भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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३६ भावप्रकाश निघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके फलों में ३-३.५% एक उड़न शील तैल पाया जाता है । इस तैल में डिल एपिओल (Dill-apiole, C₁₂H₁₄O₄) नामक एक तैलीय पदार्थ रहता है जो पारस्ले एपिओल (Parsley apiole, C₁₂H₁₄O₄) के सदृश होते हुये भी गुणों में उससे पृथक् (Isomeric = आइसॉमेरिक्) रहता है । इसके अतिरिक्त इसमें एक तरल हाइड्रोकार्बन ॲनीथेन् (Hydrocarbon-anethene, C₁₀H₁₆) और कारवोन (Carvone) सदृश पदार्थ रहता है । विदेशी और भारतीय तैल में थोड़ा अन्तर होता है । गुण और प्रयोग—सोआ दीपन, पाचन, वातानुलोमक, सुगन्धि, उत्तेजक, वातहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं दुग्धवर्धक है। बालकों के पचन विकारों में, विशेषकर आध्मान एवं शूल में चूने के जल के साथ इसके अर्क का बहुत व्यवहार किया जाता है। प्रसूता में भी वमन, अजीर्ण, हिक्का, आध्मान, शूल तथा दुग्ध वृद्धि आदि के लिये इसके क्वाथ का प्रयोग किया जाता है । अनार्तव में भी इसका प्रयोग करते हैं । केल और म्हसकर के मतानुसार अंकुश कृमि (Hookworm) में यह उपयोगी है । (१) अतिसार में मेथी और सोआ घी में भूनकर देते हैं । (२) इसके पत्तों को तेल लगा कर गरम करके फोड़े फुन्सियों पर बांधने से वे जल्दी पक जाते हैं । (३) इसके पत्ते तथा मूल को पीसकर जोड़ों की सूजन पर बांधने से लाभ होता है । (४) विरेचक औषधियों के साथ इसके तैल या अर्क के व्यवहार से मरोड नहीं होती । (५) चरक की राजयक्ष्मा की चिकित्सा में पार्श्वशूलहर लेप में इसका उल्लेख है । मात्रा—फल चूर्ण - १-४ माशा, तैल-१-३ बूंद, अर्क-३-१ औंस । संकेन्द्रित जल (अंका कन्सैन्ट्रैट = Aqua Concentrata) - ५-१५ बूंद । २४ सौंफ हि०-सौंफ, बड़ी सौंफ, सवँफ । ब०-मौरी, पान मौरी । म०-बड़ी शेगले गु०-वरीआली, वलीय़ारी । क०-बड़ी सोपु, सब्बसिंगे । मा०-सौंफ । प०-सौंफ । ते -सोपु, पेद्दजिलकुरा । ता०-सौदिकिरे, शोम्बु । फा०-राजयानज्, राजयाना, बादियां, बादियान, राजियानह् । अ०- एजियानज़, असुलुल एजियानज़, राज़ियाज़ । अं०-Fennel Fruit (फेन्नेल फ्रूट)। ले०-Foe- niculum vulgare Mill. (फिनिक्यूलम् वलगेरि); Syr.-Anethum foeniculum (एनेथम् फिनिक्यूलम् ।। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बोई जाती है । इसका क्षुप लम्बा, पत्ते-कई भागों में विभक्त सोये के पत्तों के समान, फूल-छत्राकार किञ्चित पीले रंग के और फल-६ से ७ मि. मि. लम्बे, ४ मि. मि. चौड़े, आयताकार, प्रायः अखण्डित एवं डंठल युक्त होते हैं । नये बीज हरे रंग के और पुराने होने पर पीलापन युक्त हो जाते हैं। जिन फलों का तेल निकाल लिया जाता है उनमें तैल की मात्रा कम हो जाती है और उनकी गन्ध भी कम होती है तथा वे अधिक गहरे रंग के हो जाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल १-२.९% और स्थिर तैल ८.८-१५.८% रहता है । इस उड़नशील तैल में एनीथॉल् (Anethol) ६०% तथा फेनकोन् (Fenchone)


