भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 143 में से

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६२ भावप्रकाश निघण्टुः मेदा और महामेदा के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—उसमें महामेदा नामक कन्द मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिणपूर्वभाग) आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। महामेदा, बनीमेदा है ऐसा मुनीश्वरों ने कहा है। महामेदा लता से उत्पन्न होती है तथा इसका कन्द पाण्डुवर्ण का, सफेद अदरक के समान होता है। ये महामेदा के लक्षण हुये, अब मेदा के भी लक्षण कहते हैं— जिसके कन्द सफेद हों तथा जिसमें नख से काटने पर मेदधातु के समान एक प्रकार का रस निकलता हो उसे मेदा समझना चाहिये। शल्यपर्णी, मणिच्छिद्रा, मेदा, मेदोभवा और अध्वरा ये नाम मेदा के हैं। महामेदा, वसुच्छिद्रा, त्रिदन्ती और देवतमणि ये नाम महामेदा के हैं। उक्त दोनों प्रकार का मेदा—वे दोनों परिपाक में गुरु, स्वादिष्ट, वीर्यवर्धक, दुग्ध तथा कफ को बढ़ाने वाले, धातुवर्धक, शीतल, पित्त, रक्तसम्बन्धी दोष, वायु तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं ॥ १२६-१३१ ॥ अथ काकोलीक्षीरकाकोल्योत्पत्तिलक्षणनामगुणान्याह जायते क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले ॥ १३२ ॥ यत्र स्यात्क्षीरकाकोली काकोली तत्र जायते । पीवरीसदृशः कन्दः सक्षीरः¹ प्रियगन्धवान् ॥ १३३ ॥ सा प्रोक्ता क्षीरकाकोली काकोलीलिङ्गमुच्यते । यथास्यात्क्षीरकाकोली काकोल्यपि तथा भवेत् ॥ एषा किञ्चिद्भवेत्कृष्णा मेदोऽयुग्मभयोरपि । काकोली वायसोली च वीरा कायस्थिका तथा ॥ सा शुक्ला क्षीरकाकोली वयस्था क्षीरशुक्लिका ॥ कथिता क्षीरिणी धीरा² क्षीरशुक्ला पयस्विनी ॥ १३६ ॥ काकोलीयुगलं शीतं शुक्लं मधुरं गुरु । बृंहणं वातदाहास्रपित्तशोषज्वरापहम् ॥ १३७ ॥ काकोली तथा क्षीरकाकोली के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—महामेदा के उत्पन्न होने का जहां स्थान है, वहीं पर क्षीरकाकोली भी उत्पन्न होती है। और जहां पर क्षीरकाकोली उत्पन्न होती है, वहां पर काकोली भी होती है। क्षीरकाकोली का कन्द पीवरी (शतावर) के समान होता है और काटने पर उसमें से दूध निकलता है तथा यह प्रिय गन्ध से युक्त होता है। अब काकोली के लक्षण कहते हैं—जिस प्रकार की क्षीरकाकोली होती है उसी प्रकार की काकोली भी होती है। किन्तु दोनों में भेद यह है कि काकोली, क्षीरकाकोली की अपेक्षा कुछ कृष्णवर्ण की होती है। काकोली, वायसोली, वीरा और कायस्थिका ये नाम काकोली के हैं और शुक्ला, क्षीरकाकोली, वयस्था, क्षीरशुक्लिका, क्षीरिणी, धीरा, क्षीरशुक्ला और पयस्विनी ये नाम क्षीरकाकोली के हैं। उक्त दोनों प्रकार की काकोली-शीतल, शुक्रवर्धक, मधुर, गुरु, बृंहण (धातुवर्धक), वात, दाह, रक्तपित्त (या रक्तदोष तथा पित्त), शोष और ज्वर की नाशक होती है ॥ १३२-१३७ ॥ अथ ऋद्धिवृद्धयोत्पत्तिलक्षणनामगुणान्याह ऋद्धिवृद्धिश्च कन्दौ द्वौ भवतः कोशलेऽचले³ । श्वेतलोमान्वितः कन्दो लताजातः सरन्ध्रकः ॥ स एव ऋद्धिर्वृद्धिश्च भेदमप्येतयोर्भुवे । तुलग्रन्थिसमा ऋद्धिर्वामावर्त्तफला चसा ॥ १३९॥ वृद्धिस्तु दक्षिणावर्त्तफला प्रोक्ता महर्षिभिः । ऋद्धियोंग्या⁴ सिद्धिर्लक्ष्म्यौ वृद्धेरप्याह्वया इमे ॥ १४० ॥

