भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- ब्राह्मपर्व *
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उर्वशी और ईशानकोणमें विनतादेवीकी पूजा करनी चाहिये। तृतीयावरणमें पूर्वमें शुक्र, पश्चिममें शनि, उत्तरमें बृहस्पति, ईशानमें बुध और मण्डलके अग्रिकोणमें चन्द्रमाकी पूजा करनी चाहिये। नैऋत्यकोणमें राहु तथा वायव्यकोणमें केतुकी पूजा करनी चाहिये। चौथे आवरणमें लेखक, शाण्डिलीपुत्र, यम, विरूपाक्ष, वरुण, वायुपुत्र, ईशान तथा कुबेर आदिकी उन-उनकी दिशाओंमें पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरणमें पूर्वादि क्रमसे महाश्वेता, श्री, ऋद्धि, विभूति, धृति, उन्नति, पृथ्वी तथा महाकीर्ति आदि देवियोंकी पूजा करनी चाहिये तथा इन्द्र, विष्णु, अर्यमा, भग, पर्जन्य,
विवस्वान्, अर्क, त्वष्टा आदि द्वादश आदित्योंकी पूजा छठे आवरणमें करनी चाहिये। सिर, नेत्र, अस्त्र-शस्त्रसे युक्त रथसहित सूर्यकी सातवें आवरणमें पूजा करनी चाहिये। यक्ष, गन्धर्व, मासाधिपति तथा संवत्सर आदिकी भी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद भगवान् भास्करका पुष्प, गन्ध आदिसे विधिपूर्वक पूजन कर—‘ॐ खखोल्लाक्य नमः’ इस मूल मन्त्रसे अपने अङ्गोंका स्पर्श अर्थात् हृदयादिन्यास करते हुए पूजन करना चाहिये। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस विधिसे सूर्यकी नित्य अथवा दोनों पक्षोंकी ससमीके दिन पूजन करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १५०)
सौरधर्मका वर्णन
राजा शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यका माहात्म्य कीर्तिवर्धक और सभी पापोंका नाशक है। मैंने भगवान् सूर्यनारायणके समान लोकमें किसी अन्य देवताको नहीं देखा। जो भरण-पोषण और संहार भी करनेवाले हैं वे भगवान् सूर्य किस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उस धर्मको आप अच्छी तरह जानते हैं। मैंने वैष्णव, शैव, पौराणिक आदि धर्मोंका श्रवण किया है। अब मैं सौरधर्मको जानना चाहता हूँ। इसे आप मुझे बतायें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब आप सौरधर्मके विषयमें सुने।
यह सौरधर्म सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ और उत्तम है। किसी समय स्वयं भगवान् सूर्यने अपने सारथि अरुणसे इसे कहा था। सौरधर्म अन्धकाररूपी दोषको दूरकर प्राणियोंको प्रकाशित करता है और यह संसारके लिये महान् कल्याणकारी है। जो व्यक्ति शान्तचित्त होकर सूर्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह सुख और धन-धान्यसे परिपूर्ण हो जाता है। प्रातः, मध्याह्न और सायं—त्रिकाल
अथवा एक ही समय सूर्यकी उपासना अवश्य करनी चाहिये। जो व्यक्ति सूर्यनारायणका भक्तिपूर्वक अर्चन, पूजन और स्मरण करता है, वह सात जन्मोंमें किये गये सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो भगवान् सूर्यकी सदा स्तुति, प्रार्थना और आराधना करते हैं, वे प्राकृत मनुष्य न होकर देवस्वरूप ही हैं। षोडशाङ्ग-पूजन-विधिको स्वयं सूर्यनारायणने कहा है, वह इस प्रकार है—
प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिये। जप, हवन, पूजन, अर्चनादि कर सूर्यको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, गाय, पीपल आदिकी पूजा करनी चाहिये। भक्तिपूर्वक इतिहास-पुराणका श्रवण और ब्राह्मणोंको वेदाभ्यास करना चाहिये। सबसे प्रेम करना चाहिये। स्वयं पूजनकर लोगोंको पुराणादि ग्रन्थोंकी व्याख्या सुनानी चाहिये। मेरा नित्य-प्रति स्मरण करना चाहिये। इस प्रकारके उपचारोंसे जो अर्चन-पूजन-विधि बतायी गयी है, वह सभी प्रकारके लोगोंके लिये उत्तम है। जो कोई इस प्रकारसे भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, वही
