भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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४० | भावप्रकाश निघण्टुः अण्डाकार परन्तु अग्र पर भीतर की तरफ दबे हुये रहते हैं। बीज—छोटे, लाल तथा जल में डालने पर लुआबदार होते हैं। अधिकतर इसके बीजों का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक सुगन्धि उड़नशील तथा स्थिर तैल पाया जाता है। इसमें आयोडीन (Iodine), लोह, फॉस्फेटस् (Phosphates), पोटैश (Potash), कुछ लवण, एक तिक्त सत्व एवं जल आदि पदार्थ रहते हैं तथा गन्धक अधिक मात्रा में रहता है। इसके ग्लूको- साइड (Glucoside) को ग्लूकोट्रोपोइओलिन (Glucotro-poeolin) कहते हैं। गुण और प्रयोग—चनसुर रसायन, बल्य, वाजीकर, उत्तेजक, आनुलोमिक, दुग्धवर्धक एवं शूलहर है। इसका उपयोग प्रसूतावस्था, रक्तदोष, त्वचा के रोग, नेत्र रोग, यकृत और प्लीहा की जीर्ण वृद्धि, ग्रन्थिरोग, रक्तांश, श्वास, कास एवं अतिसार आदि में किया जाता है। (१) इसके फांट का व्यवहार आमाशय के प्रक्षोभ से उत्पन्न हिक्का में किया जाता है। इसको बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाना चाहिये। इसी प्रकार प्रक्षोभजन्य अतिसार एवं ग्रहणी में भी इससे लाभ होता है। (२) गरी के साथ इसकी बर्फी या दूध में लप्सी बनाकर प्रसूता को दिया जाता है। यह रसायन, पौष्टिक तथा दुग्धवर्धक है। इससे कटिशूल एवं श्वेतप्रदर में भी लाभ होता है। दूध में उबाल कर गर्भपात कराने के लिए प्रयोग में लाते हैं। पुरुषों के लिए भी यह रसायन तथा वाजी- कर है एवं इसका व्यवहार शरीर की ऊँचाई बढ़ाने के लिए करते हैं। (३) मिश्री के साथ इसका चूर्ण कुपचन, अतिसार एवं ग्रहणी आदि में देते हैं। (४) नींबू के रस में पीसकर इसका लेप कटिशूल, आन्त्रिक शोथ, आमवात तथा सन्धिशूल आदि में करते हैं। (५) इसके पत्र मूत्रल तथा उत्तेजक होते हैं एवं इनका सलाद प्रशीताद (Scurvy = स्कर्वी) नामक रोग में व्यवहार में लाया जाता है। (६) इसकी जड़ का व्यवहार फिरङ्ग तथा निस्तानिका (Tenesmus = टेनेस्मस्) में किया जाता है। मात्रा—$\frac{१}{४}$-१ तो०।

अथ चतुर्बीजगुणानाह

मेथिका चन्द्रशूरश्च कालाऽजाजी यवानिका । एतच्चतुष्टयं युक्तं चतुर्बीजमिति स्मृतम् ॥९८॥ तच्चूर्णं भक्षितं नित्यं निहन्ति पवनामयम् । अजीर्ण शूलमाध्मानं पार्श्वशूलं कटिष्यथाम् ॥ 'चतुर्बीज' (चारदाना) के गुण—मेथी, चनसुर, मंगरैला और अजवाइन इन चारों के बीजों के योग को 'चतुर्बीज' (चारदाना) कहते हैं और इस चतुर्बीज का चूर्ण बनाकर नित्य खाने से वात सम्बन्धी रोग, अजीर्ण, शूल, आध्मान, पार्श्वशूल और कमर का दर्द दूर होता है॥९८-९९॥

अथ हिङ्गुनामगुणानाह

सहस्रवेधि जतुकं बाह्लीकं हिङ्गु रामठम् ॥ १०० ॥ हिङ्गूष्णं पाचनं रुच्यं तीक्ष्णं वातबलासत्नुत् १। शूलगुल्मोदरानाहकृमिघ्नं पित्तवर्धनम् ॥ १. 'हृदि'ति पा० ।