¹. 'क्षीरं स्रवति गन्धवानि'ति पाठा० । ². 'धीरे'ति पाठा० । ³. 'कोशयामले' इति पाठान्तरम् । ⁴. 'ऋद्धियुग्ममि'ति पाठा० ।

हरीतक्यादिवर्गः ६३ ऋद्धिर्बल्या त्रिदोषघ्नी शुक्ला मधुरा गुरुः । प्राणैश्वर्यकरी मूर्च्छारक्तपित्तविनाशिनी ॥ १४१ ॥ वृद्धिर्गर्भप्रदा शीता बृंहणी मधुरा स्मृता । वृष्या पित्तास्रशमनी क्षतकासक्षयापहा ॥ १४२ ॥ ऋद्धि तथा वृद्धि के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—ऋद्धि और वृद्धि ये दोनों कन्द कोशल पर्वत में उत्पन्न होते हैं। ऋद्धि का कन्द सफेद रोयें से युक्त, लता से उत्पन्न होने वाला तथा छिद्रों से युक्त होता है। और वृद्धि भी इसी प्रकार की होती है, किन्तु इन दोनों का जो परस्पर भेद है उसे अब कहता हूँ—ऋद्धि कपास की गांठ के समान आकार वाली तथा बायें तरफ से आवर्त्तशील फल वाली होती है। और वृद्धि—दहिने तरफ से आवर्त्तशील फलवाली होती है ऐसा महर्षि लोग कहते हैं। उक्त दोनों प्रकार की ऋद्धि (ऋद्धि-वृद्धि) के योग्य, सिद्धि और लक्ष्मी ये तीन नाम हैं। ऋद्धि-बलकारक, त्रिदोष को दूर करने वाली, शुक्रवर्धक, मधुर रस युक्त, पाक में गुरु और प्राणप्रद, ऐश्वर्यजनक, एवं मूर्च्छा और रक्त पित्त को नाश करने वाली होती है। वृद्धि-गर्भजनक, शीतल, बृंहण (धातुवर्धक), मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रक्तपित्त को शमन करने वाली, क्षत (उरःक्षतादिक), कास तथा क्षय को दूर करने वाली होती है ॥ १३८-१४२ ॥ राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः । तस्मादस्य प्रतिनिधिं गृह्णीयात्तद्गुणं भिषक् ॥ १४३ ॥ साधारण लोगों को कौन कहे अष्टवर्ग की उक्त औषधियां राजाओं को भी दुर्लभ हैं। अतः वैद्य को चाहिये कि वे इसके समान गुण वाली प्रतिनिधि औषधियों को काम में लावें ॥ १४३ ॥ ✤ मुख्यसदृशः = प्रतिनिधिः ॥ १४३ ॥ यहां पर 'प्रतिनिधि' पद का 'मुख्य के सदृश' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ १४३ ॥ अथाष्टवर्गस्य प्रतिनिधिमाह मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेष्वपि चासति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहीश्चक्रमात् क्षिपेत् ॥ १४४ ॥ अष्टवर्ग की प्रतिनिधि औषधियां—दोनों प्रकार की मेदा, दोनों प्रकार के जीवक, दोनों प्रकार की काकोली तथा दोनों प्रकार की ऋद्धि के स्थान में क्रम से शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द इन औषधियों को डालना चाहिये ॥ १४४ ॥ ✤ मेदामहामेदास्थाने शतावरीमूलम् । जीवकर्षभकस्थाने विदारीमूलम् । काकोली- क्षीरकाकोलीस्थाने अश्वगन्धामूलम् । ऋद्धिवृद्धिस्थाने वाराहीकन्दं गुणैस्तत्तुल्यं क्षिपेत् ॥ १४४ ॥ यहां पर 'मेदा और महामेदा के स्थान में सतावर का मूल, जीवक तथा ऋषभक के स्थान में विदारीकन्द का मूल, काकोली तथा क्षीरकाकोली के स्थान में असगन्ध का मूल, एवं ऋद्धि तथा वृद्धि के स्थान में वाराही कन्द को गुणों में पूर्वोक्त औषधियों के समान समझकर डालें' ऐसा समझना चाहिये ॥ १४२ ॥