भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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५४ भावप्रकाशनिघण्टुः (५) चर्म रोगों में इसका आन्तरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। दाद में इसके लेप से लाभ होता है। (६) मज्जातन्तु के रोग जैसे अर्धांगघात, आक्षेप एवं अपस्मार आदि में लहसुन के साथ दूध में उबाल कर देना चाहिये । (७) पीनस, शिरःशूल तथा अर्धावभेदक में इससे सिद्ध तैल के नस्य से लाभ होता है। शिरःशूल में कपाल पर इसकी मालिश करनी चाहिये । (८) बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश पर इसका उपयोग लिखा गया है । (९) इसका ताजा रस शीतल, मूत्रल तथा आनुलोमिक होता है । मात्रा—चूर्ण ४ से १६ माशा । ३६ विडङ्ग भेद सं०-विडङ्गभेद । हि०-वायविडङ्ग भेद, बायबिरङ्ग । अवध०-बेवरङ्ग । देहरादून-वाय- विरङ्ग, गैया । गोंड-कोपवल्ली । कुरकु०-भारङ्गेली । मु०-आमटी, गोंदली, वाबंटी । ने०-कलय बोगोटी । अं०-Basal (बासल) । लै०-E. tsjeriam-cottam, A. DC. (ए० त्स्जेरियम्-कोट्टम, ए० डीसी०) ! Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेंसी) । यह हिमालय पहाड़ के पूर्व की ओर बङ्गाल तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक कहीं न कहीं पाया जाता है। इसके वृक्ष छोटे और बहुत शाखदार होते हैं। पत्ते कुछ अधिक बड़े होते हैं तथा शिराएँ कुछ मुरचई रोमावरण से युक्त होती हैं। फूल-हरियाली लिये सफेद रङ्ग या हरापन युक्त फीके पीले रङ्ग के बहुत छोटे छोटे आते हैं। फल-छोटे छोटे गोल होते हैं और लंबाई में महीन धारीदार होते हैं। गुण और प्रयोग-यह वातानुलोमक, कृमिघ्न, अर्शोघ्न, शोथप्रतीकारक और रसायन है। इसका उपयोग विडङ्ग के समान किया जाता है। बाज़ार में दोनों ही जाति के फल मिले हुये रहते हैं। (१) यह भी विडङ्ग के समान स्फीतकृमि नाशक होता है। (२) गण्डमाला में अनन्तमूल के साथ इसका क्वाथ पिलाते हैं तथा ठण्डे जल में पीसकर गांठों पर लेप करते हैं। (३) दन्तशूल में इसका चूर्ण हींग के साथ दांत के गढे में रखने से लाभ होता है तथा इसका मञ्जन में व्यवहार करते हैं। इसके मूल की छाल का भी इसमें उपयोग होता है। (४) इसके कोमल पत्तों का सोंठ के साथ क्वाथ बनाकर गले की सूजन, मुख के छाले एवं व्रण में कवल कराने से लाभ होता है। (५) न्यूमोनिया तथा अन्य छाती के विकारों में चावल की मांड के साथ इसकी छाल को उबाल कर पिलाते हैं तथा छाल पीसकर छाती पर लेप करते हैं। इसके फलों को पीसकर मक्खन के साथ छाती पर लगाने से फुफ्फुसावरण शोथ में लाभ होता है तथा शिरःशूल में भी इसी प्रकार कपाल में इसका लेप करते हैं ।


हरीतक्यादिवर्गः । ५५ ३७ नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) नाडीहिङ्गु पलाशरूपा जन्तुका रामठी च सा। वंशपत्री च पिण्डाङ्गा सुवीर्य्या हिङ्गुनाडिका ॥ रा. नि. सं०-नाडीहिङ्गु, पलाशरूपा, जन्तुका, रामठी, वंशपत्री, पिण्डाङ्गा, सुवीर्य्या, हिङ्गुनाडिका । हि०-नाडीहिङ्गु, नारीहींग, कलपतोहींग, डिकामाली, डिकेमाली, कमरी । ब०-हिंगुविशेष । म०- डिकेमाली । गु०-डीकामारी । काठी०-मांलण, मालड़ी । क०-डिकामल्हि । ता०-कुंदै । ते०- गेरिविकि, करिगा, तेल्लामंगा । अं०-Gummy Gardena ( गम्मी गार्डेनीया ); Cambi resin (कॅम्बी रेसिन) । लै०-Gardenia gummifera Linn. (गार्डेनिया गम्मी- फेरा) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । इसके वृक्ष अधिकतया दक्षिण भारत में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-छोटा-तथा शाखदार होता है। पत्ते-विनाल, ४"५-७ x २-२'५ से० मी० बड़े, दीर्घवृत्ताभ आयताकार, स्वरूप में कुछ अमरूद के पत्तों के समान तथा चिकने, चमकीले होते हैं। फूल-सुगन्धहीन, प्रारंभ में श्वेत किन्तु बाद में पीतवर्ण के १ से ३ साथ साथ रहते हैं। फल-२'५-३.८ से० मी०, आयताकार या दीर्घ वृत्ताभ, चिकना, लंबाई में धारीदार एवं नोकदार होता है। इन पौधों की कोमल शाखाओं के बीच तथा कलियों में से जाड़े के दिनों में हरियाली लिए हुए किञ्चित पीले रंग का गोंद निकलता है । उसी को 'डीकामाली' कहते हैं। इसकी छाल से गोंद नहीं निकलता । जंगली गोंड लोग ठीकरों में इकट्ठा कर सुखा करके बाजार में बेचते हैं। इस गोंद में छोटी छोटी लकड़ियां, फूस घास आदि मिली रहती है अत एव इसे गरम जल में घोल, छान एवं सुखा करके औषधि के काम में लेना चाहिये । शुद्ध डिकामाली में बिलार के मूत्र जैसी गन्ध आती है तथा वह कुछ आर्द्र एवं चमकीला रहता है और उसके चूर्ण बनाने में कठिनाई होती है। गुण नाडीहिङ्गु कटूष्णं च कफवातात्तिशान्तिकृत् । विष्ठाविबन्धदोषघ्नमानाहामयहारी च (रा० नि०) नाडीहिङ्गु-कटु, गरम, कफ और वात की पीड़ा को शमन करने वाली तथा विष्ठा, विबन्ध और आनाह रोग को नष्ट करने वाली है। नाडीहिङ्गुस्तु कटुकस्तीक्ष्णोष्णश्च दीपकः । कफवातमलस्तम्भमनोमोहामनाशनः ॥ (निघण्टुरत्नाकरः) नाडीहिङ्गु-कटु, तीक्ष्ण, गरम, अग्निप्रदीपक तथा कफ, वात, मलबन्ध, मन का मोह और आम का नाश करनेवाली है। रासायनिक संघटन-इसमें दो प्रकार के राल के सदृश पदार्थ रहते हैं जिसमें से गार्डेनिन् (Gardenin) रवेदार सुनहले पीले रंग का तथा दूसरा डिकेनाली (Dikenali) कुछ मुलायम तथा हरे रंग का होता है। गुण और प्रयोग-यह उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, विरेचक, कृमिघ्न, ज्वरहर, स्वेदजनन, श्लेष्मनिःसारक, त्वक दोषहर एवं प्रतिदूषक है । गुणों में बायविडङ्ग और डिकामाली बहुत समानता रखती है। किन्तु शास्त्रों में विडङ्ग को कृमिघ्न लिखा है और डिकायोली के विषय में उसकी कृमिघ्नता के गुण का स्पष्टीकरण नहीं किया