भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ भावप्रकाश निघण्टुः
**मिलावटें—**हींग में कंकड़, बालू, मिट्टी, मूल के टुकड़े, गोदन्ती तथा गोंद आदि मिलाये रहते हैं ।
**रासायनिक संगठन—**यह गन्धक का सेन्द्रिय योग है । इसमें लहसुन में पाये जाने वाला एक उड़नशील तैल ३-१७% रहता है । इस तैल में टरपेन्स ( Terpenes ), डाइसल्फाइड्स ( Disulphides, $C_7H_{14}S_2$ and $C_{11}H_{20}S_2$ ) और एक नीले रंग का तरल पदार्थ $(C_{10}H_{16}O)n$ रहता है । इसमें राल ४०-६५% रहती है जिसमें असारेसिनोटेनॉल ( Asaresinotannol ), असा-रेसिनोल फेरूलिक एसिड इस्टर ( Asaresinol ferulic acid ester ) तथा फ्री फेरूलिक एसिड ( Free ferulic acid-1.3% ) रहता है । इसके अतिरिक्त इसमें गोंद की मात्रा २५% रहती है । शुद्ध हींग में ६५-७५% मद्यसार में घुलने वाले पदार्थ रहते हैं तथा राख ३-५% रहती है । इसकी राल का उर्ध्व पातन ( Dry distillation ) करने से अंबेलिफेरोन् ( Umbelliferone ) प्राप्त होता है लेकिन भारतीय जाति से यह प्राप्त नहीं होता ।
**गुण और प्रयोग—**हींग दीपन, पाचन, वातानुलोमक, उद्वेष्टन निरोधि, उत्तेजक, कफदुर्गन्धि हर, कफनिःसारक, वातनाड़ियों के लिये बल्य, गर्भाशयसंकोचक एवं कृमिघ्न है । इसका उत्सर्ग फुफ्फुस, त्वचा, मूत्र तथा पसीने के द्वारा होता है ।
इसका उपयोग आध्मान, शूल, अपस्मार, अपतन्त्रक, वातविकार, श्वास, कास, कुकास एवं हृच्छूल आदि में किया जाता है । हींग को घृत में भूनकर व्यवहार में लाया जाता है जिससे वमन नहीं होने पाता ।
(१) फुफ्फुस के रोगों में हींग का अच्छा उपयोग होता है। जीर्ण श्वास नलिका शोथ, दमा, कुकास, बच्चों के फुफ्फुसपाक एवं शुष्क कास आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके लिये जल के साथ हींग के घोल का व्यवहार करना चाहिये ।
(२) आध्मान, शूल, विबन्ध एवं आमाशय तथा आन्त्र की शिथिलता में अजवाइन अथवा एलुवा और साबुन के साथ गोली बनाकर दिया जाता है । ऐसे विकारों में हिंग्वाष्टक चूर्ण अथवा हिंगुकर्पूरवटी का बहुत व्यवहार किया जाता है ।
(३) विषमज्वर में प्रतिबन्धन की दृष्टि से अन्न के साथ हींग का व्यवहार किया जाता है ।
(४) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं तज्जन्य अन्य विकारों में इसका बहुत अच्छा उपयोग होता है ।
(५) प्रसव के बाद इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। बार बार होने वाले गर्भपात को रोकने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं । गर्भ रहते ही ६ माशे हींग की ६० गोलियां बनाकर प्रारम्भ में १ गोली दिन में दो बार देते हैं । बाद में धीरे धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते हुये १० गोली प्रतिदिन देते हैं और फिर प्रसवतक धीरे धीरे इसकी मात्रा कम करते हैं ।
(६) आध्मान, शूल एवं आक्षेप आदि में २-३ माशा हींग जल के साथ घोटकर उसकी बस्ति दी जाती है । इससे सूत्र कृमि में भी लाभ होता है ।
(७) सीलोन में नारियल के दूध में हींग को उबालकर सर्पदंश के स्थान पर लगाते हैं तथा पानी में इसको घोलकर नाक में भी टपकाते हैं। बिच्छू के काटने पर भी इसको लगाने से लाभ होता है।
