भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भ्रमण करते रहते हैं, इसलिये उनकी प्रतिमाको चलानेमें कोई भी दोष नहीं है। भगवान् सूर्यके भ्रमण करते हुए उनका रथ एवं मण्डल दिखायी नहीं पड़ता, इसलिये मनुष्योंने रथयात्राके द्वारा ही उनके रथ एवं मण्डलका दर्शन किया है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवोंकी प्रतिमाके स्थापित हो जानेके बाद उनको उठाना नहीं चाहिये, किंतु सूर्यनारायणकी रथयात्रा प्रजाओंकी शान्तिके लिये प्रतिवर्ष करनी चाहिये। सोने-चाँदी अथवा उत्तम काष्ठका अतिशय रमणीय और बहुत सुदृढ़ रथका निर्माण करना चाहिये। उसके बीचमें भगवान् सूर्यकी प्रतिमाको स्थापित कर उत्तम लक्षणोंसे युक्त अतिशय सुशील हरितवर्णके घोड़ोंको रथमें नियोजित करना चाहिये। उन घोड़ोंको केसरसे रँगकर अनेक आभूषणों, पुष्पमालाओं और चँवर आदिसे अलंकृत करना चाहिये। रथके लिये अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। इस प्रकार रथको तैयार कर सभी देवताओंकी पूजा कर ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। दक्षिणा देकर दीन, अंधे, उपेक्षितों तथा अनाथोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। उत्तम, मध्यम अथवा अधम किसी भी व्यक्तिको विमुख नहीं होने देना चाहिये। रथयात्रास्वरूप इस सूर्यमहायागमें भूखसे पीड़ित, बिना भोजन किये यदि कोई व्यक्ति भग्न आशावाला होकर लौट जाता है तो इस दुष्कृत्यसे उसके स्वर्गस्थ पितरोंका अधःपतन हो जाता है*। अतः सूर्यभगवान्के इस यज्ञमें भोजन और दक्षिणासे सबको संतुष्ट करना चाहिये, क्योंकि बिना दक्षिणाके यज्ञ प्रशस्त नहीं होता तथा निम्नलिखित मन्त्रोंसे देवताओंको उनका प्रिय पदार्थ समर्पित करना चाहिये—
बलिं गृहन्तु मे देवा आदित्या वसवस्तथा ॥
मरुतोऽथाश्विनौ रुद्राः सुपर्णाः पन्नगा ग्रहाः ।
असुरा यातुधानाश्च रथस्था यास्तु देवताः ॥
दिकपाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविनायकाः ।
जगतः स्वस्ति कुर्वन्तु ये च दिव्या महर्षयः ॥
मा विघ्नं मा च मे पापं मा च मे परिपन्थिनः ।
सौम्या भवन्तु तृमाश्च देवा भूतगणास्तथा ॥
(ब्राह्मपर्व ५५।६८-७१)
इन मन्त्रोंसे बलि देकर 'वामदेव्यो', 'पवित्रो' 'मानस्तोक०' तथा 'रथन्तर०' इन ऋचाओंके पाठ करें। अनन्तर पुण्याहवाचन और अनेक प्रकारके मङ्गल वाच्योंकी ध्वनि कर सुन्दर एवं समतल मार्गपर रथको चलाये, जिससे कहींपर धक्का न लगे। घोड़ेके अभावमें अच्छे बैलोंको रथमें लगाने चाहिये या पुरुषगण ही रथको खींचें। तीस वर्ष सोलह ब्राह्मण जो शुद्ध आचरणवाले हों तथा ब्रत हों, वे प्रतिमाको मन्दिरसे उठाकर बड़ी सावधानीसे रथमें स्थापित करें। सूर्य-प्रतिमाके दोनों ओर सूर्यदेवकी राज्ञी (संज्ञा) एवं निशुभा (छाया) नामक दोनो पत्नियोंको स्थापित करें। निशुभाको दाहिनी ओर तथा राज्ञीको बायीं ओर स्थापित करना चाहिये। सदाचारी वेदपाठी दो ब्राह्मण प्रतिमाओंके पीछेकी ओर बैठें और उन्हें सँभालकर स्थिर रखें। सारथि भी कुशल रहना चाहिये। सुवर्णदण्डसे अलंकृत छत्र रथके ऊपर लगाये, अतिशय सुन्दर रत्नोंसे जटित सुवर्णदण्डसे युक्त ध्वजा रथपर चढ़ाये, जिसमें अनेक रंगोंकी सात पताकाएँ लगी हों। रथके आगेके भागमें सारथिके रूपमें ब्राह्मणको बैठना चाहिये। श्रद्धारहित व्यक्तिको रथके ऊपर नहीं चढ़ना चाहिये। क्योंकि जो श्रद्धारहित व्यक्ति रथपर आरूढ़ होता है, उसकी संतति नष्ट हो जाती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको ही रथके वहन करनेका अधिकार है। अपने स्थानसे चलकर सर्वप्रथम रथको उत्तरद्वारपर
- सूर्यकृतौ तु वितते एवमाहूर्मनोपिणः ॥
यश्चित्तयति भग्राशः श्रुधावातप्रपीडितः । अदातुर्हि पितृस्तैन स्वर्गस्थानपि पातयेत् ॥ (ब्राह्मपर्व ५५।६५-६६)
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