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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

साम्ब और महर्षि वसिष्ठके संवादका वर्णन कर रहा हूँ।

एक बार साम्ब महर्षि वसिष्ठके पवित्र आश्रमपर गये। वहाँ जाकर उन्होंने नियतात्मा वसिष्ठके चरणोंमें प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर विनीत भावसे खड़े हो गये। महर्षि वसिष्ठने भी उनके भक्तिभावको देखकर प्रसन्नमनसे उनसे पूछा।

वसिष्ठ बोले— साम्ब! तुम्हारा तो सम्पूर्ण शरीर भयंकर कुछ-रोगसे विदीर्ण हो गया था, यह सर्वथा रोगमुक्त कैसे हुआ और तुम्हारे शरीरकी दिव्य कान्ति एवं शोभा कैसे बढ़ गयी? यह सब मुझे बताओ।

साम्बने कहा— महाराज! मैंने भगवान् सूर्यनारायणकी आराधना उनके सहस्त्रनामोंद्वारा की है। उसी आराधनाके प्रभावसे उन्होंने प्रसन्न होकर मुझे साक्षात् दर्शन दिया है और उनसे मुझे वरकी भी प्राप्ति हुई है।

वसिष्ठने पुनः पूछा— तुमने किस विधिसे सूर्यकी आराधना की है? तुम्हें किस व्रत, तप अथवा दानसे उनका साक्षात् दर्शन हुआ? यह सब विस्तारसे बतलाओ।

साम्बने कहा— महाराज! जिस विधिसे मैंने भगवान् सूर्यको प्रसन्न किया है, वह समस्त वृत्तान्त आप ध्यानपूर्वक सुनें।

आजसे बहुत पहले मैंने अज्ञानवश दुर्वासा-मुनिका उपहास किया था। इसलिये क्रोधमें आकर उन्होंने मुझे कुछरोगसे ग्रस्त होनेका शाप दे दिया, जिससे मैं कुछरोगी हो गया। तब अत्यन्त दुःखी एवं लज्जित होते हुए मैंने अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर निवेदन किया—‘तात! मैं दुर्वासा मुनिके शापसे कुछरोगसे ग्रस्त होकर अत्यधिक पीड़ित हो रहा हूँ, मेरा शरीर गलता जा रहा है। कण्ठका स्वर भी बैठता जा रहा है। पीड़ासे प्राण

निकल रहे हैं। वैद्यों आदिके द्वारा उपचार करानेपर भी मुझे शान्ति नहीं मिलती। अब आपकी आज्ञा प्राप्त कर मैं प्राण त्यागना चाहता हूँ। अतः आप मुझे यह आज्ञा देनेकी कृपा करें, जिससे मैं इस कष्टसे मुक्त हो सकूँ।’ मेरा यह दीन वचन सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने क्षणभर विचार कर मुझसे कहा—‘पुत्र! धैर्य धारण करो, चिन्ता मत करो, क्योंकि जैसे सूखे तिनकेको आग जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही चिन्ता करनेसे रोग और अधिक कष्ट देता है। भक्तिपूर्वक तुम देवाराधन करो। उससे सभी रोग नष्ट हो जायेंगे।’ पिताके ऐसे वचन सुनकर मैंने पूछा—‘तात! ऐसा कौन देवता है, जिसकी आराधना करनेसे इस भयंकर रोगसे मैं मुक्ति पा सकूँ?’

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— पुत्र! एक समयकी बात है, योगिश्रेष्ठ याज्ञवल्क्य मुनिने ब्रह्मलोकमें जाकर पद्मयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम किया और उनसे पूछा कि महाराज! मोक्ष प्राप्त करनेके इच्छुक प्राणीको किस देवताकी आराधना करनी चाहिये? अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति किस देवताकी उपासना करनेसे होती है? यह चराचर विश्व किससे उत्पन्न हुआ है और किसमें लीन होता है? इन सबका आप वर्णन करें।

ब्रह्माजी बोले— महर्षि! आपने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। यह सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैं आपके प्रश्नोंका उत्तर दे रहा हूँ, इसे ध्यानपूर्वक सुनें—जो देवश्रेष्ठ अपने उदयके साथ ही समस्त जगत्का अन्धकार नष्ट कर तीनों लोकोंको प्रतिभासित कर देते हैं, वे अजर-अमर, अव्यय, शाश्वत, अक्षय, शुभ-अशुभके जाननेवाले, कर्मसाक्षी, सर्वदेवता और जगत्के स्वामी हैं। उनका मण्डल कभी क्षय नहीं होता। वे पितरोंके पिता, देवताओंके भी देवता, जगत्के आधार, सृष्टि, स्थिति तथा

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  • ब्राह्मपर्व *

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संहारकर्ता हैं। योगी पुरुष वायुरूप होकर जिनमें लीन हो जाते हैं, जिनकी सहस्र रश्मियोंमें मुनि, सिद्धगण और देवता निवास करते हैं, जनक, व्यास, शुक्रदेव, बालखिल्य, आदि ऋषिगण, पञ्चशिख आदि योगिगण जिनके प्रभामण्डलमें प्रविष्ट हुए हैं, ऐसे वे प्रत्यक्ष देवता सूर्यनारायण ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदिका नाम तो मात्र सुननेमें ही आता है, पर सभीको वे दृष्टिगोचर नहीं होते, किंतु तिमिरनाशक सूर्यनारायण सभीको प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं। इसलिये ये सभी देवताओंमें श्रेष्ठतम हैं। अतः याज्ञवल्क्य! आपको भी सूर्यनारायणके अतिरिक्त अन्य किसी देवताकी उपासना नहीं करनी चाहिये। इन प्रत्यक्ष देवताकी आराधना करनेसे सभी फल प्राप्त हो सकते हैं।

याज्ञवल्क्य मुनिने कहा— महाराज! आपने मुझे बहुत ही उत्तम उपदेश दिया है, जो बिलकुल सत्य है, मैंने पहले भी बहुत बार सूर्यनारायणके माहात्म्यको सुना है। जिनके दक्षिण अङ्गसे विष्णु, वाम अङ्गसे स्वयं आप और ललाटसे रुद्र उत्पन्न हुए हैं, उनकी तुलना और कौन देवता कर सकते हैं? उनके गुणोंका वर्णन भला किन शब्दोंमें किया जा सकता है? अब मैं उनकी उस आराधना-विधिको सुनना चाहता हूँ, जिसके द्वारा मैं संसार-सागरको पार कर जाऊँ। वे कौन-से व्रत-उपवास-दान, होम-जप आदि हैं, जिनके करनेसे सूर्यनारायण प्रसन्न होकर समस्त कष्टोंको दूर कर देते हैं? यह सब आप बतलानेकी कृपा करें; क्योंकि प्राणियोंद्वारा धर्म, अर्थ तथा कामकी प्राप्तिके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें वही चेष्टा सफल है जो भगवान् सूर्यका आश्रय ग्रहण कर अनुष्ठित हो; अन्यथा वे सभी क्रियाएँ व्यर्थ हैं। इस अपार घोर संसार-सागरमें निमग्न प्राणियोंद्वारा एक बार भी

किया गया सूर्यनमस्कार मुक्तिको प्राप्त करा देता है*। भक्तिभावसे परिपूर्ण याज्ञवल्क्यके इन वचनोंको सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हो उठे और कहने लगे कि याज्ञवल्क्य! आपने सूर्यनारायणकी आराधनाका जो उपाय पूछा है, उसका मैं वर्णन कर रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर आप सुनें।

ब्रह्माजी बोले— आदि और अन्तसे रहित, सर्वव्याप्त, परब्रह्म अपनी लीलासे प्रकृति-पुरुष-रूप धारण करके संसारको उत्पन्न करनेवाले, अक्षर, सृष्टि-रचनाके समय ब्रह्मा, पालनके समय विष्णु और संहारकालमें रुद्रका रूप धारण करनेवाले सर्वदेवमय, पूज्य भगवान् सूर्यनारायण ही हैं। अब मैं भेदाभेदस्वरूप उन भगवान् सूर्यको प्रणाम करके उनकी आराधनाका वर्णन करूँगा, यह अत्यन्त गुप्त है, जिसे प्रसन्न होकर भगवान् भास्करने मुझसे कहा था।

ब्रह्माजी पुनः बोले— याज्ञवल्क्य! एक बार मैंने भगवान् सूर्यनारायणकी स्तुति की। उस स्तुतिसे प्रसन्न होकर वे प्रत्यक्ष प्रकट हुए, तब मैंने उनसे पूछा कि महाराज! वेद-वेदाङ्गोंमें और पुराणोंमें आपका ही प्रतिपादन हुआ है। आप शाश्वत, अज तथा परब्रह्मास्वरूप हैं। यह जगत् आपमें ही स्थित है। गृहस्थाश्रम जिनका मूल है, ऐसे वे चारों आश्रमोंवाले रात-दिन आपकी अनेक मूर्तियोंका पूजन करते हैं। आप ही सबके माता-पिता और पूज्य हैं। आप किस देवताका ध्यान एवं पूजन करते हैं? मैं इसे नहीं समझ पा रहा हूँ, इसे मैं सुनना चाहता हूँ, मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।

भगवान् सूर्यने कहा— ब्रह्मन्! यह अत्यन्त गुप्त बात है, किंतु आप मेरे परम भक्त हैं, इसलिये मैं इसका यथावत् वर्णन कर रहा हूँ—वे परमात्मा सभी प्राणियोंमें व्याप्त, अचल, नित्य,

  • दुर्गसंसारकान्तारमपारमभिधावताम्। एकः सूर्यनमस्कारो मुक्तिमार्गस्य देशकः ॥ (ब्राह्मपर्व ६६।७२)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सूक्ष्म तथा इन्द्रियातीत हैं, उन्हें क्षेत्रज्ञ, पुरुष, हिरण्यगर्भ, महान्, प्रधान तथा बुद्धि आदि अनेक नामोंसे अभिहित किया जाता है। जो तीनों लोकोंके एकमात्र आधार हैं, वे निर्गुण होकर भी अपनी इच्छासे सगुण हो जाते हैं, सबके साक्षी हैं, स्वतः कोई कर्म नहीं करते और न तो कर्मफलकी प्राप्तिसे संलिप्त रहते हैं। वे परमात्मा सब ओर सिर, नेत्र, हाथ, पैर, नासिका, कान तथा मुखवाले हैं, वे समस्त जगत्को आच्छादित करके अवस्थित हैं तथा सभी प्राणियोंमें स्वच्छन्द होकर आनन्दपूर्वक विचरण करते हैं।

शुभाशुभ कर्मरूप बीजवाला शरीर क्षेत्र कहलाता है। इसे जाननेके कारण परमात्मा क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं। वे अव्यक्तपुरुषमें शयन करनेसे पुरुष, बहुत रूप धारण करनेसे विश्वरूप और धारण-पोषण करनेके कारण महापुरुष कहे जाते हैं। ये ही अनेक रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार एक ही वायु शरीरमें प्राण-अपान आदि अनेक रूप धारण किये हुए हैं

