भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
साम्बने कहा—भगवन्! आपके चरणोंमें मेरी दृढ़ भक्ति हो, यही वर चाहता हूँ।
सूर्यभगवान्ने कहा—ऐसा ही होगा! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ, सुब्रत! द्वितीय वर माँगो।
साम्बने कहा—भगवन्! मेरे शरीरमें रहनेवाला यह मल—कुछ आपकी कृपासे दूर हो जाय, गोपते! मेरा शरीर सर्वथा शुद्ध निर्मल हो जाय।
भगवान् सूर्यने कहा—ऐसा ही होगा।
भगवान् सूर्यके ऐसा कहते ही साम्बके शरीरसे कुछरोग वैसे ही दूर हो गया जैसे सर्पके शरीरसे केंचुल। वह दिव्य रूपसम्पन्न हो गया। साम्ब भगवान् सूर्यको प्रणामकर उनके सम्मुख खड़े हो गये।
सूर्यदेवने कहा—साम्ब! प्रसन्न होकर मैं और भी वर देता हूँ। आजसे मेरा यह स्थान तुम्हारे नामसे प्रसिद्ध होगा। लोकमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति होगी। जो व्यक्ति तुम्हारे नामसे मेरा स्थान बनायेगा, उसे सनातन लोक प्राप्त होगा। इस चन्द्रभागा नदीके तटपर मेरी स्थापना करो। मैं तुझे स्वप्रमें दर्शन देता रहूँगा। इतना कहकर सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष दर्शन देकर अन्तर्धान हो गये।
इस साम्बकृत स्तोत्रको जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक तीनों कालमें पढ़ता है अथवा सात दिनोंमें एक सौ इक्कीस बार पाठ और हवन करता है तो राज्यकी कामना करनेवाला राज्य, धनकी कामना करनेवाला धन प्राप्त कर लेता है और रोगसे
पीड़ित व्यक्ति वैसे ही रोगमुक्त हो जाता है, जैसे साम्ब कुछरोगसे मुक्त हो गये।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! तपस्याके समय रोगसे दुर्बल साम्बने सूर्यकी स्तुति उनके सहस्रनामसे की थी। उसे दुःखी देखकर स्वप्नमें भगवान् सूर्यने साम्बसे कहा—‘साम्ब! सहस्रनामसे मेरी स्तुति करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अपने अतिशय गोपनीय, पवित्र और इक्कीस शुभ नामोंको बताता हूँ। प्रयत्नपूर्वक उन्हें ग्रहण करो, उनके पाठ करनेसे सहस्रनामके पाठका फल प्राप्त होगा। मेरे इक्कीस नाम इस प्रकार हैं—
(१) विकर्तन (विपत्तियोंको काटने तथा नष्ट करनेवाले), (२) विवस्वान् (प्रकाश-रूप), (३) मार्तण्ड (जिन्होंने अण्डमें बहुत दिन निवास किया), (४) भास्कर, (५) रवि, (६) लोकप्रकाशक, (७) श्रीमान्, (८) लोकचक्षु, (९) ग्रहेश्वर, (१०) लोकसाक्षी, (११) त्रिलोकेश, (१२) कर्ता, (१३) हर्ता, (१४) तमिस्त्रहा (अन्धकारको नष्ट करनेवाले), (१५) तपन, (१६) तापन, (१७) शुचि (पवित्रतम), (१८) सप्ताश्ववाहन, (१९) गभस्तिहस्त (किरणें ही जिनके हाथस्वरूप हैं), (२०) ब्रह्मा और (२१) सर्वदेवनमस्कृत।*
साम्ब! ये इक्कीस नाम मुझे अतिशय प्रिय हैं। यह स्तवराजके नामसे प्रसिद्ध है। यह स्तवराज
प्रत्यक्षदर्शी त्वं देव समुद्धरसि लीलया । का मे शक्तिः स्तवैः स्तोतुमार्तोऽहं रोगपीडितः ॥ स्युसे त्वं सदा देवैर्बहाविष्णुशिवादिभिः । महैन्द्रसिद्धगन्धर्वैरप्सरोभिः सगृह्यैः ॥ स्तुतिभिः किं पवित्रैर्वा तव देव समीरितैः । यस्य ते ऋगयजुःसाम्रां त्रितयं मण्डलस्थितम् ॥ ध्यानिनां त्वं परं ध्यानं मोक्षद्वारं च मोक्षिणाम् । अनन्ततेजसाक्षोभ्यो ह्यचिन्त्याव्यक्तनिष्कलः ॥ यदयं व्याहतः किंचित् स्तोत्रेऽस्मिञ्जगतः पतिः । आर्तिं भक्तिं च विज्ञाय तत्सर्वं ज्ञातुमर्हसि ॥
(ब्राह्मपर्व १२७।१०—१३)
- वैकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः । लोकप्रकाशकः श्रीमौल्लोकचक्षुग्रहेश्वरः ॥ लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्त्रहा । तपनस्तापनश्वैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥ गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः ।
(ब्राह्मपर्व १२८।५—७)
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