भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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३८ भावप्रकाशनिघण्टुः अं०-Fenugreek (फेनुग्रीक) । ले०-Trigonella foenumgraecum Linn. (ट्राइगोनेल्ला फोएनम् ग्रेडकम्) । Papilionaceae (पैपिलिओनेसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है परन्तु पञ्जाब और काश्मीर में यह आपही आप जङ्गल में उत्पन्न होती है। इसका क्षुप ६ इञ्च से १६-१७ इञ्च तक ऊँचा होता है। पत्ते संयुक्त एवं प्रत्येक सींक पर तीन तीन पत्रक रहते हैं और वे आधे से एक इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार और बारीक कंगूरेदार होते हैं। फूल-नन्हें नन्हें हलके पीत रङ्ग के आते हैं। फलियाँ-गोल २-३ इञ्च लम्बी कुछ टेढ़ी सी नोकदार रहती हैं। प्रत्येक से १०-२० पीले रङ्ग के दाने निकलते हैं। इन्हीं का चिकित्सा में अधिक उपयोग करते हैं। रासायनिक सङ्गठन-इसके सूखे पञ्चाङ्ग में प्रोटीन (Protein) की मात्रा १६% रहती है जिसमें से इसके ग्लोब्यूलिन (Globulin) में हिस्टिडीन् (Histadine) की काफी मात्रा रहती है। इसके अलब्यूमिन् (Albumin) भाग में फॉस्फोरस् (Phosphorus) तथा गन्धक रहता है। इसके बीजों में ट्रिगोनेल्लिन (Trigonelline, C_7 H_7 O_2 N), कोलीन (Choline) आदि क्षाराम, एक पीत रञ्जक पदार्थ, स्थिरतैल ६%, प्रोटीन २२% तथा गोंद २८% रहता है। बीजों को जलाने से इसमें ७% राख निकलती है जिसमें से ३ फॉस्फोरिक् एसिड (Phosphoric acid) रहता है। इसके बीजों में फॉस्फेट्स (Phosphates), लेसिथिन् (Lecithin) और न्यूक्लिओ अलब्यूमिन् (Nucleo-albumin) रहने के कारण ये कॉडलिवर ऑइल (Cod-liver oil) के समान पोषक तथा बलकारक होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके बीज स्निग्ध, सुगन्धि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, आध्मानहर, बल्य, वृष्य, वातहर, गर्भाशय सङ्कोचक, दुग्ध वृद्धिकर एवं शोथघ्न होते हैं। इसके पत्र शीतल, दाहशामक, शोथहर एवं मृदु विरेचक होते हैं। (१) इसके बीजों से बनाये लड्डू का व्यवहार प्रसूता में किया जाता है जिससे भूख बढ़ती है, मल शुद्धि और आर्तवशुद्धि होती है। अजीर्ण, अग्निमांद्य, आमवात, एवं कामशक्ति की कमजोरी में भी ये उपयोगी हैं। (२) रक्तातिसार एवं मसूरिका में इसके बीज भूनकर और फिर उसका फांट बनाकर देते हैं। (३) शरीर की पीड़ा में इसके बीजों को ३-१ तोला की मात्रा में खिलाने से लाभ होता है। (४) दुग्ध वृद्धि के लिये इसकी लप्सो बनाकर प्रसूता को दी जाती है। (५) घी में भुने हुये मेथी के बीज, बादियाण और नमक का व्यवहार अतिसार रोकने के लिये करते हैं। (६) इसके बीजों को कॉडलिवर आइल के स्थान पर दे सकते हैं और इसका व्यवहार गण्डमाला, फक्करोग, पाण्डु, वातरक्त, मधुमेह और औपसर्गिक रोगजन्य दौर्बल्य में किया जाता है। (७) मिश्र में ज्वर रोकने के लिये इसको अङ्कुरित करके खिलाते हैं। मधुमेह में भी इससे लाभ होता है। (८) चर्मको मुलायम और स्वच्छ रखने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। बालों के झड़ने पर तथा सूजन पर इसका लेप उपयोगी है। श्वेतप्रदर में इसकी पेसरी को धारण कराया जाता है।


