भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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के लिये अनेक निघण्टुओं का निर्माण ऋषिकल्प अधिकारी वनस्पति वेत्ताओं ने किया जिनमें धन्वन्तरि निघण्टु या गुडूच्यादि निघण्टु, मदन विनोद या मदनपाल निघण्टु, अभिधान चूड़ामणि या राज निघण्टु एवं भाव प्रकाश निघण्टु प्रमुख ग्रन्थ हैं। इन निघण्टुओं के अतिरिक्त अनेक महत्वपूर्ण निघण्टु ग्रन्थों का एवं द्रव्यगुण शास्त्र के अभिज्ञ विद्वानों का उल्लेख चिकित्सा साहित्य के वर्तमान ग्रन्थों में यत्र- तत्र मिलता है। किन्तु पूर्ण या खण्डित प्रति के रूप में वनौषधि विषयक दूसरी विशिष्ट रचनायें उपलब्ध नहीं हैं। उपर्निर्दिष्ट सभी निघण्टु ग्रन्थ बड़े महत्व के तथा द्रव्य-गुणों की अनमोल संग्रहात्मक रचनायें हैं। सबकी अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। इनमें भावमिश्र कृत द्रव्यगुणसंग्रह या भावप्रकाशनिघण्टु का उसकी सरलता के कारण एवं आधुनिक चिकित्सा महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में अन्तर्भाव होने के कारण व्यापक प्रसार हुआ है। भावप्रकाशनिघण्टु की लघु एवं दीर्घ कलेवर की अनेक व्याख्यायें उपलब्ध हैं। किन्तु काल प्रभाव से जिन दोषों का अन्तर्भाव वनस्पतियों के व्याख्यान के क्षेत्र में अभिनिविष्ट होता गया, उपलब्ध अधिकांश व्याख्याओं में भी वह गुण-दोष उत्तरोत्तर अभिवृद्ध होता रहा है। हम लोग कमरे में बैठ कर चार छः महत्व के आकर ग्रन्थों के सहारे अपनी कल्पनात्मक कूची के जोर से वनस्पतियों के चित्र खींचते जाते हैं, चाहे हमने उन वनस्पतियों को दर्शन स्वप्न में भी न किया हो। इस प्रकार की जटिलताओं के कारण द्रव्यगुण-विज्ञान का अध्ययन एवं अध्यापन बड़ा अप्रिय, नीरस एवं आयासकर विषय हो गया है। निघण्टु क्षेत्र की इन कठिनाइयों का निराकरण करने की चेष्टा भावप्रकाश-निघण्टु के वर्तमान संस्करण में की गई है। मेरे मित्र श्री कृष्णचन्द्र चुनेकर, प्राध्यापक, स्नातकोत्तर आयुर्वेदीय अनुसन्धान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने अपना जीवन ही द्रव्यगुण साहित्य के परिष्कार के लिये अर्पित कर दिया है। पिछली दो दशाब्दियों से आपने इस क्षेत्र के विशिष्ट वाङ्मय का पर्यालोचन करने के अतिरिक्त व्यावहारिक रूप में वनस्पतियों का प्रत्यक्ष परिचय पाने के लिये प्रायः सम्पूर्ण उत्तर भारत के गहन जंगलों की यात्रायें की हैं। वनस्पतियों का परिचय एवं स्वरूप निर्धारण, आधुनिक पाश्चात्य वर्गीकरण की दृष्टि से उनका अभिज्ञान आदि विषयों की उपलब्धि उनको इस क्षेत्र के सर्वमान्य वनौषधिवेत्ता आदरणीय प्रो० बलवन्तसिंह जी से प्राप्त हुई है। उनके साथ श्री चुनेकर जी ने उत्तरा खण्ड की तराईयों-चकराता, काश्मीर, देहरादून एवं विन्ध्यक्षेत्र की वनस्पतियों के लिये चित्रकूट अमरकण्टक आदि का पर्यटन किया है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वनौषधि संग्रहालय-
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हरबेरियम का वर्षों तक सञ्चालन करते हुए उसका गौरवपूर्ण प्रतिमान उपस्थित किया है। आपके सहयोग से भावप्रकाश-निघण्टु के पिछले तीन संस्करण पाठकों के सामने आ चुके हैं और उनका पर्याप्त समादर हुआ है। प्रस्तुत संस्करण में विमर्श का आद्यन्त परिष्कार, अद्यतन वनौषधि अनुसन्धान साहित्य का अन्तर्भाव एवं प्रत्येक वनस्पति का यथाशक्ति असंदिग्ध परिचय देने की चेष्टा की गई है। उन वनस्पतियों के शास्त्रोक्त विशिष्ट आमयिक प्रयोगों का भी यथास्थल उल्लेख किया गया है। संस्कृत के मूल श्लोकों का हिन्दी अनुवाद, भेषज द्रव्यों के भिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचलित सही नाम, उनके अंग्रेजी व लैटिन के स्वीकृत नाम, वनस्पतियों के उत्पत्ति-स्थान, उनका विशिष्ट परिचय, रासायनिक संगठन आदि का यथाशक्ति सही-सही वर्णन किया गया है। संदिग्ध एवं विवादास्पद स्थलों पर विभिन्न विद्वानों के विचार एवं मतभेद के आधार के उल्लेख की चेष्टा की गई है। अनेक परिशिष्टों के अलंकरण से इस संस्करण को अतीव उपयोगी बनाया गया है। इस प्रकार के कार्य में कितना श्रम पड़ता है इसका अनुभव सम्बद्ध विषयों के ज्ञाता ही कर सकते हैं। वनस्पतियों के भिन्न-भिन्न भाषाओं के नामों का एवं एक ही वनस्पति के भिन्न प्रान्तों में दूसरे अभिधानों से उल्लेख होने के कारण और अनेक वनस्पतियों का एक ही नाम से उल्लेख होने के कारण उत्पन्न भ्रान्तियों का निराकरण करने के लिए आपको केवल एक ही वनस्पति के लिये महीनों श्रम करना पड़ा है। श्री चुनेकर जी को यह लगन, कर्मठता एवं ज्ञान अपने पिता आयुर्वेदीय क्षेत्र के मर्मज्ञ, कुशल चिकित्सक अपने समय के दिग्विदिगन्त विख्यात पीयूषहस्त स्व० त्र्यम्बक शास्त्री के पट्ट शिष्य, पूज्य श्री श्रीनिवास शास्त्री जी से प्राप्त हुआ है। प्राचीन वैद्य परम्परा में सम्भवतः श्री श्रीनिवास जी शास्त्री ही एकमात्र ऐसे विद्वान् व्यक्ति हैं जिन्हें आधुनिक रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र तथा तकनीकशास्त्र (Technology) का आधुनिकतम परिज्ञान प्राप्त है। और पचासी वर्ष की अवस्था में अध्ययन-अध्यवसाय में निरन्तर लगे रहकर 'यावज्जीवमधीते विप्रः' की परम्परा को गति प्रदान कर रहे हैं। विश्वास है, भावप्रकाशनिघण्टु का प्रस्तुत संस्करण वानस्पतिक द्रव्यगुण- विज्ञान विषयक साहित्य का अध्ययन, अध्यापन, अनुसन्धान करने वाले एवं वैद्यक व्यवसाय से सम्बद्ध महानुभावों के लिये पूर्वापेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध होगा।