और जैसे एक ही अग्नि अनेक स्थान-भेदोंके कारण अनेक नामोंसे अभिहित की जाती है, उसी प्रकार परमात्मा भी अनेक भेदोंके कारण बहुत रूप धारण करते हैं। जिस प्रकार एक दीपसे हजारों दीप प्रज्वलित हो जाते हैं, उसी प्रकार एक परमात्मासे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है। जब वह अपनी इच्छासे संसारका संहार करता है, तब फिर एकाकी ही रह जाता है। परमात्माको छोड़कर जगत्में कोई स्थावर या जंगम पदार्थ नित्य नहीं है, क्योंकि वे अक्षय, अप्रमेय और सर्वज्ञ कहे जाते हैं। उनसे बढ़कर कोई अन्य नहीं है, वे ही पिता हैं, वे ही प्रजापति हैं, सभी देवता और असुर आदि उन परमात्मा भास्करदेवकी आराधना करते हैं और वे उन्हें सद्गति प्रदान करते हैं। वे सर्वगत होते हुए भी निर्गुण हैं। उसी आत्मस्वरूप परमेश्वरका मैं ध्यान करता हूँ तथा सूर्यरूप अपने आत्माका ही पूजन करता हूँ। हे याज्ञवल्क्य मुने! भगवान् सूर्यने स्वयं ही ये बातें मुझसे कही थीं।

(अध्याय ६६-६७)

सूर्यनारायणके प्रिय पुष्प, सूर्यमन्दिरमें मार्जन-लेपन आदिका फल, दीपदानका फल तथा सिद्धार्थ-ससमी-व्रतका विधान और फल

ब्रह्माजी बोले—याज्ञवल्क्य! एक बार मैंने भगवान् सूर्यनारायणसे उनके प्रिय पुष्पोंके विषयमें जिज्ञासा की। तब उन्होंने कहा था कि मल्लिका (बेला फूलकी एक जाति)-पुष्प मुझे अत्यन्त प्रिय है। जो मुझे इसे अर्पण करता है, वह उत्तम भोगोंको प्राप्त करता है। मुझे श्वेत कमल अर्पण करनेसे सौभाग्य, सुगन्धित कुटज-पुष्पसे अक्षय ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है तथा मन्दार-पुष्पसे सभी प्रकारके कुष्ठ-रोगोंका नाश होता है और बिल्व-पत्रसे पूजन करनेपर विपुल सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है। मन्दार-पुष्पकी मालासे सम्पूर्ण कामनाओंकी

पूर्ति, वकुल (मौलिसिरी)-पुष्पकी मालासे रूपवती कन्याका लाभ, पलाश-पुष्पसे अरिष्ट-शान्ति, अगस्त्य-पुष्पसे पूजन करनेपर (मेरा) सूर्यनारायणका अनुग्रह तथा करवीर (कनौल)-पुष्प समर्पित करनेसे मेरे अनुचर होनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। बेलाके पुष्पोंसे (मेरी) सूर्यकी पूजा करनेपर मेरे लोककी प्राप्ति होती है। एक हजार कमल-पुष्प चढ़ानेपर मेरे (सूर्य) लोकमें निवास करनेका फल प्राप्त होता है। वकुल-पुष्प अर्पित करनेसे भानुलोक प्राप्त होता है। कस्तूरी, चन्दन, कुंकुम तथा कपूरके योगसे बनाये गये यक्षकर्दम गन्धका लेपन करनेसे

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  • ब्राह्मपर्व *

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सद्गति प्राप्त होती है। सूर्यभगवान्के मन्दिरका मार्जन तथा उपलेपन करनेवाला सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है और उसे शीघ्र ही प्रचुर धनकी प्राप्ति होती है। जो भक्तिपूर्वक गेरूसे मन्दिरका लेपन करता है, उसे सम्पत्ति प्राप्त होती है और वह रोगोंसे मुक्ति प्राप्त करता है तथा यदि मृत्तिकासे लेपन करता है तो उसे अठारह प्रकारके कुष्ठरोगोंसे मुक्ति मिल जाती है।

सभी पुष्पोंमें करवीरका पुष्प और समस्त विलेपनोंमें रक्तचन्दनका विलेपन मुझे अधिक प्रिय है। करवीरके पुष्पोंसे जो सूर्यभगवान्की (मेरी) पूजा करता है, वह संसारके सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें स्वर्गलोकमें निवास करता है।

मन्दिरमें लेपन करनेके पश्चात् मण्डल बनानेपर सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। एक मण्डल बनानेसे अर्थकी प्राप्ति, दो मण्डल बनानेसे आरोग्य, तीन मण्डलकी रचना करनेसे अविच्छिन्न संतान, चार मण्डल बनानेसे लक्ष्मी, पाँच मण्डल बनानेसे विपुल धन-धान्य, छः मण्डलोंकी रचना करनेसे आयु, बल और यश तथा सात मण्डलोंकी रचना करनेसे मण्डलका अधिपति होता है तथा आयु, धन, पुत्र और राज्यकी प्राप्ति होती है एवं अन्तमें उसे सूर्यलोक मिलता है।

मन्दिरमें घृतका दीपक प्रज्वलित करनेसे नेत्र-रोग नहीं होता। महुएके तेलका दीपक जलानेसे सौभाग्य प्राप्त होता है, तिलके तेलका दीपक जलानेसे सूर्यलोक तथा कडुआ तेलसे दीपक जलानेपर शत्रुओंपर विजय प्राप्त होती है।

सर्वप्रथम गन्ध-पुष्प-धूप-दीप आदि उपचारोंसे

सूर्यका पूजन कर नाना प्रकारके नैवेद्य निवेदित करने चाहिये। पुष्पोंमें चमेली और कनेरके पुष्प, धूपोंमें विजय-धूप, गन्धोंमें कुंकुम, लेपोंमें रक्तचन्दन दीपोंमें घृतदीप तथा नैवेद्योंमें मोदक भगवान् सूर्यनारायणको परम प्रिय हैं। अतः इन्हीं वस्तुओंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। पूजन करनेके पश्चात् प्रदक्षिणा और नमस्कार करके हाथमें श्वेत सरसोंका एक दाना और जल लेकर सूर्यभगवान्के सम्मुख खड़े होकर हृदयमें अभीष्ट कामनाका चिन्तन करते हुए सरसोंसहित जलको पी जाना चाहिये, परंतु दांतोंसे उसका स्पर्श नहीं हो। इसी प्रकार दूसरी ससमीको श्वेत सर्षप (पीली सरसों)-के दो दाने जलके साथ पान करना चाहिये और इसी तरह सातवीं ससमीतक एक-एक दाना बढ़ाते हुए इस मन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित करके पान करना चाहिये— सिद्धार्थकस्त्वं हि लोके सर्वत्र श्रूयसे यथा। तथा मामपि सिद्धार्थमर्थतः कुरुतां रविः॥

(ब्राह्मपर्व ६८। ३६)

तदनन्तर शास्त्रोक्त रीतिसे जप और हवन करना चाहिये। यह भी विधि है कि प्रथम ससमीके दिन जलके साथ सिद्धार्थ (सरसों)-का पान करे, दूसरी ससमीको घृतके साथ और आगे शहद, दही, दूध, गोमय और पञ्चगव्यके साथ क्रमशः एक-एक सिद्धार्थ बढ़ाते हुए सातवीं ससमीतक सिद्धार्थका पान करे। इस प्रकार जो सर्षप-ससमीका व्रत करता है, वह बहुत-सा धन, पुत्र और ऐश्वर्य प्राप्त करता है। उसकी सभी मनःकामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं और वह सूर्यलोकमें निवास करता है। (अध्याय ६८)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

शुभाशुभ स्वप्न और उनके फल

ब्रह्माजी बोले— याज्ञवल्क्य ! जो व्यक्ति ससमीमें उपवास करके विधिपूर्वक सूर्यनारायणका पूजन, जप एवं हवन आदि क्रियाएँ सम्पन्नकर रात्रिके समय भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए शयन करता है, तब उसे रात्रिमें जो स्वप्न दिखायी देते हैं, उन स्वप्न-फलोंका मैं अब वर्णन कर रहा हूँ। यदि स्वप्नमें सूर्यका उदय, इन्द्रध्वज और चन्द्रमा दिखायी दे तो सभी समृद्धियाँ प्राप्त होती हैं। माला पहने व्यक्ति, गाय या वंशीकी आवाज, श्वेत कमल, चामर, दर्पण, सोना, तलवार, पुत्रकी प्राप्ति, रुधिरका थोड़ा या अधिक मात्रामें निकलना तथा पान करना ऐसा स्वप्न देखनेसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। घृताक्त प्रजापतिके दर्शनसे पुत्र-प्राप्ति का फल होता है। स्वप्नमें प्रशस्त वृक्षपर चढ़े अथवा अपने मुखमें महिषी, गौ या सिंहनीका दोहन करे तो शीघ्र ही ऐश्वर्य प्राप्त होता है। सोने या चाँदीके पात्रमें अथवा कमल-पत्रमें जो स्वप्नमें खीर खाता है उसे बलकी प्राप्ति होती है। घृत, वाद तथा युद्धमें विजयप्राप्ति का जो स्वप्न देखा है, वह सुख प्राप्त करता है। स्वप्नमें जो अग्नि-पान करता है, उसके जठराग्निकी वृद्धि होती है। यदि स्वप्नमें अपने अङ्ग प्रज्वलित होते दिखायी दें और सिरमें पीड़ा हो तो सम्पत्ति मिलती है। श्वेतवर्णके वस्त्र,

माला और प्रशस्त पक्षीका दर्शन शुभ होता है। देवता-ब्राह्मण, आचार्य, गुरु, वृद्ध तथा तपस्वी स्वप्नमें जो कुछ कहते हैं, वह सत्य होता है। स्वप्नमें सिरका कटना अथवा फटना, पैरोंमें बेड़ीका पड़ना, राज्य-प्राप्ति का संकेतक है। स्वप्नमें रोनेसे हर्षकी प्राप्ति होती है। घोड़ा, बैल, श्वेत कमल तथा श्रेष्ठ हाथीपर निडर होकर चढ़नेसे महान् ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ग्रह और ताराओंका ग्रास देखे, पृथ्वीको उलट दे और पर्वतको उखाड़ फेंके तो राज्यका लाभ होता है। पेटसे आँत निकले और उससे वृक्षको लपेटे, पर्वत-समुद्र तथा नदी पार करे तो अत्यधिक ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। सुन्दर स्त्रीकी गोदमें बैठे और बहुत-सी स्त्रियाँ आशीर्वाद दें, शरीरको कीड़े भक्षण करें, स्वप्नमें स्वप्नका ज्ञान हो, अभीष्ट बात सुनने और कहनेमें आये तथा मङ्गलदायक पदार्थोंका दर्शन एवं प्राप्ति हो तो धन और आरोग्यका लाभ होता है। जिन स्वप्नोंका फल राज्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति है, यदि उन स्वप्नोंको रोगी देखा है तो वह रोगसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार रात्रिमें स्वप्न देखनेके पश्चात् प्रातःकाल स्नानकर राजा-ब्राह्मण अथवा भोजकको अपना स्वप्न सुनाना चाहिये।

(अध्याय ६९)

१-देवह्विजजनाचार्यगुरुवृद्धतपस्विनः

यद्यद्वदन्ति तत्सर्वं सत्यमेव हि निर्दिशेत्। (ब्राह्मपर्व ६९।१४-१५)

२-भारत तथा विदेशोंमें भी मैटिनी आदिके 'डिक्शेनरी ऑफ़ ड्रीम्स' आदि अनेक ग्रन्थ हैं। बृहस्पतिप्रोक्त 'स्वप्नाध्याय' ग्रन्थ विशेष प्रसिद्ध है। वाल्मीकीय रामायणमें त्रिजटाके स्वप्नका वर्णन ध्येय है। स्वप्नका योगसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। सभीके संयुक्त अध्ययनसे साधकोंको विशेष लाभ हो सकता है।

