भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ भावप्रकाशनिघण्टुः ये दो नाम संस्कृत में उस नमक का है जो कि जमीन से स्वयम् उत्पन्न होता है। रेहगवा नोन- क्षार गुणयुक्त, गुरु, कड़वरसयुक्त, स्निग्ध, शीतल और वातनाशक होता है ॥ २०५ ॥ ९१ रेह का नमक हि०-रेहगवा नोन, रेह का नमक, मटिया नोन, शोरा नोन। बं०-फूला लवण । जांगल देश की खारी भूमि में रेह उत्पन्न होती है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार एवं बंगाल आदि प्रान्तों की ऊसर जमीन में भी रेह होती है। उसी रेह से बना हुआ नमक रेहगवा नोन कहलाता है। जिस प्रकार की मिट्टी होगी उसी प्रकार का नमक प्राप्त होता है। जिस मिट्टी से शोरा अलग किया जाता है उससे प्राप्त नमक में शोरे का अंश रहता है। ऐसे नमक को कुछ लोग सौवर्चल लवण मानते हैं। तथा सज्जी मिट्टी से प्राप्त नमक में सज्जीखार की कुछ मात्रा रहती है। इसे वे औद्भिद लवण या रेहगवा नोन मानते हैं। कुछ भी हो जो ऊसर मिट्टी से नमक निकाला जाता है उसे रेहगवा नोन कहा जाता है। यह नमक कुछ तीता, कडवा एवं क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इस नमक में काफी मात्रा में खारी नोन (सोडा सल्फ) तथा अल्प मात्रा में सोडियम कार्बोनेट एवं मॅग्नेशियम् सल्फेट रहते हैं। गुण और प्रयोग-रोचक, दीपन एवं पाचन गुण के कारण सभी पाचन योगों में इसका व्यवहार किया जाता है। सामान्य मात्रा में मूत्रल भी होता है। योगों के अतिरिक्त स्वत- न्त्ररूप में लवणों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। वमन कराने के लिए प्रायः सैन्धव ही प्रयुक्त होता है। मात्रा-४ रत्ती से १ माशा। नोट-उपर्युक्त लवणों के अतिरिक्त चरक (वि. अ. ८) के लवण स्कन्ध में एवं सुश्रुत (सू. अ. ४६) में इतर विशिष्ट लवणों का उल्लेख किया गया है। अथ चणकाम्लम् । तस्य गुणानाह चणकाम्लुकमत्युष्णं दीपनं दन्तहर्षणम् । लवणानुरसं हृद्यं शुलाजीर्णविबन्धनुत् ॥ २५१ ॥ चनाखार के नाम तथा गुण-चनाखार को संस्कृत में चणकाम्ल कहते हैं। चणकाम्ल- अत्यन्त उष्णवीर्य, अग्निदीपक, दन्तहर्षण (दन्तहर्ष अर्थात् दांतों में खट्टापन लग जाने से चबाने में असमर्थ कर देने वाला ), कुछ लवण रस युक्त, रुचिकारक, शूल, अजीर्ण तथा विबन्ध को दूर करने वाला होता है ॥ २५१ ॥ ९२ चनाखार हि०-चने का खारा, चनाखार, चनक लोणी, चने का सिरका । म०-हरभरयाची आंब। गु०-चणा नो खार । मार्गशीर्ष के महीने में जब चने के क्षुप लवण युक्त हो जाते हैं तब मलमल का सफेद कपड़ा लेकर प्रतिदिन प्रातःकाल उक्त क्षुपों पर फेर, उन पर पड़े हुए ओस की बूँदों से उसको तर कर सुखा दें। इस प्रकार एक मास करके इस कपड़े को पानी में खूब मलकर उसका अम्ल पदार्थ निकाल ले। फिर उस पानी को ५-७ घण्टे स्थिर छोड़ कर उसका पानी नितार ले। नीचे जमे हरीतक्यादिवर्गः १६३ हुए पदार्थ को सुखा ले और पानी को अग्नि पर औटा कर उसको भी सुखा ले। फिर दोनों को एक में मिला कर सुरक्षित रख दें। उपर्युक्त विधि के अतिरिक्त केवल रात में या सुबह