भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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६० भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ ज्योतिष्मती (मालकांगनी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह ज्योतिष्मती स्यात्कटभी ज्योतिष्का कङ्गुनीति च । पारावतपदी $^{१}$पण्या लता प्रोक्ता ककुन्दनी ॥ ७१ ॥ ज्योतिष्मती कटुतिक्ता सरा कफसमीरजित् । अत्युष्णा वामनी तीक्ष्णा वह्निबुद्धिस्मृतिप्रदा ॥
**मालकांगनी के नाम तथा गुण—**ज्योतिष्मती, कटभी, ज्योतिष्का, कङ्गुनी, पारावतपदी, पिण्या, लता और ककुन्दनी ये सब नाम मालकांगनी के हैं। **मालकांगनी—**कटु तथा तिक्तरस युक्त, सारक (दस्तावर), कफ वातनाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, वमन करानेवाली और तीक्ष्ण एवं जठराग्नि, बुद्धि तथा स्मरणशक्ति को बढ़ाने वाली होती है ॥ १७१-१७२ ॥
५५ ज्योतिष्मती (मालकांगनी) **हिं०—**मालकांगनी, मालकौनी, मालटांगुन । **ब०—**लताफटकी, बनउच्छे । **म०—**मालकांगोणी, करडकंपोनी, पिंगवी, पेंगी । **क०—**करिगन्ने । **ते०—**बावंजी । **गु०, मा०—**मालकांगणां । ता०— वलुलुवै । **फा०—**काल । **अ०—**हब्बे किलिकिल् । **अं०—**Staff tree (स्टाफ् ट्री) । ले०—Celastrus paniculatus Willd. (सिलेस्ट्रस् पैनिक्युलेटस्) । Fam. Celastraceae (सिलेक्ट्रेसी) ।
यह हिमालय पहाड़ के उष्ण तथा साधारण जगहों में पंजाब, झेलम के आसपास तक समस्त भारतवर्ष की पहाड़ी भूमि में, पूर्वी बंगाल, बिहार, दक्षिण भारत, ब्रह्मा और सिलोन आदि प्रदेशों में होती है ।
इसकी सुविस्तृत काष्ठमय लता होती है जिसकी नवीन शाखाओं पर बहुत श्वेत बिन्दु पड़े रहते हैं। **पत्ते—**विषमवर्त्ता लगते हैं और आकार में कई प्रकार के होते हैं तथा गोलाई लिये किञ्चित् लम्बे, ऊपर से लट्वाकार, चिकने, चर्मवत् और नुकीले तथा गोल दांतों से युक्त धार वाले होते हैं। प्रायः इनकी लम्बाई २ से ४ इञ्च तक और चौड़ाई १।। से ३ इञ्च तक होती है। **फूल—**आध इञ्च के घेरे में पीलापन लिये हरे रंग के होते हैं। इन पर आध आध इञ्च के डोडे (डेंड़ी) लगते हैं जो गोलाई लिये किञ्चित् चिपटे, चमकीले, कच्ची अवस्था में हरे और पक होने पर पीले रंग के होते हैं और उनके आगे का हिस्सा फटे रहने से बीज दिखलाई पड़ते हैं। आषाढ़ एवं श्रावण के महीने में जब इसमें पक फलों के गुच्छे लगते हैं तब यह लता बहुत सुन्दर प्रतीत होती है। प्रत्येक फल में ३ खण्ड होते हैं। उनमें १ से ६ तक लगभग तिहाई इञ्च के काले बीज होते हैं और वे एक प्रकार के लाल आवरण से ढके रहते हैं।
**रासायनिक संगठन—**इसके बीजों में एक गाढ़ा, रक्ताभ, कड़वा और गन्धयुक्त तैल ३०%, एक कडवी राल, राख ५% और टैनिन् आदि द्रव्य रहते हैं। इसके बीजों को जलाकर पाताल यन्त्र द्वारा भी एक तैल निकाल सकते हैं।
**गुण और प्रयोग—**मालकांगनी के बीज उष्ण, स्वेदजनन, उत्तेजक, बुद्धि एवं स्मृतिवर्धक, वातहर, वातनाड़ी बल्य एवं त्वग्दोषहर हैं।
(१) इसके बीजों के साथ लोहबान, लवंग, जायफल और जावित्री मिलाकर पाताल यन्त्र द्वारा एक तैल निकाला जाता है जिसे कृष्णतैल (Black oil) या ओलियम् नाइग्रम् (Oleum Nigrum) कहते हैं। यह तैल विजगापट्टम्, मसुलिपट्टम और एलौर आदि स्थानों में बिकता है।