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  • ब्राह्मपर्व *

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सिद्धार्थ (सर्पप) -ससमी-व्रतके उद्यापनकी विधि

ब्रह्माजी बोले—याज्ञवल्क्य! सिद्धार्थ-ससमीके व्रतके अनन्तर दूसरे दिन स्नान-पूजन-जप तथा हवन आदि करके भोजक, पुराणवेत्ता और वेद-पारङ्गत ब्राह्मणोंको भोजन कराकर लाल वस्त्र, दूध देनेवाली गाय, उत्तम भोजन तथा जो-जो पदार्थ अपनेको प्रिय हों, वे सब मध्याह्नकालमें भोजकोंको दान देने चाहिये। यदि भोजक न प्राप्त हो सकें तो पौराणिकको और पौराणिक न मिल सकें तो सामवेद जाननेवाले मन्त्रविद् ब्राह्मणको वे सभी वस्तुएँ देनी चाहिये। मुने! यह सिद्धार्थ-ससमीके उद्यापनकी संक्षिप्त विधि है।

इस प्रकार भक्तिपूर्वक सात ससमीका व्रत करनेसे अनन्त सुखकी प्राप्ति होती है और दस अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इस व्रतसे सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। गरुड़को देखकर सर्प आदिकी तरह कुछ आदि सभी रोग इसके अनुष्ठानसे दूर भागते हैं। व्रत-नियम तथा तप करके सात ससमीको व्रत करनेसे मनुष्य विद्या, धन, पुत्र, भाग्य, आरोग्य और धर्मको तथा अन्त समयमें सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है। इस ससमी-व्रतकी विधिका जो श्रवण करता है अथवा उसे पढ़ता है, वह भी सूर्यनारायणमें लीन हो जाता

है। देवता और मुनि भी इस व्रतके माहात्म्यको सुनकर सूर्यनारायणके भक्त हो गये हैं। जो पुरुष इस आख्यानका स्वयं श्रवण करता है अथवा दूसरेको सुनाता है तो वे दोनों सूर्यलोकको जाते हैं। रोगी यदि इसका श्रवण करे तो रोगमुक्त हो जाता है। इस व्रतकी जिज्ञासा रखनेवाला भक्त अभलिषित इच्छाओंको प्राप्त करता है और सूर्यलोकको जाता है। यदि इस आख्यानको पढ़कर यात्रा की जाय तो मार्गमें विघ्न नहीं आते और यात्रा सफल होती है। जो कोई भी जिस पदार्थकी कामना करता है, वह उसे निश्चित प्राप्त कर लेता है। गर्भिणी स्त्री इस आख्यानको सुने तो वह सुखपूर्वक पुत्रको जन्म देती है, बन्ध्या सुने तो संतान प्राप्त करती है। याज्ञवल्क्य! यह सब कथा सूर्यनारायणने मुझसे कही थी तथा मैंने आपको सुना दी और अब आप भी भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणकी आराधना करें, जिससे सभी पातक नष्ट हो जायें। उदित होते ही जो अपनी किरणोंसे संसारका अन्धकार दूर कर प्रकाश फैलाते हैं, वे द्वादशात्मा सूर्यनारायण ही जगत्के माता-पिता तथा गुरु हैं, अदिति-पुत्र भगवान् सूर्य आपपर प्रसन्न हों।

(अध्याय ७०)

ब्रह्माद्वारा कहा गया भगवान् सूर्यका नाम-स्तोत्र

ब्रह्माजी बोले—याज्ञवल्क्य! भगवान् सूर्य जिन नामोंके स्तवनसे प्रसन्न होते हैं, मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ—

नमः सूर्याय नित्याय रवयेऽर्काय भानवे।

भास्कराय मतङ्गाय मार्तण्डाय विवस्वते ॥

नित्य, रवि, अर्क, भानु, भास्कर, मतङ्ग, मार्तण्ड तथा विवस्वान् नामोंसे युक्त भगवान् सूर्यको

मेरा नमस्कार है।

आदित्यायादिदेवाय नमस्ते रश्मिमालिने।

दिवाकराय दीसाय अग्नये मिहि्राय च ॥

आदिदेव, रश्मिमाली, दिवाकर, दीस, अग्नि तथा मिहिर नामक भगवान् आदित्यको मेरा नमस्कार है।

प्रभाकराय मित्राय नमस्तेऽदितिसम्भव।

नमो गोपतये नित्यं दिशां च पतये नमः ॥

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हे अदितिके पुत्र भगवान् सूर्य! आप प्रभाकर, मित्र, गोपति (किरणोंके स्वामी) तथा दिक्पति नामवाले हैं, आपको मेरा नित्य नमस्कार है।

नमो धात्रे विधात्रे च अर्यम्णे वरुणाय च।

पूष्णे भगाय मित्राय पर्जन्यायांशवे नमः॥

धाता, विधाता, अर्यमा, वरुण, पूषा, भग, मित्र, पर्जन्य, अंशुमान् नामवाले भगवान् सूर्यको मेरा प्रणाम है।

नमो हितकृते नित्यं धर्माय तपनाय च।

हरये हरिताश्वाय विश्वस्य पतये नमः॥

हितकृत (संसारका कल्याण करनेवाले), धर्म, तपन, हरि, हरिताश्व (हरे रंगके अश्वोंवाले), विश्वपति भगवान् सूर्यको नित्य मेरा नमस्कार है।

विष्णवे ब्रह्मणे नित्यं त्र्यम्बकाय तथात्मने।

नमस्ते ससलोकेश नमस्ते सससमये॥

विष्णु, ब्रह्मा, त्र्यम्बक (शिव), आत्मस्वरूप, ससससि, हे ससलोकेश! आपको मेरा नमस्कार है।

एकस्मै हि नमस्तुभ्यमेकचक्रथाय च।

ज्योतिषां पतये नित्यं सर्वप्राणभूते नमः॥

अद्वितीय, एकचक्रथ (जिनके रथमें एक ही चक्र है), ज्योतिष्यति, हे सर्वप्राणभूत! (सभी प्राणियोंका भरण-पोषण करनेवाले) आपको मेरा नित्य नमस्कार है।

हिताय सर्वभूतानां शिवायार्तिहराय च।

नमः पद्मप्रबोधाय नमो वेदादिमूर्तये॥

समस्त प्राणिजगत्का हित करनेवाले, शिव (कल्याणकारी) और आर्तिहर (दुःखविनाशी), पद्मप्रबोध (कमलोंको विकसित करनेवाले), वेदादिमूर्ति भगवान् सूर्यको नमस्कार है।

काधिजाय नमस्तुभ्यं नमस्तारासुताय च।

भीमजाय नमस्तुभ्यं पावकाय च वै नमः॥

प्रजापतियोंके स्वामी महर्षि कश्यपके पुत्र! आपको नमस्कार है। भीमपुत्र तथा पावक नामवाले तारासुत! आपको नमस्कार है, नमस्कार है।

धिषणाय नमो नित्यं नमः कृष्णाय नित्यदा।

नमोऽस्वददितिपुत्राय नमो लक्ष्याय नित्यशः॥

धिषण, कृष्ण, अदितिपुत्र तथा लक्ष्य नामवाले भगवान् सूर्यको बार-बार नमस्कार है।

ब्रह्माजीने कहा—याज्ञवल्क्य! जो मनुष्य सायंकाल और प्रातःकाल इन नामोंका पवित्र होकर पाठ करता है, वह मेरे समान ही मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त करता है। इस नाम-स्तोत्रसे सूर्यकी आराधना करनेपर उनके अनुग्रहसे धर्म, अर्थ, काम, आरोग्य, राज्य तथा विजयकी प्राप्ति होती है। यदि मनुष्य बन्धनमें हो तो इसके पाठसे बन्धनमुक्त हो जाता है। इसके जप करनेसे सभी पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। यह जो सूर्यस्तोत्र मैंने कहा है, वह अत्यन्त रहस्यमय है।

(अध्याय ७१)

जम्बूद्वीपमें सूर्यनारायणकी आराधनाके तीन प्रमुख स्थान,

दुर्वासा मुनिका साम्बको शाप देना

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! ब्रह्माजीसे इस प्रकार उपदेश प्राप्तकर याज्ञवल्क्य मुनिने सूर्यभगवान्की आराधना की, जिसके प्रभावसे उन्हें सालोक्य-मुक्ति प्राप्त हुई। अतः भगवान् सूर्यकी उपासना करके आप भी उस देवदुर्लभ मोक्षको प्राप्त

कर सकेंगे।

राजा शतानीकने पूछा—मुने! जम्बूद्वीपमें भगवान् सूर्यदेवका आदि स्थान कहाँ है? जहाँ विधिपूर्वक आराधना करनेसे शीघ्र ही मनोवाञ्छित फलोंकी प्राप्ति हो सके।

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  • ब्राह्मपर्व *

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सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! इस जम्बूद्वीपमें भगवान् सूर्यनारायणके मुख्य तीन स्थान हैं१। प्रथम इन्द्रवन है, दूसरा मुण्डीर तथा तीसरा तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध कालप्रिय (कालपी) नामक स्थान है। इस द्वीपमें इन तीनोंके अतिरिक्त एक अन्य स्थान भी ब्रह्माजीने बतलाया है, जो चन्द्रभागा नदीके तटपर अवस्थित है, जिसको साम्बपुर भी कहा जाता है, वहाँ भगवान् सूर्यनारायण साम्बकी भक्तिसे प्रसन्न होकर लोककल्याणके लिये अपने द्वादश रूपोंमेंसे मित्ररूपमें निवास करते हैं। जो भक्तिपूर्वक उनका पूजन करता है, उसको वे स्वीकार करते हैं।

राजा शतानीकने पुनः पूछा—महामुने! साम्ब कौन है? किसका पुत्र है? भगवान् सूर्यने उसके ऊपर अपनी कृपा क्यों की? यह भी आप बतानेकी कृपा करें।

सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! संसारमें द्वादश आदित्य प्रसिद्ध हैं, उनमेंसे विष्णु नामके जो आदित्य हैं, वे इस जगत्में वासुदेव श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुए। उनकी जाम्बवती नामकी पत्नीसे महाबलशाली साम्ब नामक पुत्र हुआ। वह शापवश कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। उससे मुक्त होनेके लिये उसने भगवान् सूर्यनारायणकी आराधना की और उसीने अपने नामसे साम्बपुर२ नामक एक नगर बसाया तथा यहींपर भगवान् सूर्यनारायणकी प्रथम प्रतिमा प्रतिष्ठापित की।

राजा शतानीकने पूछा—महाराज! साम्बके द्वारा ऐसा कौन-सा अपराध हुआ था, जिससे उसे इतना कठोर शाप मिला। थोड़ेसे अपराधपर तो शाप नहीं मिलता।

सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! इस वृत्तान्तका वर्णन हम संक्षेपमें कर रहे हैं, आप सावधान होकर सुनें। एक समय रुद्रके अवतारभूत दुर्वासा मुनि तीनों लोकोंमें विचरण करते हुए द्वारकापुरीमें आये, परंतु पीले-पीले नेत्रोंसे युक्त कुश-शरीर, अत्यन्त विकृत रूपवाले दुर्वासाको देखकर साम्ब अपने सुन्दर स्वरूपके अहंकारमें आकर उनके देखने, चलने आदि चेष्टाओंकी नकल करने लगे। उनके मुखके समान अपना ही विकृत मुख बनाकर उन्हींकी भाँति चलने लगे। यह देखकर और 'साम्बको रूप तथा यौवनका अत्यन्त अभिमान है' यह समझकर दुर्वासा मुनिको अत्यधिक क्रोध हो आया। वे क्रोधसे काँपते हुए यह कह उठे—'साम्ब! मुझे कुरूप और अपनेको अति रूपसम्पन्न मानकर तूने मेरा परिहास किया है। जा, तू शीघ्र ही कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो जायगा।'