हरीतक्यादिवर्गः | ४१ हींग के नाम तथा गुण—सहस्रवेधि, जतुक, बाह्लीक, हिङ्गु और रामठ ये सब नाम हींग के हैं। हींग उष्णवीर्य, पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण, वात-श्लेष्म को दूर करने वाला, शूल, गुल्म, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा) और कृमियों को नष्ट करनेवाला एवम् पित्त को बढ़ाने वाला होता है ॥ १००-१०१॥

२८ हींग

हि०—हींग। ब०—हिंगु। पं०—हिंगे, हीग। म०—हिंग। मा०—हींग। गु०—हिंगड़ो, बधारणी, हिंग बघारणी। ते०—इङ्गुव, इंगुव, इंगुरा। ता०—पेरुंगियम्, पेरुंग्यम्। क०—हिंगु। फा०—अंगूजह, अंगुजा, अंगुजहे-ईल्ती। अ०—हिल तीत, हिल्तीस। अ०—Asafoetida (असेफीटिडा)। लै०—Ferula narthex, Boiss. (फेरुला नार्थेक्स, बॉ़यस.); F. alliacea Boiss. (फे. एलिएसिआ); Ferula foetida Regel (फेरुला फीटिडा)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। हींग सर्व प्रसिद्ध वस्तु एक विदेशीय वृक्ष का निर्यास है। इसकी उपर्युक्त कई जातियां विभिन्न स्थानोंपर होती हैं जिनसे कुछ कुछ भिन्न प्रकार का निर्यास प्राप्त किया जाता है। अधिकांश मिला- वटी हींग बिकती है। इनमें चोखी हींग, हीरा हींग, तलाव हींग इत्यादि अच्छी समझी जाती हैं। जो हींग रूमी मस्तगी के समान वर्ण वाली, गरम घी में डालने से लावा के समान खिल जाने वाली तथा लालिमा लिये भूरे या बादामी रंग की हो वह अच्छी मानी जाती है। उत्तम हींग की डली को तोड़ने से वह भाग बादामी रंग का दिखाई पड़ता है। इसका स्वाद कड़वा और लहसुन के समान खराशदार तथा इसकी गन्ध लहसुन के समान तीव्र होती है। पानी में घोलने से सफेद रंग की दिखाई पड़ती है। हींग के वृक्ष काबुल, हिरात, खुरासान, फारस एवं अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में उत्पन्न होते हैं तथा इस देश के पंजाब और काश्मीर में कहीं कहीं देखने में आते हैं। विभिन्न जातियों में थोड़ा बहुत स्वरूप में अंतर होता है। इसका वृक्ष झाड़ के समान छोटा, ५ से ८-९ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते अनेक भागों में विभक्त, अजमोदे के पत्तों के समान कटे किनारे वाले एवं १-२ फुट लम्बे होते हैं तथा टहनियों के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल-तिहाई से तीन चौथाई इञ्च के घेरे में अण्डाकार होते हैं। चार वर्ष का वृक्ष होने पर इसको काटते हैं और भूमि के पास वाली जड़ को तिरछे तराशने से जो रस निकल कर सूख जाता है उसको दो दिन के बाद खुरच कर संग्रह कर लेते हैं। फिर दो दिन के बाद जड़ को उसी प्रकार ऊपर से तराश कर छोड़ देते हैं और सूखने पर खुरच कर इकट्ठा कर लेते हैं। यही सूखा हुआ पदार्थ हींग है। प्रत्येक वृक्ष से २-३ छटांक से ५-६ छटांक तक हींग मिल सकती है। देशी हींग की अपेक्षा काबुली हींग अच्छी होती है। साधारण परीक्षा—(१) जल के साथ घोटने से इसका पीताभ दूधिया घोल बनता है जो क्षार मिलाने पर हरिताभ पीत हो जाता है। (२) थोड़ेसे हींग को गन्धक के तेजाब के साथ गरम करने पर लाल से भूरे रंग का घोल बनता है। इस घोल को अधिक जल से विरल बनाकर (Dilute), छानकर (filtering) उसको क्षारीय करने से एक गाढ़े नीले रंग की चमक उत्पन्न होती है (Purplish-blue fluorescence)।