भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ भावप्रकाशनिघण्टुः (४) प्रसूता को देने से दुग्ध वृद्धि होती है। (५) हिचकी में घृत के साथ इसका धूमपान बहुत उपयोगी है। (६) इसको स्वरभंग एवं सर्पविष में भी उपयोगी बतलाया गया है। (७) इसका बाह्यलेप पीडाहर है एवं यह अर्श, स्तन, अण्डकोष तथा उदर की पीड़ा पर लगाया जाता है और घृत, मधु एवं नमक के साथ बिच्छू के काटने पर लगाने से लाभ होता है। इसके क्वाथ से स्नान करने से खुजली दूर होती है तथा इससे सिद्ध तैल का चर्मरोगों में उपयोग होता है। मात्रा—३-२ माशा २० कृष्ण जीरक हि०-काला जीरा, स्या जीरा, स्याह जीरा, कृष्णजीरा। ब०-काल जीरें, कृष्णजीरा। म०- शहाजीरें, शाहाजीरें, कालेजीरे। गु०-स्याजीरुं। क०-करिजीरके, करिजिरीगे । ते०-शिमइसपू। ता०-शिमह शोम्बु । मा०-श्याजीरो। जना०-गूंयूं । फा०-सियाहजीरा, स्याहजीरा, ज़ीरस्याह, जीरयेस्याह । अ०-कमूले किरमानी, कमून अस्वद । आं०-Black Caraway seed (ब्लॅक कॅराबे सीड)। ले०-Carum carvi Linn. (कॅरम् कॅरवई) । Fam. Umbelliferae (अम्बेलीफेरी) । इसका क्षुप उत्तरी हिमालय के पहाड़ी भागों में उत्पन्न होता है। इसकी खेती भारत के मैदानी भागों में एवं काश्मीर, कुमाऊं, गढवाल, चम्बा आदि पहाड़ी स्थानों में की जाती है। यह अफ- गानिस्तान एवं ईरान में भी होता है। यह १-२ फूट ऊँचा, शाखा-कोमल, हरित, एकांतर; पत्र- बहुविभक्त; पुष्प-श्वेत, छत्राकार; फल-कुछ टेढ़ापन लिये लंबे, सुगंधि, भूरापन लिये हुये काले, करीब ७ मि० मि० तक लंबे एवं २ मि० मि० चौड़े एवं दोनों सिरों पर नोकीले होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल ३*१-७% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक और स्तन्यजनन है। आध्मान, उदर- शूल, अतिसार, अपचन, जीर्णज्वर आदि में इसका उपयोग किया जाता है। प्रसूतिकाल में दूध बढ़ाने के लिए इसको देते हैं। यूरोप में इसको शान्तिदायक, मस्तिष्क के लिए उत्तेजक और अप- तंत्रक में उपयोगी मानते हैं। (१) इसके तैल का उपयोग अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिए एवं उनसे उत्पन्न हृल्लास और मरोड़ को दूर करने के लिए किया जाता है। (२) इसके अर्क का उपयोग बच्चों का पेट फूलना, शूल आदि में अनुपान के रूप में किया जाता है। (३) अर्श में सूजन हो तो इसके क्वाथ से सेकने से लाभ होता एवं गर्भाशय की पीड़ा में स्त्री को इसके क्वाथ में बैठाते हैं। मात्रा—३-२ माशा । नोट-एक अन्य प्रकार के जीरक का वर्णन जिसे संस्कृत में अरण्यजीरक और लैटिन में वर्नोनिया अंन्थेलमिन्टिका; कॉम्पोसिटी (Vernonia anthelmintica Willd; Fam. Compo- sitae ) कहते हैं, परिशिष्ट में देखें । २१ कालाजाजी (कलौंजी) हि०-कलौंजी, कलवंजी, कलौजी, मँगरेला, मंगरैल, मंगरैला। बं०-मोटा कालेजीरे, मोटकालजीर । म०-कलौंजी जीरें, कालेजीरे । गु०-कलौंजी जीरुं । क०-करि जीरिगे । ते०-नल्लुजील कारा। हरीतक्यादिवर्गः ३३ फा०-स्याहदाना । अ०-हब्बतूस्सोदा, शोनीज़ । आं०-Black cumin (ब्लॅक क्युमिन् ), Small fennel (स्मॉल फेनेल), Nigella seed (निगेल्ला सीड)। ले०-Nigella sativa Linn. (निगेला सॅटिवा, लिन.)