भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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५६ | भावप्रकाशनिघण्टुः ।
है। आधुनिक शोध द्वारा सिद्ध हुआ है कि डिकामली भी विशेष कृमिघ्न है। नाड़ीहिङ्गु के प्रयोग से कोष्ठान्तर्गत वर्तुलाकार कृमि नष्ट या निर्जीव हो जाते हैं। बायविडङ्ग—पक्वाशय के लम्बे चिपटे कृमियों का विनाशक है। डिकामली—इन कृमियों का नाश नहीं कर सकती। इससे गोल ( Round ) या कुछ लम्बे नन्हें नन्हें कृमियों का नाश होता है। डिकेमाली का फांट नियत कालिक ज्वर में देने से कम्पन कम होता है। आन्त्र की विकृतियां जैसे आध्मान, कुपचन एवं शूल आदि में इससे लाभ होता है। बच्चों को दन्तोद्भव के समय जो पाखाना एवं कय आदि विकार होते हैं उसमें इससे अच्छा लाभ होता है। आध्मान में एलुवा के साथ पेट पर इसका लेप करते हैं तथा डिकेमाली खिलाते हैं। इसके फल विरेचक तथा कृमिघ्न होते हैं। मोटापा तथा प्लीहावृद्धि में इसका गोंद व्यवहार किया जाता है। बाहरी प्रयोग से दूषित व्रण साफ किये जाते हैं। इससे कीड़े नहीं पड़ने पाते तथा पड़े हुए कीड़े निकल जाते हैं और मक्खियां नहीं बैठने पातीं। इससे दन्तशूल में लाभ होता है। नारू में इसे ५ र० की मात्रा में देते हैं। अतएव नाड़ीहिङ्गु शास्त्रीय 'विडङ्ग' कदापि नहीं हो सकती। मात्रा—चूर्ण ३–२ र०।
अथ तुम्बुरुफलस्य नामानि गुणांश्चाह
तुम्बुरुः सौरभः सौरो वनजः सानुजोऽन्धकः ॥ ११३ ॥ तुम्बुरु प्रथितं तिक्तं कटुपाकेऽपि तत्कटु । रूक्षोष्णं दीपनं तीक्ष्णं रुच्यं लघु विदाहि च ॥११४॥ वातरश्लेष्माक्षिकर्णाष्ठशिरोरुग्गुरुताकृमीन् । कुष्ठशूलारुचिश्वासप्लीहकृच्छ्राणि नाशयेत् ॥११५॥
'तुम्बुरु' फल के नाम तथा गुण—तुम्बुरु, सौरभ, सौर, वनज, सानुज और अन्धक ये नाम 'तुम्बुरु फल' के हैं। तुम्बुरु फल—तिक्त तथा कटरस युक्त है और विपाक में भी कटरस युक्त है। यह रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, तीक्ष्ण, रुचिजनक, पाक में लघु और विदाही होता है। यह बात- श्लेष्म, नेत्र, कर्ण, ओष्ठ तथा शिर के रोगों को एवं गुरुता (शरीर का भारीपन), कृमि, कुष्ठ, शूल, अरुचि, श्वास, प्लीहा और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को भी दूर करता है ॥ ११३-११५ ॥
३८ तुम्बुरु
**हिं०—**तुम्बर, तुम्बुल, तेजफल । **बं०—**तम्बुल, तुम्बुरु फल, नेपाली धने, नेपाली धनिया । **म०—**नेपाली धनियां । **मा०—**तूगूरू । **क०—**तुम्बुरु । **ते०—**तुम्बुरलु । **पं०—**तुम्बर । गु०— तुम्बुरुफल । **लिपचा०—**तंगु कंग । **ले०—**Zanthoxylum alatum Roxb. ( झैंथोक्साइलम् अलैटम् ); Zanthoxylum acanthopodium DC. ( झैंथोक्साइलम् एकैन्थोपोडियम ) दूसरी जाति । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) ।
यह हिमालय की गरम तराइयों में जम्मू से भूटान तक, खासिया पहाड़, टेहरी, गढ़वाल, नाग पहाड़, विजिगापट्टम और गंजाम के पहाड़ों पर पाया जाता है। इसका **वृक्ष—**झाड़ीदार या कचित् छोटे वृक्षवत रहता है। **कांटे—**सीधे, १-२ से. मी. लंबे एवं अंडाकार आधार के ऊपर रहते हैं। **पत्ते—**संयुक्त लंबे पत्र दण्ड वाले, एवं आधार की तरफ सपंख तथा गुलाबी एवं सीधे कांटों से युक्त होते हैं। **पत्रक—**५ से ११, भालाकार, न्यूनाधिक दन्तुर, ऊपर से चमकीले एवं नीचे से हलके रंग के होते हैं। छोटे छोटे पीले रङ्ग के फूलों के गुच्छे लगते हैं । **फल—**काली मरिच के समान झुमकों में रहते हैं, किन्तु उनके मुख फटे होते हैं। फलों में सुगन्धि आती है। इन फलों के ऊपर तेलिया राल की गाँठे