१. 'पण्ये'ति पाठान्तरम् ।
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हरीतक्यादिवर्गः ६१
यह तैल अत्यन्त उत्तेजक, मूत्रनिःसारक तथा स्वेदल होता है। नवीन बेरी बेरी (Beri Beri) नामक रोग में १० से १५ बूंद इस तैल को देने से बहुत लाभ होता है। या इसके बीजों को क्रमशः बढ़ाते हुये एक दिन में ५० बीजों तक सोंठ के साथ देते हैं। पहले इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है और बाद में जलशोथ कम होकर फिर संवेदनाशक्ति वापस आती है। जलोदर में भी इस तैल से लाभ होता है। मलेरिया ज्वर जैसी पीडा जब आमवात में होती है तब तथा अङ्गघात आदि में इसको रक्तोत्क्लेशक (Rubefacient) के रूप में लगाते हैं। बुद्धि बढ़ाने के लिये आठगुने मक्खन में इसे मिलाकर सर में लगाया जाता है ।
(२) इसके बीजों को दबाकर भी तेल निकाला जाता है। २ से १० बूंद की मात्रा में आमा- शय के रोगों में एवं बुद्धि तथा स्मृतिवृद्धि के लिये इसको खिलाते हैं। सुश्रुत में इस तैल को जलोदर के लिये हींग तथा जवाखार के साथ दूध में पीने को लिखा है। रसरत्नसमुच्चय में इसके तेल को स्मृति एवं बुद्धि वृद्धि के लिये बहुत उपयोगी माना है।
(३) इसके बीजों का क्वाथ अन्य सुगन्धित औषधों के साथ आमवात, वातरक्त, अंगघा- तादि वातरोग एवं कुष्ठ में लाभदायक है।
(४) इसके बीजों को व्रण के ऊपर पीसकर लगाने से न भरने वाले व्रण जल्दी भरते हैं।
**मात्रा—**कृष्णतैल–मूत्र वृद्धिकर १०–३० बूंद। स्वेदजनक ५–१५ बूंद। ज्ञानतन्तु उत्तेजक १०–२५ बूंद। दबाकर निकाला तैल २–१० बूंद।
अथ कुष्ठम् (कूठ) तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुष्ठं रोगाह्वयं वाप्यं $^{१}$ पारिभाव्यं तथोत्पलम् ॥ कुष्ठमुष्णं कटु स्वादु शुक्रलं तिक्तकं लघु । हन्ति वातास्रवीसर्पकासकुष्ठामहरुक्फवान् ॥ १७३ ॥
**कूठ के नाम तथा गुण—**कुष्ठ, रोगाह्वय (रोगवाची शब्द), वाप्य, पारिभाव्य तथा उत्पल ये सब कूठ के नाम हैं। **कूठ—**उष्णवीर्य, कटु, स्वादु तथा तिक्त रसयुक्त, शुक्रजनक और लघु होता है। और यह वातरक्त, विसर्प, कास, कुष्ठ, वायु तथा कफ को दूर करता है ॥ १७३ ॥
५६ कुष्ठ (कूठ) **हिं०—**कूठ, कूट, कुष्ठ । **बं०—**पाचक, कुर । **म०—**कोष्ठ, उपलेट । **गु०—**उपलेट, कठ । **क०—**कोष्ट । **ते०—**चेंगुलकोष्ठम् । **प०—**कुष्ठह, कुट, कोठ । **फा०—**कुष्ठ-ई-तल्ख । **अ०—**कुस्तबहेरी । काश्मी०— पोस्तखै, कूठ । **भोटिया०—**कुष्ठ । **ता०—**कोष्ठम्, गोष्ठम् । **अं०—**Costus root (कोस्टस् रूट) । ले०—Saussurea lappa, C. B Clarke (सॉस्सुरिया लप्पा) । Fam. Compositae (कॉम्पोजिटी) ।
इसके क्षुप काश्मीर तथा उसके आसपास के आर्द्र ढालों पर ८०००–१३००० फीट की ऊंचाई पर तथा चेनाव और झेलम नदियों के आसपास के प्रदेशों में १००००–१३००० फीट की ऊंचाई पर पाये जाते हैं।
१. व्याप्यमाप्यं वेति पाठान्तरे ।