भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
साम्ब और महर्षि वसिष्ठके संवादका वर्णन कर रहा हूँ।
एक बार साम्ब महर्षि वसिष्ठके पवित्र आश्रमपर गये। वहाँ जाकर उन्होंने नियतात्मा वसिष्ठके चरणोंमें प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर विनीत भावसे खड़े हो गये। महर्षि वसिष्ठने भी उनके भक्तिभावको देखकर प्रसन्नमनसे उनसे पूछा।
वसिष्ठ बोले— साम्ब! तुम्हारा तो सम्पूर्ण शरीर भयंकर कुछ-रोगसे विदीर्ण हो गया था, यह सर्वथा रोगमुक्त कैसे हुआ और तुम्हारे शरीरकी दिव्य कान्ति एवं शोभा कैसे बढ़ गयी? यह सब मुझे बताओ।
साम्बने कहा— महाराज! मैंने भगवान् सूर्यनारायणकी आराधना उनके सहस्त्रनामोंद्वारा की है। उसी आराधनाके प्रभावसे उन्होंने प्रसन्न होकर मुझे साक्षात् दर्शन दिया है और उनसे मुझे वरकी भी प्राप्ति हुई है।
वसिष्ठने पुनः पूछा— तुमने किस विधिसे सूर्यकी आराधना की है? तुम्हें किस व्रत, तप अथवा दानसे उनका साक्षात् दर्शन हुआ? यह सब विस्तारसे बतलाओ।
साम्बने कहा— महाराज! जिस विधिसे मैंने भगवान् सूर्यको प्रसन्न किया है, वह समस्त वृत्तान्त आप ध्यानपूर्वक सुनें।
आजसे बहुत पहले मैंने अज्ञानवश दुर्वासा-मुनिका उपहास किया था। इसलिये क्रोधमें आकर उन्होंने मुझे कुछरोगसे ग्रस्त होनेका शाप दे दिया, जिससे मैं कुछरोगी हो गया। तब अत्यन्त दुःखी एवं लज्जित होते हुए मैंने अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर निवेदन किया—‘तात! मैं दुर्वासा मुनिके शापसे कुछरोगसे ग्रस्त होकर अत्यधिक पीड़ित हो रहा हूँ, मेरा शरीर गलता जा रहा है। कण्ठका स्वर भी बैठता जा रहा है। पीड़ासे प्राण
निकल रहे हैं। वैद्यों आदिके द्वारा उपचार करानेपर भी मुझे शान्ति नहीं मिलती। अब आपकी आज्ञा प्राप्त कर मैं प्राण त्यागना चाहता हूँ। अतः आप मुझे यह आज्ञा देनेकी कृपा करें, जिससे मैं इस कष्टसे मुक्त हो सकूँ।’ मेरा यह दीन वचन सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने क्षणभर विचार कर मुझसे कहा—‘पुत्र! धैर्य धारण करो, चिन्ता मत करो, क्योंकि जैसे सूखे तिनकेको आग जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही चिन्ता करनेसे रोग और अधिक कष्ट देता है। भक्तिपूर्वक तुम देवाराधन करो। उससे सभी रोग नष्ट हो जायेंगे।’ पिताके ऐसे वचन सुनकर मैंने पूछा—‘तात! ऐसा कौन देवता है, जिसकी आराधना करनेसे इस भयंकर रोगसे मैं मुक्ति पा सकूँ?’
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— पुत्र! एक समयकी बात है, योगिश्रेष्ठ याज्ञवल्क्य मुनिने ब्रह्मलोकमें जाकर पद्मयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम किया और उनसे पूछा कि महाराज! मोक्ष प्राप्त करनेके इच्छुक प्राणीको किस देवताकी आराधना करनी चाहिये? अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति किस देवताकी उपासना करनेसे होती है? यह चराचर विश्व किससे उत्पन्न हुआ है और किसमें लीन होता है? इन सबका आप वर्णन करें।
ब्रह्माजी बोले— महर्षि! आपने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। यह सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैं आपके प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ, इसे ध्यानपूर्वक सुनें—जो देवश्रेष्ठ अपने उदयके साथ ही समस्त जगत्का अन्धकार नष्ट कर तीनों लोकोंको प्रतिभासित कर देते हैं, वे अजर-अमर, अव्यय, शाश्वत, अक्षय, शुभ-अशुभके जाननेवाले, कर्मसाक्षी, सर्वदेवता और जगत्के स्वामी हैं। उनका मण्डल कभी क्षय नहीं होता। वे पितरोंके पिता, देवताओंके भी देवता, जगत्के आधार, सृष्टि, स्थिति तथा
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