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुनि, श्रीमान्, पण्डित और अच्छे कुलमें उत्पन्न है। जो कोई पत्र, पुष्प, फल, जल आदि जो भी उपलब्ध हो उससे मेरी पूजा करता है उसके लिये न मैं अदृश्य हूँ और न वह मेरे लिये अदृश्य है। मुझे जो व्यक्ति जिस भावनासे देखता है, मैं भी उसे उसी रूपमें दिखायी पड़ता हूँ। जहाँ मैं स्थित हूँ, वहीं मेरा भक्त भी स्थित होता है। जो मुझ सर्वव्यापीको सर्वत्र और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित
देखता है, उसके लिये मैं उसके हृदयमें स्थित हूँ और वह मेरे हृदयमें स्थित है। सूर्यकी पूजा करनेवाला व्यक्ति बड़े-बड़े राजाओंपर विजय प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति मनसे मेरा निरन्तर ध्यान करता रहता है, उसकी चिन्ता मुझे बराबर बनी रहती है कि कहीं उसे कोई दुःख न होने पाये। मेरा भक्त मुझको अत्यन्त प्रिय है। मुझमें अनन्य निष्ठा ही सब धर्मोंका सार है। (अध्याय १५१)
ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान् सूर्यकी स्तुति एवं वर-प्राप्ति
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! भगवान् सूर्यकी भक्ति, पूजा और उनके लिये दान करना तथा हवन करना सबके वशकी बात नहीं है तथा उनकी भक्ति और ज्ञान एवं उसका अभ्यास करना भी अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी उनके पूजन-स्मरणसे इसे प्राप्त किया जा सकता है। सूर्य-मन्दिरमें सूर्यकी प्रदक्षिणा करनेसे वे सदा प्रसन्न रहते हैं। सूर्यचक्र बनाकर पूजन एवं सूर्यनारायणका स्तोत्र-पाठ करनेवाला व्यक्ति इच्छित फल एवं पुण्य तथा विषयोंका परित्याग कर भगवान् सूर्यमें अपने मनको लगा देनेवाला मनुष्य निभीक होकर उनकी निश्चल भक्ति प्राप्त कर लेता है।
राजा शतानीकने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! मुझे भगवान् सूर्यकी पूजन-विधि सुननेकी बड़ी ही अभिलाषा है। मैं आपके ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। कृपाकर कहिये कि सूर्यकी प्रतिमा स्थापित करनेसे कौन-सा पुण्य और फल प्राप्त होता है तथा सम्मार्जन करने और गन्ध आदिके लेपनसे किस पुण्यकी प्राप्ति होती है। आरती, नृत्य, मङ्गल-गीत आदि कृत्योंके करनेसे कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है। अर्घ्यदान, जल एवं पञ्चामृत आदिसे स्नान, कुश, रक्त पुष्प, सुवर्ण, रत्न, गन्ध, चन्दन, कपूर आदिके द्वारा पूजन, गन्धादि-विलेपन, पुराण-श्रवण एवं
वाचन, अव्यङ्ग-दान और व्योमरूपमें भगवान् सूर्य तथा अरुणकी पूजा करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! प्रथम आप भगवान् सूर्यके महनीय तेजके विषयमें सुनें। कल्पके प्रारम्भमें ब्रह्मादि देवगण अहंकारके वशीभूत हो गये। तमरूपी मोहने उन्हें अपने वशमें कर लिया। उसी समय उनके अहंकारको दूर करनेके लिये एक महनीय तेज प्रकट हुआ, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त हो गया। अन्धकार-नाशक तथा सौ योजना विस्तारयुक्त वह तेजःपुञ्ज आकाशमें भ्रमण कर रहा था। उसका प्रकाश पृथ्वीपर कमलकी कर्णिकाकी भाँति दिखलायी दे रहा था। यह देख ब्रह्मादि देवगण परस्पर इस प्रकार विचार करने लगे—हम लोगोंका तथा संसारका कल्याण करनेके लिये ही यह तेज प्रादुर्भूत हुआ है। यह तेज कहाँसे प्रादुर्भूत हुआ, इस विषयमें वे कुछ न जान सके और इस तेजने सभी देवगणोंको आश्चर्यचकित कर दिया। तेजाधिपति उन्हें दिखायी भी नहीं पड़े। ब्रह्मादि देवताओंने उनसे पूछा—देव! आप कौन हैं, कहाँ हैं, यह तेजकी कैसी शक्ति है? हम सभी लोग आपका दर्शन करना चाहते हैं। उनकी प्रार्थनासे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यनारायण अपने विराट्-रूपमें प्रकट हो गये।
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उस महनीय तेजःस्वरूप भगवान् भास्करकी देवगण पृथक्-पृथक् वन्दना करने लगे।
