भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112
  • ब्राह्मपर्व *

१०१

हे दिण्डिन्! इस प्रकार मैंने ससमीके इस माहात्म्यका वर्णन किया, जिसके श्रवणमात्रसे भी सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और सूर्यलोककी प्राप्ति होती है।

सुमन्तु बोले—राजन्! इतना कहकर ब्रह्माजी

अन्तर्धान हो गये और दिण्डी भी उनके द्वारा बताये गये इस व्रतके अनुसार सूर्यनारायणका पूजन करके अपने मनोवाञ्छित फलको प्राप्त करनेमें सफल हुए और भगवान् सूर्यके अनुचर हो गये। (अध्याय ६५)

शंख एवं द्विज, वसिष्ठ एवं साम्ब तथा याज्ञवल्क्य और ब्रह्माके संवादमें आदित्यकी आराधनाका माहात्म्य-कथन, भगवान् सूर्यकी ब्रह्मरूपता

राजा शतानीकने कहा—मुने! आप भगवान् सूर्यनारायणके प्रभावका और भी वर्णन करें। आपकी अमृतमयी वाणी सुन-सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! इस विषयमें शंख और द्विजका जो संवाद हुआ है, उसे आप सुनें, जिसे सुनकर मानव सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

एक अत्यन्त रमणीय आश्रम था, जिसमें सभी वृक्ष फलोंके भारसे झुक रहे थे। कहीं मृग अपनी सींगोंसे परस्पर एक-दूसरेके शरीरमें खुजला रहे थे, किसी दिशामें मयूरोंका नृत्य और भ्रमरोंकी मधुर ध्वनिका गुंजार हो रहा था। ऐसे मनोहारी आश्रममें अनेक तपस्वियोंसे सेवित भगवान् सूर्यके अनन्य भक्त शंख नामके एक मुनि रहते थे। एक बार भोजक-कुमारोंने मुनिके समीप जाकर विनयपूर्वक अभिवादन कर निवेदन किया—महाराज! वेदोंके विषयमें हमें संदेह है। आप उसका निवारण करें। उन विनयी भोजकोंकी इस प्रार्थनाको सुनकर प्रसन्न हुए शंखमुनि उन सभीको वेदाध्ययन कराने लगे। एक दिन वे सभी कुमार वेदका अध्ययन कर रहे थे, उसी समय परम तपस्वी द्विज नामके एक श्रेष्ठ मुनि वहाँ आये। अमित तेजस्वी उन शंखमुनिने उनकी विधिवत् अर्चना की और उन्हें आसनपर

बैठाया। उन कुमारोंने भी उनकी वन्दना की, जिससे द्विज बहुत प्रसन्न हुए।

शंख मुनिने उन भोजक-कुमारोंसे कहा—शिष्ट पुरुषके आगमनसे अनध्याय होता है। अतः तुम सब इस समय अपना अध्ययन समाप्त करो। यह सुनते ही कुमारोंने अपने-अपने ग्रन्थ बंद कर दिये।

द्विजने शंख मुनिसे पूछा—ये बालक कौन हैं और क्या पढ़ते हैं?

शंख मुनिने कहा—महाराज! ये भोजक-कुमार हैं। सूत्र और कल्पके साथ चारों वेद, सूर्यनारायणके पूजन और हवनका विधान, प्रतिष्ठाविधि, रथयात्राकी रीति तथा ससमी तिथिके कल्पका ये अध्ययन कर रहे हैं।

द्विजने पुनः पूछा—मुने! ससमी-व्रतका क्या विधान है और भगवान् सूर्यके अर्चनकी क्या विधि है? सूर्य-मन्दिरमें गन्ध, पुष्प, दीप आदि देनेसे क्या फल प्राप्त होता है? किस व्रत, नियम और दानसे भगवान् सूर्य प्रसन्न होते हैं? उन्हें कौन-से पुष्प-धूप तथा उपहार दिये जाते हैं? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ, इसे आप बतायें। सूर्यनारायणके माहात्म्यकी भी विशेषरूपसे चर्चा करें।

शंख मुनिने कहा—इस प्रसंगमें मैं महाराज

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth