भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८४ भावप्रकाश निघण्टुः रसमें के अज्मैलाइन, सर्पेन्टाइन् और सर्पेन्टिनाइन् क्षाराम केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान को उत्तेजित करते हैं जिसमें से सर्पेन्टाइन् अधिक प्रभावशाली तथा विषैला है। इन ३ क्षारामों से रहित सम्पूर्ण क्षाराम तथा मद्यसारीय सत्व (Alcoholic extract) में शामक (Sedative) एवं निद्राकर (Hypnotic) गुण हैं। कुछ क्षाराम मिश्रित रूप से हृदय, रक्तवाहिनी एवं रक्तवाहिनी नियन्त्रक केन्द्र (Vaso-motor centre) के लिये अवसादक (Depressant) हैं। इसका निद्राकर (Hypnotic) प्रभाव क्षाराम की अपेक्षा प्रधानतया इसके रालीय भाग में है। इसके शामक गुणों के कारण पागलपन एवं अन्य मानसिक व्याधियों में इसके मूल का बहुत व्यवहार हो रहा है तथा इसके मद्यसारीय सत्व का उपयोग रक्तचाप (Blood pressure) को कम करने के लिये किया जा रहा है। इधर कुछ दिनों से इस औषधि के संबंध में विदेशों में विशेष अनुसन्धान किया जा रहा है और इसके कार्यकारी सत्व को रीसर्पाइन् (Reserpine) नाम दिया गया है जो मूल की अपेक्षा १ हजार गुना अधिक कार्यकारी कहा जाता है। यह नाड़ीकेन्द्रों में अवरोध (Ganglionic blockade) उत्पन्न नहीं करता वरन् ऐसा मालूम होता है कि रक्तचाप को कम करने का इसका प्रभाव कुछ अंश में स्वतन्त्र नाड़ी संस्थान के केन्द्रीय निरोध (Central inhibition of sym- pathetic nervous system) के कारण है। गुण और प्रयोग—यह तिक्त पौष्टिक, शामक, निद्राकर, ज्वरहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं विषहर है। इसका उपयोग बालतिसार और हैजे में ईश्वर मूल के साथ, उदरशूल में जंगली एरण्डमूल के साथ, रक्तातिसार में कुटज के साथ तथा जीर्णज्वर में मिरिच, घोडवच, डिकेमाली, चिरायता एवं विडलवण के साथ किया जाता रहा है। प्रसव के समय आवि (Uterine contra- ction) वृद्धि के लिये एवं सर्पविष एवं अन्यान्य विषों को दूर करने के लिये भी इसको उपयोग में लाते हैं। सर्पविष में इसके १ से २ तो० मूल को जल में घिसकर पिलाते हैं तथा इसका लेप भी किया जाता है। नेत्र शुक्र में इसके पत्तों का रस आँख में डालते हैं। उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त यह औषधि युक्तप्रान्त तथा बिहार के प्रान्तों में पागल की दवा के नाम से बहुत दिनोंसे प्रसिद्ध है तथा इस कार्य के लिये बहुत दिनों से सफलतापूर्वक व्यवहार में लाई जा रही है। इधर विदेशी शास्त्रज्ञों ने इसके गुणों से आकृष्ट होकर इसका प्रयोग करना शुरू किया है तथा आज यह रक्तचाप (Hyperpiesis), वातिक उन्माद, अनिद्रा एवं अन्यान्य मानसिक विकारों के लिये बहुत उत्कृष्ट औषधि सिद्ध हुई है। इस औषधि के प्रारम्भ करने के पश्चात् २ से ७ दिनों में इसका असर प्रारम्भ होता है तथा ३-६ सप्ताह में इसका पूर्ण प्रभाव स्पष्ट होता है तथा इसको बन्द करने के पश्चात् १ से ३ सप्ताह में इसका असर निकल जाता है। इसके उपयोग से मानसिक प्रक्षोभ दूर होकर शान्ति मिलती है एवं शिरःशूल, भ्रम आदि दूर होते हैं। रक्त चाप (Blood pressure) की अधिकता के लिये यह सबसे कम विषैली तथा उत्कृष्ट औषधि है। इसमें एक विशेष लाभ यह है कि इससे एकाएक आसन परिवर्तनजन्य रक्तभाराल्पता (Postural hypotension) तथा बहुत अधिक रक्तभाराल्पता नहीं होती। अधिक मात्रा में लेने से अतिसार या अनिष्ट स्वप्न (Nightmares) होते हैं लेकिन कोई तीव्र दुष्परिणाम