भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कनिष्ठ होता है, अतः इससे छोटा नहीं होना चाहिये। यज्ञोपवीतकी तरह आठवें वर्षमें अव्यङ्ग धारण करना चाहिये। भोजकोंके लिये यह मुख्य संस्कार है। इसके धारण करनेसे वह सभी क्रियाओंका अधिकारी होता है। यह अव्यङ्ग सर्वदेवमय, सर्ववेदमय, सर्वलोकमय और सर्वभूतमय है। इसके मूलमें विष्णु, मध्यमें ब्रह्मा और अन्तमें शशाङ्कमौलि भगवान् शिव निवास करते हैं। इसी

तरह ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद क्रमशः मूल, मध्य और अग्रभागमें रहते हैं, अथर्ववेद ग्रन्थमें स्थित रहता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और भूलोक, भुवलोक तथा स्वलोक आदि सातों लोक अव्यङ्गमें निवास करते हैं। सूर्यभक्त भोजकको सभी समय अव्यङ्ग धारणकर भगवान् सूर्यकी उपासना करनी चाहिये।

(अध्याय १४२)

साम्बोपाख्यानमें भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करने और धूप दिखानेकी महिमा

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस प्रकार व्यासजीके द्वारा अव्यङ्गके विषयमें जानकारी प्राप्त कर साम्ब नारदजीके पास वापस लौट आये और उन्होंने उनसे सब वृत्तान्त बताकर पूछा—‘देवर्षि! भोजकोंको भगवान् सूर्यको स्नान, अर्घ्य, आचमन, धूप आदि किस प्रकार समर्पित करना चाहिये?’ इसका आप कृपाकर वर्णन करें।

नारदजी बोले—साम्ब! संक्षेपमें मैं वह विधि बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। सर्वप्रथम शौचादिसे निवृत्त होकर आचमनपूर्वक नदीमें या जलाशय आदिमें स्नान करना चाहिये। अनन्तर स्वर्णदान कर तीन बार आचमन करे। शुद्ध वस्त्र पहनकर पवित्री धारणकर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो आचमन करना चाहिये। तदनन्तर दो बार मार्जन और तीन बार अभ्युक्षण करे। आचमनके बिना की गयी क्रिया निष्फल होती है एवं इसके बिना पुरुष शुद्ध भी नहीं होता। वेदमें कहा गया है कि देवता पवित्रताको ही चाहते हैं। आचमन करनेके बाद मौन होकर देवालयमें जाना चाहिये। आसनपर बैठकर प्राणायाम कर सिरको कपड़ेसे आच्छादित करे तथा विविध पुष्पोंसे सूर्यभगवान्की पूजा करे। व्याहृतिपूर्वक गायत्री-मन्त्रसे गुगुलका धूप दे। फिर

भगवान् सूर्यके मस्तकपर पुष्पाञ्जलि अर्पित करे।

रक्त चन्दन, पद्म, करवीर, कुंकुम आदिको जलमें मिलाकर ताम्रके पात्रसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्यपात्रको हाथमें उठाकर भगवान् सूर्यका आवाहन करे तथा दोनों जानुओंपर बैठकर भगवान् सूर्यका अपने हृदयमें ध्यान करते हुए नीचे लिखे मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे—

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां देव गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥

तदनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करे— अर्चितस्तव्यं यथाशक्त्या मया भक्त्या विभावसो। ऐहिकामुष्मिकीं नाथ कार्यसिद्धिं ददस्व मे॥

(ब्राह्मपर्व १४३।४७)

तीनों काल स्नानकर इस प्रकार जो भगवान् सूर्यकी आराधना करता है और धूप देता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है और उसे धन, पुत्र तथा आरोग्यकी भी प्राप्ति हो जाती है एवं अन्तमें वह भगवान् सूर्यमें लीन हो जाता है। उत्तम पुष्पोंके न मिलनेपर पत्रोंसे ही पूजन करे। धूप ही दे या भक्तिपूर्वक जल ही सूर्यको समर्पित करे। यदि यह भी न हो सके तो प्रणाम ही करे। प्रणाम करनेमें असमर्थ हो तो मानसी पूजा करे।

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