भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वृक्षोंके नीचे निवास करना, भोजनके लिये मिट्टीका भिक्षापत्र रखना, साधारण वस्त्र पहनना और किसीसे सहायता न लेना तथा सभी प्राणियोंमें समभाव रखना—यही जीवनमुक्त पुरुषके लक्षण हैं।

जैसे तिलमें तैल, गायमें दूध, काष्ठमें अग्नि स्थित है, वैसे ही परमात्मा समस्त प्राणियोंमें स्थित है। ऐसा समझकर उनकी प्रासिका उपाय करना चाहिये। प्रथम प्रमथन स्वभाववाले तथा चञ्चल मनको प्रयत्नपूर्वक वशमें कर बुद्धि और इन्द्रियोंको वैसे ही रोकना चाहिये, जैसे पिंजरेमें पक्षियोंको रोका जाता है। इन संयत इन्द्रियोंके द्वारा इस शरीरको अमृतकी धाराके समान तृप्ति होती है१। प्राणायामसे शारीरिक दोष, धारणासे पूर्वजन्माजित तथा वर्तमानतकके सभी पाप, प्रत्याहारसे संसर्गजनित दोष एवं ध्यानसे जैविक दोषोंका त्यागकर ईश्वरीय गुणोंको प्राप्त करना चाहिये। जैसे आगके तापमें रखनेसे धातुओंके दोष दग्ध हो जाते हैं, वैसे ही प्राणायामके द्वारा साधकके इन्द्रियजनित दोष दग्ध हो जाते हैं। जैसे एक हाथसे दूसरे हाथको दबाया जाता है, वैसे ही अपनी शुद्ध बुद्धिके द्वारा मनको एवं चित्तको शुद्ध कर पवित्र भावनाओंके द्वारा दुर्व्यसनोंको शान्तकर मन-बुद्धिको अत्यन्त पवित्र

कर लेना चाहिये। अतः चित्तकी शुद्धिके लिये प्रयास करना चाहिये। चित्तकी शुद्धि होनेसे शुभ और अशुभ कर्मोंका ज्ञान होता है। शुभ और अशुभ कर्मोंसे छुटकारा प्राप्त कर साधक निर्द्वन्द्व, निर्मम, निष्परिग्रह और निरहंकार होकर मोक्षको प्राप्त कर लेता है२।

सूर्यका पूर्वाह्नमें रक्तवर्ण, ऋग्वेदस्वरूप तथा राजसरूप होता है। मध्याह्नमें शुक्लवर्ण, यजुर्वेदस्वरूप एवं सात्त्विक रूप होता है। सायंकालमें कृष्णवर्ण, सामवेदस्वरूप तथा तामसरूप होता है। इन तीनोंसे भिन्न ज्योतिःस्वरूप, सूक्ष्म और निरञ्जनस्वरूप चतुर्थ स्वरूप है। पद्मासनमें बैठकर सुषुम्णा नाडी-मार्गमें चित्तको स्थिर कर प्रणवसे पूरक, कुम्भक और रेचकरूप प्राणायाम कर पैके अँगूठेके अग्रभागसे लेकर मस्तकपर्यन्त न्यास करे। नाभिमें अग्रिका, हृदयमें चन्द्रमाका और मस्तकमें अग्रिशिखाका न्यास करना चाहिये। इन सबसे ऊपर सूर्यमण्डलका न्यास करे—यह चतुर्थ स्थान है, इस स्थानको मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको अवश्य जानना चाहिये। ऋषिगण-सूर्यभगवान्के इसी तृतीय स्थानमें मनको लीनकर मुक्त हो जाते हैं। मग भी इसी स्थानका ध्यान कर मोक्षके भागी होते हैं। इस ज्ञानको सुनाकर भगवान् वेदव्यास बदरिकाश्रमकी ओर चले गये। (अध्याय १४५)

१-तिले तैलं गवि शौरं काष्ठे पावकसंततिः। उपायं चिन्तयेदस्य धिया धीरः समाहितः॥

प्रमाथि च प्रयत्नेन मनः संयम्य चञ्चलम्। बुद्धीन्द्रियाणि संयम्य शकुनानिव पंजरे॥ (ब्राह्मपर्व १४५।५-६)

२-इन्द्रियैर्नियतैर्दृष्टिर्धाराभिरिव तृष्यते। सततममृतस्यैव जनार्दन महामते॥

प्राणायामैर्दहदोषान् धारणाभिश्च किल्विषम्। प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥

ध्यायमानस्य दह्यन्ते चान्ते दोषा यथाग्निना। तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणनिग्रहात्॥

चित्तं चित्तेन संशोध्य भावं भावेन शोधयेत्। मनस्तु मनसा शोध्य बुद्धिं बुद्ध्या तु शोधयेत्॥

चित्तस्यातिप्रसादेन भाति कर्म शुभाशुभम्।

शुभाशुभविनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः। निर्ममो निरहंकारस्ततो याति परां गतिम्॥

(ब्राह्मपर्व १४५।७-११)

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