ऐसे ही एक बार पुनः परिहास किये जानेके कारण दुर्वासा मुनिको फिर शाप देना पड़ा और उसी शापके फलस्वरूप साम्बसे लोहेका एक मूसल उत्पन्न हुआ, जो समस्त यदुवंशियोंके विनाशका कारण बना।

अतः देवता, गुरु और ब्राह्मण आदिकी अवज्ञा बुद्धिमान् पुरुषको कभी नहीं करनी चाहिये। इन लोगोंके समक्ष सदैव विनम्र ही बना रहना चाहिये और सदा मधुर वाणी ही बोलनी चाहिये। राजन्! ब्रह्माजीने भगवान् शिवके समक्ष जो दो श्लोक पढ़े थे, क्या उनको आपने सुना नहीं है? यो धर्मशीलो जितमानरोषो विद्याविनीतो न परोपतापी। स्वदारतुष्टः परदारवर्जितो न तस्य लोके भयमस्ति किंचित्।।

१-इन तीनों स्थानोंकी विशेष जानकारीके लिये 'कल्याण' के ५३ वें वर्षके विशेषाङ्क 'सूर्याङ्क' का 'तीन प्रसिद्ध सूर्य-मन्दिर' नामक अन्तिम लेख देखना चाहिये।

२-यही नगर आगे चलकर 'मूलस्थान' पुनः मुसलिम शासनमें 'मुल्तान' नामसे प्रसिद्ध हुआ, जो आज पाकिस्तानमें लाहौरके पश्चिम भागमें स्थित है।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

न तथा शशी न सलिलं न चन्दनं नैव शीतलच्छाया । प्रह्लादयति पुरुषं यथा हिता मधुरभाषिणी वाणी ॥

(ब्राह्मपर्व ७३।४७-४८)

‘जो धर्मात्मा है तथा जिसने सम्मान एवं क्रोधपर विजय प्राप्त कर ली है, विद्यासे युक्त और विनम्र है, दूसरेको संताप नहीं देता, अपनी स्त्रीसे संतुष्ट है तथा परायी स्त्रीका परित्याग करनेवाला है, ऐसे मनुष्यके लिये संसारमें किंचिन्मात्र भी भय नहीं है।’

‘पुरुषको चन्द्रमा, जल, चन्दन और शीतल

छाया वैसा आनन्दित नहीं कर पाते हैं, जैसा आनन्द उसे हितकारी मधुर वाणी सुननेसे प्राप्त होता है।’

रजन्! इस प्रकार दुर्वासा मुनिके शापसे साम्बको कुष्ठरोग हुआ था। तदनन्तर उसने भगवान् सूर्यनारायणकी आराधना करके पुनः अपने सुन्दर रूप तथा आरोग्यको प्राप्त किया और अपने नामका साम्बपुर नामक एक नगर बसाकर उसमें भगवान् सूर्यको प्रतिष्ठापित किया।

(अध्याय ७२-७३)

सूर्यनारायणकी द्वादश मूर्तियोंका वर्णन

राजा शतानीकने कहा—महामुने! साम्बके द्वारा चन्द्रभागा नदीके तटपर सूर्यनारायणकी जो स्थापना की गयी है, वह स्थान आदिकालसे तो नहीं है, फिर भी आप उस स्थानके माहात्म्यका इतना वर्णन कैसे कर रहे हैं? इसमें मुझे संदेह है।

सुमन्तु मुनि बोले—भारत! वहाँपर सूर्यनारायणका स्थान तो सनातनकालसे है। साम्बने उस स्थानकी प्रतिष्ठा तो बादमें की है। इसका हम संक्षेपमें वर्णन करते हैं। आप प्रेमपूर्वक उसे सुनें—

इस स्थानपर परमब्रह्मस्वरूप जगत्स्वामी भगवान् सूर्यनारायणने अपने मित्ररूपमें तप किया है। वे ही अत्युक्त परमात्मा भगवान् सूर्य सभी देवताओं और प्रजाओंकी सृष्टि करके स्वयं बारह रूप धारण कर अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए। इसीसे उनका नाम आदित्य पड़ा। इन्द्र, धाता, पर्जन्य, पूषा, त्वष्टा, अर्यमा, भग, विवस्वान्, अंशु, विष्णु, वरुण तथा मित्र—ये सूर्यभगवान्की द्वादश मूर्तियाँ हैं। इन सबसे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इनमेंसे प्रथम इन्द्र नामक मूर्ति देवराजमें स्थित है, जो सभी दैत्यों और दानवोंका संहार करती है। दूसरी धाता नामक मूर्ति प्रजापतिमें स्थित होकर सृष्टिकी रचना

करती है। तीसरी पर्जन्य नामक मूर्ति किरणोंमें स्थित होकर अमृतवर्षा करती है। पूषा नामक चौथी मूर्ति मन्त्रोंमें अवस्थित होकर प्रजापोषणका कार्य करती है। पाँचवीं त्वष्टा नामकी जो मूर्ति है, वह वनस्पतियों और ओषधियोंमें स्थित है। छठी मूर्ति अर्यमा प्रजाकी रक्षा करनेके लिये पुरोंमें स्थित है। सातवीं भग नामक मूर्ति पृथ्वी और पर्वतोंमें विद्यमान है। आठवीं विवस्वान् नामक मूर्ति अग्निमें स्थित है और वह प्राणियोंके भक्षण किये हुए अन्नको पचाती है। नवीं अंशु नामक मूर्ति चन्द्रमामें अवस्थित है, जो जगत्को आप्पायित करती है। दसवीं विष्णु नामक मूर्ति दैत्योंका नाश करनेके लिये सदैव अवतार धारण करती है। ग्यारहवीं वरुण नामकी मूर्ति समस्त जगत्की जीवनदायिनी है और समुद्रमें उसका निवास है। इसीलिये समुद्रको वरुणालय भी कहा जाता है। बारहवीं मित्र नामक मूर्ति जगत्का कल्याण करनेके लिये चन्द्रभागा नदीके तटपर विराजमान है। यहाँ सूर्यनारायणने मात्र वायु-पान करके तप किया है और मित्ररूपसे यहाँपर अवस्थित हैं, इसलिये इस स्थानको मित्रपद (मित्रवन) भी कहते हैं। ये

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* ब्राह्मपर्व * १९१

अपनी कृपामयी दृष्टिसे संसारपर अनुग्रह करते हुए भक्तोंको भाँति-भाँतिके वर देकर संतुष्ट करते रहते हैं। यह स्थान पुण्यप्रद है। महाबाहो! यहींपर अमित तेजस्वी साम्बने सूर्यनारायणकी आराधना करके मनोवाञ्छित फल प्राप्त किया है। उनकी प्रसन्नता और आदेशसे साम्बने यहाँ भगवान् सूर्यको प्रतिष्ठापित किया। जो पुरुष भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणको प्रणाम करता है और श्रद्धा-भक्तिसे उनकी आराधना करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है। (अध्याय ७४)


देवर्षि नारदद्वारा सूर्यके विराट्रूप तथा उनके प्रभावका वर्णन

सुमन्तुजी बोले— राजन्! भयंकर कुष्ठरोगका शाप प्राप्तकर दुःखित हो साम्बने अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा—तात! मेरा यह कष्ट कैसे दूर होगा? कृपाकर इसका उपाय आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— वत्स! तुम भगवान् सूर्यकी आराधना करो, उससे तुम्हारा यह कुष्ठरोग दूर हो जायगा। तुम देवर्षि नारदद्वारा सूर्यनारायणके आराधना-विधानकी शिक्षा प्राप्त करो। वे प्रसन्न होकर तुम्हें विस्तारसे उनकी आराधनाका विधान बतलायेंगे।

एक दिन नारदजी द्वारकापुरीमें भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये आये। उसी समय साम्बने अत्यन्त विनम्रभावसे जाकर उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की। महामुने! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरे ऊपर कृपाकर कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे मेरा शरीर कुष्ठरोगसे मुक्त हो सके और मेरा कष्ट दूर हो जाय।

नारदजीने कहा— साम्ब! सभी देव जिनकी स्तुति करते हैं, उन्हींका तुम भी पूजन करो। उन्हींकी कृपासे तुम रोगसे मुक्त हो जाओगे।

साम्बने पूछा— महाराज! देवगण किसका पूजन और स्तवन करते हैं? आप ही उसे भी बतायें, जिससे मैं उनकी शरणमें जा सकूँ। यह शापाग्नि मुझे दग्ध कर रही है। ऐसे कौन देवता हैं, जो कृपा करके मुझे इस विपत्तिसे मुक्त करा सकेंगे?

नारदजीने कहा— पुत्र! समस्त देवताओंके पूज्य, नमस्कार करने योग्य और निरन्तर स्तुत्य भगवान् सूर्यनारायण ही हैं। तुम उनके प्रभावको सुनो—

किसी समय समस्त लोकोंमें विचरण करता हुआ मैं सूर्यलोकमें पहुँचा। वहाँ मैंने देखा कि देवता, गन्धर्व, नाग, यक्ष, राक्षस और अप्सराएँ सूर्यनारायणकी सेवामें लगे हुए हैं। गन्धर्व गीत गा रहे हैं और अप्सराएँ नृत्य कर रही हैं। राक्षस-यक्ष तथा नाग शस्त्र धारण करके उनकी रक्षाके लिये खड़े हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद मूर्तिमान् स्वरूप धारण कर स्वयं स्तुति कर रहे हैं और ऋषिगण भी वेदोंकी ऋचाओंसे उनका स्तवन कर रहे हैं। मूर्तिरूपमें प्रातः, मध्याह्न और सायंकालकी तीनों सुन्दर रूपवाली संध्याएँ हाथमें वज्र तथा बाण धारण किये हुए सूर्यनारायणके चारों ओर स्थित हैं। प्रातः-संध्या रक्तवर्णकी है, मध्याह्न-संध्या चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णकी एवं सायं-संध्या मंगलके समान वर्णवाली है। आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत् तथा अश्विनीकुमार आदि सभी देवगण तीनों संध्याओंमें उन भगवान् सूर्यका पूजन करते हैं। इन्द्र सदैव वहाँ खड़े होकर भगवान् सूर्यकी जय-जयकार करते रहते हैं। गरुड़के ज्येष्ठ भ्राता अरुण उनका सारथि है। वह कालके अवयवोंसे निर्मित उनके रथका संचालक है। हरे वर्णके छन्दरूप सात अश्व उनके रथमें जुते हुए हैं। राज्ञी तथा निक्षुभा नामकी दो पत्नियाँ उनके दोनों ओर बैठी

११२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हुई हैं। सभी देवता हाथ जोड़कर चारों ओर खड़े हैं। पिंगल, लेखक, दण्डनायक आदि गण तथा कल्माष नामक दो पक्षी द्वारपालके रूपमें उनकी सेवामें लगे हुए हैं। दिण्डी उनके सामने तथा ब्रह्मा आदि सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे हैं।

भगवान् सूर्यनारायणका ऐसा प्रभाव देखकर मैंने सोचा कि यही देव हैं, जो समस्त देवताओंके पूज्य हैं। साम्ब! तुम उन्हींकी शरणमें जाओ।

