो गया हो तथा पोषण की त्वरित आवश्यकता हो तो ५% ग्लूकोज के साथ समबल लवणजल का उपयोग लाभदायक होता है। इन उपर्युक्त अवस्थाओं में सिरा के अतिरिक्त चर्म के नीचे, मुख द्वारा एवं गुदा द्वारा लवणजल का उपयोग किया जा सकता है। गुदा द्वारा, २ माशे नमक करीब ५ छटांक जल में घोलकर रोगी को उत्तान लिटा कर तथा चूतड़ों को कुछ ऊँचा करके रबर की नली द्वारा हर चार घण्टे पर दिया जाता है। घोल की उष्णता शरीर की उष्णता के बराबर या कुछ अधिक होनी चाहिये। (२) डा. ब्रूक मलेरिया के लिये एक प्रयोग लिखते हैं। एक मुट्ठीभर नमक को कढ़ाई में डालकर मन्द आंच पर कुछ बादामी रंग होने तक भूनते हैं। इसमें से १ तो. नमक जल के साथ सुबह खाली पेट रोगी को दिया जाता है। इसके पश्चात प्यास बहुत लगे तो थोड़ा-थोड़ा जल पीने को दें। २, ३ घण्टे तक खाने को कुछ भी न दें। बाद में बहुत भूख लगने पर हल्का पौष्टिक आहार दें। रोगी को ठण्डक से बच कर रहना चाहिये। डा० ब्रूक का कहना है कि इसके एक ही बार के प्रयोग से मलेरिया दूर हो जाता है या कभी २ दो बार प्रयोग करना पड़ सकता है। (३) व्रण, नाड़ीव्रण एवं दूषित क्षत आदि के प्रक्षालन के लिये परमबल लवणजल का प्रयोग किया जाता है तथा विरल कपड़े (गॉज) की पट्टी इस घोल में भिगो कर व्रण पर रखी जाती है। इससे व्रणित भाग में लसिकास्राव एवं श्वेतकणों की वृद्धि होकर व्रण शुद्ध होकर जल्दी


हरीतक्यादिवर्गः | १५७ अच्छा होता है। इस चिकित्सा में अन्य प्रतिदूषकों (Antiseptics) की तरह शरीर की कोषाओं को कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचता। (४) श्वसनक ज्वर (न्युमोनिया) में नमक की पोटली बना कर उससे छाती को सेंका जाता है जिससे कफ ढीला हो कर निकलता है तथा वेदना शांत होती है। इसका आंतरिक प्रयोग ४ र. की मात्रा में जल के साथ किया जा सकता है। संधिवात, आमवात, गंडमाला एवं आमाशयिक पीड़ा आदि में भी पोटली से सेंकने से लाभ होता है। (५) इन्फ्लूएंझा, प्रतिश्याय एवं शिरःशूल तथा स्वास्थ वृद्धि के लिये १ तोला नमक १ सेर जल में डाल कर उसका नस्य बहुत लाभदायक है। (६) गले की खराबी में कदुष्ण जल में नमक डाल कर उससे गरारा करना चाहिये। गला एवं तालु की शिथिलता होने पर ठंडे पानी में नमक डाल कर कुल्ला कराने से लाभ होता है। (७) यदि गलती से जोंक गले के अन्दर चली जाय तो लवण जल पिलाते हैं। इसी प्रकार सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) नामक चांदी के दाहक क्षार के विष क दूर करने के लिये इसको पिलाते हैं। (८) जीर्ण आमवात, गृध्रसी तथा अन्य पीड़ायुक्त संधि विकारों में एवं बिच्छू के काटने पर २०% उष्ण लवण जल में अवगाह किया जाता है तथा लवण जल पिलाते भी हैं। (९) सूत्रकृमि (Thread worm) में इसकी बस्ति दी जाती है। (१०) वमन कराने के लिये यह अत्युत्तम औषध है। अल्प मात्रा (२%) में देने से यदि वमन होता हो तो रुक जाता है। (११) मांसपेशियों की दुर्बलता में नमकयुक्त ठण्डे जल की धारा से बहुत लाभ होता है विशेषकर वर्धमान लड़कियों की पीठ की दुर्बलता में इसका अच्छा उपयोग होता है। करीब १५ सेर जल में ३ सेर नमक डाल कर स्नान करने से रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा स्फूर्ति मालूम होती है। मांसपेशियों की पीड़ा, चर्म रोग, मोच एवं मरोड़ आदि में भी स्नान से लाभ होता है। निषेध— किसी भी प्रकार के शोफ, जलोदर तथा अन्य रोग जिनमें शरीर के अन्दर द्रव पदार्थों का संचय होता है उनमें नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिये। रक्तभाराधिक्य, चर्मरोग एवं अत्यधिक प्यास आदि में भी इसका निषेध है। अधिक मात्रा में सिरा द्वारा लवणजल के प्रयोग से कभी-कभी इक्षुमेह (Glycosuria), साधारण ज्वर एवं कचित् मूत्र में अलब्यूमिन का निकलना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। फुफ्फुस शोफ (Oedema of lungs) तथा हृदय अधिक भार सहन करने में असमर्थ हो तब सिरा द्वारा लवणजल का प्रयोग न करें नहीं तो मृत्यु की सम्भावना रहती है।

अथ शाकम्भरीयम् । तस्य नामगुणानाह

शाकम्भरीयं कथितं गडाख्यं रोमकं तथा ॥ २४२ ॥ गडाख्यं लघु वातघ्नमत्युष्णं भेदिपित्तलम् । तीक्ष्णोष्णं चापि सूक्ष्मञ्चाभिष्यन्दिकटुपाकि च ॥ २४३ ॥ सांभर नमक के नाम तथा गुण—शाकम्भरीय के ही, गडाख्य (गडलवण) तथा रोमक पर्यायवाची शब्द हैं। सांभर नमक-लघु, वायुनाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, भेदी (मलादिक का भेदन १. 'तीक्ष्णं व्यवायी'ति पाठान्तरम् ।