ब्रह्माजीकी स्तुतिका भाव इस प्रकार है$^१$— हे देवदेवेश! आप सहस्रों किरणोंसे प्रकाशमान हैं। कोणवल्लभ! आप संसारके लिये दीपक हैं, आपको नमस्कार है। अन्तरिक्षमें स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वको प्रकाशित करनेवाले भगवान् भास्कर, विष्णु, कालचक्र, अमित तेजस्वी, सोम, काल, इन्द्र, वसु, अग्नि, खग, लोकनाथ तथा एकचक्रवाले रथसे युक्त—ऐसे नामोंवाले आपको नमस्कार है। आप अमित तेजस्वी एवं संसारके कल्याण तथा मङ्गलकारक हैं, आपका सुन्दर रूप अन्धकारको नष्ट करनेवाला है, आप तेजकी निधि हैं, आपको नमस्कार है। आप धर्मादि चतुर्वर्गस्वरूप हैं तथा अमित तेजस्वी हैं, क्रोध-लोभसे रहित हैं, संसारकी स्थितिमें कारण हैं, आप शुभ एवं मङ्गलस्वरूप हैं तथा शुभ एवं मङ्गलके प्रदाता हैं, आप परम शान्तस्वरूप हैं तथा ब्राह्मण एवं ब्रह्मरूप हैं, ऐसे हे परब्रह्म परमात्मा जगत्पते! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइये, आपको नमस्कार है।
ब्रह्माजीके बाद शिवजीने महातेजस्वी सूर्यनारायणको प्रणामकर उनकी स्तुति की—
विश्वकी स्थितिके कारण-स्वरूप भगवान् सूर्यदेव! आपकी जय हो। अजेय, हंस, दिवाकर, महाबाहु, भूधर, गोचर, भाव, खग, लोकप्रदीप, जगत्पति, भानु, काल, अनन्त, संवत्सर तथा शुभानन! आपकी जय हो। कश्यपके आनन्दवर्धन, अदितिपुत्र, सप्ताश्ववाहन, सतेश, अन्धकारको दूर करनेवाले, ग्रहोंके स्वामी, कान्तीश, कालेश, शंकर, धर्मादि चतुर्वर्गके स्वामी! आपकी जय हो। वेदाङ्गरूप, ग्रहरूप, सत्यरूप, सुरूप, क्रोधादिके विनाशक, कल्माषपक्षिरूप तथा यतिरूप! आपकी जय हो। प्रभो! आप विश्वरूप, विश्वकर्मा, ओंकार, वषट्कार, स्वाहाकार तथा स्वधारूप हैं और आप ही अश्वमेधरूप, अग्नि एवं अर्यमारूप हैं, संसाररूपी सागरसे मोक्ष दिलानेवाले हे जगत्पते! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ, मुझे अपने हाथका अवलम्बन दीजिये, आपकी जय हो$^२$।
भगवान् विष्णुने सूर्यनारायणको श्रद्धा और
१-नमस्ते देवदेवेश सहस्रकिरणोज्ज्वल। लोकदीप नमस्तेऽस्तु नमस्ते कोणवल्लभ॥
भास्कराय नमो नित्यं खखोल्काय नमो नमः। विष्णवे कालचक्राय सोमायामिततेजसे॥
नमस्ते पञ्चकालाय इन्द्राय वसुरेतसे। खगाय लोकनाथाय एकचक्ररथाय च॥
जगद्धिताय देवाय शिवायामिततेजसे। तमोघ्नाय सुरूपाय तेजसां निधये नमः॥
अर्थाय कामरूपाय धर्मायामिततेजसे। मोक्षाय मोक्षरूपाय सूर्याय च नमो नमः॥
क्रोधलोभविहीनाय लोकानां स्थितिहेतवे। शुभाय शुभ्ररूपाय शुभदाय शुभात्मने॥
शान्ताय शान्तरूपाय शान्तयेऽस्मासु वै नमः। नमस्ते ब्रह्मरूपाय ब्राह्माणाय नमो नमः॥
ब्रह्मदेवाय ब्रह्मरूपाय ब्रह्मणे परमात्मने। ब्रह्मणे च प्रसादं वै कुरु देव जगत्पते॥ (ब्राह्मपर्व १५३।५०-५७)
२-जय भाव जयाजेय जय हंस दिवाकर। जय शम्भो महाबाहो खग गोचर भूधर॥
जय लोकप्रदीपाय जय भानो जगत्पते। जय कालजयानन्त संवत्सर शुभानन॥
जय देवादितेः पुत्र कश्यपानन्दवर्धन। तमोघ्न जय सतेश जय सप्ताश्ववाहन॥
ग्रहेश जय कान्तीश जय कालेश शङ्कर। अर्थकामेश धर्मेश जय मोक्षेश शर्मद॥
जय वेदाङ्गरूपाय ग्रहरूपाय वै नमः। सत्याय सत्यरूपाय सुरूपाय शुभाय च॥
क्रोधलोभविनाशाय कामनाशाय वै जय। कल्माषपक्षिरूपाय यतिरूपाय शम्भवे॥
विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्मार्य वै जय। जयोंकार वषट्कार स्वाहाकार स्वधामय॥
जयाश्वमेधरूपाय चाग्निरूपार्यमाय च। संसारार्णवपीताय मोक्षद्वारप्रदाय च॥
संसारार्णवमग्नस्य मम देव जगत्पते। हस्तावलम्बनो देव भव त्वं गोपतेऽद्धुत॥ (ब्राह्मपर्व १५३।६०-६८)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनकी स्तुति की, भाव इस प्रकार है—
भूतभावन देवदेवेश! आप दिवाकर, रवि, भानु, मार्तण्ड, भास्कर, भग, इन्द्र, विष्णु, हरि, हंस, अर्क—इन रूपोंमें प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है। लोकगुरो! आप विभु, त्रिनेत्रधारी, त्र्यक्षराम्भक, त्र्यङ्गात्मक, त्रिमूर्ति, त्रिगति हैं, आप छः मुख, चौबीस पाद तथा बारह हाथवाले हैं, आप समस्त लोकों तथा प्राणियोंके अधिपति हैं, देवताओं तथा वणोंके भी आप ही अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। जगत्स्वामिन्! आप ही ब्रह्मा, रुद्र, प्रजापति, सोम, आदित्य, ओंकार, बृहस्पति, बुध, शुक्र, अग्नि, भग, वरुण, कश्यपात्मज हैं। आपसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है, देवता, असुर तथा मानव आदि सभी आपसे ही उत्पन्न हैं, अनघ! कल्पके आरम्भमें संसारकी उत्पत्ति, पालन एवं संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उत्पन्न हुए हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप ही वेदरूप, दिवसस्वरूप, यज्ञ एवं ज्ञानरूप हैं। किरणोज्ज्वल! भूतेश! गोपते! संसारमें निमग्न हुए हमपर आप प्रसन्न होइये, आप वेदान्त एवं यज्ञ-कलात्मक रूप हैं, आपकी जय हो, आपको नित्य नमस्कार है *।
ब्रह्मादि देवताओंकी स्तुतिसे भगवान् सूर्य बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु
तथा महादेवको अपनी अखण्ड भक्ति तथा अपना अनुग्रह प्राप्त करनेका वर प्रदान करते हुए कहा— हे विष्णो! आप देव, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व आदि सभीपर विजय प्राप्त कर अजेय रहेंगे। सम्पूर्ण संसारका पालन करते हुए आपकी मेरे ऊपर अचल भक्ति बनी रहेगी। ब्रह्मा भी इस जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ होंगे और मेरे प्रसादसे शंकर भी इस संसारका संहार कर सकेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। मेरी पूजाके फलस्वरूप आपलोग ज्ञानियोंमें उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर लेंगे।
भगवान् सूर्यके इन वचनोंको सुनकर महादेवजी बोले—भगवन्! हमलोग आपकी आराधना किस प्रकार करें, उसे आप बतायें। हमें आपकी परम पूजनीय मूर्ति तो दिखायी नहीं दे रही है, केवल प्रकाशकी आकृति और मात्र तेज ही दिखायी पड़ रहा है, यह तेज आकारविहीन होनेके कारण हृदयमें स्थान नहीं पा रहा है। जबतक मन किसी विषय-वस्तुमें नहीं लगता, तबतक किसी भी व्यक्तिकी भक्ति या इच्छा उस विषय-वस्तुको प्राप्त करनेकी नहीं होती। जबतक भक्ति उत्पन्न नहीं होगी, तबतक पूजन आदि करनेमें कोई भी समर्थ नहीं होगा। इसलिये आप साकाररूपमें प्रकट हों, जिससे कि हमलोग उस साकाररूपका पूजन-अर्चन कर सिद्धिको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जायें।
- नमामि देवदेवेशं भूतभावनमव्ययम् । दिवाकरं रविं भानुं मार्तण्डं भास्करं भगम् ॥ इन्द्रं विष्णुं हरिं हंसमर्कं लोकगुरुं विभुम् । त्रिनेत्रं त्र्यक्षं त्र्यङ्गं त्रिमूर्तिं त्रिगतिं शुभम् ॥ षण्मुखाय नमो नित्यं त्रिनेत्राय नमो नमः । चतुर्विंशतिपादाय नमो द्वादशपाणये ॥ नमस्ते भूतपतये लोकानां पतये नमः । देवानां पतये नित्यं वणानां पतये नमः ॥ त्वं ब्रह्मा त्वं जगन्नाथो रुद्रस्त्वं च प्रजापतिः । त्वं सोमस्त्वं तथादित्यस्त्वमोकारक एव हि ॥ बृहस्पतिर्बुधस्त्वं हि त्वं शुक्रस्त्वं विभावसुः । यमस्त्वं वरुणस्त्वं हि नमस्ते कश्यपात्मज ॥ त्वया तत्तमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । त्वत्त एव समुत्पन्नं सदेवासुरमानुषम् ॥ ब्रह्मा चार्ह च रुद्रश्च समुत्पन्नो जगत्पते । कल्पादी तु पुरा देव स्थितये जगतोऽनघ ॥ नमस्ते वेदरूपाय अहोरूपाय वै नमः । नमस्ते ज्ञानरूपाय यज्ञाय च नमो नमः ॥ प्रसीदास्मासु देवेश भूतेश किरणोज्ज्वल । संसाराण्यवमग्नानां प्रसादं कुरु गोपते । वेदान्ताय नमो नित्यं नमो यज्ञकलाय च ॥
(ब्राह्मपर्व १५३।७१-८०)
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- ब्राह्मपर्व *
१७९
