भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102
  • ब्राह्मपर्व *

११

ले जाना चाहिये। वहाँ एक दिनतक रथकी पूजा करे, विविध नृत्य-गीतादि-उत्सव, वेदपाठ तथा पुराणोंकी कथा होनी चाहिये। वहाँ ब्राह्मण-भोजन भी कराना चाहिये। नवमीके दिन रथ चलाकर पूर्वद्वारपर ले जाय, एक दिन वहाँ रहे। तीसरे दिन दक्षिणद्वारपर रथ ले जाय तथा चौथे दिन पश्चिमद्वारपर रथ ले जाय। वहाँसे नगरके मध्यमें रथ ले जाय, वहाँ पूजन और उत्सव करे, दीपमालिका प्रज्वलित करे, ब्राह्मणोंको दान दे और भोजन

कराये। अनन्तर वहाँसे मन्दिरमें रथको लाना चाहिये। वहाँ नगरके सभी लोग मिलकर पूजन और उत्सव करें। एक दिन-रात रथमें ही प्रतिमा रहे। दूसरे दिन भगवान् सूर्यकी प्रतिमाको रथसे उतारकर बड़ी धूमधामसे मन्दिरमें स्थापित करे। इस प्रकार ससमीसे त्रयोदशीतक रथयात्रा होनी चाहिये और चतुर्दशीको प्रतिमा पूर्व स्थानमें स्थापित कर दे। इस रथयात्राके करनेसे सभी विघ्न-बाधाएँ निवृत्त हो जाती हैं। (अध्याय ५५)

रथयात्रामें विघ्न होनेपर एवं गोचरमें दुष्ट ग्रहोंके आ जानेपर शान्तिका विधान और तिलकी महिमा

भगवान् रुद्रने पूछा—ब्रह्मन्! आप पुनः रथयात्राका वर्णन करें।

ब्रह्माजीने कहा—रुद्र! रथको धीरे-धीरे सममार्गपर चलाया जाय, जिससे रथको धक्का आदि न लगने पाये। मार्गकी शुद्धिके लिये प्रथम प्रतीहार और दण्डनायक उस मार्गमें जायें। पिंगल, रक्षक, द्वारक, दिण्डी तथा लेखक—ये भी रथके साथ-साथ चलें। इतनी सतर्कता और कुशलतासे रथको ले जाया जाय कि रथका कोई अङ्ग-भङ्ग न हो। रथका ईषादण्ड टूटनेपर ब्राह्मणोंको, अक्ष टूटनेपर क्षत्रियोंको, तुला टूटनेपर वैश्योंको, शय्याके टूटनेपर शूद्रोंको भय होता है। युगके भङ्गसे अनावृष्टि, पीठके भङ्गसे प्रजाको भय, रथका चक्र टूटनेसे शत्रुसेनाका आगमन, ध्वजाके गिरनेसे राज-भङ्ग तथा प्रतिमा खण्डित होनेसे राजाकी मृत्यु होती है। छत्रके टूटनेपर युवराजकी मृत्यु होती है। इनमेंसे किसी भी प्रकारका उत्पात होनेपर उसकी शान्ति अवश्य करानी चाहिये तथा ब्राह्मणको भोजन और दान देना चाहिये एवं विधिपूर्वक ग्रह-शान्ति करानी चाहिये। रथके ईशानकोणमें वेदी अथवा कुण्ड

बनाकर घृत और समिधाओंसे देवता तथा ग्रहोंकी प्रसन्नताके लिये हवन करना चाहिये और इन नाम-मन्त्रोंसे आहुति देनी चाहिये—‘ॐ अग्नये स्वाहा, ॐ सोमाय स्वाहा, ॐ प्रजापतये स्वाहा।’—इत्यादि। अनन्तर शान्ति एवं कल्याणके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

स्वस्त्यस्त्वह च विप्रेभ्यः स्वस्ति राज्ञे तथैव च। गोभ्यः स्वस्ति प्रजाभ्यश्च जगतः शान्तिरस्तु वै॥ शं नोऽस्तु द्विपदे नित्यं शान्तिरस्तु चतुष्पदे। शं प्रजाभ्यस्तथैवास्तु शं सदात्मनि चास्तु वै॥ भूः शान्तिरस्तु देवेश भुवः शान्तिस्तथैव च। स्वश्वैवास्तु तथा शान्तिः सर्वत्रास्तु तथा रवेः॥ त्वं देव जगतः स्वष्टा पोष्टा चैव त्वमेव हि। प्रजापाल ग्रहेशान शान्तिं कुरु दिवस्पते॥

(ब्राह्मपर्व ५६।१६—१९)

अपनी जन्मराशिसे दुष्ट स्थानमें स्थित ग्रहोंकी प्रसन्नता तथा शान्तिके लिये ग्रह-समिधाओंसे हवन करना चाहिये। ये समिधाएँ प्रादेशमात्र लम्बी होनी चाहिये। सूर्यके लिये अर्ककी, चन्द्रमाके लिये पलाशकी, मङ्गलके लिये खदिरकी, बुधके लिये अपामार्गकी, बृहस्पतिके लिये पीपलकी, शुक्रके

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

भविष्य पुराण · पृष्ठ 102, कुल 654 में से · BharatKosha