भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
१५५
दारुण रोगसे ग्रस्त हूँ। वैद्योंद्वारा बहुत ओषधियोंका सेवन करनेपर भी मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। अब आप आज्ञा दें कि मैं वनमें जाकर तपस्याद्वारा अपने इस भयंकर रोगसे छुटकारा प्राप्त करूँ।' पुत्रका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने आज्ञा दे दी और साम्ब अपने पिताकी आज्ञाके अनुसार सिन्धुके उत्तरमें चन्द्रभागा नदीके तटपर लोकप्रसिद्ध मित्रवन नामके सूर्यक्षेत्रमें जाकर तपस्या करने लगे। वे उपवास करते हुए सूर्यकी आराधनामें तत्पर हो गये। उन्होंने इतना कठोर तप किया कि उनका अस्थिमात्र ही शेष रह गया। वे प्रतिदिन इस गुहा स्तोत्रसे दिव्य, अव्यय एवं प्रकाशमान आदित्यमण्डलमें स्थित भगवान् भास्करकी स्तुति करने लगे—
प्रजापति परमात्मन्! आप तीनों लोकोंकेनेत्र-स्वरूप हैं, सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि हैं, अतः आदित्य नामसे विख्यात हैं। आप इस मण्डलमें महान् पुरुषरूपमें देदीप्यमान हो रहे हैं। आप ही अचिन्त्यस्वरूप विष्णु और पितामह ब्रह्मा हैं। रुद्र, महेन्द्र, वरुण, आकाश, पृथ्वी, जल, वायु, चन्द्र, मेघ, कुबेर, विभावसु, यमके रूपमें इस मण्डलमें देदीप्यमान पुरुषके रूपसे आप ही प्रकाशित हैं। यह आपका साक्षात् महादेवमय वृत्त अण्डके समान है। आप काल एवं उत्पत्तिस्वरूप हैं। आपके मण्डलके तेजसे सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त हो रही है। आप सुधाकी वृष्टिसे सभी प्राणियोंको
परिपुष्ट करते हैं। विभावसो! आप ही अन्तःस्थ म्लेच्छजातीय एवं पशु-पक्षीकी योनिमें स्थित प्राणियोंकी रक्षा करते हैं। गलित कुछ आदि रोगोंसे ग्रस्त तथा अन्ध और बधिरोंको भी आप ही रोगमुक्त करते हैं। देव! आप शरणागतके रक्षक हैं। संसार-चक्र-मण्डलमें निमग्र निर्धन, अत्यायु व्यक्तियोंकी भी सर्वदा आप रक्षा करते हैं। आप प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं। आप अपनी लीलामात्रसे ही सबका उद्धार कर देते हैं। आर्त और रोगसे पीड़ित मैं स्तुतियोंके द्वारा आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हूँ। आप तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिसे सदा स्तुत होते रहते हैं। महेन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक आदि स्तुतियोंके द्वारा आपकी सदा आराधना करते रहते हैं। जब ऋक्, यजु और सामवेद तीनों आपके मण्डलमें ही स्थित हैं तो दूसरी कौन-सी पवित्र अन्य स्तुति आपके गुणोंका पार पा सकती है? आप ध्यानियोंके परम ध्यान और मोक्षार्थियोंके मोक्षद्वार हैं। अनन्त तेजोराशिसे सम्पन्न आप नित्य अचिन्त्य, अक्षोभ्य, अव्यक्त और निष्कल हैं। जगत्पते! इस स्तोत्रमें जो कुछ भी मैंने कहा है, इसके द्वारा आप मेरी भक्ति तथा दुःखमय परिस्थिति (कुष्ठरोगकी बात)-को जान लें और मेरी विपत्तिको दूर करें*।
सूर्यभगवान्ने कहा—जाम्बवतीपुत्र! मैं तुम्हारी स्तुतिसे प्रसन्न हूँ, वत्स! मुझसे जो तुम चाहते हो वह कहो।
- आदिरेष हि भूतानामादित्य इति संज्ञितः। त्रैलोक्यचक्षुरेवात्र परमात्मा प्रजापतिः ॥ एष वै मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्। एष विष्णुरचिन्त्यात्मा ब्रह्मा चैष पितामहः ॥ रुद्रो महेन्द्रो वरुण आकाशं पृथिवीं जलम्। वायुः शशाङ्कः पर्जन्यो धनाध्यक्षो विभावसुः ॥ य एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्। एकः साक्षान्महादेवो वृत्रमण्डनिभः सदा ॥ कालो ह्येष महाबाहुर्निबोधोत्पलितक्षणः। य एष मण्डले ह्यस्मिन्तेजोभिः पूर्यन् महोम् ॥ भ्राम्यते ह्यव्यवच्छिन्नो वातैर्योऽमृतलक्षणः। नातः परतरं किंचित् तेजसा विद्यते क्वचित् ॥ पुण्याति सर्वभूतानि एष एव सुधामृतैः। अन्तःस्थान् म्लेच्छजातीयास्तिर्यग्योनिगतानपि ॥ कारुण्यात् सर्वभूतानि पासि त्वं च विभावसो। क्षिप्रकुष्ठग्रन्थबधिरान् पंगुरुचापि तथा विभो ॥ प्रपन्नवत्सलो देव कुरुते नीरुजो भवान्। चक्रमण्डलमग्नांश्च निर्धनात्यायुपस्तथा ॥
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth