भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ भावप्रकाशनिघण्टुः जाता है तथा इसके टुकड़े को मुख में रखकर चूसते भी हैं। केशर्तलों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है। छोटे व्रणों तथा फोड़े फुन्सियों पर इसका लेप लाभदायक है। मात्रा-२ से १५ र० । अथ कटुपर्णी (चोक) तस्या नामानि गुणाँश्चाह कटुपर्णी हैमवती हेमक्षीरी हिमावती । हेमाह्वा पीतदुग्धा च तन्मूलं चोकमुच्यते ॥१७६॥ हेमाह्वा रेचनी तिक्ता भेदिन्युत्क्लेशकारिणी । कृमिकण्डूविषानाहकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ॥१७७॥ सत्यानाशी ( चोक ) के नाम तथा गुण-कटुपर्णी, हैमवती, हेमक्षीरी, हिमावती, हेमाह्वा और पीतदुग्धा ये सब सत्यानाशी के नाम हैं और इसी के जड़ भाग को चोक कहते हैं। सत्यानाशी-रेचक, तिक्तरसयुक्त, भेदक (मल को भेदन करने वाली) और उत्क्लेश कारक होती है एवम् कृमि, खुजली, विष, आनाह, कफ, पित्त, रक्त विकार और कुष्ठ को दूर करने वाली होती है ॥ १७६-१७७ ॥ ५८ कटुपर्णी (चोक) हि०-सत्यानाशी, पीला धतूरा, फरंगी धतूरा, उजर कांटा, सियाल कांटा, भड़भांड़, चोक । बं०-सोनाखिरणी, शियाल कांटा, बड़ो सियाल कांटा । म०-कांटे धोत्रा । गु०-दारूडी । क०- अरसिन उन्मत्त । ता०-ब्रह्मदण्डु, कुडियोट्टि, कुरुक्कुम चेडि । ते०-ब्रह्मदण्डी चेट्टु । पं०- कण्डियारी, स्यालकांटा, भटमिल, सत्यनशा, भेरबण्ड, भटकटैया । सम्ता०-गोकुहल जानम । पश्चिमो०-भरभुरवा, कडवइ कण्टेला । मला०-पोन्नुम्मत्तम् । उडि०-कांटाकुशम । अं०- Mexican poppy (मेक्सिकन पॉप्पी), Prickly poppy (प्रिक्ली पॉप्पी), Yellow thistle (यलो थिसल्) । लै०-Argemone mexicana Linn. (आर्जिमोन् मेक्सिकाना) । Fam. Papaveraceae (पैपेहरेसी) । यह सब प्रान्तों के खेत, मैदान, झाड़ी, खण्डहर, सड़क के किनारे आदि गन्दी जमीन में उत्पन्न होती है। शिमले में ५००० फीट ऊँची भूमि पर भी पाई जाती है। सत्यानाशी क्षुप जाति की वनस्पति २ से ४ फीट तक ऊँची, अनेक शाखाओं से युक्त सघन होती है। इसके क्षुप, पत्ते, फल इत्यादि पर तीक्ष्ण कांटे होते हैं। डण्डी और पत्तों को तोड़ने से पीला दूध निकलता है। पत्ते ३ से ७ इञ्च तक लम्बे, कटे हुए, तीक्ष्ण कँटीले नोक वाले, सफेद धब्बों से युक्त तथा रेशेवाले होते हैं। फूल-कटोरी नुमा चमकीले पीले रंग के आते हैं और वे खुले मुख होते हैं। फल-लम्बे तथा गोल होते हैं और उनसे राई के समान काले रंग के बीज निकलते हैं। वैशाख, ज्येष्ठ की गरमी से इसका क्षुप सूख कर नष्ट हो जाता है। फल के सूखने पर बीज भूमि पर गिर जाते हैं और वे ही शरद ऋतु में अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत हो जाते हैं। इसकी जड़ का नाम 'चोक' है। कुछ विद्वान् इस पौधे को विदेशी मानते हैं तथा इसे प्राचीन 'स्वर्णक्षीरी' नहीं मानते । इस वनस्पति के ताजे मूल, क्षीर, बीज तथा तैलादि का औषध में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-पहले ऐसा समझा जाता रहा कि इस वनस्पति के पत्तों तथा फलियों में मॉर्फीन (Morphine) या आर्जेमोनाइन् (Argemonine) क्षाराम पाये जाते हैं लेकिन हरीतक्यादिवर्गः ५७ बाद के प्रयोगों से ज्ञात हुआ कि इसमें इस प्रकार के कोई क्षाराम नहीं रहते लेकिन बर्बेरीन (Berberine) तथा प्रोटोपाइन (Protopine) नामक अन्य क्षाराम होते हैं। इसके बीजों में एक गहरे