भगवान् सूर्यने कहा—महादेवजी! आपने बड़ी अच्छी बात पूछी है—आप दत्तचित्त होकर सुनें। इस जगत्में मेरी चार प्रकारकी मूर्तियाँ हैं जो सम्पूर्ण संसारको व्यवस्थित करती हुई सृजन, पालन, पोषण तथा संहार आदिमें प्रत्येक समय संलग्न रहती हैं। मेरी प्रथम मूर्ति राजसी मूर्ति है, जो ब्राह्मी शक्तिके नामसे प्रसिद्ध है, वह कल्पके आदिमें संसारकी सृष्टि करती है। द्वितीय सात्त्विकी मूर्ति विष्णुस्वरूपिणी है, जो संसारका पालन और दुष्टोंका विनाश करती है। तृतीय मूर्ति तामसी है, जो भगवान् शंकरके नामसे विख्यात है, वह हाथमें त्रिशूल धारण किये कल्पके अन्तमें विश्व-सृष्टिका संहार करती है। मेरी चतुर्थ मूर्ति सत्त्वादि गुणोंसे अतीत तथा उत्तम है, वह स्थित रहते हुए भी दिखायी नहीं पड़ती। उस अदृश्य शक्तिके द्वारा यह समस्त संसार विस्तारको प्राप्त हुआ है। ओंकार ही मेरा स्वरूप है। यह सकल तथा निष्कल और साकार एवं निराकार दोनों रूपोंमें है। यह सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त रहते हुए भी सांसारिक कर्म-फलोंसे लिस नहीं रहती, जलमें पद्मपत्रकी भाँति अलिस रहती है। यह प्रकाश आपलोगोंके अज्ञानको दूर करने तथा संसारमें प्रकाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है। आपलोग मेरे इस अस्पृष्ट (निलिस) रूपकी आराधना करें।
कल्पके अन्तमें मेरे आकाशरूपमें सभी देवताओंका लय हो जाता है। उस समय केवल आकाशरूप ही रहता है। पुनः मुझसे ही ब्रह्मादि देवगण तथा चराचर उत्पन्न होते हैं। हे त्रिलोचन! मैं सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हूँ। इसलिये
मेरे व्योमरूपकी आराधना आपसहित ब्रह्मा, विष्णु भी करें। त्रिलोचन! आप गन्धमादनपर दिव्य सहस्र वर्षांतक तपस्या करके परम शुभ षडङ्ग-सिद्धिको प्राप्त करें। जनार्दन! आप मेरे व्योमरूपकी श्रद्धा और भक्तिपूर्वक आराधना कलापग्राममें निवास कर करें। जगत्पति ब्रह्मा भी अन्तरिक्षमें जाकर लोकपावन पुष्करतीर्थमें मेरी आराधना करें। इस प्रकार आराधना करनेके पश्चात् कदम्बके समान गोलाकार, रश्ममालासे युक्त मेरी मूर्तिके आपलोग दर्शन करेंगे।
इस प्रकार सूर्यनारायणके वचनको सुनकर भगवान् विष्णुने उन्हें प्रणाम कर कहा—देव! हम सभी लोग उत्तम सिद्धि प्राप्त करनेके लिये आपके परम तेजस्वी व्योमरूपका पूजन-अर्चन कर किस विधिसे आराधना करें। परमपूजित! कृपया आप उस विधिको बतलाकर मुझसहित ब्रह्मा और शिवपर दया कीजिये, जिससे हमलोगोंको परम सिद्धि प्राप्त होनेमें कोई विघ्न-बाधा न पहुँच सके।
भगवान् सूर्य बोले—देवताओंमें श्रेष्ठ वासुदेव! आप शान्तचित्त होकर सुनिये। आपका प्रश्न उचित ही है। मेरे अनुपम व्योमरूपकी आपलोग आराधना करें। मेरी पूजा मध्याह्नकालमें भक्तिपूर्वक सदैव करनेसे इच्छित भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है। भगवान् सूर्यके इस वाक्यको सुनकर ब्रह्मादि देवताओंने प्रणामकर कहा—‘देव! आप धन्य हैं, हमलोगोंको आपने अपने तेजसे प्रकाशित किया है, हमलोग कृतकृत्य हो गये। आपके दर्शनमात्रसे ही सभी लोगोंको ज्ञान प्राप्त हुआ है तथा तम, मोह, तन्त्रा आदि सभी क्षणमात्रमें ही दूर हो गये हैं। हमलोग
१-अन्य पुराणों तथा सांख्य, वेदान्त आदि दर्शनोंके अनुसार आकाशका मनस्तत्त्वमें, मनका अहंतत्त्वमें और अहंका महतत्त्वमें, महतत्त्वका अव्यक्त-तत्त्वमें और अव्यक्तका सत्-तत्त्वमें लय होता है, जो संकल्प-विकल्पमें शून्य होता है और पुनः सृष्टिके समय सत्-तत्त्वमें कलनाके साथ अव्यक्त, महत्, मन, अहंकारके बाद आकाशकी उत्पत्ति होती है।
२-योगवासिष्ठमें सबको व्योमके ही अन्तर्गत स्थित मानकर हृद-व्योम-उपासना (दहर-उपासना)-का निर्देश है और ब्रह्मसूत्रके ‘आकाशस्तल्लिङ्गात्’ इस सूत्रमें आकाश शब्दका अर्थ परमात्मा माना गया है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
आपके ही तेजके प्रभावसे उत्पत्ति, पालन और संहार करते हैं। अब आप व्योमके पूजन-विधिको बतानेकी कृपा करें।'
