भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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६४ भावप्रकाश निघण्टुः
(३) आमवात में इसके चूर्ण को एरण्ड तैल के साथ खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं। (४) रसायन के लिये इसके चूर्ण को घृत तथा मधु के साथ नित्य सुबह चाटना चाहिये जिससे किसी भी प्रकार के रोग नहीं होने पाते तथा आयु की वृद्धि एवं शरीर की कांति बढ़ती है। अथर्ववेद में भी इसके रसायन गुणों के साथ इसे शिरोरोग, तृतीयक ज्वर, कुष्ठ एवं कृमि रोगों के लिये उपयोगी माना है लेकिन आधुनिक विद्वान् मलेरिया, आंत्रिक कृमि, महलूष्ठ एवं आमवातादि में अनुपयोगी बतलाते हैं । (५) बार-बार आनेवाली हिक्का में यह औषध लाभदायक है। इसमें कूठ तथा राल का धूम्रपान कराया जाता है। (६) चर्मरोगों में यह बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है। व्रणों पर इसके मलहम का उपयोग किया जाता है। अरूंषिका (सर के क्लेदयुक्त फोड़े फुन्सी ) में इसका चूर्ण खपरैल में भूनकर तेल के साथ लगाया जाता है जिससे खुजली, जलन, पीडा एवं सर के व्रण आदि अच्छे होते हैं। मुख कान्ति वृद्धि के लिये इसे नींबू के रस में ७ दिन भिगोकर मधु के साथ मुख पर लगाना चाहिये । (७) एरण्डमूल के साथ इसको कांजी में पीसकर उसके लेप से शिरःशूल दूर होता है । (८) यह गुलाबजल में पीसकर हाथ पैरों की सूजन, उदरवृद्धि, शिरःशूल तथा मोच आदि पर लगाया जाता है । (९) चीन में इसका उपयोग बालों को काला करने के लिए मसाले के रूप में एवं धूपन के लिये किया जाता है तथा दन्तशूल में कस्तूरी के साथ उसे लगाते हैं। बालों को धोने के काम में भी इसका उपयोग होता है। मात्रा—चूर्ण २-१५ २०; तरळसव ३-२ ड्राम । प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण—कभी कभी सॉस्सुरिया हाइपोल्यूका (Saussurea hypoleuca) के मूल इसके प्रतिनिधि के रूप में व्यवहार में आते हैं। इसमें कभी-कभी लॅबियैटी (Labiateae) वर्ग की सलविया लॅनेटा (Salvia lanata) या लियुलॅरिया (Ligularia) के मूल, निर्विश (Kyllingia triceps), रास्ना भेद (Inula racemosa), कुछ हीन जाति के अंकोनाइट (Aconite) के मूल एवं सेनेसिओ जकेमाँन्टियानस् (Senecio jacquemontianus) जिसे काश्मीर में पोहकर कहते हैं आदि का व्यामिश्रण किया जाता है जिनको सूक्ष्मदर्शन यन्त्र एवं अन्य आकारादि द्वारा अलग पहचान सकते हैं। दक्षिण की तरफ कहीं-कहीं संभवतः केबुक (Costus speciosus-कोस्टस् स्पेशिओसस्) इसके स्थान पर लिया जाता रहा।
अथ कुष्ठभेदः-पुष्करमूलम्, तस्य नामानि गुणांश्चाह तर्कं पुष्करमूलं तु पौष्करं पुष्करञ्च तत् । पद्मपत्रञ्च काश्मीरं कुष्ठभेदमिमं जगुः ॥१७४॥ पौष्करं कटुकं तिक्तमूष्णं वातकफज्वरान् । हन्ति शोथारुचिश्वासान्विशेषात्पार्श्वशूलनुत् ॥ कूठ के भेद पोहकर मूल के नाम तथा गुण-पुष्करमूल, पौष्कर, पुष्कर, पद्मपत्र, काश्मीर और कुष्ठभेद ये सब पोहकर मूल के नाम हैं। पोहकरमूल-कडु तथा तिक्त रसयुक्त होता है और वात कफ ज्वर, शोथ, अरुचि तथा श्वास को दूर करता है। और यह विशेषतः पार्श्वशूल को नष्ट करने वाला होता है ॥ १७४-१७५ ॥
हरीतक्यादिवर्गः | ६५
