भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 654 में से

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पृष्ठ 108
  • ब्राह्मपर्व * ९७

कभी गानेकी इच्छा हो तो मेरी मूर्तिके आगे मेरा गुणानुवाद गाओ, सुननेकी इच्छा हो तो हमारी कथा सुनो। इस प्रकार मुझमें अपने मनको अर्पण करनेसे तुम्हें परमपदकी प्राप्ति हो जायगी। सभी कर्म मुझमें अर्पण करो, डरनेकी कोई बात नहीं। मुझमें मन लगाओ, जो कुछ करो मेरे लिये करो, ऐसा करनेसे तुम ब्रह्महत्या आदि सभी दोष-पापोंसे रहित होकर मुक्त हो जाओगे, इसलिये तुम इस क्रियायोगका आश्रय ग्रहण करो।

दिण्डी बोले—महाराज! इस अमृतरूप क्रियायोगको आप विस्तारसे कहें, क्योंकि आपके बिना कोई भी इसे बतलानेमें समर्थ नहीं है। यह अत्यन्त गोपनीय और पवित्र है।

भगवान् सूर्यने कहा—तुम चिन्ता मत करो। इस सम्पूर्ण क्रियायोगका ब्रह्माजी तुमको विस्तारपूर्वक उपदेश करेंगे और मेरी कृपासे तुम इसे ग्रहण करोगे। इतना कहकर तीनों लोकोंके दीपस्वरूप भगवान् सूर्य अन्तर्हित हो गये और दिण्डी भी ब्रह्माजीके धामको चले गये। ब्रह्मलोक पहुँचकर दिण्डी सुरज्येष्ठ चतुर्मुख ब्रह्माजीको प्रणाम कर कहने लगे।

दिण्डीने प्रार्थनापूर्वक कहा—ब्रह्मन्! मुझे भगवान् सूर्यदेवने आपके पास भेजा है। आप कृपाकर मुझे क्रियायोगका उपदेश करें, जिसके सहारे मैं शीघ्र ही भगवान् सूर्यको प्रसन्न कर सकूँ।

ब्रह्माजी बोले—गणाधिप! भगवान् सूर्यका दर्शन करते ही तुम्हारी ब्रह्महत्या तो नष्ट हो गयी। तुम भगवान् सूर्यके कृपापात्र हो। यदि सूर्यनारायणकी आराधना करनेकी इच्छा है तो प्रथम दीक्षा ग्रहण करो, क्योंकि दीक्षाके बिना उपासना नहीं होती। अनेक जन्मोंके पुण्यसे भगवान् सूर्यमें भक्ति होती है। जो पुरुष भगवान् सूर्यसे द्वेष रखता है, ब्राह्मण तथा वेदकी निन्दा करता है, उसे अवश्य ही अधम पुरुषसे उत्पन्न समझो। मायाके प्रभावसे ही अधम पुरुषोंकी कुकर्ममें प्रवृत्ति होती है और उनके स्वल्प शेष रहनेपर सूर्यकी आराधनाके लिये दीक्षाकी इच्छा होती है। इस भवसागरमें डूबनेवाले पुरुषोंका हाथ पकड़कर उद्धार करनेवाले एकमात्र भगवान् सूर्य ही हैं। इसलिये तुम दीक्षा ग्रहण कर भगवान् सूर्यमें तन्मय होकर उनकी उपासना करो, इससे शीघ्र ही भगवान् सूर्य तुमपर अनुग्रह करेंगे।

दिण्डीने पूछा—महाराज! दीक्षाका अधिकारी कौन पुरुष है और दीक्षा-ग्रहण करनेके बाद क्या करना चाहिये। कृपया आप इसे बतायें।

ब्रह्माजीने कहा—दिण्डिन्! दीक्षा-ग्रहणकी इच्छावाले व्यक्तिको मन, वचन और कर्मसे हिंसा नहीं करनी चाहिये। सूर्यभगवान्‌में भक्ति करनी चाहिये, दीक्षित ब्राह्मणोंको सदा नमस्कार करना चाहिये, किसीसे द्रोह नहीं करना चाहिये। सभी प्राणियोंको सूर्यके रूपमें समझना चाहिये। देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, चींटी, वृक्ष, पाषाण आदि जगत्‌के सभी पदार्थों और आत्माको सूर्यसे भिन्न न समझकर मन, वचन और कर्मसे जीवोंमें पापबुद्धि नहीं करनी चाहिये—ऐसा ही पुरुष दीक्षाका अधिकारी होता है। जो गति सूर्यनारायणकी आराधनासे प्राप्त होती है, वह न तो तपसे मिलती है और न बहुत दक्षिणावाले यज्ञोंके करनेसे। सभी प्रकारसे जो भगवान् सूर्यका भक्त है, वह धन्य है। उस सूर्यभक्तके अनेक कुलोंका उद्धार हो जाता है। जो अपने हृदयप्रदेशमें भगवान् सूर्यकी अर्चा करता है, वह निष्पाप होकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। सूर्यका मन्दिर बनवानेवाला अपनी सात पीढ़ियोंको सूर्यलोकमें निवास कराता है और जितने वर्षोंतक मन्दिरमें पूजा होती है, उतने हजार वर्षोंतक वह सूर्यलोकमें आनन्दका भोग करता है। निष्कामभावसे सूर्यकी