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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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रासायनिक संगठन--इसमें टाइलोफोराइन (Tylophorine, C24 H27 O4 N), टाइलो- फोरिनाइन् (Tylophorinine, C23 H27 O4 N, 0.5 H2 O), ये दो रवेदार क्षाराम, एक उडनशील तैल ०.२६%, एक रंगहीन रवेदार अन्य पदार्थ ०.१८%, खनिज (Mineral matter) १५% तथा एक वामक द्रव्य आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग--इसके मूल तथा पत्र अच्छे वामक, कफनिःसारक, स्वेदल, रक्तशोधक, आनुलोमिक एवं आमपाचक हैं। यह एपीकैक के अच्छे प्रतिनिधि हैं। अल्प मात्रा में इससे खांसी दमा, बच्चों की कुक्कुर खांसी, अतिसार एवं संग्रहणी आदि में बहुत लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह वामक तथा अधिक बार प्रयोग से वमन के साथ विरेचन भी होता है। (१) यह १ मा० की मात्रा में चूर्ण के रूप में अतिसार, रक्तातिसार एवं संग्रहणी आदि में देने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ सोंठ, गोंद या अल्प मात्रा में अफ़ीम मिलाई जा सकती है। (२) कफ विकारों में इसके चूर्ण को घोडवच एवं मुलेठी आदि के साथ देने से लाभ होता है। (३) प्रसूति के बाद स्रावशुद्धि के लिए इसका उपयोग करते हैं। (४) अजीर्ण आदि में वमन कराने के लिये ४ इञ्च लंबी ताजी जड़ की छाल जल में घिस कर देने से वमन होता है या १-२ माशा पत्र चूर्ण जल के साथ दिया जाता है। (५) इसको रसायन तथा रक्तशोधक मानते हैं एवं आमवात, फिरंगज आमवाताभ विकृति, सन्निपात, शरीरपीड़ा एवं सर्पदंश आदि में इसका उपयोग करते हैं। (६) वातरक्त में इसके मूल का बाह्यलेप किया जाता है। मात्रा-३-१० र०; वामक १-२ मा०। इन उपर्युक्त वनस्पतियों के अतिरिक्त मद्रास की तरफ कुलिञ्जन का व्यवहार रास्ना के नाम से कुछ लोग करते हैं तथा धवलबरुआ और सर्पाक्षी-ले० ओफिओराइज्झा मुन्गोस् (Ophiorr- hiza mungos Linn.) एवं अन्य अनेक औषधियां भी रास्ना नाम से ली जाती हैं। इनमें से प्रथम ३ औषधियां अधिक प्रचलित हैं। नोटः-सर्पाक्षी का वर्णन गुडूच्यादि वर्ग तथा धवलबरुआ का वर्णन नाकुली में किया गया है।

अथ (रास्नाभेदः) नाकुली नामगुणानाह नाकुली सुरसा नागसुगन्धा गन्धनाकुली । नकुलेष्टा भुजङ्गाक्षी सर्पाक्षी विषनाशिनी ॥ नाकुली तुवरा तिक्ता कटूकोष्णा विनाशयेत् । भोगिलूतावृश्चिकाखुविषज्वरकृमिव्रणान् ॥ नाकुलीकन्द के नाम तथा गुण-नाकुली, सुरसा, नागसुगन्धा, गन्धनाकुली, नकुलेष्टा, भुजङ्गाक्षी, सर्पाक्षी तथा विषनाशिनी ये सब नाम 'नाकुलीकन्द' के हैं। नाकुलीकन्द-कषाय, तिक्त एवं कटरसयुक्त तथा उष्णवीर्य होता है। और सर्प, मकड़ी, बिच्छू तथा मूसा इन सबों के विषको दूर करने वाला एवं ज्वर, कृमि तथा व्रण को भी नष्ट करने वाला होता है ॥ १६५-१६६ ॥