हरीतक्यादिवर्गः ३६ (९) इसके पत्तों का भी लेप सूजन एवं दाह में किया जाता है। लू लगने में इसके पत्तों को पीसकर शरीर पर मलते हैं तथा आन्तरिक व्यवहार भी करते हैं जिससे दाह की शान्ति होती है। अल्पमूल्य में बल्य एवं पोषक होने के कारण पशुओं को भी खिलायी जाती है। मात्रा-चूर्ण ३-३ तोला । २६ बनमेथी हि०-बनमेथी, जङ्गली मेथी । पं०-सिंजी । सिन्ध-जिर । अ०-अकूलिल्-उल्-मल्लिका । अं०-Sweet-cloves (स्वीट् क्लोव्हस्) । ले०-Melilotus parviflora Desf. मेलिलोटस् पार्विफ्लोरा); Syn.-Trifolium indicum Linn. (ट्रिफोलिअम् इण्डिकम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । पश्चिम प्रायद्वीप, बंगाल और उत्तरप्रदेश आदि स्थानों में यह आप ही आप उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-३० से ४५ मि० मि० ऊँचा तथा वर्षायु होता है। पत्र-संयुक्त तथा त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-१२ से १६ × ८ से १० मि० मि०, दन्तुर, अर्धभालाकार या अर्ध अंडाकार होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीतवर्ण की मंजरियों में आते हैं। फली-दीर्घवृत्ताकार, दबी हुई, दोनों छोर पर पतली एवं २.५ मि० मि० लंबे एक बीज युक्त होती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज ग्राही होते हैं तथा उदरशूल, अतिसार और आंत्र के विकारों में लाभदायक हैं। इसका व्यवहार कष्टार्तव, आमवात, गण्डमाला आदि में तथा रक्त शुद्धि के लिये किया जाता है। बच्चों के अतिसार में इसकी लप्सी का व्यवहार करते हैं। अथ चन्द्रशूरस्य नामानि गुणांश्चाह चन्द्रिका चर्महन्त्री च पशुमेहनकारिका । नन्दिनी कारवी भद्रा वासपुष्पा सुवासरा ॥५६॥ चन्द्रशूरं हितं हिक्कावातश्लेष्मातिसारिणाम् । असृग्वातगदद्वेषि बलपुष्टिविवर्द्धनम् ॥५७॥ चनसूर के नाम तथा गुण-चन्द्रिका, चर्महन्त्री, पशुमेहनकारिका, नन्दिनी, कारवी, भद्रा, वासपुष्पा और सुवासरा ये नाम चनसूर के हैं। चनसूर-हिक्को, वात-श्लेष्मा और अतिसार ग्रस्त रोगी तथा रक्तवातग्रस्त रोगियों के लिए हितकर है और बल तथा पुष्टिवर्धक भी है ॥५६-५७॥ २७ चन्द्रिका (हालों) हि०-हालों, हालिम, चनसुर, चन्दसुर, चन्द्रशूर । बं०-हालिम, हालिमा, हालो, चान्दसूर, अलेवेरी । म०-आलीव, हलिम, अहालीव । गु०-अशेलीओ, अशेरिया, आंशाल बीज । यू०- तरम राह के बीज । फा०-तुख्म तरह तेजक । अ०-बाजरुज्जरजीर । कुमा०-हालिम । ता०-अलिविरह । ते०-अदित यलु । प०-तेजक । सि०-अहेरो । क०-अह्लिबीज । अं०- Common Cress (कॉमनक्रेस) । ले०-Lepidium sativum Linn. (लेपिडियम् सेटि- वम्) Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। यह सब प्रान्तों में बोया जाता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मसृण या कुछ रोएंदार होता है। पत्ते-विभक्त होते हैं। पुष्प-सफेद तथा छोटे होते हैं। फल-०.२ इञ्च, चिपटे, १. 'चन्द्रिकाया' इति पाठा० । २. 'वामपुष्पे'ति पाठा० ।