भगवान् आदित्यने कहा—आपलोग सत्य ही कह रहे हैं, जो मैं हूँ वही आपलोग भी हैं अर्थात् आपलोगोंके स्वरूपमें मैं ही स्थित हूँ। अहंकारी, विमूढ़, असत्य, कलहसे युक्त लोगोंके कल्याणके लिये तथा आपलोगोंके अन्धकार अर्थात् तम-मोहादिकी निवृत्तिके लिये मैंने तेजोमय स्वरूप प्रकट किया, इसलिये अहंकार, मान, दर्प आदिका परित्याग कर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक निरन्तर आपलोग मेरी आराधना करें। इससे मेरे सकल-निष्कल उत्तम स्वरूपका दर्शन प्राप्त होगा और मेरे दर्शनसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जायँगी। इतना कहकर सहस्रकिरण भगवान् सूर्य देवताओंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। भगवान् भास्करके तेजस्वी रूपका दर्शन कर ब्रह्मा, विष्णु और शिव सभी आश्चर्यचकित होकर परस्पर कहने लगे—'ये तो अदिति-पुत्र सूर्यनारायण हैं। ये महातेजस्वी लोकोंको प्रकाशित करनेवाले सूर्यनारायण हैं, इन्होंने हम सभी लोगोंको महान् अन्धकाररूपी तमसे निवृत्त किया है। हम अपने-अपने स्थानपर चलकर इनकी पूजा करें, जिससे इनके प्रसादसे हमें सिद्धि प्राप्त हो सके।'
उस व्योमरूपकी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन करनेके लिये ब्रह्माजी पुष्करक्षेत्रमें, भगवान् विष्णु शालग्राममें और वृषध्वज शंकर गन्धमादन पर्वतपर चले गये। वहाँ मान, दर्प तथा अहंकारका परित्याग कर ब्रह्माजी चार कोणसे युक्त व्योमकी, भगवान् विष्णु चक्रमें अङ्कित व्योमकी और शिव अग्निरूपी तेजसे अभिभूत व्योमवृत्तकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करने लगे। ब्रह्मादि देवता गन्ध, माला, नृत्य, गीत आदिसे दिव्य सहस्र वर्षांतक सूर्यनारायणकी पूजा कर उनकी अचल भक्ति और प्रसन्नता-
प्राप्तिके लिये उत्तम तपस्यामें तत्पर हो गये।
सुमन्तु मुनि बोले—महाराज! देवताओंके पूजनसे प्रसन्न हो वे एक रूपसे ब्रह्माके पास, एक रूपसे शंकरके पास तथा एक रूपसे विष्णुके पास गये एवं अपने चतुर्थ रूपसे रथारूढ़ हो आकाशमें स्थित रहे। भगवान् सूर्यने अपने योगबलसे पृथक्-पृथक् उन्हें दर्शन दिया। दिव्य रथपर आरूढ़ सूर्यदेवने अपने अद्भुत योगबलसे देखा कि चतुर्मुख ब्रह्माजी कमलमुख-व्योमकी पूजामें अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिसे नतमस्तक हैं। यह देखकर ब्रह्माजीसे भगवान् सूर्यदेवने कहा—'सुरश्रेष्ठ! देखो, मैं वर देनेके लिये उपस्थित हूँ।' यह सुनकर ब्रह्माजी हर्षसे प्रफुल्लित हो उठे और हाथ जोड़कर उनके कमलमुखको देखकर अति विनम्रभावसे प्रणाम कर प्रार्थना करने लगे—
'देवेश! आप प्रसन्न हैं तो मेरे ऊपर कृपा कीजिये। देव! आपके अतिरिक्त मेरे लिये अन्य कोई गति नहीं है।'
भगवान् सूर्य बोले—जैसा आप कह रहे हैं, उसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है। आप कारणरूपसे मेरे प्रथम पुत्रके रूपमें उत्पन्न हों। अब आप वर माँगिये, मैं वर देनेके लिये ही आया हूँ।
ब्रह्माजीने कहा—भगवन्! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मुझे उत्तम वर दें, जिससे मैं सृष्टि कर सकूँ।
भगवान् आदित्यने कहा—जगत्पति चतुर्मुख ब्रह्मन्! आपको मेरे प्रसादसे सिद्धि प्राप्त हो जायगी और आप इस जगत्के सृष्टिकर्ता होंगे।
ब्रह्माजीने कहा—जगन्नाथ! मेरा निवास किस स्थानपर होगा।
भगवान् सूर्य बोले—जिस स्थानपर मेरा महद्-व्योम-पृष्ठ शृंगसे युक्त उत्तम रूप रहेगा, वहाँ
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- ब्राह्मपर्व *
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कदम्ब-रूपमें आप नित्य स्थित रहेंगे। पूर्व दिशामें इन्द्र, अग्निकोणमें शाण्डिलीसुत अग्नि, दक्षिणमें यम, नैऋत्यकोणमें निर्ऋति, पश्चिममें वरुण और वायव्यकोणमें वायु तथा उत्तर दिशामें कुबेरका निवास रहेगा। ईशानकोणमें शंकर और आपका तथा मध्यमें विष्णुका निवास रहेगा।
