भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ भावप्रकाश निघण्टुः 'धनियाँ' ही के समान है किन्तु विशेषता यह है कि यह मधुर रस युक्त तथा पित्त की विशेष रूप से नाशक होती है ॥ ८६- ८८ ॥ २२ धनियाँ हि०-धनियाँ । बं०-धने । म०-धने, । कोथिंबीर, धणे । गु०-धाना, धाणा, कोथमीर । क०-कोथुंबुरी, कोथम्बरी, हविज । ते०-कोत्तिमिरि, धनियल्लु । ता०-कोत्मल्लि, कोतमल्ली । सिन्ध०-धातु । फा०-कश्नीज । अ०-कज़बुरा, कजबुरह । अं० -- Coriander fruit ( कोरि- ॲन्डर फ्रूट ) । ले०-Coriandrum sativum Linn. ( कोरिएण्ड्रम् सैटिवम् लिन ) । Fam. Umbelliferae (अंबेलीफेरी) । इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में एवं विदेशों में भी इसकी उपज की जाती है । इसका पौधा १-२ फुट ऊँचा, शाखायें-चिकनी, पत्ते-विषमपत्ती, जड़ के निकटवाले पत्ते गोलाकार, ३-४ या ५ भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग कटे किनारे वाले और कँगूरेदार तथा शाखाओं के पत्ते सोआ, चनसुल आदि के पत्तों के समान होते हैं । फूल-छत्ते से सोया के फूल के समान सफेद या किंचित् गुलाबी रंग के आते हैं। फल-नन्हें नन्हें, अण्डाकार, गुच्छों में छत्राकार लगते हैं । सूखने पर वे दो टुकड़े होकर धनिये के नाम से बिकते हैं । रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक उड़नशील तैल ०'५-१% तक पाया जाता है जिसमें ४५-५५% कोरिएण्ड्रॉल ( Coriandrol, C₁₀H₁₈O ) तथा कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं । इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १३%, वसीय पदार्थ १३%, गोंद, टैनिन, मैलिक एसिड तथा राख ५% आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-धनियां मूत्रल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, संग्राहक, दाहशामक एवं पिपासाघ्न है । इसका उपयोग नेत्र रोग, ज्वरजन्यदाह, वमन, अतिसार, आमाजीर्ण, आध्मान, शूल आदि में किया जाता है। मसाले के रूप में, अनेक औषधियों को सुगन्धित करने के लिए तथा विरेचक ओषधियां जैसे सनाय रेवाचीनी आदि से मरोड न हो इसलिए इसका व्यवहार किया जाता है। ( १ ) ज्वर में दाह एवं प्यास की शान्ति के लिए इसका शीत कषाय मिश्री तथा मधु मिला- कर पिलाते हैं । ( २ ) नेत्राभिष्यन्द में इसके क्वाथ को छानकर नेत्र बिन्दु के रूप में डालने से लाभ होता है। पहले एरण्ड तैल डालकर फिर इसका प्रयोग करना चाहिये । शीतला में आँख धोने के लिये इसके जल का व्यवहार किया जाता है जिससे उत्तरकालीन नेत्राभिष्यन्द एवं नेत्रव्रण आदि उपद्रवों का प्रतिषेध होता है। ( ३ ) इसके तैल का व्यवहार वातनाडी शूल एवं जोड़ों के दर्द में करते हैं तथा बच्चों के आध्मान जन्य शूल में १-४ बूँद मिश्री के साथ देते हैं । ( ४ ) कच्ची धनियां का लेप सिरदर्द तथा भिलावे से उत्पन्न दाह पर किया जाता है। ( ५ ) पुराने घाव, सूजन तथा विषैले फोड़ों पर यवके आटे के साथ इसकी पुल्टिस उपयोगी है । ( ६ ) इसके क्वाथ में मिश्री मिलाकर रक्तार्श