बादामी रंग का, स्वादहीन तैल २२% पाया जाता है जो पहले पतला रहता है लेकिन बाद में रखने पर गाढ़ा होता जाता है। इसके अतिरिक्त इन बीजों में कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohy- drates) एवं अॅल्ब्युमिन (Albumin) ४९%, आर्द्रता ९% तथा राख ६% पाई जाती है। इस राख में क्षारीय फॉस्फेट (Phosphate) तथा सल्फेट (Sulphate) पाये जाते हैं। इस वनस्पति में पीले रंग का दूध बहुत होता है जिसमें अल्प मात्रा में बर्बेरीन (Berberine) होता है। पोटैशियम नाइट्रेट (Potassium nitrate) लवण भी इसमें होता है। गुण और प्रयोग-यह विरेचक, रसायन, कुष्ठघ्न एवं कृमिघ्न है तथा इसका प्रयोग फिरंग, उपदंश, सोजाक, कुष्ठ, चर्मरोग तथा नेत्र विकारों में किया जाता है। (१) इसके बीजों का तेल मृदुरेचक, रसायन, कुष्ठघ्न एवं त्वचा के रोगों में लाभदायक है। यह ३० बूंद की मात्रा में शर्करा के साथ दिया जाता है। इसके नये बीज वामक होने के कारण इन बीजों को एक मास रख कर फिर तेल निकालते हैं तथा ताजे निकाले तेल का ही उपयोग अच्छा होता है। इसमें एरण्ड तैल के समान न तो कोई दुर्गन्ध या खराब स्वाद होता है न इससे मरोड़ आदि होती है तथा यह अल्प मात्रा में प्रभावशाली होता है। आमातिसार, संग्रहणी, विसू- चिका उदरशूल, विबन्ध युक्त उदरशूल एवं सर्वांगशोथ आदि में इसका उपयोग किया जाता है। फिरङ्ग तथा उपदंश में इसके बीजों का प्रयोग विरेचन के लिये किया जाता है। कुष्ठ, दाद, विसर्प, श्वित्र एवं अन्यान्य पीड़ा एवं दाहयुक्त चर्मविकारों में इसका तैल लगाया जाता है जिससे शान्ति मिलती है। (२) इसके बीज वामक तथा उत्क्लेशकारक होने के कारण इनका उपयोग गले के विकार, फुफ्फुस विकार, कास, कुक्कास एवं तमकश्वास आदि में लाभदायक होता है। इसमें कोई उद्वेष्टन निरोधि गुण नहीं है जो तमकश्वास में लाभदायक होता हो । ये रेचक तथा वेदनास्थापक भी होते हैं। दांतों में गड्ढे होकर पीड़ा होती हो तो इनके धूम्रपान से लाभ होता है। (३) इस पौधे में जो पीले रंग का दूध होता है वह रसायन, कुष्ठघ्न, मूत्रजनन, व्रणशोधक तथा रोपक, शोथप्रतिकारक, ज्वरहर एवं नेत्र के लिये हितकारक होता है। फिरंग, उपदंश एवं सोजाक आदि में 'किडमार' (Aristolochia bracteata Retz) के रस के साथ इसको पिलाते हैं। मलेरिया आदि जीर्ण विषमज्वरों में नींबू के रस में इसे घोंट कर पिलाते हैं। सोजाक में इसको घी के साथ देने से भी लाभ होता है। जलोदर एवं कामला आदि में भी इसका व्यवहार किया जाता है। नेत्राभिष्यन्द में पलकों पर इसको लगाते हैं तथा नेत्रशुक्र, अधिमांस एवं दृष्टिमांद्य आदि में घी के साथ १ बूंद इसे आंखों में डालते हैं। इससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सर्वदा के प्रयोग के लिये इसको सुखाकर रख सकते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर घी या दूध में घिसकर उपयोग में ला सकते हैं। पुराने व्रण, फिरंगादि से उत्पन्न व्रण एवं खुजली (Scabies) आदि में इसको लगाने से लाभ होता है। (४) इसका मूल रसायन, कृमिघ्न तथा कुष्ठघ्न है। फिरंग, उपदंश, सोजाक, अश्मरी तथा अन्य चर्मरोगों में इसका क्वाथ दिया जाता है एवं इसका लेप भी करते हैं। स्फीत कृमि (Ta- pe-worm) के लिये इसके चूर्ण को ४ माशा की मात्रा में खिलाते हैं। बिच्छू काटने पर इसकी 7 ताजी जड़ को घिस कर लगाते हैं। ७ भाव० नि०