ब्रह्माजीने कहा—देव! आज मैं कृतकृत्य हो गया, जो कुछ भी मुझे चाहिये, वह सब प्राप्त हो गया।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस प्रकार भगवान् आदित्य ब्रह्माजीको वर प्रदानकर उनके साथ गन्धमादन पर्वतपर गये, वहाँ उन्होंने देखा—भूत-भावन शिव तीव्र तपस्यामें संलग्न हैं। वे तेजसे युक्त व्योमका पूजन कर रहे हैं। इस प्रकार शिवद्वारा पूजन-अर्चनको देखकर भगवान् भास्कर प्रसन्न हो गये।
सूर्यभगवान्ने कहा—भीम! मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ। वत्स! वर माँगो! मैं वर देनेके लिये उपस्थित हूँ। इसपर महादेवजीने साष्टाङ्ग प्रणाम कर स्तुति की और कहा—‘देव! आप मुझपर कृपा करें। आप जगत्पति हैं। संसारका उद्धार करनेवाले हैं। मैं आपके अंशसे आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ हूँ, आप वही करें जो एक पिता अपने पुत्रके लिये करता है।’ यह वचन सुनकर भगवान् सूर्य बोले—‘शंकर! जो तुम कह रहे हो, उसमें कोई भी संदेह नहीं है। मेरे ललाटसे तुम पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुए हो। जो तुम्हारे मनमें हो वह वर माँगो।’
महादेवजीने कहा—भगवन्! यदि आप मेरे ऊपर संतुष्ट हैं तो मुझे अपनी अचल भक्ति प्रदान करें, जिससे यक्ष, गन्धर्व, देव, दानव आदिपर मैं विजय प्राप्त कर सकूँ और युगके अन्तमें प्रजाका संहार कर सकूँ। देव! मुझे उत्तम स्थान
प्रदान करें। भगवान् सूर्यने ‘ऐसा ही होगा’ कहकर कहा कि इसी प्रकार तुम मेरे परम व्योमरूपकी पूजा प्रतिदिन करते रहो और यही परम तेजस्वी व्योम तुम्हारा शस्त्र—त्रिशूल होगा।
सुमन्तु मुनि बोले—महाराज! तदनन्तर भगवान् सूर्य भगवान् विष्णुको वर देने शालग्राम (मुक्तिनाथ-क्षेत्र) गये। वहाँ उन्होंने देखा कि वे कृष्णाजिन धारणकर शान्तचित्त हो परम उत्कृष्ट तप कर रहे हैं और हृदयमें भगवान् सूर्यका ध्यान कर रहे हैं। भगवान् भास्करने अति प्रसन्न होकर कहा—‘विष्णो! मैं आ गया हूँ, मुझे देखो।’ भगवान् विष्णुने उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहा—‘जगन्नाथ! आप मेरी रक्षा करें। मेरे ऊपर दया करें। मैं आपका द्वितीय पुत्र हूँ। पिता अपने पुत्रपर जैसी कृपादृष्टि रखता है, उसी प्रकार आप भी मेरे ऊपर दया-दृष्टि बनाये रखें।’
भगवान् सूर्य बोले—महाबाहो! मैं तुम्हारी श्रद्धा-भक्तिसे संतुष्ट हो गया हूँ। जो कुछ भी इच्छा हो, माँग लो। मैं वर प्रदान करनेके लिये ही आया हूँ।
विष्णुभगवान्ने कहा—भगवन्! मैं आज कृतकृत्य हो गया। मेरे समान कोई भी धन्य नहीं है, क्योंकि आप संतुष्ट होकर मुझे स्वयं वर देने आ गये। आप अपनी अचल भक्ति और शत्रुको पराजित करनेकी शक्ति मुझे प्रदान करें तथा जैसे मैं संसारका पालन कर सकूँ ऐसा वर प्रदान करें। मुझे इस प्रकारका स्थान दें जिससे कि मैं सभी लोकोंमें यशस्वी, बल, वीर्य, यश और सुखसे सम्पन्न हो सकूँ।
भगवान् सूर्य बोले—‘तथास्तु’ महाबाहो! तुम ब्रह्माके छोटे और शिवके बड़े भ्राता हो, तुम्हें सभी देवता नमस्कार करेंगे। तुम मेरे परम भक्त और परम प्रिय हो, इसलिये तुम्हारी मुझमें अचल
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भक्ति रहेगी। जिस व्योमरूपका तुमने अर्चन किया है, यह व्योम ही तुम्हारे लिये चक्ररूपमें अस्त्र-शस्त्रका कार्य करेगा। यह सभी आयुधोंमें उत्तम एवं दुर्घोंका विनाशक है। समस्त लोक इसे नमस्कार करते हैं।
सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! इस प्रकार भगवान् भास्कर भगवान् विष्णुको वर प्रदानकर अपने लोकको चले गये और ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरने भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा कर सृष्टि, पालन और संहार करनेकी शक्ति प्राप्त की। यह आख्यान अति पवित्र, पुण्य और सभी प्रकारके पापोंका नाशक है। यह तीन देवोंका उपाख्यान है और