मलमल का कपड़ा चने के क्षुपों पर डाल कर सुबह उसको निचोड़ लेते हैं। जो द्रव प्राप्त होता है उसे उसी द्रव रूप में या सुखा कर काम में लाया जाता है। कुछ लोग क्षार-निर्माण विधि की तरह चने का क्षुप जलाकर उससे क्षार निकालते हैं वह गलत है क्योंकि उसमें तो केवल क्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) ही रहता है। यहां जो गुण दिये गये हैं वे अम्ल के हैं। इसलिये ऊपर दी हुई विधि से ही इसे बनाना चाहिये न कि क्षाररूप में। रासायनिक संगठन-यद्यपि इसे चनाखार लिखा गया है लेकिन इसमें अम्ल द्रव्य होते हैं। इसमें ॲक्झॅलिक (Oxalic), मॅलिक् (Malic) एवं अॅसेटिक् (Acetic) आदि अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-चणकाम्ल का उपयोग उदरशूल, अजीर्ण, बच्चों के आमातिसार, अग्नि- मांद्य, विबन्ध तथा कष्टार्तव में किया जाता है। इसको जल में मिला कर लू लगने पर तथा ज्वर में देने से तृषा, दाह एवं सन्ताप कम होता है। अजीर्ण में इसको सिरका के साथ मिला कर पिलाते हैं। लौंग तथा मिश्री के साथ इसको जल में मिलाकर हैजे में देने से लाभ होता है। मधुमेह एवं पथरी में इसका प्रयोग हानिकारक है। मात्रा-१-२ रत्ती या ५-१० बूंद। अथ यवक्षारः स्वर्जिका सुवर्चिका च। तन्नामगुणानाह पाक्यं क्षारो यवक्षारो यावशूको यवाग्रजः। स्वर्जिकाऽपि स्मृतः क्षारः कपोतः सुखवर्चकः ॥ कथितः स्वर्जिकाभेदो विशेषज्ञैः सुवर्चिका । यवक्षारो लघुः स्निग्धः सुसूक्ष्मो वह्निदीपनः ॥ निहन्ति शूलवातामश्लेष्मश्वासगलामयान् । पाण्ड्र्वर्धोग्रहणीगुल्मानाहलीहहृदामयान् ॥ स्वर्जिकाऽल्पगुणा तस्माद्विशेषा गुल्मशूलहृत् । सुवर्चिका स्वजिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनैः ॥ २५५ ॥ जवाखार, सज्जी तथा सोरा के नाम और गुण-पाक्य, क्षार, यवक्षार, यावशूक और यवाग्रज ये सब जवाखार के संस्कृत नाम हैं। स्वर्जिका, क्षार, कपोत और सुखवर्चक ये सब सज्जी के संस्कृत नाम हैं। जवाखार की भाँति इसका भी संस्कृत में क्षार नाम है। द्रव्यों की विशेषताओं के ज्ञाता वैद्य जन सोरा को सज्जी का ही भेद बतलाते हैं। इसे संस्कृत में सुवर्चिका कहते हैं। जवाखार - लघु, स्निग्ध, अत्यन्त सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतोगामी) तथा अग्निदीपक होता हैं एवम् यह शूल, वायु, आम, कफ, श्वास, गलरोग, पाण्डुरोग, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, आनाह, प्लीहा और हृद्रोग का नाश करता है। सज्जी-इसे जवाखार की अपेक्षा न्यून गुणवाली तथा विशेष करके गुल्म तथा शूल को दूर करने वाली समझना चाहिये । सुवर्चिका (सोरा) ?-इसे लोग गुणों में सज्जी के समान ही समझें, ऐसा वैद्यों का मत हैं ॥ २५२-२५५ ॥ ९३ जवाखार। हि०-जवाखार, जवखार । बं०-यवक्षार । म०-झाडाचे मीठ, जवाखार । गु०-जवाखार, खारो । ता०-मरवप्पु । ते०-मानुवप्पु । मळ०-कारम् । क०-मरदउप्पु । अं०-Impure carbo- nate of potash (इम्प्योअर कार्बोनेट ऑफ् पोटॅश्) । ले०-Potasii carbonas (पोटॅसाइ कार्बोनस्) ।