में देने से लाभ होता है। ( ७ ) क्षोभशामक होने के कारण धनियां के शीत कषाय का उपयोग अनुपान या सहपान के रूप में स्वप्नमेह एवं श्वेतप्रदर में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः । ३५ ( ८ ) जीर्ण प्रतिश्याय में धनियां का फाण्ट या बीजों का चूर्ण मिश्री के साथ प्रयुक्त होता है । मात्रा- ३ - ४ माशा । अधिक मात्रा में सेवन से कामशक्ति का ह्रास तथा स्त्रियों में मासिक धर्म रुक जाता है । दर्पनाशक - मधु, दालचीनो और अण्डा । अथ शतपुष्पामिश्रेयोर्नामानि गुणांश्चाह शतपुष्पा शताह्वा च मधुरा कारवी मिसिः । अतिलम्बी सितच्छत्रा संहितच्छत्रिकाऽपि १ च ॥ छत्रा शालेयशालीनी मिश्रेया मधुरा मिसिः । शतपुष्पा लघुस्तीक्ष्णा पित्तकृद्दीवनी कटुः ॥ उष्णा ज्वरानिलश्लेष्मव्रणशूलाक्षिरोगहत् । मिश्रेया तद्गुणा प्रोक्ता विशेषाद्यो निशूलनुत् ॥ अग्निमन्द्यहरी हृद्या वद्धविट्कृमिशुक्रहृत् । रूक्षोष्णा पाचनी कासवमिरुलेष्मानिलाहरेत् ॥ सोया और सौंफ के नाम तथा गुण- शतपुष्पा, शताह्वा, मधुरा, कारवी, मिसि, अतिलम्बी, सितच्छत्रा तथा संहितच्छत्रिका ये नाम सोये के हैं और छत्रा, शालेय, शालीन, मिश्रेया, मधुरा और मिसि ये सब नाम सौंफ के हैं। सोयां-परिपाक में लघु, तीक्ष्ण, पित्तकारक, अग्निदीपक, कड़वरसयुक्त, उष्णवीर्य तथा ज्वर, वातश्लेष्म, व्रण, शूल और नेत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली है और सौंफ के भी सोये के समान ही गुण हैं किन्तु विशेष करके यह योनिसम्बन्धी शूल को दूर करने वाली, अग्नि की मन्दता को नाश करने वाली, हृदय के लिये हितकारक, मल की विबद्धता को दूर करने वाली, कृमि तथा शुक्र का नाश करने वाली, रूक्ष, उष्णवीर्य पाचक एवं कास, वमन, कफ तथा वायु को दूर करने वाली होती है ॥ ८९-९२ ॥ २३ सोआ हि०-सोआ, सोया, सोवा, बनसौंफ । बं०-शुलफा, शुल्का । पं०-सोया । म०-बालंत शोप, शेप । क०-सब्बसिगे । गु०-सुवा । सै०-पुरातकुषिविट् डुलू, सोम्पा । मा०-सोवा, सुवा । ता०-शतकुप्पी विरइ । अं०-Indian dill fruit ( इण्डियन डिल फ्रूट ) । ले०-Anethum sowa Kurz ( अनेथम् सोवा ) । Peucedanum graveolens Linn. (प्यूसिडैनम् ग्रॅवियोलेन्स लिन) Fam. Umbelliferae ( अंबेलीफेरी ) । युरोपीय जाति प्यूसिडैनम् ॲवियोलेन्स ( Peucedanum graveolens ) से भारतीय जाति में कुछ अन्तर होने के कारण भारतीय जाति को अनेथम सोवा ( Anethum sowa ) कहते हैं । इस देश के सब प्रान्तों में विशेषकर गरम और शीत गरम प्रान्तों में इसकी खेती शीत ऋतु में की जाती है। यह क्षुप जाति की वनस्पति १-३ फुट तक ऊँची होती है । पत्ते-कई भागों में विभक्त, बारीक और अत्यन्त कोमल होते हैं । फूल-छत्राकार किञ्चित् पीले रंग के होते हैं । फल-अंडाकार, चिपटे, उन्नतोदर, किनारे पर सपक्ष एवं प्रायः दोनों अर्धखण्ड मिले हुये तथा आधार पर पतला डण्ठल लगा रहता है। ये विदेशी बीजों से कम चौड़े तथा अधिक उन्नतोदर और इनके पृष्ठ भाग की धारियां हलके रंग की होती हैं । १. 'संहिते'ति पाठा० ।