भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 654 में से

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पृष्ठ 106

* ब्राह्मपर्व * ९५


लोकपूजित ब्रह्मा और विष्णु तथा ललाटसे शंकर उत्पन्न हुए हैं, उनके प्रभावका वर्णन कौन कर सकता है? अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जिन मन्त्र, स्तोत्र, दान, स्नान, जप, पूजन, होम, व्रत तथा उपवासादि कर्मोंके करनेसे भगवान् सूर्य प्रसन्न होकर सभी कष्टोंको निवृत्त करते हैं और संसार-सागरसे मुक्त करते हैं, आप उन्हीं उत्तम मन्त्र, स्तोत्र, रहस्य, विद्या, पाठ, व्रत आदिको बतायें, जिनसे भगवान् सूर्यका कीर्तन हो और जिह्वा धन्य हो जाय। क्योंकि वही जिह्वा धन्य है जो भगवान् सूर्यका स्तवन करती है। सूर्यकी आराधनाके बिना यह शरीर व्यर्थ है। एक बार भी सूर्यनारायणको प्रणाम करनेसे प्राणीका भवसागरसे उद्धार हो जाता है। रत्नोंका आश्रय मेरुपर्वत, आश्चर्योंका आश्रय आकाश, तीर्थोंका आश्रय गङ्गा और सभी देवताओंके आश्रय भगवान् सूर्य हैं। मुने! इस प्रकार अनन्त गुणोंवाले भगवान् सूर्यके माहात्म्यको मैंने बहुत बार सुना है। देवगण भी भगवान् सूर्यकी ही आराधना करते हैं, यह भी मैंने सुना है। अब मेरा यही दृढ़ संकल्प है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाले तथा स्मरणमात्रसे समस्त पाप-तापोंको दूर करनेवाले भगवान् सूर्यकी भक्तिपूर्वक उपासना कर मैं भी संसारसे मुक्त हो जाऊँ।

(अध्याय ५९-६०)


भगवान् सूर्यद्वारा योगका वर्णन एवं ब्रह्माजीद्वारा दिण्डीको दिया गया क्रियायोगका उपदेश

सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! ऋषियोंको जिस प्रकार ब्रह्माजीने सूर्यनारायणकी आराधनाके विधानका उपदेश दिया था, उसे मैं सुनाता हूँ।

किसी समय ऋषियोंने ब्रह्माजीसे प्रार्थना की कि महाराज! सभी प्रकारकी चित्तवृत्तिके निरोधरूपी योगको आपने कैवल्यपदको देनेवाला कहा है, किंतु यह योग अनेक जन्मोंकी कठिन साधनाके द्वारा प्राप्त हो सकता है। क्योंकि इन्द्रियोंको बलात् आकृष्ट करनेवाले विषय अत्यन्त दुर्जय हैं, मन किसी प्रकारसे स्थिर नहीं होता, राग-द्वेष आदि दोष नहीं छूटते और पुरुष अल्पायु होते हैं, इसलिये योगसिद्धिका प्राप्त होना अतिशय कठिन है। अतः आप ऐसे किसी साधनका उपदेश करें जिससे बिना परिश्रमके ही निस्तार हो सके।

ब्रह्माजीने कहा—मुनीश्वरो! यज्ञ, पूजन, नमस्कार, जप, व्रतोपवास और ब्राह्मण-भोजन आदिसे सूर्यनारायणकी आराधना करना ही इसका मुख्य उपाय है। यह क्रियायोग है। मन, बुद्धि, कर्म, दृष्टि आदिसे सूर्यनारायणकी आराधनामें तत्पर रहे। वे ही परब्रह्म, अक्षर, सर्वव्यापी, सर्वकर्ता, अव्यक्त, अचिन्त्य और मोक्षको देनेवाले हैं। अतः आप उनकी आराधना कर अपने मनोवाञ्छित