भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

लिये गूलरकी, शनिके लिये शमीकी, राहुके लिये दूर्वाकी और केतुके लिये कुशाकी समिधा ही हवनके लिये प्रयोग करना चाहिये। उत्तम गौ, शङ्ख, लाल बैल, सुवर्ण, वस्त्र युगल, श्वेत अक्ष, काली गौ, लौहपात्र और छाग—ये क्रमशः नौ ग्रहोंकी दक्षिणा हैं। गुड और भात, घी-मिश्रित खीर, हविष्यान्न, क्षीरान्न, दही-भात, घृत, तिल और उड्डके बने पक्कान्न, गूदोंवाला फल, चित्रवर्णका भात एवं काँजी—ये क्रमशः नवग्रहोंके भोजन हैं। जैसे शरीरमें कवच पहन लेनेसे बाण नहीं लगते, वैसे ही ग्रहोंकी शान्ति करनेसे किसी प्रकारका उपघात नहीं होता। अहिंसक, जितेन्द्रिय, नियममें स्थित और न्यायसे धनार्जन करनेवाले पुरुषोंपर ग्रहोंका सदा अनुग्रह रहता है। यश, धन, संतानकी प्राप्तिके लिये, अनावृष्टि होनेपर, आरोग्य-प्राप्तिके लिये तथा सभी उपद्रवोंकी शान्तिके लिये ग्रहोंकी सदा पूजा करनी चाहिये। संतानसे रहित, दुष्ट संतानवाली, मृतवत्सा, मात्र कन्या संतानवाली स्त्री संतानदोषकी निवृत्तिके लिये, जिसका राज्य नष्ट हो गया हो वह राज्यके लिये, रोगी पुरुष रोगकी शान्तिके लिये अवश्य ग्रहोंकी शान्ति करे, ऐसा मनीषियोंने कहा है१। ग्रहोंकी प्रतिमा ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, सुवर्ण, चाँदी, लोहे और शीशे आदिकी बनवाकर अथवा इनके चित्रका निर्माण करा कर जिस ग्रहका जो वर्ण हो उसी रंगके वस्त्र एवं पुष्प उन्हें समर्पित करे। गुग्गुलका धूप सभीको अर्पित करना चाहिये।

‘आ कृष्णो नो’ (यजु० ३३।४३), ‘इमं देवा नो’ (यजु० ९।४०) इत्यादि नवग्रहोंके अलग-अलग मन्त्रोंसे एक-एक ग्रहके नामसे समिधा, घृत, शहद और दहीकी एक सौ आठ अथवा अट्टाईस आहुतियाँ दे तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराये। उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दे। जो ग्रह जिसके गोचर अथवा कुण्डलीमें दुष्ट स्थानपर स्थित हो, उसे उस ग्रहकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। महादेव! मैंने इन ग्रहोंके ऐसा वर दिया है कि लोगोंद्वारा तुम सब पूजित होओगे। राजाओंका उत्थान और पतन तथा मनुष्योंका उदय और सम्पत्तियोंका नाश ग्रहोंके अधीन हैं, इसलिये ग्रहशान्ति अवश्य करनी चाहिये। ग्रह, गाय, राजा, गुरुजन तथा ब्राह्मण पूजन करनेवाले व्यक्तिको सब प्रकारका सुख प्रदान करते हैं। इनका अपमान करनेसे मनुष्यको अनेक प्रकारके दुःख मिलते हैं। यज्ञ करनेवाले, सत्यवादी, जप, होम, उपवास आदिमें तत्पर धर्मात्मा पुरुषोंकी सभी बाधाएँ शान्त हो जाती हैं२।

इस प्रकारसे शान्ति कर रथको पुनः चलाना चाहिये और शेष मार्गोंमें घुमाकर अपने स्थानमें पहुँच जानेपर रथ-स्थित देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। उत्पात होनेपर ग्रहोंकी शान्तिके समान ही रथमें स्थित सभी देवताओंकी भी पूजा करनी चाहिये, ऐसा करनेसे सभी तरहके उत्पातोंकी सब प्रकारसे शान्ति हो जाती है।

दुष्ट ग्रहोंकी शान्तिके लिये ब्राह्मणोंको तिल प्रदान करे अथवा घीके साथ तिलोंका हवन करे

१- यथा बाणप्रहारणां वारणं कवचं स्मृतम्। तथा दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारणम्॥ अहिंसकस्य दान्तस्य धर्माजितधनस्य च। नित्यं च नियमस्थस्य सदा सानुग्रहा ग्रहाः॥ ग्रहाः पूज्या सदा रुद्र इच्छता विपुलं यशः। श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समाचरेत्॥ वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन् पुनः। यानपत्या भवेन्नारी दुष्प्रजाश्चापि या भवेत्॥ बाला यस्याः प्रप्रियन्ते या च कन्याप्रजा भवेत्। राज्यभ्रष्टो नृपो यस्तु दीर्घरोगी च यो भवेत्॥ ग्रहयज्ञः स्मृतस्तेषां मानवानां मनीषिभिः। (ब्राह्मपर्व ५६।३०—३५)

२- ग्रहा गावो नरेन्द्राश्च गुरवो ब्राह्मणास्तथा। पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्यपमानिताः॥ यज्ज्वां सत्यवाक्यानां तथा नित्योपवासिनाम्। जपहोमपराणां च सर्वं दुष्टं प्रशाम्यति॥ (ब्राह्मपर्व ५६।४७, ४९)

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