भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ भावप्रकाश निघण्टुः इसका बहुवर्षाणु क्षुप-बहुत दृढ़ होता है। काण्ड स्वावलम्बी, ४-७ फीट ऊँचा, बड़ा, जड़ की ओर छोटी उङ्गली प्रमाण मोटा होता है । पत्ते-कौशेय सदृश, विषम दन्तुर, खण्डित, आधरोय बहुत लम्बे, २-४ फीट, त्रिकोणाकार, लम्बे खण्डयुक्त सपक्ष डण्ठलवाले तथा ऊपर के छोटे । फूल-दृढ़ १ से १५ इन्च गोल, विनाल, गुच्छेदार, गहरे नील बैंगनी रंग के या काले । फल-०-३१ इन्च तक लम्बे, दबे हुये, मुड़े हुये चर्मलफल (Achene) । मूल-हलके मुरचर्र लाल या काले बादामी, हलके, दृढ़, सीधे, १ से ३ इन्च लम्बे, १ से १३ इन्च मोटे, छोटे छोटे उभारों से युक्त; मोटे टुकड़े अन्दर से पोले; इसके ठीक कटे हुये पृष्ठ में ३ भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं जिसमें से बाहरी भाग अंगूठी की तरह गोल, बीच का काष्ठमय भाग कुछ हलके रंग का तथा महीन किरणों के समान धारियों से युक्त एवं अन्दर में मध्यभाग; भग्न-छोटा तथा शृङ्गवत् (Horny) ; गंध-मधुर; स्वाद-कुछ कडवा । इन्हीं मूलों का व्यवहार औषध में किया जाता है। चक्रपाणि ने अच्छे कूठ की पहचान यह दी है कि उसे तोड़ने पर नीचे उसके कण अलग होकर नहीं गिरते तथा वह मृगशृङ्ग के समान होता है । कुछ लोग मीठा और कडवा कूठ करके दो भेद करते हैं और मीठा कूठ, पुष्करमूल को कहते हैं । शास्त्रीय गुणों में पुष्करमूल कटु, तिक्त कहा गया है लेकिन कूठ कटु और स्वादु लिखा गया है । इससे यह बात स्पष्ट है कि मीठा कूठ, पुष्करमूल नहीं है। कुछ लोगों ने इसका समाधान इस प्रकार किया है कि परिपक्व कूठ की मूल कडवी तथा अपक्व कूठ की मूल कुछ मीठी होती है। फारसी लेखक तिक्त कुष्ठ को कुस्त-ई-तल्ख और मीठे कूठ को कुस्त-ई-सिरीन् लिखते हैं और मीठे कूठ को पुष्कर मूल का अंग्रेजी नाम ओरिस्रूट बतलाते हैं। कूठ काश्मीर से चीन को बहुत जाता है जिसे वहां लोग धूप की तरह व्यवहार में लाते हैं। ऊनी वस्त्रों की कृमियों से रक्षा करने के लिये कूठ के टुकड़ों को उनमें रखते हैं। रासायनिक संगठन- इसके मूल में एक उड़नशील तैल १५-२५%, एक सॉसुराइन (Saussurine) नामक क्षाराम ०५%, राल ६%, इन्युलिन (Inulin) १८%, तैल, पोटेशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate), शर्करा तथा टैनिन आदि द्रव्य रहते हैं। एक अन्य कुष्टिन (Kushtin, C20H26O3) नामक तरल पदार्थ भी इससे प्राप्त होता है। इसके उड़नशील तैल में कोस्टस् लॅक्टोन (Costus lactone, C15H20O2) १२, कोन्दुसिक एसिड (Costusic acid, C15H22O2) १४, डीहाइड्रोकोस्टस् लॅक्टोन (Dihydrocostus lactone) १५, अॅप्लोटोक्सिन (Aplotoxin) २०, अॅल्फा-कोस्टेन (a-costene) ६, बीटा-कोस्टेन (B-Costene) ६, फेलॅन्ड्रेन (Phelandrene) ०.४, कॅम्फेन (Camphene) ०.४, तथा टरपेन ॲल्कोहोल (Terpene alcohol) ०.२% पाया जाता है। इसके पत्तों में भी क्षाराभ आदि पाये जाते हैं लेकिन उड़नशील तैल नहीं रहता। कुछ लोगों के मत से इसमें हॅलेरिक अम्ल (Valeric acid) के लवण तथा इसकी राख से मैंगनीज (Manganese) भी पाया जाता है। सॉसुराइन नामक क्षाराभ की क्रिया सुषुम्नाशीर्ष (Medulla) स्थित प्राणदा (Vagus) नाडी केन्द्र पर तथा श्वसनिका (Bronchioles) एवं पचनसंस्थान (Gastro-intestinal tract) की अनैच्छिक (Involuntary) मांसपेशी तन्तुओं पर अवसादक (Depressant) होती है जिससे श्वसनिकाओं का विस्तार (Relaxation) होता है। इससे रक्तचाप की कुछ वृद्धि होती है जो लगातार बनी रहती है तथा हृदय, विशेष कर उसके निलय (Ventricles) के संकोच तथा विस्तार की शक्ति बढ़ती है। श्वसनिका विस्तार की क्रिया अॅड्रेनलीन (Adrena- line) के जितनी तीव्र नहीं होती न यह उतनी जल्दी कार्य ही करता