साम्बने पूछा— महाराज! मैं भलीभाँति यह जानना चाहता हूँ कि सूर्यनारायण सर्वगत कैसे हैं? उनकी कितनी रशियाँ हैं? कितनी मूर्तियाँ हैं? राजी तथा निक्षुभा नामकी ये दोनों भार्याएँ कौन हैं? पिंगल, लेखक और दण्डनायक वहाँ क्या कार्य करते हैं? कल्माष पक्षी कौन हैं? उनके आगे स्थित रहनेवाला दिण्डी कौन है? और वे कौन-कौन देवता हैं, जो उनके चतुर्दिक खड़े रहते हैं? आप इन सबका तत्त्वतः अच्छी तरहसे वर्णन करें, जिससे मैं भी सूर्यनारायणके प्रभावको जानकर उनकी शरणमें जा सकूँ।

नारदजीने कहा— साम्ब! अब मैं सूर्यनारायणके माहात्म्यका वर्णन कर रहा हूँ। तुम उसे प्रेमपूर्वक सुनो—

विवस्वान् देव अव्यक्त कारण, नित्य, सत् एवं असत्-स्वरूप हैं। जो तत्त्वचिन्तक पुरुष हैं, वे उनको प्रधान और प्रकृति कहा करते हैं। वे गन्ध, वर्ण तथा रससे हीन एवं शब्द और स्पर्शसे रहित हैं। वे जगत्की योनि हैं तथा सनातन परब्रह्म हैं। वे सभी प्राणियोंके नियन्ता हैं। वे अनादि, अनन्त, अज, सूक्ष्म, त्रिगुण, निराकार तथा अविज्ञेय हैं, उन्हें परमपुरुष कहा जाता है। उन्हीं महात्मा भगवान् सूर्यसे यह सब जगत् परिव्याप्त है। उन परमेश्वरकी प्रतिमा ज्ञान एवं वैराग्य-लक्षणोंवाली है। उनकी बुद्धि धर्म एवं

ऐश्वर्यको प्रदान करनेवाली ब्राह्मी बुद्धि कही जाती है। उन अव्यक्तकी जो भी इच्छा होती है, वही सब उत्पन्न होता है। वे ही सृष्टिके समय चतुर्मुख ब्रह्मा बन जाते हैं और प्रलयके समय कालरूप हो जाते हैं। पालनके समय वे ही पुरुष विष्णुरूप ग्रहण कर लेते हैं। स्वयम्भू पुरुषकी ये तीनों अवस्थाएँ उनके तीन गुणोंके अनुसार हैं। वे आदिदेव होनेके कारण आदित्य तथा अजात होनेके कारण अज कहे गये हैं। देवताओंमें महान् होनेसे वे महादेव कहे गये हैं। समस्त लोकोंके ईश होने तथा अधीश होनेके कारण वे ईश्वर कहे गये हैं। बृहत् होनेसे ब्रह्मा तथा भवत्त्व होनेसे भव कहे जाते हैं। वे समस्त प्रजाओंकी रक्षा और पालन करते हैं, इसलिये प्रजापति कहे गये हैं। पुरमें शयन करनेसे 'पुरुष,' उत्पाद्य न होने और अपूर्व होनेसे 'स्वयम्भू' नामसे प्रसिद्ध हैं। हिरण्याण्डमें रहनेके कारण ये हिरण्यगर्भ कहे जाते हैं। ये दिशाओंके स्वामी, ग्रहोंके ईश, देवताओंके भी देवता होनेसे देवदेव तथा दिवाकर भी कहे जाते हैं। तत्त्वदृष्टा ऋषियोंने आपको नार कहा है, यह अप् इनका आश्रय है, इसीलिये 'आप' नारायण कहे गये हैं। 'अर' यह शीघ्रतावाचक शब्द है। 'आप' ही समुद्ररूप धारण करनेपर फिर उसमें शीघ्रता नहीं रहती, इसीके कारण उसे नार कहते हैं। प्रलयकालमें सभी स्थावर-जंगम नष्ट हो जाते हैं। जब सम्पूर्ण जगत् समुद्रके समान एकाकार हो जाता है, तब वे पुरुष नारायणरूप धारण करके उस समुद्रमें शयन करते हैं। वे पुरुष वेदोंमें सहस्रों सिरों, सहस्रों भुजाओं, सहस्रों नेत्रों तथा सहस्रों चरणोंवाले कहे गये हैं। वे ही देवताओंमें प्रथम देवता तथा जगत्की रक्षा करनेवाले हैं।

नारदजीने पुनः कहा— साम्ब! सहस्रयुगके समान अपनी रात्रि बिताकर प्रभात होते ही उन

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  • ब्राह्मपर्व *

११३

पुरुषने जब सृष्टि रचनेकी इच्छा की, तब उन्होंने देखा कि सम्पूर्ण पृथ्वी जलमें डूबी हुई है। तदनन्तर उन्होंने वराहरूप धारण करके महासागरके जलमें निमग्न पृथ्वीका उद्धार किया। उस समय उनका वेदमय शरीर कमिप्त हो उठा और रोमोंमें स्थित महर्षिगण उनकी स्तुति करने लगे। पुनः ब्रह्माका रूप धारण करके वे सृष्टिकी रचना करने लगे। उन्होंने सर्वप्रथम अपने ही समान अपने मनसे मुञ्ज-सहित श्रेष्ठ दस मानसपुत्रोंको उत्पन्न किया। जिनके नाम हैं—भृगु, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, दक्ष एवं वसिष्ठ—इन प्रजापतियोंकी सृष्टि करनेके बाद प्रजाओंकी हित-कामनासे वे ही सूर्यनारायण देवी अदितिके पुत्र-रूपमें स्वयं प्रादुर्भूत हुए। मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। दक्षकी कन्या अदितिका विवाह महर्षि कश्यपके साथ हुआ। उसने 'भूर्भुवः स्वः' से संयुक्त एक अण्ड उत्पन्न किया, जिससे द्वादशात्मा भगवान् सूर्य प्रकट हुए। इस सूर्यमण्डलका व्यास नौ हजार योजन है। सताईस हजार योजन उसकी परिधि है। जिस प्रकार कदम्बका पुष्प चारों ओर केसरोंसे व्याप्त रहता है, उसी प्रकार सूर्यमण्डल अपनी किरणोंसे परिव्याप्त रहता है। वह सहस्रों सिरवाला पुरुष जिसको परमात्मा कहते हैं, इस तेजोमय मण्डलके मध्य स्थित है। वह अपनी सहस्र किरणोंद्वारा नदी, समुद्र, हृद, कूप आदिसे जलको ग्रहण कर लेता है। सूर्यकी प्रभा (तेज) रात्रिके समय अग्निमें प्रवेश कर जाती है, इसीलिये रात्रिमें अग्नि दूसरे ही दिखायी देने लगती है। सूर्योदयके समय वही प्रभा पुनः सूर्यमें प्रविष्ट हो जाती है। प्रकाशत्व और उष्णत्व—ये दोनों गुण सूर्यमें तथा अग्निमें भी हैं। इस प्रकार सूर्य और अग्नि एक-दूसरेको आप्यायित किया करते हैं।

साम्ब! हेति, किरण, गौ, रश्मि, गभस्ति,

अभीषु, घन, उस्त्र, वसु, मरीचि, नाडी, दीर्धिति, साध्य, मयूरव, भानु, अंशु, सप्ताच्वि, सुपर्ण, कर तथा पाद—ये बीस भगवान् सूर्यकी किरणोंके नाम कहे गये हैं, जो संख्यामें एक हजार हैं। इनमेंसे चार सौ किरणें वृष्टि करती हैं, जिनका नाम चन्दन है। इन किरणोंका स्वरूप अमृतमय है। तीन सौ किरणें हिमको वहन करती हैं। उनका नाम चन्द्र है और वर्ण पीत है। शेष तीन सौ शुक्ल नामवाली किरणें धूपकी सृष्टि करती हैं, ये सभी किरणें ओषधियों, स्वधा तथा अमृतके रूपमें मनुष्यों, पितरों तथा देवताओंको सदा संतुष्ट करती रहती हैं। ये द्वादशात्मा कालस्वरूप सूर्यदेव तीनों लोकोंमें अपने तेजसे तपते रहते हैं। ये ही ब्रह्मा-विष्णु तथा शिव हैं। ऋक्, यजुः एवं साम—ये तीनों वेद भी ये ही हैं। प्रातःकालमें ऋग्वेद, मध्याह्नकालमें यजुर्वेद तथा संध्याकालमें सामवेद इनकी स्तुति करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके द्वारा इनका पूजन नित्य होता रहता है। जिस प्रकार वायु सर्वगत है, उसी प्रकार सूर्यकी किरणें भी सर्वव्याप्त हैं। तीन सौ किरणोंके द्वारा भूलोक प्रकाशित होता रहता है। इसके पश्चात् जो शेष किरणें हैं, वे तीन-तीन सौकी संख्यामें शेष अन्य दोनों लोकों (भुवलोक और स्वर्लोक)—को प्रकाशित करती हैं। एक सौ किरणोंसे पाताल प्रकाशित होता है। ये नक्षत्र, ग्रह तथा चन्द्रमादि ग्रहोंके अधिष्ठान हैं। चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र तथा तारागणोंमें सूर्यनारायणका ही प्रकाश है। इनकी एक सहस्र किरणोंमें ग्रहसंज्ञक सात किरणें मुख्य हैं, जिन्हें सुषुम्पा, हरिकेश, विश्वकर्मा, सूर्य, रश्मि, विष्णु, और सर्वबन्धु कहा जाता है।

सम्पूर्ण जगत्के मूल भगवान् आदित्य ही हैं। इन्द्र आदि देवता इन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। देवताओं तथा जगत्का सम्पूर्ण तेज इन्हींका है।

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११४ * संक्षिप्त भविष्यपुराण *


अग्निमें दी गयी आहुति सूर्यनारायणको ही प्राप्त होती है। इसलिये आदित्यसे ही वृष्टि उत्पन्न होती है। वृष्टिसे अन्न उत्पन्न होता है तथा अन्नसे प्रजाका पालन होता है। ध्यान करनेवाले लोगोंके लिये ध्यानरूप और मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छासे आराधना करनेवाले लोगोंके लिये ये मोक्षस्वरूप हैं। क्षण, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर तथा युगकी कल्पना सूर्यनारायणके बिना सम्भव नहीं है। काल-नियमके बिना अग्निहोत्रादि कर्म नहीं हो सकते। ऋतु-विभागके बिना पुष्प-फल तथा मूलकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है। उनके न रहनेसे तो जगत्‌के सम्पूर्ण व्यवहार ही नष्ट हो जाते हैं। सूर्यनारायणके सामान्य द्वादश नाम इस प्रकार हैं—आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रतापन, मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर और रवि। विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य—ये द्वादश आदित्य हैं। चैत्रादि बारह महीनोंमें ये द्वादश आदित्य उदित रहते हैं। चैत्रमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में अंशुमान्, श्रावणमें पर्जन्य, भाद्रपदमें वरुण, आश्विनमें इन्द्र, कार्तिकमें धाता, मार्गशीर्षमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमें भग और फाल्गुनमें त्वष्टा नामके आदित्य तपते हैं।

