भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 654 में से

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पृष्ठ 182

* ब्राह्मपर्व * । १७१

उत्तम एवं अधम भोजकोंके लक्षण

राजा शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यकी पूजा करनेवाले भोजक दिव्य, उनसे उत्पन्न एवं उन्हें अत्यन्त प्रिय हैं। इसलिये वे पूज्य हुए किंतु वे अभोज्य कैसे कहलाते हैं, इस विषयमें आप बतलायें ?

सुमन्तु मुनिने कहा—राजन् ! मैं इस विषयमें भगवान् वासुदेव तथा कृतवर्माके द्वारा हुए संवादको अत्यन्त संक्षेपमें बतला रहा हूँ। किसी समय नारद और पर्वत—ये दोनों मुनि साम्बपुर गये। वहाँ उन्होंने भोजकोंके यहाँ भोजन किया, अनन्तर वे दोनों विमानपर आरूढ़ हो द्वारकापुरीमें आ गये। उनके विषयमें कृतवर्माको शंका हुई कि सूर्यके पूजक होनेसे भोजकोंका अन्न अग्राह्य है, फिर नारद तथा पर्वत—इन दोनोंने उनका अन्न कैसे ग्रहण किया? इसपर वासुदेवने कृतवर्मासे कहा—जो भोजक अव्यङ्ग धारण नहीं करते और बिना अव्यङ्गके तथा बिना स्नान किये भगवान् सूर्यकी पूजा करते हैं और शूद्रका अन्न ग्रहण करते हैं तथा देवार्चाका परित्याग कर कृषि-कार्य करते हैं, जिनके जातकर्मार्दि संस्कार नहीं हुए हैं, शङ्ख धारण नहीं करते, मुण्डित नहीं रहते—वे भोजकोंमें अधम हैं। ऐसे भोजकद्वारा किये गये देवार्चन, हवन, स्नान, तर्पण, दान तथा ब्राह्मण-भोजन आदि सत्कर्म भी निष्फल होते हैं। इसीसे अशुचि होनेके कारण वे अभोज्य कहे गये हैं। भगवान् सूर्यके नैवेद्य, निर्माल्य, कुंकुम आदि शूद्रोंके हाथ बेचनेवाले, भगवान् सूर्यके धनको अपहृत करनेवाले भोजक उन्हें प्रिय नहीं हैं तथा वे भोजकोंमें अधम हैं। जो भोजक भगवान्‌को भोग लगाये बिना भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन उन्हें नरक प्राप्त करानेवाला बन जाता है। अतः भगवान् सूर्यको अर्पण करके ही नैवेद्य भक्षण करना चाहिये, इससे शरीरकी शुद्धि होती है।

वासुदेवने पुनः बतलाया—कृतवर्मन् ! भोजकोंकी प्रियताके विषयमें भगवान् सूर्यने अरुणको जो बतलाया, उसे आप सुनें—

जो भोजक पर-स्त्री तथा पर-धनका हरण करते हैं, देवताओं तथा वेदोंके निन्दक हैं, वे मुझे अप्रिय हैं, उनके द्वारा की गयी पूजा तथा प्रदान किये गये अर्घ्यको मैं ग्रहण नहीं करता। जो भगवती महाश्वेताका यजन नहीं करते एवं सूर्य-मुद्राओंको नहीं जानते तथा मेरे पार्षदोंका नाम नहीं जानते, वे मेरी पूजा करनेके अधिकारी नहीं हैं और न मेरे प्रिय हैं।

इसके विपरीत देव, द्विज, मनुष्य, पितरोंकी पूजा करनेवाले, मुण्डित सिरवाले, अव्यङ्ग धारण करनेवाले, शङ्ख-ध्वनि करनेवाले, क्रोधरहित, तीनों कालमें स्नान एवं पूजन करनेवाले भोजक मुझे अत्यन्त प्रिय हैं एवं मेरे पूजनके अधिकारी हैं। जो रविवारके दिन षष्ठी तिथि पड़नेपर नक्तव्रत तथा सप्तमी एवं संक्रान्तिमें उपवास करते हैं एवं मुझमें विशेष भक्ति रखते हुए मेरे भक्त ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं तथा देव, ऋषि, पितर, अतिथि और भूत-यज्ञ—इन पाँचोंका अनुष्ठान करते हैं, एकभुक्त होकर सूर्यपूजा करते हैं तथा सांवत्सरिक, पार्वण, एकोद्दिष्ट आदि श्राद्ध सम्पन्न करते हैं और उन तिथियोंमें दान देते हैं, वे भोजक मुझे अत्यन्त प्रिय हैं तथा जो भोजक माघ मासकी सप्तमीको करवीर-पुष्प, रक्त चन्दन, मोदकका नैवेद्य, गुग्गुल, धूप, दूध, शङ्खादि वाद्य-ध्वनि, पताका तथा छत्रादिसे मेरी पूजा करते हैं, घृतकी आहुति देकर हवन