भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
१६३
ससर्पिगण पद्मपरागसे सुगन्धित सम्पूर्ण तीर्थ-जलोंसे परिपूर्ण सप्तम घटके द्वारा आपका आभिषेक करें। आठ प्रकारके मङ्गलसे समन्वित अष्टम कलशसे वसुगण आपका अभिषेक करें। हे देवदेव! आपको नमस्कार है*।'
इसी प्रकार एक ताम्रके पात्रमें पञ्चगव्य बनाकर स्नान कराये। वैदिक मन्त्रोंसे गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, कुशोदक लेकर ताम्रके नवीन पात्रमें पञ्चगव्य बनाकर सूर्यनारायणको स्नान कराये। मन्त्रसे गन्धयुक्त जलसे स्नान कराये, अनन्तर शुद्धोदक-स्नान कराये तथा रक्त वस्त्र एवं अलंकारसे अलंकृत कर इस प्रकार आवाहन करें—
एहोहि भगवन् भानो लोकाग्नग्रहकारक।
यज्ञभागं गृहाण त्वमग्निदेव नमोऽस्तु ते॥
‘भगवन्! लोकाग्नग्रहकारक भानो! आप आये, इस यज्ञभागको ग्रहण करें, भगवान् सूर्यदेव! आपको नमस्कार है।’
तदनन्तर सुवर्णपात्रके द्वारा सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करें। पहले मिट्टीके कलशसे, अनन्तर ताम्र-कलशसे फिर रजत-कलशसे और अन्तमें सुवर्णके कलशसे मन्त्रोंद्वारा अभिषेक करें। सम्पूर्ण तीर्थोंदक
और सर्वोषधिसे युक्त शुद्धको सूर्यदेवके मस्तकपर भ्रमण कराये और उसके जलसे स्नान कराये, अनन्तर पुष्प और धूप देकर जल, दूध, घृत, शहद और इक्षुरससे स्नान कराये।
इस प्रकारसे सूर्यदेवको स्नान करानेवाला पुरुष अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम, वाजपेय, राजसूय और अश्वमेध-यज्ञके फलको प्राप्त करता है। जो स्नानके समय सूर्यदेवका भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह भी पूर्वोक्त फल प्राप्त करता है। ऐसे स्थानमें स्नान कराना चाहिये जहाँ स्नानके जलका कोई लङ्घन न कर सके और स्नानके जल, दही, दूधको कुत्ता, कौआ आदि निन्दित जीव भक्षण न कर सकें।
इस प्रकारके स्नानविधिके सम्पादनके लिये जिस प्रकारके ब्राह्मण और भोजककी आवश्यकता होती है, उनका लक्षण सुनें—
वह व्यक्ति विकलाङ्ग अर्थात् न्यूनाधिक अङ्गवाला न हो। वेदादि-शास्त्रोंका ज्ञाता, सुन्दर, कुलीन और आर्यावर्त देशमें उत्पन्न हो। गुरुभक्त, जितेन्द्रिय, तत्त्ववेता और सूर्यसम्बन्धी शास्त्रोंका ज्ञाता हो। ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मणसे स्नान और प्रतिष्ठा करानी चाहिये। (अध्याय १३५)
भगवान् सूर्यकी प्रतिमाके अधिवासन और
प्रतिष्ठाका विधान तथा फल
नारदजी बोले—साम्ब! अब मैं अधिवासनविधि कहता हूँ। पवित्र भूमिको लीपकर पाँच रंगोंसे चतुरस्र सुन्दर मण्डलकी रचना करे। पताका, ध्वज, तोरण, छत्र, पुष्पमाला आदिसे उसे अलंकृत
- देवास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः । व्योमगङ्गाभ्युपूर्णन कलशेन सुरोत्तम ॥ मरुतश्चाभिषिञ्चन्तु भक्तिमन्तो दिवस्पते । मेघतोयाभिपूर्णन द्वितीयकलशेन तु ॥ सारस्वतेन पूर्णन कलशेन सुरोत्तम । विद्याधराभिषिञ्चन्तु तृतीयकलशेन तु ॥ शक्राद्या अभिषिञ्चन्तु लोकपालाः सुरोत्तमाः । सागरोदकपूर्णन चतुर्थकलशेन तु ॥ वारिणा परिपूर्णन पद्मरेणुसुगन्धिना । पञ्चमेनाभिषिञ्चन्तु नागास्त्वां कलशेन तु ॥ हिमवद्भेमकूटाद्या अभिषिञ्चन्तु चाचलाः । नैर्ऋतोदकपूर्णन षष्ठेन कलशेन तु ॥ सर्वतीर्थाम्बुपूर्णन पद्मरेणुसुगन्धिना । सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः ॥ वसवश्चाभिषिञ्चन्तु कलशेनाष्टमेन वै । अष्टमङ्गलयुक्तेन देवदेव नमोऽस्तु ते ॥
(ब्राह्मपर्व १३५।२१-२८)
584 Sankshipta Bhavishya Puran Section 7.2 From Digitized by Sarvagya Sharda Peeth