उत्तरायणमें सूर्य-किरणें वृद्धिको प्राप्त करती हैं और दक्षिणायनमें वह किरण-वृद्धि घटने लगती है। इस प्रकार सूर्य-किरणें लोकोपकारमें प्रवृत्त रहती हैं। जैसे स्फटिकमें विभिन्न रंगोंके प्रविष्ट होनेसे वह अनेक वर्णका दिखायी देता है, जैसे एक ही मेघ आकाशमें अनेक रूपोंका हो जाता है तथा गुण-विशेषसे जैसे आकाशसे गिरा हुआ जल भूमिके रस-वैशिष्ट्यसे अनेक स्वाद और गुणवाला हो जाता है, जिस प्रकार एक ही अग्नि ईंधन-भेदके कारण अनेक रूपोंमें विभक्त हो जाती है, जैसे वायु पदार्थोंके संयोगसे सुगन्धित और दुर्गन्धयुक्त हो जाती है, जैसे गृह्याग्निके भी अनेक नाम हो जाते हैं, उसी प्रकार एक सूर्यनारायण ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि अनेक रूप धारण करते हैं, इसलिये इनकी ही भक्ति करनी चाहिये। इस प्रकार जो सूर्यनारायणको जानता है, वह रोग तथा पापोंसे शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।

पापी पुरुषकी सूर्यनारायणके प्रति भक्ति नहीं होती। इसलिये साम्ब! तुम सूर्यनारायणकी आराधना करो, जिससे तुम इस भयंकर व्याधिसे मुक्त होकर सभी कामनाओंको प्राप्त कर लोगे।
(अध्याय ७५—७८)


भगवान् सूर्यका परिवार

**सुमन्तु मुनि बोले—**राजन्! साम्बने नारदजीसे पुनः कहा—महामुने! आपने भगवान् सूर्यनारायणके अत्यन्त आनन्दप्रद माहात्म्यका वर्णन किया, जिससे मेरे हृदयमें उनके प्रति दृढ़ भक्ति उत्पन्न हो गयी। अब आप भगवान् सूर्यनारायणकी पत्नी महाभागा राज्ञी एवं निक्षुभा तथा दिण्डी और पिंगल आदिके विषयमें बतायें।

**नारदजीने कहा—**साम्ब! भगवान् सूर्यनारायणकी राज्ञी और निक्षुभा नामकी दो पत्नियाँ हैं। इनमेंसे राज्ञीको द्यौ अर्थात् स्वर्ग और निक्षुभाको पृथ्वी भी कहा जाता है। पौष शुक्ल सप्तमी तिथिको द्यौके साथ और माघ कृष्णपक्षकी सप्तमी तिथिको निक्षुभा (पृथ्वी)-के साथ सूर्यनारायणका संयोग होता है। जिससे राज्ञी—द्यौसे जल और निक्षुभा—पृथ्वीसे तीनों लोकोंके कल्याणके लिये अनेक प्रकारकी सस्य-सम्पत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। सस्य

  • ब्राह्मपर्व *

११५

(अत्र) - को देखकर अत्यन्त प्रसन्नतासे ब्राह्मण हवन करते हैं। स्वाहाकार तथा स्वधाकारसे देवताओं और पितरोंकी तृप्ति होती है। जिस प्रकार रात्री अपने दो रूपोंमें हुई और ये जिनकी पुत्री हैं तथा इनकी जो संतानें हुई उनका हम वर्णन करते हैं, इसे आप सुनें—

साम्ब ! ब्रह्माके पुत्र मरीचि, मरीचिके कश्यप, कश्यपसे हिरण्यकशिपु, हिरण्यकशिपुसे प्रह्लाद, प्रह्लादसे विरोचन नामका पुत्र हुआ। विरोचनकी बहिनका विवाह विश्वकर्माके साथ हुआ, जिससे संज्ञा नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। मरीचिकी सुरुपा नामकी कन्याका विवाह अंगिरा ऋषिसे हुआ, जिससे बृहस्पति उत्पन्न हुए। बृहस्पतिकी ब्रह्मवादिनी बहिनने आठवें प्रभास नामक वसुसे पाणिग्रहण किया, जिसका पुत्र विश्वकर्मा समस्त शिल्पोंको जाननेवाला हुआ। उन्हींका नाम त्वष्टा भी है। जो देवताओंके बढ़ई हुए। इन्हींकी कन्या संज्ञाको रात्री कहा जाता है। इन्हींको द्यौ, त्वाष्ट्री, प्रभा तथा सुरेणु भी कहते हैं। इन्हीं संज्ञाकी छायाका नाम निक्षुभा है। सूर्यभगवान्की संज्ञा नामक भार्या बड़ी ही रूपवती और पतिव्रता थी। किंतु भगवान् सूर्यनारायण मानवरूपमें उसके समीप नहीं जाते थे और अत्यधिक तेजसे परिव्याप्त होनेके कारण सूर्यनारायणका वह स्वरूप सुन्दर मालूम नहीं होता था। अतः वह संज्ञाको भी अच्छा नहीं लगता था। संज्ञासे तीन संतानें उत्पन्न हुईं, किंतु सूर्यनारायणके तेजसे व्याकुल होकर वह अपने पिताके घर चली गयी और हजारों वर्षतक वहाँ रही। जब पिताने संज्ञासे पतिके घर जानेके लिये अनेक बार कहा, तब वह उत्तर कुरुदेशको चली गयी। वहाँ वह अश्विनीका रूप धारण करके तृण आदि चरती हुई समय बिताने लगी।

सूर्यभगवान्के समीप संज्ञाके रूपमें उसकी छाया निवास करती थी। सूर्य उसे संज्ञा ही समझते थे। इससे दो पुत्र हुए और एक कन्या हुई। श्रुतश्रवा तथा श्रुतकर्मा—ये दो पुत्र और अत्यन्त सुन्दर तपती नामकी कन्या छायाकी संतानें हैं। श्रुतश्रवा तो सार्वर्णि मनुके नामसे प्रसिद्ध होगा और श्रुतकर्माने शनैश्चर नामसे प्रसिद्ध प्राप्त की। संज्ञा जिस प्रकारसे अपनी संतानोंसे स्नेह करती थी, वैसा स्नेह छायाने नहीं किया। इस अपमानको संज्ञाके ज्येष्ठ पुत्र सार्वर्णि मनुने तो सहन कर लिया, किंतु उनके छोटे पुत्र यम (धर्मराज) सहन नहीं कर सके। छायाने जब बहुत ही क्लेश देना शुरू किया, तब क्रोधमें आकर बालपन तथा भावी प्रबलताके कारण उन्होंने अपनी विमाता छायाकी भर्त्सना की और उसे मारनेके लिये अपना पैर उठाया। यह देखकर क्रुद्ध विमाता छायाने उन्हें कठोर शाप दे दिया— 'दुष्ट ! तुम अपनी माँको पैरसे मारनेके लिये उद्यत हो रहे हो, इसलिये तुम्हारा यह पैर टूटकर गिर जाय।' छायाके शापसे विह्वल होकर यम अपने पिताके पास गये और उन्हें सारा वृत्तान्त कह सुनाया। पुत्रकी बातें सुनकर सूर्यनारायणने कहा— 'पुत्र ! इसमें कुछ विशेष कारण होगा, क्योंकि अत्यन्त धर्मात्मा तुझ—जैसे पुत्रके ऊपर माताको क्रोध आया है। सभी पापोंका तो निदान है, किंतु माताका शाप कभी अन्यथा नहीं हो सकता। पर मैं तुम्हारे ऊपर अधिक स्नेहके कारण एक उपाय कहता हूँ। यदि तुम्हारे पैरके मांसको लेकर कृमि भूमिपर चले जायँ तो इससे माताका शाप भी सत्य होगा और तुम्हारे पैरकी रक्षा भी हो जायगी।'

सुमन्तु मुनिने कहा—राजन् ! इस प्रकार पुत्रको आश्रासन देकर सूर्यनारायण छायाके समीप जाकर बोले— 'छाये ! तुम इनसे स्नेह क्यों नहीं करती

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११६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हो? माताके लिये तो सभी संतानें समान ही होनी चाहिये।' यह सुनकर छायाने कोई उत्तर नहीं दिया, जिससे सूर्यनारायणको क्रोध आ गया और वे शाप देनेके लिये उद्यत हो गये। छाया भगवान् सूर्यको क्रुद्ध देखकर भयभीत हो गयी और उसने अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त बतला दिया। तब सूर्य अपने ससुर विश्वकर्माके पास गये। अपने जामाता सूर्यको क्रुद्ध देखकर विश्वकर्माने उनका पूजन किया तथा मधुर वचनोंसे शान्त किया और कहा—'देव! मेरी पुत्री संज्ञा आपके अत्यन्त तेजको सहन न कर सकेके कारण वनको चली गयी है और वह आपके उत्तम रूपके लिये वहाँपर महान् तपस्या कर रही है। ब्रह्माजीने मुझे आज्ञा दी है कि यदि उनकी अंभिरुचि हो तो तुम संसारके कल्याणके लिये सूर्यको तराशकर उत्तम रूप बनाओ।' विश्वकर्माका यह वचन सूर्यनारायणने स्वीकार कर लिया और तब विश्वकर्माने शाकद्वीपमें सूर्यनारायणको भ्रमि (खराद)—पर चढ़ाकर उनके प्रचण्ड तेजको खराद डाला, जिससे उनका रूप बहुत कुछ सौम्य बन गया। सूर्यनारायणने भी अपने योगबलसे इस बातकी जानकारी की कि सम्पूर्ण प्राणियोंसे अदृश्य हमारी पत्नी संज्ञा अश्विनीके रूपको धारण करके उत्तरकुर्मे निवास कर रही है। अतः सूर्य भी स्वयं अश्वका रूप धारण करके उसके पास आकर मिले। फलतः कालान्तरमें अश्विनीसे देवताओंके वैद्य जुडुर्वा अश्विनीकुमारोंका जन्म हुआ। उनके नाम हैं नासत्य तथा दक्ष। इसके पश्चात् सूर्यनारायणने अपना वास्तविक रूप धारण किया। उस रूपको

देखकर संज्ञा अत्यन्त प्रीतिसे प्रसन्न हुई और वह उनके समीप गयी। तत्पश्चात् संज्ञासे 'रेवन्त' नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, जो भगवान् सूर्यनारायणके समान ही सौन्दर्य-सम्पन्न था।

इस प्रकार सावर्णि मनु, यम, यमुना, शनि, तपती, दो अश्विनीकुमार, वैवस्वत मनु और रेवन्त—ये सब सूर्यनारायणकी संतानें हुई। यमकी भगिनी यमी यमुना नदी बनकर प्रवाहित हुई। सावर्णि आठवें मनु होंगे। सावर्णि मनु मेरु पर्वतके पृष्ठप्रदेशपर तपस्या कर रहे हैं। सावर्णिके भ्राता शनि एक ग्रह बन गये और उनकी भगिनी तपती नदी बन गयी, जो विन्ध्यगिरिसे निकलकर पश्चिमी समुद्रमें जाकर मिलती है। इस नदीमें स्नान करनेसे बहुत ही पुण्य प्राप्त होता है। सौम्या नदीसे तपतीका संगम और गङ्गा नदीसे वैवस्वती—यमुनाका संगम होता है। दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके वैद्य हैं, जिनकी विद्यासे ही वैद्यगण भूमिपर अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। सूर्यनारायणने अपने समान रूपवाले रेवन्त नामक पुत्रको अश्वोंका स्वामी बनाया। जो मानव अपने गन्तव्य मार्गके लिये रेवन्तकी पूजा करके प्रस्थान करता है, उसे मार्गमें क्लेश नहीं होता। विश्वकर्माके द्वारा सूर्यनारायणको खरादपर चढ़ाकर जो तेज ग्रहण किया गया, उससे उन्होंने भगवान् सूर्यकी पूजा करनेके लिये भोजकोंको उत्पन्न किया। जो अमित तेजस्वी सूर्यनारायणकी संतानोत्पत्तिकी इस कथाको सुनता अथवा पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें दीर्घकालतक रहनेके पश्चात् पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है। (अध्याय ७९)

