भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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ध्वजारोपणका विधान और फल
नारदजी बोले—साम्ब! अब मैं ब्रह्माजीद्वारा वर्णित ध्वजारोपणकी विधि बतलाता हूँ। पूर्वकालमें देवता और असुरोंमें जो भीषण युद्ध हुआ, उसमें देवताओंने अपने-अपने रथोंपर जिन-जिन चिह्नोंकी कल्पना की, वे ही उनके ध्वज कहलाये। उनका लक्षण इस प्रकार है—ध्वजका दण्ड सीधा, व्रणरहित और प्रासादके व्यासके बराबर लम्बा होना चाहिये अथवा चार, आठ, दस, सोलह या बीस हाथ लम्बा होना चाहिये। ध्वजाका दण्ड बीस हाथसे अधिक लम्बा न हो और सम पर्वोवाला हो। उसकी गोलाई चार अङ्गुल होनी चाहिये।
ध्वजके ऊपर देवताको सूचित करनेवाला चिह्न बनवाना चाहिये। भगवान् विष्णुके ध्वजपर गरुड, शिवजीकी ध्वजापर वृष, ब्रह्माजीकी ध्वजापर पद्म, सूर्यदेवकी ध्वजापर व्योम, सोमकी पताकापर नर, बलदेवकी पताकापर फालसहित हल, कामदेवकी पताकापर मकरध्वज, इन्द्रकी ध्वजापर हस्ती, दुर्गाकी ध्वजापर सिंह, उमादेवीकी ध्वजापर गोधा, रैवतकी ध्वजापर अश्व, वरुणकी ध्वजापर कच्छप, वायुकी ध्वजापर हरिण, अग्निकी ध्वजापर मेघ, गणपतिकी ध्वजापर मूषकका तथा ब्रह्मर्षियोंकी पताकापर कुशका चिह्न बनाना चाहिये। जिस देवताका जो वाहन हो, वही ध्वजापर भी अङ्कित रहता है।
विष्णुकी ध्वजाका दण्ड सोनेका और पताका पीतवर्णकी होनी चाहिये, वह गरुडके समीप रखनी चाहिये। शिवजीका ध्वजदण्ड चाँदीका और श्वेत वर्णकी पताका वृषके समीप स्थापित करे। ब्रह्माका ध्वजदण्ड ताँबेका और पद्मवर्णकी पताका कमलके समीप रखे। सूर्यनारायणका ध्वजदण्ड सुवर्णका और व्योमके नीचे पँचरंगी पताका होनी चाहिये, जिसमें किंकिणी लगी रहे एवं पुष्पमालाओंसे संयुक्त हो। इन्द्रका ध्वजदण्ड
सोनेका और हस्तीके समीप अनेक वर्णकी पताका होनी चाहिये। यमका ध्वजदण्ड लोहेका और महिषके समीप कृष्णवर्णकी पताका रखनी चाहिये। कुबेरका ध्वजदण्ड मणिमय और मनुष्य-पादके समीप रक्त वर्णकी पताका रखे। बलदेवका ध्वजदण्ड चाँदीका और तालवृक्षके नीचे श्वेतवर्णकी पताका रखनी चाहिये। कामदेवका ध्वजदण्ड त्रिलौह (सोना, चाँदी और ताँबा-मिश्रित)–का और मकरके समीप रक्तवर्णकी पताका स्थापित करनी चाहिये। कार्तिकेयका ध्वजदण्ड त्रिलौहका और मयूरके समीप चित्रवर्णकी पताका एवं गणपतिका ध्वजदण्ड ताम्रका अथवा हस्तिदन्तका एवं मूषकके समीप शुक्लवर्णकी पताका और मातृकाओंके ध्वजदण्ड अनेक रूपोंके तथा अनेक वर्णोंकी अनेक पताकाएँ होनी चाहिये। रेवन्तकी पताका अश्वके समीप लालवर्णकी, चामुण्डाका ध्वजदण्ड लौहका और मुण्डमालाके समीप नीले वर्णकी ध्वजा होनी चाहिये। गौरीका ध्वजादण्ड ताम्रका और इन्द्रगोप (बीरबहूटी कीट)–के समान अतिशय रक्तवर्णकी ध्वजा होनी चाहिये। अग्निका ध्वजदण्ड सुवर्णका और मेघके समीप अनेक वर्णकी पताका होनी चाहिये। वायुका ध्वजदण्ड लौहका और हरिणके समीप कृष्णवर्णकी पताका होनी चाहिये। भगवतीका ध्वजदण्ड सर्वधातुमय, उसके ऊपर सिंहके समीप तीन रंगकी पताका होनी चाहिये।
इस प्रकार ध्वजका पहिले निर्माण कर उसका अधिवासन करे। लक्षणके अनुसार वेदीका निर्माण करे, कलशकी स्थापना कर सर्वौषधि-जलसे ध्वजको स्नान कराये। वेदीके मध्यमें उसे खड़ाकर सभी उपचारोंसे उसकी पूजा करे और उसे पुष्पमाला पहिनाये, दिव्यालोंको बलि देकर एक राततक अधिवासन करे। दूसरे दिन भोजन कराकर शुभ
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