भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कर मण्डलमें कुशा बिछाये और सूर्यदेवकी मूर्ति स्थापित करे। भगवान् सूर्यका आवाहन कर उन्हें अर्घ्य दे, मधुपर्क तथा वस्त्र, यज्ञोपवीत आदिसे पूजन करे और अव्यङ्ग अर्पण करे। जिस प्रकार देवताओंको पवित्रक अर्पण किया जाता है, वैसे ही प्रतिवर्ष श्रावण मासमें नवीन अव्यङ्गकी रचना कर सूर्यनारायणको समर्पित करना चाहिये। इनका यह पवित्रक है। नवीन अव्यङ्गके समर्पणके समय ब्राह्मणोंको भोजन कराये। भगवान्की प्रतिमाको सुगन्धित द्रव्योंसे उपलिस कर पुष्पमाला चढ़ाये तथा धूप आदि दिखाये। 'नमः शम्भवायः' (यजु० १६।४१) इस मन्त्रसे भगवान्की प्रतिमाको शय्याके ऊपर शयन कराये। सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्तिके लिये इस प्रकार पाँच दिन, तीन दिन अथवा एक ही रात्रि प्रतिमाका अधिवासन करे*।

देवालयेके ईशानकोणमें उत्तम स्थानके मध्यमें कुशा बिछाकर वहाँ शुक्ल वस्त्रोंसे सुसज्जित शय्या रखे। शय्याका सिरहाना पूर्वमुख रखा जाय। उसी शय्यापर भगवान् सूर्यकी प्रतिमाको शयन कराये। उनके दाहिने भागमें निशुभा, वाम भागमें रात्री और चरणोंके समीप दण्डनायक तथा पिङ्गलको स्थापित करे। उस रात्रिमें सूर्यनारायणके समीप जागरण करे, वन्दी-चारणसे स्तुति, नृत्य, गीत आदि उत्सव कराये। प्रभात होते ही ऋग्वेदके विधानसे प्रतिमाका उद्घोषन करे और स्वस्तिवाचनपूर्वक भगवान्की पूजा कर ब्राह्मण तथा भोजकोंको हविष्यान्न भोजन कराये तथा उन्हें दक्षिणा देकर प्रसन्न करे। अनन्तर मन्दिरके गर्भगृहमें पिण्डिकाके ऊपर सात अक्षोंसे युक्त सुवर्णका रथ स्थापित कर सूर्यनारायणको अर्घ्य देकर मङ्गल वाद्योंके साथ जलधारा गिराये। फिर उत्तम मुहूर्त और स्थिर लग्नमें प्रतिमाकी स्थापना करे। प्रतिमाका मुख नीचे-ऊपर या अगल-

बगल, तिरछा न हो, वरन् सीधा और सम रहे। भगवान् सूर्यकी प्रतिमाके दक्षिणभागमें और वामभागमें क्रमशः निशुभा और रात्रीकी प्रतिमा स्थापित करे। अनन्तर मोदक, शष्कुली, पायस, कुशर आदिसे इन्द्रादि दस दिव्यालोंका आवाहन तथा पूजन कर उन्हें बलि समर्पित करे।

इसके अनन्तर स्तुतियों तथा विविध उपचारोंसे सूर्यदेवका पूजन कर ब्राह्मणों और भोजकोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार भक्तोंद्वारा भक्तिपूर्वक प्रतिमाकी स्थापना किये जानेपर, वह उनकी सभी प्रकार कल्याण, मङ्गल और सुख-समृद्धिकी वृद्धि करती है और उसमें भगवान् सूर्यका नित्य सान्निध्य रहता है। सूर्यकी स्थापना करनेवाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है और उसे सात जन्मोंतक आधि-व्याधियाँ भी नहीं सतातीं। तीन दिनोंतक प्रतिष्ठाके उत्सवोंमें सम्मिलित रहनेवाला व्यक्ति सूर्यलोकको जाता है। सूर्यनारायणकी प्रतिमाकी स्थापना करनेसे दस अश्वमेध तथा सौ वाजपेय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। मन्दिरकी ईंट जबतक चूर्ण नहीं हो जाती, तबतक मन्दिर बनवानेवाला पुरुष स्वर्ग-सुख भोगता है। सूर्य-मन्दिरके जीर्णोद्धार करनेका पुण्य इससे भी अधिक है। जो पुरुष मन्दिरका निर्माण कराकर प्राणियोंकी सृष्टि, स्थिति एवं प्रलयके हेतुभूत सुरश्रेष्ठ भगवान् सूर्यकी प्रतिमा स्थापित करता है, वह संसारके सब सुखोंको भोगकर सौ कल्पोंतक सूर्यलोकमें निवास करता है। मन्दिरमें इतिहास-पुराणका पाठ भी करना चाहिये।

इसी प्रकार अन्य देवताओंकी प्रतिमाओंका भी शय्याधिवास तथा उद्घोषन करे और शुभ मुहूर्तमें उन प्रतिमाओंको यथास्थान पिण्डिकापर स्थापित कर पूजन करे। (अध्याय १३६-१३७)

  • पाक्षरात्र-आगमों तथा विविध प्रतिष्ठा-ग्रन्थोंमें अधिवासनकी विस्तृत विधियाँ निर्दिष्ट हैं।

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