५१ नाकुली (धवलबरुआ, सर्पगन्धा) हि०-नकुलकन्द, नाकुलीकन्द, नाई, हरकाई चन्द्रा, रास्नाभेद, छोटाचांद । उड़ीसा, बिहार- धनेंदना, धनबरुआ, धवलबरुआ, सनोचांडो । बं०-नाकुली, गन्धरास्ना, चन्द्र । म०-अडकई, चन्द्र । ०-नोलवेल, अमेलपोदी । क०-सूत्रनाभि । ते०-पातालभगंधि । मा०-हरकय । मलयां०-चुवन्ना अविलपोरी । फा०-छोटाचान्दा । ले०-Rauwolfia serpentina Benth. ex Kurz- (रॉवोल्फिया सर्पेन्टाइना) । Fam. Apocynaceae (एपोसइनेसी) । वैद्य समाज में नकुलकन्द भी एक सन्दिग्ध वनौषधि है। कुछ लोगों ने नाकुली को ले०-एरिस्टोलोकिया इण्डिका (Aristolochia indica Linn.), ईश्वरमूल लिखा है तथा श्री ठा० बलवन्त सिंह जी भी उनसे सहमत होते हुए सर्पगन्धा नाम भी उसी के (नाकुली) लिये तथा धवलबरुआ के लिए राजनिघण्टु का जम्बू नाम उचित समझते हैं जिसको श्री भगीरथ स्वामी ने माना है। प्राचीन ग्रंथों में केवल सुश्रुत के अमानुषोपसर्गाध्याय में मानसरोगहर अपराजितगण में सर्पगन्धा नाम का उल्लेख मिलता है। यहां पर पहले वर्णन 'रावोल्फिया' का दिया जा रहा है जिसके बाद ईश्वरमूल का स्वतंत्र वर्णन दिया जावेगा । धवलबरुआ के क्षुप हिमालय के निचले प्रदेशों में सरहिन्द से लेकर पूर्व में आसाम तक विशेष कर देहरादून, सिवालिक पहाड़ी भाग तथा रोहिलखण्ड, उत्तरी अवध और गोरखपुर के हिमालय के निचले भाग में ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं कोंकण, उत्तरी कनारा, दक्षिणी महाराष्ट्र प्रान्त, मद्रास के पूर्वी तथा पश्चिमी घाट में ३००० फीट तक और बिहार के अनेक भाग में जैसे पटना, भागलपुर तथा उत्तरी एवं मध्य बंगाल, बर्मा, श्याम और जावा आदि स्थानों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप छोटा, आकर्षक, १ से २ फीट ऊँचा क्वचित् ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्र-हरे, चमकीले, ३-७ इंच लम्बे, १॥-२॥ इंच चौड़े, भालाकार या व्यस्तभालाकार, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र, आधार की ओर पतले होकर ३ क्षुद्र पत्रनाल से युक्त एवं टहनी के प्रत्येक गांठ पर ३-४ के चक्री में (Whorled)। पुष्प-श्वेत या साधारण गुलाबी गुच्छों में, २-४ इञ्च लम्बे पुष्प दण्डों पर । फल-छोटे, मांसल एक या दो दो जुड़े हुये पकने पर बैगनी काले । मूल-सर्प की तरह टेढ़ा मेढ़ा, करीब १५ इञ्च तक लम्बा, ।।३ इ० मोटा, खुरदरा, कुछ कुछ झुर्रियों से युक्त, शाखाओं से युक्त और उस पर लम्बाई में धारियां रहती हैं। इसे तोड़ने पर भग्न छोटा एवं अनियमित । मूल की छाल धूसरित पीत (Greyish yellow) तथा अन्दर का काष्ठ श्वेत। स्वाद में अत्यन्त कडवा तथा गन्धहीन । इसके मूल को तोड़कर कटे भाग पर २ भाग शोरे का तेजाब (Nitric acid) और १ भाग जल मिले घोल के २ बूंद डालने से मेड्युलरी रेज् (Medullary rays) विशेष कर अन्तःचर्म (Cortex) के पास वाले भाग रंगीन हो जाते हैं। इस क्षुप के ३, ४ साल पुराने पौधे के मूल को शरदकाल में संग्रह कर छाल सहित सुखाकर व्यवहार में लाया जाता है। रासायनिक संगठन-बिहार में उत्पन्न मूल में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा ०-८-१-३% रहती है जिसमें अजमेलाइन (Ajmaline, C20H26O2N2, 3 H2O), अजर्मेलीनाइन् (Ajmaline, C20H26O3N2, 1.5 H2O), अजर्मेलीसाइन (Ajmalicine) तथा पीत वर्ण के क्षाराम सर्पेन्टाइन् (Serpentine, C20H20O3N2, 1.5 H2O), सर्पेन्टिनाइन् (Serpentinine, C20H20O2N2, 1.5 H2O) तथा बिना रवेदार (Amorphous) क्षार (Bases) रहते हैं। देहरादून से प्राप्त जड़ में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा १-१-३% तक रहती है लेकिन उसमें पीत वर्ण के क्षाराम नहीं रहते तथा इसमें अजर्मेलाइन् और अजर्मेलीनाइन् के समसंगठन (Isomeric) वाले दो क्षार द्रव्य रहते हैं। इनके अतिरिक्त उभयविध प्रतिक्रिया (Amphoteric character) वाले कुछ दूसरे भी क्षाराम होते हैं। इन क्षारामों के अतिरिक्त इसके मूल में एक तैलीय राल (Oleoresin) और सरपोस्टेरॉल (Serposterol, C30 H48O2) रहता है।

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