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होती हैं तथा इनके अन्दर कागज के समान पड़दा रहता है। फल प्रायः खाली रहते हैं किन्तु कभी कभी उनके अन्दर गोल, काले चमकीले बीज रहते हैं। उत्तर हिन्दुस्तान में इसका व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में इसके स्थान पर ले०-झैं. र्हेटसा ( Z. rhetsa DC. ), हिं०- चिरफल, तिरफल, के फल का व्यवहार किया जाता है जो तुम्बुरु के फल से बड़े होते हैं। उन पर तैलिया राल की गांठें तथा अन्दर कागज के समान पडदा नहीं रहता । उनका स्वाद चटपटा अकरकरहा के समान एवं गन्ध संतरे के छिलके के समान होती है।
**रासायनिक सङ्गठन—**इसकी छाल में एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील तैल और राल रहती है। यह कडुवा पदार्थ दारुहरिद्रा में पाये जाने वाले बर्बेरीन ( Berberine ) के सदृश होता है। इसके फलों में एक उड़नशील तैल, राल, एक अम्ल पदार्थ और एक रवेदार पदार्थ झैन्- थोक्थाइलिन् ( Xanthoxylin ) पाया जाता है। यह तैल यूकलिप्टस् ( Eucalyptus ) तैल के सदृश गन्ध एवं गुणवाला होता है।
**गुण और प्रयोग—**यह सुगन्धि, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही और उत्तेजक है। इसकी क्रिया गन्धाबिरोजा तथा यूकेलिप्टस् तेल के समान होती है। इसके छाल की क्रिया दारुहरिद्रा के समान होती है। ( १ ) ज्वर, कुपचन, अतिसार, हैजा एवं मंदाग्नि आदि में इसके मूलत्वक् और फल का फांट उत्तेजक तथा बल्य औषध के रूप में दिया जाता है। ( २ ) दमें में इसका गुड़ाखू बना कर धूम्रपान उपयोगी है। ( ३ ) गले की सूजन में इसके ताजे पत्तों को पीस कर चावल के आटे के साथ गरम करके बांधने से लाभ होता है। ( ४ ) यह एक अच्छा प्रतिदूषक ( Antiseptic ) होने के कारण व्रणों के लिये इसके फलों का आन्तरिक तथा बाह्य प्रयोग किया जाता है। इसके मूलत्वक् काथ से व्रण प्रक्षालन से लाभ होता है। ( ५ ) इसके फलों. का व्यवहार दन्तशूल में किया जाता है। इसकी दातुन दाँतों के लिये अच्छी समझी जाती है एवं छाल तथा फल का दन्तमञ्जनों में प्रयोग किया जाता है। ( ६ ) इसका तैल प्रतिदूषक, कीटाणुनाशक तथा दुर्गन्धिहर है। **मात्रा—**फल—२-५ र., छाल—१-२ तो. फांट बना कर।
३९ तिरफल
**सं०—**तुंबरु । **म०—**चिरफल, तिसल । ते०— इरत्तचै। **ता०—**राचामम् । **क०—**जिमुमी मारा । ले०—Zanthoxylum rhetsa DC (झैंथोक्साइलम् ह्रेटसा) । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) ।
यह मध्यम ऊंचाई का कटीला वृक्ष दक्षिण में विशेषकर कोंकणमें होता है। इसके **पत्ते—**सदलपर्ण एवं मोटी टहनियों के अग्र पर समुद्भवद होकर रहते हैं। **पत्रक—**प्रायः १९-२५, तून के सदृश, आयताकार या प्रासवत् , अखण्ड या गोल दन्तुर धार वाले होते हैं। **पुष्प—**छोटे, पीले, गुच्छों के रूप में। **फल—**गुच्छों के रूप में, कच्ची अवस्था में हरे तथा बाद में काले से हो जाते हैं। अन्य वर्णन ऊपर तुम्बुरु के साथ दिया गया है। इसके फल तथा जड़ की छाल का प्रयोग किया जाता है। **रासायनिक सङ्गठन—**तुम्बुरु के समान तैल, राल आदि ।