भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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भगवान् सूर्य (अग्निस्वरूप) रुष्ट हो गये। बादमें अग्निरूप भगवान् सूर्यके द्वारा निक्षुभाका जो पुत्र हुआ, वही मग कहलाया। भगवान् सूर्यके वरदानसे ये ही अग्निवंशमें उत्पन्न अव्यङ्गको धारण करनेवाले मग सूर्यके परम भक्त हुए और सूर्यकी पूजाके लिये नियुक्त हुए। भगवान् सूर्यकी पूजा करनेवाले मग शाकद्वीपमें निवास करते हैं, आप भगवान् सूर्यके पूजकके रूपमें उन्हें प्राप्त करनेके लिये शाकद्वीप जायँ।
अनन्तर साम्बने द्वारका जाकर अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णको सब समाचार सुनाया। फिर वे उनकी आज्ञा प्राप्तकर गरुडपर सवार हो शीघ्र ही शाकद्वीप पहुँच गये। वहाँ जाकर उन्होंने अतिशय तेजस्वी महात्मा मर्गोंको सूर्यभगवान्की आराधनामें संलग्न देखा। साम्बने उन्हें सादर प्रणामकर उनकी प्रदक्षिणा की।
साम्बने कहा—आपलोग धन्य हैं। आप सबका दर्शन सबके लिये कल्याणकारी है, आपलोग सदा भगवान् सूर्यकी आराधनामें लगे हुए हैं। मैं भगवान् श्रीकृष्णका पुत्र हूँ, मेरा नाम साम्ब है।
मैंने चन्द्रभागा नदीके तटपर सूर्यदेवकी मूर्तिकी स्थापना की है। उनकी आज्ञाके अनुसार उनकी विधिवत् आराधनाके निमित्त शाकद्वीपसे जम्बूद्वीपमें ले जानेके लिये मैं आपकी सेवामें उपस्थित हुआ हूँ। मेरी सविनय प्रार्थना है कि आपलोग कृपाकर जम्बूद्वीपमें पधारें और भगवान् सूर्यकी पूजा करें।
मर्गोंने कहा—‘साम्ब! इस बातकी जानकारी भगवान् सूर्यने हमें पहले ही दे दी है।’
यह सुनकर साम्ब बहुत प्रसन्न हुए और गरुडपर उन्हें बैठाकर वहाँसे मित्रवन (मूलस्थान—मुल्लान) ले आये। सूर्यभगवान् मर्गोंको वहाँ उपस्थित देखकर बहुत प्रसन्न हुए और साम्बसे बोले—‘साम्ब! अब तुम चिन्ता छोड़ दो, ये मग मेरी विधिवत् पूजा सम्पन्न करेंगे।’
इस प्रकार साम्बने शाकद्वीपसे अव्यङ्ग धारण करनेवाले मर्गोंको लाकर धन-धान्यसे परिपूर्ण इस साम्बपुरको उन्हें समर्पित कर दिया। वे सब भगवान् सूर्यकी सेवामें तत्पर हो गये और साम्ब भी सूर्यदेव एवं मर्गोंको प्रणामकर आनन्दचित्तसे द्वारका लौट आये। (अध्याय १३९—१४१)
अव्यङ्गका लक्षण और उसका माहात्म्य
एक बार साम्बने महर्षि व्यासेसे मर्गोंद्वारा धारण किये जानेवाले अव्यङ्गके* विषयमें जिज्ञासा की।
व्यासजीने कहा—साम्ब! मैं तुम्हें अव्यङ्गके विषयमें बताता हूँ, उसे सुनो! देवता, ऋषि, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष और राक्षस ऋतु-क्रमसे भगवान् सूर्यके रथके साथ रहते हैं। यह रथ वासुकि नामक नागसे बँधा रहता है। किसी समय वासुकि नागका कंचुक (केंचुल) उतरकर गिर पड़ा। नागराज वासुकिके शरीरसे उत्पन्न उस निर्मौक (केंचुल)-को भगवान् सूर्यने सुवर्ण और
रत्नोंसे अलंकृतकर अपने मध्य भागमें धारण कर लिया। इसीलिये भगवान् सूर्यके भक्त अपने देवकी प्रसन्नताके लिये अव्यङ्ग धारण करते हैं। उसके धारण करनेसे भोजक पवित्र हो जाते हैं और उनपर सूर्यभगवान्का अनुग्रह भी होता है।
इस अव्यङ्गको सर्पके केंचुलकी तरह मध्यमें पोला अर्थात् खाली रखना चाहिये। यह एक वर्णका होना चाहिये। कपासके सूतसे बना अव्यङ्ग दो सौ अङ्गुलका उत्तम, एक सौ बीस अङ्गुलका मध्यम और एक सौ आठ अङ्गुलका
- अहैरङ्गात् समुत्पन्नो ह्यव्यङ्गस्तु ततः स्मृतः ॥ (ब्राह्मपर्व १४१।१५)
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