५७ पुष्करमूल हिं०-पोहकरमूल, पुष्करमूल । बं०-पुष्करमूल, कुष्ठविशेष । म०-पुष्करमूल, बालवेखण्ड । गु०-पोहकरमूल । पं०-पोहकरमूल, इरप्ता । काश्मी०-पातालपद्मिनी । अ०-सोसन इरप्ता । फा०-बेख-इ-बनफ्शा । अं०-Orris root (ओरिस रूट) । ले०-Iris germanica, Linn. (आइरिस् जरमॅनिका, लिन) । Fam. Iridaceae (आइरिडेसी) । पुष्करमूल के सम्बन्ध में विद्वानों में कुछ मतभेद है। कुछ लोगों ने यह लिखा है कि पुष्कर- मूल के अभाव में कूठ लेना चाहिये । प्राचीन समय में इसका अभाव होगा ऐसा प्रतीत नहीं होता। आधुनिक विद्वानों में डा० देसाई ने पुष्करमूल को (ले०) आइरिस् जर्मॅनिका (Iris germa- nica) माना है लेकिन उसी को वह बालवच (हैमवती, श्वेतवचा) भी मानते हैं। कुछ अन्य विद्वान् पुष्करमूल को (ले०) इनूला रेसिमोसा (Inula racemosa) मानते हैं जिसको डा० देसाई ने 'रास्ना' माना है तथा बालवच (हैमवती, श्वेतवचा) को (ले०) आइरिस हेरसिकलर (Iris versicolor) मानते हैं। सभी विद्वान् पुष्करमूल का अंग्रेजी नाम ओरिस रूट (Orris Root) लिखते हैं। ओरिस रूट, (ले०) आइरिस फ्लोरेन्टिना (Iris florentina Linn) का मूल है। बम्बई के बाजार में (अं०) ओरिस रूट नाम से अधिकतर (ले०) आइरिस जर्मॅनिका के मूल बिकते हैं, जो उसी जाति का है। गुणों की दृष्टि से (ले०) आइरिस जर्मॅनिका के गुण कूठ से मिलते जुलते होने से इसका ग्रहण उचित जान पड़ता है। कुछ लोग कमल की जड़ को पुष्करमूल के नाम से लेते हैं जो बिलकुल गलत मालूम होता है। कूठ के स्थान पर लिये जाने वाले द्रव्यों को भी इसके स्थान पर कुछ लोग लेते हैं जो उचित नहीं है। (ले०) इनूला रेसिमोसा का वर्णन 'रास्ना' के अन्तर्गत किया जा चुका है। यहां पर निम्न वर्णन (ले०) आइरिस जर्मॅनिका का किया जा रहा है। यह इरान तथा काश्मीर में उत्पन्न होता है तथा काश्मीर में इसकी उपज भी की जाती है। इसका छोटा पौधा होता है। पत्ते-अनेक, चौड़े तथा तलवार के आकार के होते हैं। पुष्प-लम्बे दंड पर आते हैं। मूल-कठोर, पीताभश्वेत, ५ से १० से० मी० लम्बे तथा २-३ से० मी० चौड़े टुकड़ों में, चिपटे, वार्षिक वृद्धि के कारण उत्पन्न सान्तर संकोच युक्त, सुगन्ध युक्त एवं स्वाद में तिक्त रहते हैं। ३ साल पुराने पौधे की जड़ निकाल कर छील कर हल्की धूप में ५-६ दिन सुखाते हैं फिर ३ वर्ष तक बंद करके रखते हैं तब इसमें गन्ध आती है। ताजी अवस्था में यह गन्धहीन एवं स्वाद में कुछ कडु रहता है। मूल का उपयोग चिकित्सा के अतिरिक्त पाउडर में तथा सुगन्ध द्रव्य के रूप में किया जाता है। रासायनिक संगठन- इसमें उड़नशील तैल, आइरीडीन (Iridin) ग्लूकोसाइड, स्टार्च, शर्करा, राल, टैनिन तथा कैल्शियम ऑक्सेलेट आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- इसके गुण कूठ के समान हैं तथा यह उष्ण, आनुलोमिक, मूत्रजनन, उत्तेजक, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा में यह विरेचक तथा वामक है। इसका उपयोग श्वास, कास, पार्श्वशूल, कुपचन, अरुचि तथा पित्ताशय की बीमारियों में किया जाता है। हकीम लोग इसको विरेचक एवं मूत्रल मानते हैं तथा यकृत के विकारों में इसका प्रयोग करते हैं। दंतशूल तथा दांत हिलते हों तब एवं मुख दुर्गन्धि में इसके चूर्ण से मंजन किया