भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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यह विधि द्रव्यके अभावमें करनी चाहिये, द्रव्य रहनेपर विधिपूर्वक सभी सामग्रियोंसे पूजन करे। भक्तिपूर्वक सूर्यभगवान्की पूजा देखनेवालेको भी
अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है और सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। धूप-दानके समय सूर्यका दर्शन करनेपर उत्तम गति प्राप्त होती है। (अध्याय १४३)
सूर्यमण्डलस्थ पुरुषका वर्णन
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! एक बार व्यासजी शङ्खु-चक्र-गदाधारी नारायण भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये द्वारका आये। महातेजस्वी श्रीकृष्णने पाद्य, अर्घ्य, आचमन आदिसे उनका पूजन कर आसनपर उन्हें बैठाया और प्रणाम कर सम्बद्धारा लाये गये भोजकोंकी महिमा तथा उनकी सूर्यभक्तिके विषयमें जिज्ञासा प्रकट की।
भगवान् वेदव्यास बोले—भोजक भगवान् सूर्यके अनन्य उपासक हैं और अन्तमें ये भगवान् सूर्यकी दिव्य तेजस्वी कलामें प्रविष्ट होते हैं। भगवान् भास्करकी तीन कलाएँ हैं। सूर्यनारायणकी प्रथम कला अग्निमें स्थित है, उससे सभी कर्मोंकी सिद्धि होती है। दूसरी प्रकाशिका कला आकाशमें स्थित है। तीसरी कला सूर्यमण्डलमें है। सवितादेवका यह मण्डल अजर एवं अव्यय है। इस मण्डलके मध्यमें सदसदात्मक वह परमात्मा पुरुषरूपमें स्थित है। वह पुरुष क्षर-अक्षररूपमें है, इसको महासूर्य कहते हैं। इसके निष्कल और सकल दो
भेद हैं। तत्त्वोंके साथ सभी भूतोंमें अवस्थित वह परमात्मा सकल कहा जाता है और तत्त्वहीन होनेपर निष्कल। तृण, गुल्म, लता, वृक्ष, सिंह, वृक, हाथी, पक्षी, देवता, सिद्ध, मनुष्य, जल-जन्तु आदि सभीकी अन्तरात्मामें वह व्याप्त है। जब वह परमात्मा दूसरी कलामें स्थित होता है, तब वृष्टि आदि करता है। तीसरी तैजस कलामें स्थित होकर अपने भक्तोंको मोक्ष देता है, जिस मोक्षपदको प्राप्तकर वह परम शान्ति प्राप्त करता है।
वह परमात्मा ओंकारस्वरूप है, ओंकारकी साढ़े तीन मात्राएँ हैं, इनमें अर्धमात्रा मकारका जो ध्यान करता है, उसको सदसदात्मक ज्ञान होता है। सूर्यनारायणका रूप मकार है, मकारका ध्यान करनेसे ही ये मग कहे जाते हैं। धूप, माल्य आदिसे सूर्यनारायणका पूजन कर वे विविध पदार्थोंका भोजन कराते हैं, अतः उनकी भोजक संज्ञा है। (अध्याय १४४)
भगवान् व्यासद्वारा योग-ज्ञानका वर्णन
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महामुने! कृपाकर आप भोजकोंके सभी ज्ञानोंकी उपलब्धिका वर्णन करें।
व्यासजीने कहा—यह शरीर अस्थियोंपर ही खड़ा है, स्नायुओंसे बँधा, चमड़ेसे ढका एवं रक्त-मांससे उपलिस है। मल-मूत्र आदि दुर्गन्धयुक्त पदार्थोंसे
भरा है। यह समस्त रोगोंका घर है और इसमें (भीतर) वृद्धावस्था और शोक छिपे हैं, जो अपने-अपने समयपर प्रकट होते रहते हैं। यह शरीर रजोगुण आदि गुणोंसे भरा है, अनित्य है और इसमें भूतसंघोंका आवास बना है। अतः इसमें आसक्तिका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये*।
- अस्थिस्थूलं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् । चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥ जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् । रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ (ब्राह्मपर्व १४५। २-३)
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