नहीं होते। इसके अवांछनीय गुण जैसे रक्तचाप की कमी एवं मन्दहृदयता आदि चिकित्सा काल में बराबर बने रहते हैं। इसके उपयोग के समय नाक में रक्ताधिक्य (Nasal congestion), शरीर भार वृद्धि, बृहदान्त्र की गति वृद्धि तथा कुछ लोगों में मैथुन शक्ति (Libido) का ह्रास होता है। इसके उपयोग मे निद्रा की अपेक्षा हरीतक्यादिवर्गः ८५ तन्द्रा आती है तथा घबड़ाहट, चिड़चिड़ापन, तनाव, हृदय की धड़कन, एवं थकावट आदि दूर होकर रोगी को बहुत आराम मिलता है। रक्तभार की अधिकता में प्रथम इसी औषधि को प्रारम्भ करना चाहिये। इसके चूर्ण की मात्रा १ रत्ती से लेकर १ माशे तक दी जा सकती है। यदि ६ सप्ताह में लाभ न हो तो अन्य औषधियां उसके साथ मिलाई जा सकती हैं। अंग्रेजी दवा की दुकानों में इसकी गोलियां तथा इसके सत्व की गोलियां बिकती हैं जिनका उपयोग सुगमता की दृष्टि से किया जा सकता है। रीसर्पाइन नामक इसके सत्व का उपयोग तमकश्वास, सप्रणस्थूलान्त्रशोथ (Ulcerative colitis), पैत्तिकशूल, वृक्कशूल एवं मानसिक अवसाद (Mental depression) आदि अवस्थाओं में नहीं करना चाहिये। व्यामिश्रण—इस में रा कैनेसेन्स (R. canescens Linn.) तथा रा. डेन्सिफ्लोरा (R. densiflora Benth.) के मूल की मिलावट होती है। मात्रा—चूर्ण १ से २ माशा। ५२ नाकुली ? (ईश्वरमूल) सं०-नाकुली, ईश्वरी, अर्कमूल । हि०-ईशारमूल, रुद्रजटा । म०-सापसन । ब०-ईशरमूल । गु०-नोलवेल । ता०-इचचुरामूली । ते०-ईश्वरवेरु । उडि०-गोपोकरोनि । अ०, फा०-जरवन्दे हिन्दी । उर्दू०-शपेसन्द । अं०-Indian birthwort (इन्डियन बर्थवर्ट) । Aristolochia indica Linn. (परिस्टोलोकिआ इन्डिका) । Fam. Aristolochiaceae (परिस्टोलोकि- एसी)। इसकी लता भारतवर्ष के सभी भागों में विशेष कर दक्षिण कोंकण में होती है। इस लता के कांड लम्बे, २-४ इञ्च मोटे, गोल, चिकने तथा लम्बाई में धारियों से युक्त एवं कपूरवत् गंधयुक्त होते हैं। पत्र-हरे, डण्ठल की तरफ चौड़े तथा अग्र पर नुकीले विभिन्न आकार के एवं ५ शिराओं से युक्त । पुष्प-सद्पिण्डक हरित् । बीज-अण्डाकार, चपटे एवं पंखयुक्त । मूल-गांठदार, शाखाओं से युक्त, मोटा भाग ४-६ इञ्च, हलके बादामी रंग के तथा मूलत्वक् मोटी, कहीं २ अलग भई हुई । काष्ठ-श्वेत । भग्न-तन्तुमय । स्वाद-कुछ कड़ुआ । इसके पञ्चांग का व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें ॲरिस्टोलोचीन (Aristolochine) नामक तीन विभिन्न क्षार (Bases) पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें ३ भूयात्य अम्ल (Nitrogenous acids) जिन्हें अॅरिस्टिनिक् (Aristinic), अॅरिस्टिडिनिक् (Aristidinic) और अॅरिस्टोलिक् (Aristolic) अम्ल कहते हैं तथा एक उड़नशील तैल जिसमें शायद बोर्निओल (Borneol) रहता है एवं राल, टैनिन् एवं स्टार्च आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह बल्य, उत्तेजक, गर्भाशयसंकोचक, ज्वरहर, शूलहर तथा विषहर है। अल्प मात्रा में यह आमाशय के लिये उत्तेजक है लेकिन अधिक मात्रा में स्थानिक प्रक्षोभ उत्पन्न होकर हृल्लास, मरोड़, शूल तथा कभी २ वमन एवं कुंथन भी होता है। ॲरिस्टोलोचीन् (Aristolochine) की क्रिया अॅलोइन (Aloin) के समान होती है लेकिन उससे यह विषैला है। यह उच्च श्रेणी के जानवरों में पाचन संस्थान तथा वृक्क में प्रक्षोभ उत्पन्न करता है तथा संन्यास एवं श्वसनाघात से मृत्यु होती है। (१) इसके चूर्ण का उपयोग ज्वर, आमवात, संधिशोध एवं जलोदर आदि में बहुत लाभदायक है।