(८) बच्चों के पेट फूलने पर इसका लेप पेट पर लगाते हैं तथा कुकास में छाती पर लेप करने से लाभ होता है। नारू तथा दाद पर इसको लगाने से लाभ होता है।
हरीतक्यादिवर्गः ४३
(९) हींग तथा अफीम की गोली दांत के दर्द में दांत के गड्ढे में रखने से लाभ होता है।
(१०) हींग, लहसुन तथा सैंधव आदि पदार्थों से सिद्ध तैल कर्णरोगों में बहुत उपयोगी है। इसको $\frac{३}{२}-१$ चम्मच दूध के साथ दिन में ३, ४ बार या सुबह ४ चम्मच एक साथ ही दूध और मिश्री के साथ पिलाते हैं एवं इसको गर्म करके कान में ३, ४ बूँद डालते हैं। यह तैल बहुत अच्छा प्रतिदूषक ( Antiseptic ) है एवं इसका अन्तर्वाह्य प्रयोग उपयोगी है।
**मात्रा—**२-८ रत्ती ।
अथ वचाया नामानि गुणाँश्चाह
वचोग्रगन्धा षड्ग्रन्था गोलोमी शतपर्विका । क्षुद्रपत्री च मङ्गल्या जटिलाोग्रा च लोमशा ॥ वचोग्रगन्धा कटुका तिक्तोष्णा वान्तिवह्निकृत् । विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ॥ अपस्मारकोन्मादभूतजन्तवनिळान्हरेत् ॥ १०३ ॥
**वच के नाम तथा गुण—**वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी, शतपर्विका, क्षुद्रपत्री, मङ्गल्या, जटिला, उग्रा और लोमशा ये सब नाम वच के हैं । **वच—**उग्रगन्ध युक्त, तिक्त तथा कटुरस वाली, उष्णवीर्य, वमनकारक, अग्निजनक, विबन्ध, आध्मान और शूलको नष्ट करने वाली एवं मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है। एवम् मिर्गी, कफ, उन्माद, भूतबाधा, कृमि तथा वायु को भी दूर करने वाली होती है ॥ १०२-१०३ ॥
२९ वच
**हि०—**वच, घोरवच, घोड़वच। **ब०—**वच । **म०—**वेखण्ड । **ते०—**वासा, वस । **ग०—**वज, घोड़ावज । **क०—**बजे । **ता०—**वशाम्बु । **मला०—**व्ययम्पु । **गोमा०—**वेखण्ड । **पं०—**बरि बोज । **फा०—**सोज़न जर्व, अगारि तुर्की । **अ०—**उद्दल बुज, अकरून, बज, विज । **यू०—**अकुरुन् । **अं०—**Sweet Flag (स्वीट फ्लैग) । **ले०—**Acorus calamus, Linn. (एकोरस् कॅलॅमस्, लिन.) । Fam. Araceae (एरेंसी) ।
एशिया खण्ड का मध्य भाग तथा पूर्वी यूरोप वच का उत्पत्ति स्थान माना जाता है। मणीपुर, नागा पहाड़, काश्मीर, सिरमूर और युक्त प्रान्त के कितने ही देशों के दलदल और सजल स्थान, में यह उत्पन्न होती है ।
यह गुल्म जाति की बनौषधि ३-४ हाथ ऊँची होती है। इसकी जड़ अन्य पौधों की जड़ की तरह सीधी नहीं रहती बल्कि बहुत सी जटा के सदृश जड़ की शाखायें चारों ओर फैली हुई रहती हैं और इसकी मुटाई मध्यमा उँगली के समान होती है। प्रत्येक गांठ के चारो ओर सघन रोवें से होते हैं। इसके पत्ते लम्बे, पतले और तलवार के समान रहते हैं। मंजरियां सघन, विदाण्डक, २-४ इञ्च लम्बी, लम्ब गोल और ६-१८ इञ्च लम्बे पत्रकोशों से ढकी रहती हैं । वच के पौधों के सर्वाङ्ग में गन्ध आती है और इसकी जड़ में यह अत्यधिक होती है। मूलस्तम्भ तथा राइजोम ( Rhizome ) को टुकड़े टुकड़े कर बाजार में बेचते हैं । ये भूरे रङ्ग के और सुगन्धित होते हैं जिनके निचले हिस्से पर मूल के निशान रहते हैं तथा ऊपर के भाग में लम्बी गठेदार धारियां होती हैं ।