हरीतक्यादिवर्गः ३७ आदि कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं । विदेशी सौंफ की अपेक्षा भारतीय सौंफ में इस तैल की मात्रा कम रहती है । गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, दाहप्रशमन एवं मूत्रविर- जनीय है । इसका उपयोग विशेषरूप से मसाले के रूप में एवं मादक पेयों में सुगन्धि के लिये किया जाता है। इसका अर्क बच्चों के पाचन के विकार जैसे आध्मान, शूल आदि में दिया जाता है और अन्य औषधियों के अनुपान के रूप में भी व्यवहार करते हैं। इसका व्यवहार आमातिसार, अजीर्ण, आध्मान, ज्वर, खांसी, श्वास, वृक्कयोग, प्लीहा वृद्धि, अनार्तव तथा दृष्टिमांद्य आदि रोगों में किया जाता है । (१) इसको पीसकर पीने से पेशाब की जलन दूर होकर पेशाब साफ होती है । (२) सूखी खांसी और मुख के विकारों में इसे मुख में रखने से लाभ होता है । (३) इसके पत्र सुगन्धि, मूत्रल और स्वेदजनक होते हैं । (४) इसका मूल विरेचक होता है । (५) इसके फलों को पीसकर लेप करने से गरमी के दिनों में होने वाला चक्कर तथा शिरःशूल दूर होता है । (६) आध्मान में इसके क्वाथ से बस्ति देने से लाभ होता है । मात्रा-४ रत्ती से २ माशा तक । नोट-एक अन्य प्रकार की सौंफ जिसे 'बादियाण' (Pimpinella anisum Linn. पिंपिनेल्ला एनिसम्) कहते हैं उसका वर्णन परिशिष्ट में देखें । अथ मेथीवनमेथीनामगुणानाह 'मेथिका मेधिनी मेथी दीपनी बहुपत्रिका । बोधिनी बहुबीजा च ज्योतिर्गन्धफला^२ तथा । वल्लरी चन्द्रिका मन्था मिश्रपुष्पा च केरवी । कुञ्चिका बहुपर्णी च पीतबीजा^३ मुनिच्छदा ॥ मेथिका वातशमनी श्लेष्मघ्नी ज्वरनाशिनी । ततः स्वल्पगुणा वन्या^४ वाजिनां सा तु पूजिता ॥ मेथी तथा वनमेथी के नाम तथा गुण-मेथिका, मेथिनी, मेथी, दीपनी, बहुपत्रिका, बोधिनी, बहुबीजा, ज्योतिः, गन्धफला, वल्लरी, चन्द्रिका, मन्था, मिश्रपुष्पा, केरवी, कुञ्चिका, बहुपर्णी, पीतबीजा और मुनिच्छदा ये सब नाम मेथी के हैं। मेथी-वायु को शमन करने वाली, कफ को दूर करने वाली तथा ज्वर को नष्ट करने वाली है और वनमेथी-मेथी की अपेक्षा कम गुण वाली होती है, किन्तु वह घोड़ों के लिये अत्यन्त उत्तम (हितकर) होती है ॥ ९३-९५ ॥ २५ मेथी हि०-मेथी । पं०-बं०-म०-गु०-मेथी । ते०-मेंडुलु, मैंतुलु, मेंति । ता०-वेण्डयम्, वेंडयम, वेन्दयम । क०-मेंत्रे । मल-उल्लव । फा०-तुख्माशमलीत । अ०-बजरुल हुल्वा, वजरुलहुल्वह्, हुलबह् । १. 'मिथिनौ'ति पाठा० । २. 'जाती'ति पाठा० । ३. 'पित्तजिद्वायुनुद्विधे'ति पाठा० । ४. 'वल्वे'ति पाठा० ।