। Fam. Ranunculaceae रेनन्क्युलेसी ) । कलौंजी हमारे देश का सर्व प्रसिद्ध एक गरम मसाला है। यह प्रायः पूर्व के प्रान्तों में एवं बिहार और पंजाब में अधिक बोई जाती है। दक्षिणी यूरोप तथा सीरिया में भी वह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप छोटा, पत्ते लम्बे तथा कटे हुए, फूल-हल्के नीले रंग के और फलियां ३ इंच लम्बी होती हैं। बीज-त्रिकोणाकार, तिल के समान पर तिल से किञ्चित् मोटे और अत्यन्त काले रङ्ग के होते हैं। इसका गूदा सफेद होता है और इसमें तीव्र गन्ध होती है। रासायनिक संगठन—इसमें पीले रंग का उड़नशील तैल ०'५-१'४%, स्थिर तैल ३७'५%, राल, अेल्ब्युमिन, शर्करा, गोंद, टैनिन, ग्लूकोसाइड, मेलान्थिन, मेलान्येजेनिन (१%) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धित, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, गर्भाशय शुद्धिकर, स्तन्य- वर्धक, स्वेदल एवं कृमिघ्न है। इसका उत्सर्ग त्वचा, वृक्क एवं स्तन द्वारा होता है तथा इनके स्रावों की वृद्धि होती है। अधिक मात्रा में इसके सेवन से शरीर की उष्णता बढ़ती है, नाड़ी की गति बढ़ती है तथा साथ ही साथ गर्भाशय संकोच होकर गर्भपात की भी संभावना रहती है। सूतिका में इसका उपयोग चित्रकमूल के साथ करने से भूख बढ़ती है, पाचन ठीक होता है, गर्भाशय शुद्ध होता है तथा दूध भी बढ़ता है। पीडितार्तव वा नष्टार्तव में यह उपयोगी है। सूतिका ज्वर तथा विषमज्वर में इसका उपयोग किया जाता है। अग्निमांद्य, कुपचन तथा आध्मान आदि में अन्य औषधियों के साथ इसका प्रयोग लाभदायक है। हिचकी में मट्ठे के साथ देने से लाभ होता है। विरेचक औषधियों के साथ इसके उपयोग से मरोड़ नहीं होने पाती। यह मसाले के रूप में भी व्यवहार में आता है। इसका लेप हाथ और पैरों की सूजन पर करने से दर्द दूर होकर सूजन कम होती है। त्वक् रोगों में इससे सिद्ध तैल का व्यवहार करते हैं तथा इसका आंतरिक प्रयोग भी करते हैं। मात्रा ३-१ माशा। हानिकर-गर्भिणी के लिये। अथ धान्यकस्य नामानि गुणांश्चाह धान्यकं धानकं धान्यं धाना धानेयकं तथा । कुनटी धेनुका छत्रा कुस्तुम्बुरु वितुन्नकम् ॥८६॥ धान्यकं तुवरं स्निग्धमवृष्यं मूत्रलं लघु । तिक्तं कटूष्णवीर्यञ्च दीपनं पाचनं स्मृतम् ॥ ८७ ॥ ज्वरघ्नं रोचनं ग्राहि स्वादुपाकि त्रिदोषनुत् । तृष्णा दाहवमिश्र्वासकास कार्श्यक्रिमिप्रणुत् ॥८८॥ आर्द्रन्तु तद्गुणं स्वादु विशेषात्पित्तनाशनम् १ ॥ ८८ ॥ धनियाँ के नाम तथा गुण-धान्यक, धानक, धान्य, धाना, धानेयक, कुनटी, धेनुका, छत्रा, कुस्तुम्बरु और वितुन्नक ये सब 'धनियाँ' के नाम हैं। धनियाँ-कषायरसयुक्त, स्निग्ध, अवृष्य, मूत्रजनक, लघु, तिक्त तथा कटुरस युक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, रोचक, ग्राही, परिपाक में मधुररसयुक्त, त्रिदोष को दूर करने वाली, तृष्णा (प्यास ), दाह, वमन, श्वास, कास, कृशता तथा कृमिरोग का नाश करने वाली है। कच्ची धनियाँ के भी गुण ३ १. 'पित्तनाशि तदिति पाठः । ३ भा० नि०