है लेकिन इसका प्रभाव अधिक समय तक बना रहता है। हरीतक्यादिवर्गः ६३ इसमें का उड़नशील तैल (Volatile oil) जीवाणुओं के लिये, विशेष कर स्तबक तथा माला गोलाणु (Staphylo and Streptococcus) के लिए प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्ग नाशक (Disinfectant) है। यह वातानुलोमक, हृदयोत्तेजक, कफनिःसारक एवं मूत्रल है तथा अनैच्छिक मांसपेशी तन्तुओं को यह शिथिल करता है जिससे श्वसनिकाओं का विस्तार होता है । केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर इसका प्रभाव अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही होता है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुफ्फुसों द्वारा होता है जिससे यह मूत्रल तथा कफनिःसारक है। इसका प्रवाही सत्व अधिक मात्रा में (१०-२० सी० सी०) यदि सेवन किया जाय तो उदर में कुछ प्रक्षोभ तथा बेचैनी होती है तथा तन्द्रा उत्पन्न होती है। कूठ का धूम्रपान केन्द्रीय वातनाडी संस्थान (Central Nervous System) में अवसाद उत्पन्न करता है और शायद यही कारण है कि अफीम के स्थान पर इसका धूम्रपान किया जाता है । गुण और प्रयोग-कूठ उष्ण, दीपन, पाचन, सुगन्धि, उत्तेजक कफनिःसारक, उद्वेष्टननिरोधी, कुष्ठ मूत्रल, वाजीकर, रसायन, आर्तवजनन, व्रणशोधक एवं रोपक, त्वक्दोषहर, प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्गनाशक (Disinfectant) है। इसका उपयोग फुफ्फुस विकार जैसे तमकश्वास, कास एवं कुपचन, विसूचिका, जीर्ण चर्मरोग, उन्माद, अपस्मारादि वातरोग, आमवात, वातकफज्वर, नष्टार्तव, कष्टार्तव, हृदयोदर, जलोदर तथा शिरःशूल आदि में किया जाता है। (१) तमकश्वास (Asthma) के लिए- यह औषध बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुई है। इसके लिए इसका मद्यसारोय प्रवाही सत्व १-२ ड्राम की मात्रा में या इसका चूर्ण दिन में ३, ४ बार दिया जाता है। रात को सोते समय तथा जब भी श्वास के आवेग की सम्भावना हो तो इसकी एक मात्रा देने से आवेग नहीं आता न इससे अॅड्रिनॅलीन (Adrenaline) के इन्जेक्शन वा दमे की सिगरेट आदि की तरह निद्रानाश आदि दुष्परिणाम ही होते हैं क्योंकि यह उद्वेष्टन निरोधि होने के साथ-साथ केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर इसका अवसादक प्रभाव भी होता है। इस औषध को १०, १५ दिन लगातार देकर फिर कुछ दिन रोककर देखना चाहिये कि फिर दौरा तो नहीं होता। यदि फिर दौरा हो तो फिर इसे देना चाहिये। इसका न तो कोई संचायि (Cumulative) दुष्परिणाम होता है न सहनशीलता (Tolerance) ही उत्पन्न होती है जिससे प्रत्येक बार मात्रा में वृद्धि करनी पड़े। इस औषध के प्रयोग के समय तमकश्वास के कारणों की अवश्य खोज करनी चाहिये तथा उनको दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि जब तक कारण दूर नहीं होंगे तब तक स्थायी लाभ नहीं हो सकेगा। यह प्राणदा नाडी की उत्तेजना से होने वाले आवेगों (हँगोटोनिक् टाइप = Vagotonic type) को रोकने में विशेष समर्थ है। इसके क्षाराम तथा तैल दोनों संयुक्त मिलकर कार्य करते हैं। तैल श्वसनिकाओं के उद्वेष्टन को दूर करने के साथ-साथ श्लेष्मा को भी बाहर निकालता है तथा उससे श्लेष्मलकला की सूजन दूर होती है। इसके प्रवाही सत्व को पोटैशियम् आयोड़ाइड के मिश्रण के साथ भी दे सकते हैं। इसका अल्प मात्रा में धूम्रपान भी लाभदायक है। (२) पाचन के विकार जैसे अजीर्ण, कुपचन, शूल, आध्मान, अतिसार एवं विसूचिका आदि में इससे युक्त अग्निसुख चूर्ण (चक्र.) १०-२० र० की मात्रा में सुरा आदि के साथ लाभदायक है। विसूचिका में बड़ी इलायची के साथ इसका फांट दिया जाता है। हृद्दौर्बल्यजन्य जलोदर में भी इससे पाचन सुधरता है तथा मूत्रवृद्धि होकर लाभ होता है।