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  • ब्राह्मपर्व *

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सूर्यभगवान्को नमस्कार एवं प्रदक्षिणा करनेका फल और विजया-ससमी-व्रतकी विधि

देवर्षि नारदने कहा—साम्ब! अब मैं आपको भगवान् सूर्यनारायणके पूजन, उनके निमित्त दिये गये दान तथा उनको किये गये प्रणाम एवं प्रदक्षिणाके फलके विषयमें दिण्डी और ब्रह्माजीका संवाद सुना रहा हूँ, आप ध्यानसे सुनें—

ब्रह्माजी बोले—दिण्डिन्! सूर्यभगवान्का पूजन, उनकी स्तुति, जप, प्रदक्षिणा तथा उपवास आदि करनेसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। सूर्यनारायणको नम्र होकर प्रणाम करनेके लिये भूमिपर जैसे ही सिरका स्पर्श होता है, वैसे ही तत्काल सभी पातक नष्ट हो जाते हैं१। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणकी प्रदक्षिणा करता है, उसे ससद्गीपा वसुमतीकी प्रदक्षिणाका फल प्राप्त हो जाता है और वह समस्त रोगोंसे मुक्त होकर अन्त समयमें सूर्यलोकको प्राप्त करता है, किंतु प्रदक्षिणामें पवित्रताका ध्यान रखना आवश्यक है। अतएव जूता या खड़ाऊँ आदि पहनकर प्रदक्षिणा नहीं करनी चाहिये। जो मनुष्य जूता या खड़ाऊँ पहनकर सूर्य-मन्दिरमें प्रवेश करता है, वह असिपत्र-वन नामक घोर नरकमें जाता है। जो

प्राणी षष्ठी या ससमीके दिन एकाहार अथवा उपवास रखकर भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणका पूजन करता है, वह सूर्यलोकमें निवास करता है। कृष्ण पक्षकी ससमीको रक्त पुष्पोपचारोंसे और शुक्ल पक्षकी ससमीको श्वेत कमलपुष्प तथा मोदक आदि उपचारोंसे भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रती सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकको प्राप्त करता है।

दिण्डिन्! जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, महाजया, नन्दा तथा भद्रा नामकी ये सात प्रकारकी ससमियाँ कही गयी हैं। यदि शुक्ल पक्षकी ससमीको रविवार हो तो उसे विजया ससमी कहते हैं। उस दिन किया गया स्नान, दान, होम, उपवास, पूजन आदि सत्कर्म महापातकोंका विनाश करता है। इस विजया-ससमी-व्रतमें पञ्चमी तिथिको दिनमें एकभुक्त रहे, षष्ठी तिथिको नक्तव्रत करे और ससमीको पूर्ण उपवास करे, तदनन्तर अष्टमीके दिन व्रतकी पारणा करे। इस तिथिके दिन किया गया दान, हवन, देवता तथा पितरोंका पूजन अक्षय होता है।

(अध्याय ८०-८१)

द्व्वादश रविवारोंका वर्णन और नन्दादित्य-व्रतकी विधि

दिण्डीने ब्रह्माजीसे पूछा—ब्रह्मन्! जो मनुष्य आदित्यवारके दिन श्रद्धा-भक्तिसे सूर्यदेवका स्नान-दानादि कर पूजन करते हैं, उनको कौन-सा फल प्राप्त होता है? और जिस वारके संयोगसे ससमी तिथि विजया कहलाती है, उसके माहात्म्यका आप

पुनः वर्णन करें।

ब्रह्माजीने कहा—दिण्डिन्! जो मनुष्य आदित्यवारको श्राद्ध करते हैं, वे सात जन्मतक नीरोग रहते हैं तथा जो नक्तव्रत एवं आदित्यहृदयका२ पाठ करते हैं, वे रोगसे मुक्त हो जाते हैं और सूर्यलोकमें

१-प्रणिधाय शिरो भूमौ नमस्कारपरो रवेः। तत्क्षणात् सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ (ब्राह्मपर्व ८०।१०)

२-भविष्यपुराणके नामसे प्राप्त होनेवाले स्तोत्रोंमें 'श्रीआदित्यहृदय-स्तोत्र' का अत्यधिक प्रचार है और इसकी प्रसिद्धि प्राचीन कालमें भी इतनी अधिक थी कि महर्षि पराशरने सूर्यकी दशा-अन्तर्दशाओंमें शान्तिके लिये सर्वत्र इसी स्तोत्रके जपका निर्देश दिया है। यह स्तोत्र प्रायः दो सौ श्लोकोंमें उपनिबद्ध है। इसके पाठसे मनुष्य दुःख-दरिद्र तथा कुष्ठ आदि असाध्य रोगोंसे मुक्त होकर महासिद्धिको प्राप्त कर लेता है। इस स्तोत्रमें भगवान् सूर्यकी महिमा, अर्च्यदानविधि आदिका सुन्दर वर्णन है। इसका मण्डलाष्टक बड़ा ही सुन्दर है। इसके पाठसे भगवान् सूर्यमें श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। सूर्योपासनमें इस 'आदित्यहृदय' का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

निवास करते हैं। उपवास रखकर जो महाश्वेता मन्त्रका* जप करते हैं, वे मनोवाञ्छित फलको प्राप्त करते हैं। आदित्यवारके दिन महाश्वेता-मन्त्र तथा षडक्षर-मन्त्र 'ॐ खखोल्लकाय स्वाहा' का जप करनेसे निःसंदेह सूर्यलोककी प्राप्ति होती है।

सूर्यनारायणके द्वादश वार इस प्रकार हैं— नन्द, भद्र, सौम्य, कामद, पुत्रद, जय, जयन्त, विजय, आदित्याभिमुख, हृदय, रोगहा एवं महाश्वेता-प्रिय। माघ शुक्लपक्षकी षष्ठीकी नन्दसंज्ञा है। उस दिन नक्तव्रत करके घृतसे सूर्यनारायणको स्नान कराना चाहिये तथा श्वेत चन्दन, अगस्त्यके पुष्प, गुग्गुल-धूप आदिसे पूजन करके अपूप आदिका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये। ब्राह्मणको अपूप देकर स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करना चाहिये। गेहूँके अथवा यवके चूर्णमें घृत तथा खाँड़ या शक्कर मिलाकर अपूप बनाना चाहिये और उसीका नैवेद्य सूर्यनारायणको निवेदित कर निम्न मन्त्र पढ़ते हुए ब्राह्मणको वह नैवेद्य दे देना चाहिये—

आदित्यतेजसोत्पन्नं राज्ञीकरविनिर्मितम्। श्रेयसे मम विप्र त्वं प्रतीक्षापूपमुत्तमम्॥

(ब्राह्मपर्व ८२।१८)

ब्राह्मण नैवेद्य ग्रहण कर ले, तदनन्तर उस नैवेद्यको निम्न मन्त्र पढ़ते हुए पूजकको दे— कामदं सुखदं धर्म्यं धनदं पुत्रदं तथा। सदास्तु ते प्रतीच्छामि मण्डकं भास्करप्रियम्॥

(ब्राह्मपर्व ८२।१९)

उपर्युक्त दोनों मन्त्र ग्रहण करने और समर्पित करनेके लिये हैं। नन्दवारका यह विधान कल्याणकारी है। जो इस विधिसे सूर्यदेवकी पूजा करता है, उसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। उसकी संततिका कभी क्षय नहीं होता अर्थात् उसकी कुल-परम्परा पृथ्वीपर चलती रहती है तथा उसके वंशमें दारिद्र्य एवं रोग भी नहीं होते। सूर्यलोक प्राप्त करनेके पश्चात् पुनर्जन्म होनेपर वह पृथ्वीका राजा होता है। इस पूजन-विधानको पढ़ने अथवा श्रवण करनेसे भी कल्याण होता है एवं दिव्य अचल लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। (अध्याय ८२)

भद्रादित्य, सौम्यादित्य और कामदादित्यवार-व्रतोंकी विधिका निरूपण

ब्रह्माजी बोले—दिण्डिन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिको जो वार हो उसका नाम भद्र है। उस दिन जो मनुष्य नक्तव्रत और उपवास करता है, वह हंसयुक्त विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाता है। उस दिन श्वेत चन्दन, मालती-पुष्प, विजय-धूप तथा खीरके नैवेद्यसे मध्याह्नकालमें सूर्यनारायणका पूजन करके ब्राह्मणको भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये।

दिण्डिन्! यदि रोहिणी नक्षत्रसे युक्त आदित्यवार हो तो उसे सौम्यवार कहा जाता है। उस दिन किये जानेवाले स्नान, दान, जप, होम, पितृ-देवादि तर्पण तथा पूजन आदि कृत्य अक्षय होते हैं।

मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिको जो वार हो, वह कामदवार कहलाता है। यह वार भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है। इस दिन जो

यह स्तोत्र वर्तमान उपलब्ध भविष्यपुराणमें प्राप्त नहीं होता, इससे यह उसका खिल-भाग प्रतीत होता है। नारदपुराणमें उपलब्ध भविष्यपुराणकी सूची भी वर्तमानमें उपलब्ध भविष्यपुराणमें नहीं मिलती। कालक्रमसे पुराणोंका प्राचीन रूप न रह जानेसे आज वह सब एकत्र उपलब्ध नहीं हो पाता, परंतु प्रायः सभी बड़े स्तोत्र-संग्रहोंमें यह 'आदित्यहृदय-स्तोत्र' संगृहीत है। वाल्मीकीय रामायणमें अगस्त्यमुनिप्रोक्त 'आदित्यहृदय-स्तोत्र' भविष्यपुराणके 'आदित्यहृदय-स्तोत्र' से भिन्न है।

  • महाश्वेता-मन्त्र 'गायत्री-मन्त्र' का ही अपर पर्याय प्रतीत होता है।

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  • ब्राह्मपर्व *

११९

भक्ति और श्रद्धासे सूर्यनारायणकी पूजा करता है, वह सभी पातकोंसे विमुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है। इस व्रतको करनेसे विद्यार्थीको विद्या, पुत्रेच्छुको पुत्र, धनार्थीको धन और आरोग्यके

अभिलाषीको आरोग्यकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार कामदवार-व्रतसे और अन्य सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, इसीलिये इसका नाम कामद है।

(अध्याय ८३—८५)

पुत्रद, जय, जयन्तसंज्ञक आदित्यवार-व्रतोंकी विधि

ब्रह्माजी बोले—दिण्डिन्! जिस आदित्यवारको हस्त नक्षत्र हो उसे पुत्रद (आदित्य-) वार कहा जाता है। उस दिन उपवास करना चाहिये और श्राद्ध करके मध्यम पिण्डका प्राशन करना चाहिये। धूप, माल्य, दिव्य गन्ध आदि नाना प्रकारके उपचारोंसे सूर्यनारायणका पूजन कर महाश्वेता-मन्त्रको जपते हुए साधकको सूर्यनारायणके समक्ष ही शयन करना चाहिये। प्रातःकालमें ही उठकर स्नान आदिसे निवृत्त हो सूर्यभगवान्को अर्घ्य देना चाहिये। रक्त-चन्दन तथा करवीरके पुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् पाँच ब्राह्मणोंको बुलाकर उनमेंसे दो ब्राह्मणोंको मगसंज्ञक तथा तीन ब्राह्मणोंको भीमसंज्ञक मानकर विधिपूर्वक पार्वण-श्राद्ध करना चाहिये। श्राद्धके समाप्त होनेपर मध्यम पिण्डको भगवान् सूर्यके सामने रखकर निम्नलिखित मन्त्रसे भक्षण करना चाहिये—

