भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 143 में से

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८६ भावप्रकाश निघण्टुः (२) प्रसव के समय आविवृद्धि के लिये पिपरामूल के साथ देते हैं तथा अनार्तव, कष्टार्तव एवं प्रसव पश्चात् भी इसका उपयोग किया जाता है। गर्भपात करने के लिये भी इसका लोग उपयोग करते हैं। (३) मिरिच के साथ इसका प्रयोग पाचन के विकार जैसे कुपचन, अतिसार एवं शूल आदि में बहुत लाभदायक है। बच्चों में दन्तोद्भव के समय इसका अधिक व्यवहार किया जाता है। (४) सर्पविष तथा अन्य विषों के लिये भी इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। सर्पविष में इसके पत्तों का रस अथवा चूर्ण को काली मिर्च के साथ खिलाते हैं तथा बाह्य लेप भी करते हैं। (५) मधु के साथ श्वित्र पर इसका स्वरस लगाया जाता है। (६) बच्चों के विबन्ध में इसके पत्तों का लेप उदर पर किया जाता है। व्यामिश्रण- इसकी कई जातियां इस औषधि में मिली रहती हैं जिसमें से अँ० ब्रॅक्टियाटा (A. bracteata Retz.), अँ० टैगॅला (A. tagala Cham.) आदि मुख्य हैं जिनके पत्र की आकृति में अन्तर रहता है। मात्रा - पंचाङ्ग चूर्ण ५-१५ र०; टिंक्चर ३-१ तो० ।

अथ माचिका (पश्चिमदेशे 'मोइआ' इति लोके प्रसिद्धो वृक्षविशेषः) तस्या नामानि गुणांश्चाह - माचिकाप्रस्थिकाऽम्बष्ठा तथा चाम्बालिकांडबिका । मयूरविदला केशीसहस्रा बालमूलिका ॥ माचिकाऽम्ला रसे पाके कषाया शीतला लघुः । पक्कातीसारपित्तास्रकफकण्ठामयापहा ॥ मोइया (पश्चिम देश में प्रसिद्ध वृक्ष विशेष) के नाम तथा गुण - माचिका, प्रस्थिका, अम्बष्ठा, अम्बालिका, अंबिका, मयूरविदला, केशी, सहस्रा और बालमूलिका ये सब मोइया के नाम है। मोइया-अम्लरसयुक्त, परिपाक में कषाय रसयुक्त, शीतल तथा लघु होती है और पक्कातीसार, रक्तपित्त, कफ तथा कण्ठसम्बन्धी रोगों को दूर करती है ॥ १६७-१६८ ॥ ५३ माचिका (मोइया) माचिका के सम्बन्ध में विद्वानों में कुछ मतभेद है। कुछ लोगों ने इसको (ले०) सोलेनम् नाइग्रम् (Solanum nigrum) लिखा है लेकिन यह तो काकमाची (छोटी मकोय) का नाम है। अन्य लोगों ने इसको (ले०) हिबिसकस कंनाबिनस् (Hibiscus cannabinus) लिखा है जो पटुआ (पटसन) का नाम है तथा इसके गुण भी शास्त्रीय माचिका के गुणों से मिलते नहीं। छोटी माई तथा बड़ी माई जिन्हें क्रमशः (ले०) टॅमॅरिक्स आर्टिक्युलेटा तथा टॅ. गॅलिका (Tam- arix articulata & T. gallica) कहते हैं उनके गुण माचिका के शास्त्रीय गुणों से मिलते होने के कारण इन्हीं का व्यवहार माचिका नाम से करना चाहिये । माई के अर्थ में माचिका का वर्णन नीचे दिया जा रहा है तथा प्रसङ्गवश पटुआ का वर्णन भी आगे दिया जायगा। कुछ लोगों ने बड़ी माई को हाऊबेर माना है जो गलत है। हाऊबेर का वर्णन पहले ५० पृष्ठ पर आ चुका है। (क) Tamarix articulata Vahl (टॅमॅरिक्स आर्टिक्युलेटा) । Fam. Tamaricaceae (टॅमॅरिकेसी)। सं०-झावुक । हिं०-लाल झाऊ, झाव, (कृमिगृह-छोटी माई) । बं०, गु०-झाऊ। पं०- परवन, फरस, फरवा । सिं०-लई, असरेले । इरा०-मझबरू अझ्वा । यू०-सुम्रत् अल् अस्ल ।

