भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the complete and exact transcription of the text from both pages:
[पृष्ठ ६४]
६४ | भावप्रकाशनिघण्टुः ४२ अष्टवर्ग
| नाम | उत्पत्तिस्थान | सामान्यरूप | परस्पर पार्थक्य | शा० प्रतिनिधि |
|---|---|---|---|---|
| १ जीवक | हिमालय पर्वत शिखर | कन्द-रसोन के समान पत्र-सूक्ष्म सारहीन | कूं ची के समान | विदारीकन्द |
| २ ऋषभक | ” ” | ” | बैल के सींग के समान | ” |
| ३ मेदा | मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिण-पूर्व भाग | कन्द-मेद के सदृश स्राव नख से छेद्य | शुक्लवर्ण | शतावरी मूल |
| ४ महामेदा | ” | कन्द-शुक्ल आर्द्रक के समान, लताजात | पाण्डुरवर्ण | ” |
| ५ काकोली | ” | कन्द-शतावरी सदृश सक्षीर सुगन्धयुक्त | अधिक कृष्णवर्ण | अश्वगंधा का मूल |
| ६ क्षीरकाकोली | ” | ” | कम कृष्णवर्ण | ” |
| ७ ऋद्धि | कोशल्पर्वत | कन्द-श्वेतलोमयुक्त लताजात छिद्रयुक्त | कपास की गांठ के समान वामावर्तफल | वाराहीकन्द |
| ८ वृद्धि | ” | ” | दक्षिणावर्तफल | ” |
इस समय अष्टवर्ग की कोई भी औषधि सच्ची नहीं मिलती है। यों तो अष्टवर्ग के बेचनेवाले कितने फर्में हो गये हैं, इनमें 'अष्टवर्ग कार्यालय देहरादून' प्रसिद्ध है परन्तु अष्टवर्ग के देखने और शास्त्रों से मिलान करने से कोई भी असली नहीं सिद्ध होती। अष्टवर्ग के अभाव में मेदा-महामेदा की जगह शतावर, जीवक-ऋषभक की जगह विदारीकन्द, काकोली-क्षीरकाकोली की जगह असगन्ध और ऋद्धि-वृद्धि की जगह वाराहीकन्द डालने को कहा गया है। परन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्य शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द को अष्टवर्ग का प्रतिनिधि नहीं मानते। क्योंकि इनमें अष्टवर्ग का अत्यन्त न्यून गुण पाया जाता है। इसलिए अष्टवर्ग की जगह निम्नाङ्कित औषधियां देना उत्तम बतलाते हैं।
| जीवक | अभाव में | बहमन सफेद या गुडूची |
| ऋषभक | ” | बहमन लाल या लाखा सालब या वंशलोचन |
| मेदा | ” | तालमिश्री |
| महामेदा | ” | शकाकुल मिश्री या प्रसारिणी |
| काकोली | ” | काली मूसली |
| क्षीरकाकोली | ” | श्वेत मूसली |
| ऋद्धि | ” | चिड़िया कन्द या बला या ऊटकण के बीज |
| वृद्धि | ” | सालब पंजा या महाबला या बीजवंद |
[पृष्ठ ६५]
हरीतक्यादिवर्गः । | ६५
अथ यष्टीमधुनामगुणानाह यष्टीमधु तथा यष्टीमधुकं क्लीतकं तथा । अन्यत्स्थलीतनक्तं तत्तु भवेत्तोये मधूलिका ॥ १४५ ॥ यष्टी हिमा गुरुः स्वादुश्चक्षुष्या बलवर्णकृत् । सुस्निग्धा शुक्ला केश्या स्वर्या पित्तानिलास्त्रजित् । व्रणशोथविषच्छर्दि तृष्णाग्लानिक्षयापहा ॥ १४६ ॥
