भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

फलको प्राप्त करें और भवसागरसे मुक्त हो जायें। ब्रह्माजीसे यह सुनकर मुनिगण सूर्यनारायणकी उपासनारूप क्रियायोगमें तत्पर हो गये। हे राजन्! विषयोंमें डूबे हुए संसारके दुःखी जीवोंको सुख प्रदान करनेवाले सूर्यनारायणके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है, इसलिये उठते-बैठते, चलते-सोते, भोजन करते हुए सदा सूर्यनारायणका ही स्मरण करो, भक्तिपूर्वक उनकी आराधनामें प्रवृत्त होओ, जिससे जन्म-मरण, आधि-व्याधिसे युक्त इस संसारसमुद्रसे तुम पार हो जाओगे। जो पुरुष जगत्कर्ता, सदा वरदान देनेवाले, दयालु और ग्रहोंके स्वामी श्रीसूर्यनारायणकी शरणमें जाता है, वह अवश्य ही मुक्ति प्राप्त करता है।

सुमन्तु मुनिने पुनः कहा— राजन्! प्राचीन कालमें दिण्डीको ब्रह्महत्या लग गयी थी। उस ब्रह्महत्याके पापको दूर करनेके लिये उन्होंने बहुत दिनोंतक सूर्यनारायणकी आराधना और स्तुति की। उससे प्रसन्न हो भगवान् सूर्य उनके पास आये। भगवान् सूर्यने कहा—‘दिण्डिन्! तुम्हारी भक्तिपूर्वक की गयी स्तुतिसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, अपना अभीष्ट वर माँगो।’

दिण्डीने कहा— महाराज! आपने पधारकर मुझे दर्शन दिया, यह मेरे सौभाग्यकी बात है। यही मेरे लिये सर्वश्रेष्ठ वर है। पुण्यहीनोंके लिये आपका दर्शन सर्वदा दुर्लभ है। आप सबके हृदयमें स्थित हैं, अतः आप सबका अभिप्राय जानते हैं। जिस प्रकार मुझे ब्रह्महत्या लगी है, उसे तो आप जानते ही हैं। भगवन्! आप मुझपर ऐसा अनुग्रह करें कि मैं इस निन्दित ब्रह्महत्यासे तथा अन्य पापोंसे शीघ्र मुक्त हो जाऊँ और मैं सफल-मनोरथ हो जाऊँ। आप संसारसे उद्धारका उपाय बतलायें, जिसके आचरणसे संसारके प्राणी

सुखी हों। दिण्डीके इस वचनको सुनकर योगवेत्ता भगवान् सूर्यने उन्हें निर्बीज-योगका उपदेश दिया। जो दुःखके निवारणके लिये औषधरूप है।

दिण्डीने प्रार्थना करते हुए कहा— महाराज! यह निष्कल-योग तो बहुत कठिन है, क्योंकि इन्द्रियोंको जीतना, मनको स्थिर करना, अहं-शरीरादिका अभिमान और ममताका त्याग करना, राग-द्वेषसे बचना—ये सब अतिशय कष्टसाध्य हैं। ये बातें कई जन्मोंके अभ्यास करनेसे प्राप्त होती हैं। अतः आप ऐसा साधन बतलायें, जिससे अनायास बिना विशेष परिश्रमके ही फलकी प्राप्ति हो जाय।

भगवान् सूर्यने कहा— गणनाथ! यदि तुम्हें मुक्तिकी इच्छा है तो समस्त क्लेशोंको नष्ट करनेवाले क्रियायोगको सुनो। अपने मनको मुझमें लगाओ, भक्तिसे मेरा भजन करो, मेरा यजन करो, मेरे परायण हो जाओ, आत्माको मेरेमें लगा दो, मुझे नमस्कार करो, मेरी भक्ति करो, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें मुझे परिव्याप्त समझो*, ऐसा करनेसे तुम्हारे सम्पूर्ण दोषोंका विनाश हो जायगा और तुम मुझे प्राप्त कर लोगे। भलीभाँति मुझमें आसक्त हो जानेपर राग-लोभादि दोषोंके नाश हो जानेसे कृतकृत्यता हो जाती है। अपने मनको स्थिर करनेके लिये सोना, चाँदी, ताम्र, पाषाण, काष्ठ आदिसे मेरी प्रतिमाका निर्माण कराकर या चित्र ही लिखकर विविध उपचारोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करो। सर्वभावसे प्रतिमाका आश्रय ग्रहण करो। चलते-फिरते, भोजन करते, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे उसीका ध्यान करो, उसे पवित्र तीर्थोंके जलसे स्नान कराओ। गन्ध, पुष्प, वस्त्र, आभूषण, विविध नैवेद्य और जो पदार्थ स्वयंको प्रिय हों उन्हें अर्पण करो। इन विविध उपचारोंसे मेरी प्रतिमाको संतुष्ट करो।

  • मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुर्व। मामेवैष्यसि युक्तैवमात्मानं मत्परायणः ॥ (ब्रह्मपर्व ६२।१९; गीता ९।३४)

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