भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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उर्वशी और ईशानकोणमें विनतादेवीकी पूजा करनी चाहिये। तृतीयावरणमें पूर्वमें शुक्र, पश्चिममें शनि, उत्तरमें बृहस्पति, ईशानमें बुध और मण्डलके अग्रिकोणमें चन्द्रमाकी पूजा करनी चाहिये। नैऋत्यकोणमें राहु तथा वायव्यकोणमें केतुकी पूजा करनी चाहिये। चौथे आवरणमें लेखक, शाण्डिलीपुत्र, यम, विरूपाक्ष, वरुण, वायुपुत्र, ईशान तथा कुबेर आदिकी उन-उनकी दिशाओंमें पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरणमें पूर्वादि क्रमसे महाश्वेता, श्री, ऋद्धि, विभूति, धृति, उन्नति, पृथ्वी तथा महाकीर्ति आदि देवियोंकी पूजा करनी चाहिये तथा इन्द्र, विष्णु, अर्यमा, भग, पर्जन्य,
विवस्वान्, अर्क, त्वष्टा आदि द्वादश आदित्योंकी पूजा छठे आवरणमें करनी चाहिये। सिर, नेत्र, अस्त्र-शस्त्रसे युक्त रथसहित सूर्यकी सातवें आवरणमें पूजा करनी चाहिये। यक्ष, गन्धर्व, मासाधिपति तथा संवत्सर आदिकी भी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद भगवान् भास्करका पुष्प, गन्ध आदिसे विधिपूर्वक पूजन कर—‘ॐ खखोल्लाक्य नमः’ इस मूल मन्त्रसे अपने अङ्गोंका स्पर्श अर्थात् हृदयादिन्यास करते हुए पूजन करना चाहिये। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस विधिसे सूर्यकी नित्य अथवा दोनों पक्षोंकी ससमीके दिन पूजन करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १५०)
सौरधर्मका वर्णन
राजा शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यका माहात्म्य कीर्तिवर्धक और सभी पापोंका नाशक है। मैंने भगवान् सूर्यनारायणके समान लोकमें किसी अन्य देवताको नहीं देखा। जो भरण-पोषण और संहार भी करनेवाले हैं वे भगवान् सूर्य किस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उस धर्मको आप अच्छी तरह जानते हैं। मैंने वैष्णव, शैव, पौराणिक आदि धर्मोंका श्रवण किया है। अब मैं सौरधर्मको जानना चाहता हूँ। इसे आप मुझे बतायें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब आप सौरधर्मके विषयमें सुने।
यह सौरधर्म सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ और उत्तम है। किसी समय स्वयं भगवान् सूर्यने अपने सारथि अरुणसे इसे कहा था। सौरधर्म अन्धकाररूपी दोषको दूरकर प्राणियोंको प्रकाशित करता है और यह संसारके लिये महान् कल्याणकारी है। जो व्यक्ति शान्तचित्त होकर सूर्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह सुख और धन-धान्यसे परिपूर्ण हो जाता है। प्रातः, मध्याह्न और सायं—त्रिकाल
अथवा एक ही समय सूर्यकी उपासना अवश्य करनी चाहिये। जो व्यक्ति सूर्यनारायणका भक्तिपूर्वक अर्चन, पूजन और स्मरण करता है, वह सात जन्मोंमें किये गये सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो भगवान् सूर्यकी सदा स्तुति, प्रार्थना और आराधना करते हैं, वे प्राकृत मनुष्य न होकर देवस्वरूप ही हैं। षोडशाङ्ग-पूजन-विधिको स्वयं सूर्यनारायणने कहा है, वह इस प्रकार है—
प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिये। जप, हवन, पूजन, अर्चनादि कर सूर्यको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, गाय, पीपल आदिकी पूजा करनी चाहिये। भक्तिपूर्वक इतिहास-पुराणका श्रवण और ब्राह्मणोंको वेदाभ्यास करना चाहिये। सबसे प्रेम करना चाहिये। स्वयं पूजनकर लोगोंको पुराणादि ग्रन्थोंकी व्याख्या सुनानी चाहिये। मेरा नित्य-प्रति स्मरण करना चाहिये। इस प्रकारके उपचारोंसे जो अर्चन-पूजन-विधि बतायी गयी है, वह सभी प्रकारके लोगोंके लिये उत्तम है। जो कोई इस प्रकारसे भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, वही
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