मुलहठी के नाम तथा गुण - यष्टीमधु, यष्टीमधुक और क्लीतनक ये सब मुलहठी के नाम हैं। और अन्य प्रकार की भी एक मुलहठी होती है जो कि जल में उत्पन्न होती है जिसका नाम 'मधूलिका' है। मुलहठी—शीतवीर्य, गुरु, मधुररसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, बलकारक तथा वर्ण को सुन्दर करने वाली, सुस्निग्ध, वीर्यजनक, केशों के लिये हितकर, स्वर को सुधारने वाली, पित्त, वात तथा रक्त के प्रकोप को शमन करने वाली, व्रण, शोथ, विष, वमन, प्यास, ग्लानि तथा क्षय रोग को दूर करने वाली होती है ॥ १४५-१४६ ॥
४३ यष्टीमधु हि०- मुलहठी, मुलेटी, मुलेठी, मीठी लकड़ी, जेठीमध। ब०- यष्टिमधु । म०- जेष्ठिमध । गु०- जेठीमध । क०- जेष्ठमधु । ते०- यष्टिमधुकम । पं०- मुलेटी । मा०- मरुहठी । ता०- अतिमधुरं । फा०- आसरेहमहक, विखेमहक । अ०- असलुसूस । अं०- Liquorice Root (लिकोरिस् रूट) । ले०- Glycyrrhiza glabra, Linn. (ग्लिसृहाइझा ग्लैब्रा, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी ) ।
इसका क्षुप अरब, फारस की खाड़ी, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान एवं साइबेरिया आदि स्थानों में उत्पन्न होता है। इसकी उपज पंजाब तथा चेनाब से लेकर पेशावर आदि हिमालय के निचले हिस्से में तथा अंडमान द्वीप एवं बर्मा में होती है। बलूचिस्तान तथा चित्राल में भी यह उत्पन्न होता है। काश्मीर में बरमूला घाटी में इसको उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त हुई है।
इसका क्षुप २-४ फूट ऊँचा होता है। पत्रक- छोटे, ४ से ७ जोड़े, आयताकार से चौड़ाई लिये हुये भालाकार; अपरिमित सदण्डिक पुष्प व्यूह; पुष्प- बैंगनीवर्ण के, लगभग ३ इञ्च लम्बे; फली- छोटी, बारीक, ३-१ इञ्च लम्बी, चिपटी; बीज- बहुत या २-३ होते हैं। इसकी जड़ तथा भौमिक तने को सुखा कर छाल सहित अथवा छाल निकालकर बाजार में मुलेठी के नाम से बेचा जाता है। ये लम्बे टुकड़े, पीताभ बादामी रंग के झुर्रीदार होते हैं तथा छाल निकाले हुये हल्के पीले रंग के रेशेदार होते हैं। इनमें एक प्रकार की हल्की गन्ध तथा स्वाद मीठा होता है।
स्थान भेद से इसकी अन्य जातियां होती हैं जिनके स्वाद में अन्तर रहता है। यूनानी मत से ३ प्रकार की मुलेठी मानी गई है जिसमें से मिश्र की उत्तम, अरब की मध्यम तथा तुरुष्क वा फारस की अधम होती है जो उत्तरोत्तर कम मीठी होती हैं।
रासायनिक संगठन— इसमें एक सफेद, मीठा, रवेदार पदार्थ गिलसहाइझिन् (Glycyrrhi- zin) ५-१०% पाया जाता है जिसमें गिलसहाइझिक एसिड (Glycyrrhizic acid) से बने चूना तथा पोटेशियम् (Potassium) के लवण होते हैं। यह एसिड भी शुभ्र रवेदार होता है तथा इसका द्रवणांक २५° श० होता है। यह चीनी से ५० गुना अधिक मीठा होता है। गरम जल में गिलसहाइझिन् का बना घोल ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त मुलेठी में ५-१०% शर्करा, ३०% स्टार्च, प्रभुजिन, स्नेह, राल एवं अंसपेराजिन् (Asparagin) करीब १% होता है।
५ भाव नि०