भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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८८ भावप्रकाशनिघण्टुः वल्क सदृश एवं तीक्ष्णाग्र । पुष्प-द्विलिङ्गी, बहुत छोटे, १/७ इंच के घेरे में, श्वेत वा गुलाबी, शाखाओं के अन्त में गुच्छों के रूपमें । फली दै० इंच लम्बी। कृमिगृह (Galls- = गॉल्स) गोल, जायफल इतने बड़े, तीन कोणयुक्त, गांठदार, पीले, हरिताभ मटमैले तथा पुराने होने पर धूस- रित तथा स्वाद में कषाय एवं कडुवे । इसके विदेशी वृक्षों से एक प्रकार की शर्करा प्राप्त होती है जिसे गशंजबीन कहते हैं । यह शर्करा यहां की जलवायु में पतली हो जाती है तथा बजार में मधु के समान गाढ़ा पीत पदार्थ इस नाम से मिलता है । बजारू शर्करा में अन्य वृक्षों से प्राप्त शर्कराएं भी मिली रहती हैं । भारतीय वृक्षों से यह शर्करा प्राप्त नहीं होती । रासायनिक संघटन —इसमें ४०% तक टॅनिक ॲसिड होता है । गजंजबीन में विभिन्न शर्कराएं होती हैं । गुण और प्रयोग —इसके कृमिगृह ( गॉल ) माजूफल तथा छो. माई के समान ग्राही, स्तम्भन तथा रक्तस्तम्भक होते हैं । गजंजबीन मृदु विरेचक तथा कफघ्न है। इससे पाखाना पतला होता है लेकिन इससे आंत्र को कोई नुकसान नहीं होता । इसके पञ्चाङ्ग की राख मूत्रल एवं संसन होती है तथा पञ्चाङ्ग का क्वाथ ग्राही, शिथिलता दूर करने वाला एवं बल्य होता है । (१) गजंजबीन मीठा तथा सौम्य होने के कारण बच्चों को दस्त साफ होने के लिये व्यव- हार में लाया जाता है। इसके लिये इसको दूध के साथ दे सकते हैं । अनेक विरेचक एवं कफघ्न मिश्रणों में यह प्रयुक्त होता है । (२) कृमिगृह ( गॉल ) का प्रयोग माजूफल के स्थानपर किया जाता है। ग्राही होने के कारण यह अतिसार, आमातिसार, संग्रहणी, अत्यार्त्तव, रक्तष्ठीवन एवं प्रदर में लाभदायक है । इसके लिये चतुर्गुण जल में इसका फांट बनाकर २ से ४ तोले की मात्रा में पिलाते हैं । (३) इसके फांट का उपयोग दुष्ट व्रण तथा बद (Bubo ) के प्रक्षालन के लिये तथा मुखपाक, गले की तकलीफ एवं दन्त तथा मसूढ़ों की दुर्बलता में कुल्ला करने के लिये किया जाता है । (४) इसके पत्तों का लेप शोथघ्न है तथा प्लीहा एवं यकृत वृद्धि पर इसका लेप किया जाता है । मसूरिका, दूषित व्रण एवं अर्श में इसका धूआं दिया जाता है । (५) काले रंग का इसके पञ्चाङ्ग का घन काथ झाव नाम से काठियावाड़ में बिकता है तथा गलशुण्डी वृद्धि, गले की शिथिलता तथा शुष्क कास में इसको चटाते हैं । (६) इसके कृमिगृह ( गॉल ) का चूर्ण ४ से ८ माशा, अफीम २ माशा, एवं हेंसलीन २ तो० इनका मलहम बनाकर व्रण युक्त अर्श एवं गुद विदार ( Anal fissure=अॅनलफिशर् ) पर लगाते हैं । यह मलहम विदेशी गॉल से बने इसी प्रकार के डाक्टरी मलहम के समान ही लाभदायक होता है । (७) झाऊ की लकड़ी के पात्र में जल पीने से प्लीहा वृद्धि शीघ्र कम हो जाती है । मात्रा—कृमि गृह ( गॉल ) चूर्ण २-४ माशा; गशंजबीन १-४ माशा । (ग) Hibiscus cannabinus Linn. (हिबिस्कस् कॅन्नाबिनस् ) । Fam. Malvaceae ( माल्वेंसी ) । सं०-मात्रिका (?) अम्बष्ठा । हि०-मोइया, अम्बारी, पटसन, पड़वा, सन, कुद्रुम । ब०-मेस्ता- पाट । क०-पुडोम । म०-अम्बाडी । गु०-भिंडी, अम्बोई । ता०-पुलुड्डु । ते०-गोगुकुरू । सम्ता०- डरेकुद्रुम । उडि०-कनुरिया । सिन्ध-सज्जाडो । अं०-Indian hemp ( इण्डियन हेम्प ); Jute हरीतक्यादिवर्गः ८६ ( जूट ); Deccan hemp ( डेक्कन हेम्प ); Bimlipatam Jute (बिमलीपटन्रूट), Ambari hemp ( अम्बारी हेम्प ) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है परन्तु पश्चिमीघाट के पूर्व में यह आपही आप जङ्गली उत्पन्न होता है । इसका क्षुप-३ से ५-६ हाथ तक ऊँचा होता है और इस पर सूक्ष्म कांटेदार रोवें होते हैं । जड़ की ओर के पत्ते गोलाकार किञ्चित् कटे किनारे वाले होते हैं किन्तु ज्यों ज्यों पौधे बढ़ते जाते हैं त्यों त्यों पत्ते का आकार बदलता जाता है । ऊपर के पत्ते ५-७ भागों में विभक्त हो जाते हैं और प्रत्येक भाग दन्तुर होता है। फूल-पीले रंग के आते हैं । पुष्पदल के मध्य का हिस्सा बैंगनी रंग का होता है । डोडी (फल)-गोलाकार नुकीली होती हैं। बीज-भूरे रंग के होते हैं। इसका सर्वाङ्ग खट्टा होता है । तन्तु ( Fibre के लिए इसकी काफी खेती की जाती है, विशेषकर दक्षिण में । रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक प्रकार का खाने योग्य तैल पाया जाता है । गुण और प्रयोग—इसके पत्र तथा पुष्प विरेचक, रुचिकारक तथा हृद्य हैं । पित्तमयता में इनका शाक बनाकर खाया जाता है । इसके पुष्पों का १ तो० स्वरस मरिच एवं मिश्री के साथ पित्त प्रकोप में दिया जाता है, जिससे शौच साफ हो जाता है । इसके बीजों के तेल को पीड़ा एवं मोच आदि पर मलते हैं तथा पुष्टि एवं वाजीकरण के लिए इस तैल का सेवन करते हैं । तीसी और तिल में तेल निकालते समय इसके बीज की मिलावट की जाती है । अथ तेजवती । ( तेजवल्कल १ 'तेजबळ' इति च लोके) तस्या नामानि गुणांश्चाह- तेजस्विनी तेजवती तेजोह्वा तेजनी तथा ॥ १६९ ॥ तेजस्विनी कफश्वासकास्याम्यवातहृत् । पाचण्युष्णाऽरुचिस्तक्कारुचिवह्निप्रदीपिनी ॥ १७० ॥ तेजवती ( तेजवल्कल या तेजबुल नाम से भी लोक में प्रसिद्ध द्रव्य ) के नाम तथा गुण - तेज- स्विनी, तेजवती, तेजोह्वा तथा तेजनी ये सब तेजबुल के नाम हैं । तेजबुल-कफ श्वास, कास, मुखसम्बन्धीरोग तथा वायु को नष्ट करनेवाला होता है । तथा यह पाचक, उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त- रसयुक्त, रुचिकारक एवम् अग्निदीपक होता है ॥ १६९-१७० ॥ ५४ तेजवती ( तेजबुल ) हि०-तेजबल । म०-ब०-गु०-तेजबुल । अं०-Toothache Tree (टूथएक ट्री ) । ले०- Zanthoxylum alatum Roxb. (झॅन्थोक्सइलम् एलैटम् ) । Fam. Rutaceae ( रूटेसी ) । जिस वनौषधि का परिचय 'तुम्बुरु' के नाम से दिया जा चुका है उसी वृक्ष की छाल को तेजबल और कालीमिरच के आकार वाले तथा फटे मुखवाले फल को 'तुम्बुरु' कहते हैं। कुछ लोगों ने उसी वंश की अन्य जाति को तेजबुल लिखा है जिसके फलों को भी दन्तशूल में दबाने के लिए देते हैं । १. 'तेजबुल' स्थाने 'तेजपात' इति पाठान्तरम् ।