स एष पिण्डो देवेश योऽभीष्टस्तव सर्वदा।

अशामि पश्यते तुभ्यं तेन मे संततिर्भवेत्॥

(ब्राह्मपर्व ८६।१०)

इस विधानसे पूजा करनेपर सूर्यनारायण निश्चित ही पुत्र प्रदान करते हैं। इस प्रकार उपवासपूर्वक

व्रतको करनेसे धन-धान्य, सुवर्ण, सुख-आरोग्य तथा सूर्यलोक भी प्राप्त होता है, किंतु विशेषरूपसे पुत्र-प्राप्तिका ही फल है, इसीसे इस वारको पुत्रद कहते हैं।

ब्रह्माजीने कहा—दिण्डिन्! दक्षिणायनके दिन जो वार हो, वह जयवार कहा जाता है। इस दिन किया गया उपवास, नक्तव्रत, स्नान-दान तथा जप भगवान् सूर्यमें सौगुनी प्रीति बढ़ानेवाला होता है। अतः सूर्यमें सौगुनी प्रीति बढ़ानेवाले इस नक्त-व्रतादिको अवश्य करना चाहिये।

यदि उत्तरायणके दिन रविवार हो तो उसे जयन्तवार कहते हैं। इस दिन भगवान् सूर्य स्नान-दानादि कर्म तथा पूजन करनेवालोंको हजार गुना फल प्रदान करते हैं। इस दिन उपवास करके घृत, दूध तथा इक्षुससे सूर्यनारायणको स्नान कराकर कुंकुमका विलेपन करना चाहिये और गुगुलका धूप देकर मोदकका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये। इस प्रकार भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करके तिलसे हवन करना चाहिये। तदनन्तर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको मोदक, तिल तथा शष्कुली (पूरी)-का भोजन कराना चाहिये। (अध्याय ८६-८७)

विजय, आदित्याभिमुख तथा हृदयवार-व्रतोंकी विधि

ब्रह्माजी बोले—दिण्डिन्! शुक्ल पक्षमें रोहिणी नक्षत्रसे युक्त सप्तमी तिथिको विजयसंज्ञक आदित्यवार कहते हैं। वह सम्पूर्ण पापों और

भयोंको नष्ट कर देता है। उस दिन सम्पन्न किये गये पुण्यकर्म कोटिगुना फल प्रदान करते हैं। दिण्डिन्! माघ मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जो दिन हो उसे आदित्याभिमुख कहते हैं। उस दिन प्रातःकाल ही स्नान कर गन्ध-पुष्पादि उपचारोंसे सूर्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर रक्तचन्दनके काष्ठसे बने हुए स्तम्भका आश्रय लेकर सूर्यदेवकी ओर मुखकर महाश्वेता-मन्त्र जपते हुए सायंकालतक खड़ा रहना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। तत्पश्चात् मौन होकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। जो मनुष्य इस व्रतका विधिपूर्वक पालन करते हैं, उन्हें भगवान् सूर्यनारायणका अनुग्रह प्राप्त होता है।

दिण्डिन्! संक्रान्तिके दिन यदि रविवार हो तो उसका नाम हृदयवार होता है। वह आदित्यके

हृदयको अत्यन्त प्रिय है। उस दिन नक्तव्रत करके मन्दिरमें सूर्यनारायणके अभिमुख एक सौ आठ बार आदित्यहृदयका पाठ करना चाहिये अथवा सायंकालतक भगवान् सूर्यका हृदयमें ध्यान करना चाहिये। सूर्यास्त होनेके पश्चात् घर आकर यथाशक्ति ब्राह्मणको भोजन कराये तथा मौनपूर्वक स्वयं भी खीरका भोजन करके सूर्यदेवका स्मरण करते हुए भूमिपर ही शयन करे। इस प्रकार जो इस दिन व्रत रहकर श्रद्धा-भक्तिसे सूर्यनारायणकी पूजा करता है, उसके समस्त अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं और वह भगवान् सूर्यके समान ही तेज-कान्ति तथा यशको प्राप्त करता है। (अध्याय ८८-९०)

रोगहा एवं महाश्वेतवार-व्रतकी विधि

ब्रह्माजी बोले—दिण्डिन्! यदि आदित्यवारको उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पड़े तो उसे रोगहावार कहते हैं। यह सम्पूर्ण रोगों एवं भयोंको दूर करनेवाला है। इस दिन जो गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करता है, वह सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है तथा सूर्यलोकको प्राप्त होता है। मन्दारके पत्रोंका दोना बनाकर उसीमें उसीके फूल रखकर रात्रिमें भगवान् सूर्यनारायणके सामने रख देना चाहिये तथा प्रातःकाल उठकर उन्हीं फूलोंसे उनका पूजन करना चाहिये। तदनन्तर खीरका भोजन करके व्रतकी समाप्ति करनी चाहिये।

दिण्डिन्! यदि सूर्यग्रहणके दिन रविवार हो तो उसे महाश्वेतवार कहते हैं, वह भगवान् सूर्यको बहुत प्रिय है। उस दिन उपवास करके पवित्रताके साथ गन्ध-पुष्पादि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणका पूजन करके महाश्वेता-मन्त्रका जप करे। तदनन्तर महाश्वेताकी पूजा करके सूर्यनारायणकी

पूजा करनेका विधान है। महाश्वेताकी स्थापना करके गन्ध-पुष्प आदिसे उनका पूजन करे तथा उन्हींके सम्मुख एक वेदीपर सूर्यनारायणकी स्थापना कर उनकी पूजा आदि करे। तत्पश्चात् स्नान करके घृतसहित तिलोंका हवन करे। ग्रहणके समय महाश्वेता-मन्त्रका जप करता रहे और ग्रहणके समाप्त होनेके पश्चात् पुनः स्नान करके महाश्वेता तथा ग्रहाधिपति भगवान् सूर्यका पूजन करे। ब्राह्मणोंसे पुराण सुनकर उन्हें भोजन कराये तथा यथाशक्ति दक्षिणा दे। उसके बाद स्वयं मौन होकर भोजन करे। इस दिन किये हुए स्नान, दान, जप, होम आदि कर्म अनन्त फल देते हैं।

दिण्डिन्! सम्पूर्ण पापों और भयोंको दूर करनेवाले सूर्यनारायणके इन द्वादश वारोंका मैंने जो वर्णन किया है, इसे जो मनुष्य पढ़ता है अथवा सुनता है, वह भगवान् सूर्यका प्रिय हो जाता है और जो इन व्रतोंको नियमपूर्वक करता है, वह धर्म, अर्थ, काम और चन्द्रमाके समान

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  • ब्राह्मपर्व *

१२१

कान्ति, सूर्यके समान प्रभा, इन्द्रके समान पराक्रम तथा स्थायी लक्ष्मीको प्राप्त करता है, तदनन्तर

अन्तमें वह शिवलोकको चला जाता है।

(अध्याय ९१-९२)

सूर्यदेवकी पूजामें विविध उपचार और फल आदि निवेदन करनेका माहात्म्य

ब्रह्माजी बोले—दिण्डिन्! जो प्राणी भगवान् सूर्यनारायणके निमित्त सभी धर्मकार्य करते हैं, उनके कुलमें रोगी और दरिद्री उत्पन्न नहीं होते। जो व्यक्ति भगवान् सूर्यके मन्दिरमें भक्तिपूर्वक गोबरसे लेपन करता है, वह तक्षण सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। श्वेत-रक्त अथवा पीली मिट्टीसे जो मन्दिरमें लेप करता है, वह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति उपवासपूर्वक अनेक प्रकारके सुगन्धित फूलोंसे सूर्यनारायणका पूजन करता है, वह समस्त अभीष्ट फलोंको प्राप्त करता है। घृत या तिल-तैलसे मन्दिरमें दीपक प्रज्वलित करनेवाला सूर्यलोकको तथा सूर्यनारायणके प्रीत्यर्थ चौराहे, तीर्थ, देवालयादिमें दीपक प्रज्वलित करनेवाला ओजस्वी रूपको प्राप्त करता है। भक्तिभावसे समन्वित होकर जिस मनुष्यके द्वारा सूर्यके लिये दीपक जलवाया जाता है, वह अपनी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर देवलोकको प्राप्त करता है। जो चन्दन, अगरू, कुंकुम, कपूर तथा कस्तूरी आदि मिलाकर तैयार किये गये उबटनसे सूर्यनारायणके शरीरका लेपन करता है, वह करोड़ों वर्षतक स्वर्गमें विहार कर पुनः पृथ्वीपर सभी इच्छाओंसे संतुष्ट रहता है और समस्त लोकोंका पूज्य बनकर चक्रवर्ती राजा होता है। चन्दन और जलसे मिश्रित पुष्पोंके द्वारा सूर्यको अर्घ्य प्रदान करनेपर पुत्र, पौत्र, पत्नीसहित स्वर्गलोकमें पूज्य होता है। सुगन्धित पदार्थ तथा पुष्पोंसे युक्त जलके द्वारा सूर्यको अर्घ्य देकर मनुष्य देवलोकमें बहुत समयतक रहकर पुनः पृथ्वीपर राजा होता है। स्वर्णसे युक्त जल अथवा लाल वर्णके जलसे

अर्घ्य देनेपर करोड़ों वर्षतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है। कमलपुष्पसे सूर्यकी पूजा करके मनुष्य स्वर्गको प्राप्त करता है। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणको गुगुल तथा घृतमिश्रित धूप देनेसे तत्काल ही सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है।

जो मनुष्य पूर्वाह्नमें भक्ति और श्रद्धासे सूर्यदेवका पूजन करता है, उसे सैकड़ों कपिला गोदान करनेका फल मिलता है। मध्याह्नकालमें जो जितेन्द्रिय होकर उनकी पूजा करता है, उसे भूमिदान और सौ गोदानका फल प्राप्त होता है। सायंकालकी संध्यामें जो मनुष्य पवित्र होकर श्वेत वस्त्र तथा उष्णीष (पगड़ी) धारण करके भगवान् भास्करकी पूजा करता है, उसे हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है।

जो मनुष्य अर्धरात्रिमें भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उसे जातिस्मरता प्राप्त होती है और उसके कुलमें धार्मिक व्यक्ति उत्पन्न होते हैं। प्रदोष-वेलामें जो मनुष्य भगवान् सूर्यदेवकी पूजा करता है, वह स्वर्गलोकमें अक्षयकालतक आनन्दका उपभोग करता है। प्रभातकालमें भक्तिपूर्वक सूर्यकी पूजा करनेपर देवलोककी प्राप्ति होती है। इस प्रकार सभी वेलाओंमें अथवा जिस किसी भी समय जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मन्दार-पुष्पोंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह तेजमें भगवान् सूर्यके समान होकर सूर्यलोकमें पूज्य बन जाता है। जो व्यक्ति दोनों अयन-संक्रान्तियोंमें भगवान् सूर्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह ब्रह्माके लोकको प्राप्त करता है और वहाँ देवताओंद्वारा पूजित होता है। ग्रहण आदि अवसरोंपर पूजन करनेवाला चिन्तित

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