हरीतक्यादिवर्गः ८७ इसकी झाड़ी उत्तर भारत में नदी के किनारों पर उत्पन्न होती है। सिंध तथा पञ्जाब में यह अधिकता से पाई जाती है तथा इसकी उपज भी की जाती है। इस झाड़ी के कृमि गृहों (Galls-गॉल्स) को छोटी माई, मगिया मैन, छोटी मैन आदि कहा जाता है। यद्यपि इन्हें लोग फल कहते हैं तथापि ये फल न हो कर एक प्रकार के कृमियों द्वारा निर्मित गृह होते हैं। ये गोल, ग्रन्थि युक्त, चने के बराबर तथा पीताभ धूसरित रङ्ग के होते हैं। ये त्रिकोणाकृति के नहीं होते। औषधि में ये कृमिगृह, इसकी छाल तथा पञ्चांग के क्षार का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक सङ्घटन - छोटी माई में माजूफल में होने वाला गॅलिक् (Gallic) तथा टॅनिक् (Tannic) अम्ल बहुत होता है। रेतीली तथा समुद्र के किनारे होने वाली झाड़ी के पंचांग की राख में खारा नमक (Sodium sulphate सोडियम् सल्फेट) बहुत होता है। गुण और प्रयोग-छोटी माई माजूफल के समान ही गुण वाली है। यह ग्राही, स्तम्भन तथा रक्त स्रावावरोधक है। इसकी छाल तिक्त, ग्राही तथा बल्य होती है। छोटी माई का प्रयोग माजूफल के स्थान पर किया जाता है। (१) यह उत्तम संग्राह्यी होने के कारण पित्तज अतिसार, रक्तातिसार तथा रक्ताशं में उपयोगी है। (२) इसमें रक्तस्तम्भक गुण बहुत प्रबल होता है। अतः इसका उपयोग रक्तष्ठीवन, नासा- रक्त स्राव तथा प्रदर आदि रक्त स्रावी व्याधियों में मुख द्वारा एवं स्थानीय प्रयोग के रूप में किया जाता है। (३) गुल्म, प्लीहा, श्वेत प्रदर, शीघ्रपतन एवं शुक्रतारल्य आदि में भी इससे लाभ होता है। (४) इसकी छाल, कबीला एवं तैल का प्रयोग वाजीकरण के लिये किया जाता है। (५) इसका प्रलेप सिर के अपरस (Eczema-एक्झिमा) में किया जाता है। (६) गलशुण्डी वृद्धि तथा दन्तशूल में इसके चूर्ण का मञ्जन तथा काढ़े का कुल्ला कराया जाता है। मात्रा-छो. माई चूर्ण २-४ मा०; छाल ३-१ तो० क्वाथ बना कर । (ख) Tamarix gallica Linn. (टॅमॅरिक्स गॅलिका)। Fam. Tamaricaceae (टॅमॅरिकेसी)। सं०-झावुक । हिं०-झाऊ, झाव, पडवास, (कृमिगृह-बड़ी माई) । बं०-बोनझाऊ, झाउ, (कृमिगृह-बड़ी माई) । म०-झाऊ, (कृमिगृह-मगिया माई, बड़ी मुई ) । पं०-झाऊ, पिलची, (कृमिगृह-बड़ी मांडी) । ता०-सिरुसडुक्कु । ते०-एरूसारू । उर्दू-जद्देव । इरा०-गझनाझू । यू०-सुम्रात उल् तुफार्ह । अँ०-Tamarix (टॅमॅरिक्स), Tamarisk (टॅमॅरिस्क) । इसकी झाड़ी भारत के सभी भागों में विशेष कर पञ्जाब तथा उत्तर प्रदेश में होती है। बंगाल में यह नदियों के किनारों एवं आर्द्र भूमि में उत्पन्न होती है। यह सिन्ध, बलूचिस्तान, इरान एवं अफगानिस्तान में भी बहुत होती है। इसकी झाड़ी छोटी माई की झाड़ी की अपेक्षा बड़ी होती है तथा कभी २ इसके छोटे वृक्ष भी देखने में आते हैं। शाखाएं-पतली तथा आपस में मिली हुई। पत्र-सूक्ष्म, विनाकोषयुक्त, चिकने,