तीन देवता इस लोकमें पूजित हैं। यह तीन स्तोत्रोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ और कामका साधन है। यह धर्म, स्वर्ग, आरोग्य, धन-धान्यको प्रदान करनेवाला है। जो व्यक्ति इस आख्यानको प्रतिदिन सुनता है अथवा जो इन तीन स्तोत्रोंका पाठ करता है, वह आग्नेय विमानपर आरूढ़ होकर भगवान् सूर्यके परमपदको प्राप्त कर लेता है। पुत्रहीन पुत्र, निर्धन धन, विद्यार्थी विद्या प्राप्तकर तेजमें सूर्यके समान, प्रभामें उनके किरणोंके समान हो जाता है और अनन्तकालतक सुख भोगकर ज्ञानियोंमें उत्तम स्थानको प्राप्त करता है।
(अध्याय १५२—१५६)
सौर-धर्म-निरूपणमें सूर्यावतारका कथन
शतानीकने पूछा— ब्रह्मन्! जिन तेजस्वी भगवान् सूर्यनारायणने ब्रह्माजीको वर प्रदान किया, देवताओं और पृथ्वीको उत्पन्न किया, जो ब्रह्मादि देवताओंको प्रकाशित करनेवाले तथा समस्त जगत्के पालक, महाभूतोंसहित चौदह लोकोंके स्रष्टा, पुराणोंमें तेजरूपसे स्थित एवं पुराणोंकी आत्मा हैं तथा अग्निमें स्वयं स्थित हैं, जिनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र तथा सहस्रों चरण हैं, जिनके मुखसे लोकपितामह ब्रह्मा, वक्षःस्थलसे भगवान् विष्णु और ललाटसे साक्षात् भगवान् शिव उत्पन्न हुए हैं, जो विघ्नोंके विनाशक एवं अन्धकारनाशक, लोककी शान्तिके लिये जो अग्नि, वेदि, कुशा, सुवा, प्रोक्षणी, व्रत आदिको उत्पन्न कर इनके द्वारा हव्य-भाग ग्रहण करते हैं, जो युगके अनुरूप कर्मोंके विभाजन तथा क्षण, काल, काष्ठ, मुहूर्त, तिथि, मास, पक्ष, संवत्सर, ऋतु, कालयोग, विविध प्रमाण और आयुके उत्पादक तथा विनाशक हैं एवं परमज्योति और परम तपस्वी हैं, जो अच्युत तथा परमात्माके नामसे जाने जाते हैं, वे ही महर्षि
कश्यपके यहाँ पुत्रके रूपमें कैसे अवतरित हुए?
ब्रह्मादि जिनकी उपासना करते हैं तथा वेद-वेत्ताओंमें जो उत्तम और देवताओंमें प्रभु विष्णु हैं, जो सौम्योंमें सौम्य और अग्निमें तेजःस्वरूप हैं, मनुष्योंमें मनरूपसे तथा तपस्वियोंमें तप-रूपसे विद्यमान हैं, जो विग्रहोंमें विग्रह हैं, जो देवताओं और मनुष्योंसहित समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, वे देवोंके देव भगवान् सूर्य किसलिये अदितिके गर्भसे स्वयं उत्पन्न हुए? ब्रह्मन्! इस विषयमें मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है, भगवान् सूर्यकी उत्पत्तिसे आश्चर्यचकित होकर ही मैंने आपसे उनके आख्यानको पूछा है। महामुने! भगवान् सूर्यके बल-वीर्य, पराक्रम, यश और उज्ज्वलित तेजका आप वर्णन करें।
सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! आपने भगवान् भास्करकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें बहुत ही जटिल प्रश्न पूछा है। मैं अपनी सामर्थ्यके अनुसार कह रहा हूँ। आप उसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सुने।
जो भगवान् सूर्य सहस्रों नेत्रोंवाले, सहस्रों
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- ब्राह्मपर्व *
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किरणोंसे युक्त और सहस्रों सिर तथा सहस्रों हाथवाले हैं, सहस्रों मुकुटोंसे सुशोभित तथा सहस्रों भुजाओंसे युक्त एवं अव्यय हैं, जो सभी लोकोंके कल्याण एवं सभी लोकोंको प्रकाशित करनेके लिये अनेक रूपोंमें अवतरित होते हैं, वही भगवान् सूर्य कश्यपद्वारा अदितिके गर्भसे पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। महाराज! कश्यप और अदितिसे जो-जो पुत्र उत्पन्न होते थे, वे उसी क्षण मर जाते थे। इस पुत्र-विनाशको देखकर पुत्र-शोकसे दुःखी माता अदिति व्याकुल हो अपने पति महर्षि कश्यपके पास गयीं। अदितिने देखा कि महर्षि कश्यप अग्निके समान तेजस्वी, दण्ड धारण किये कृष्ण मृगचर्मपर आसीन तथा वल्लल धारण किये हुए भगवान् भास्करके सदृश देदीप्यमान हो रहे हैं। इस प्रकारसे उन्हें स्थित देखकर अदितिने प्रार्थना करते हुए कहा—‘देव! आप इस तरह निश्चिन्त होकर क्यों बैठे हैं? मेरे पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्युको प्राप्त होते जा रहे हैं। अदितिके इस वचनको सुनकर ऋषियोंमें उत्तम कश्यपजी ब्रह्मलोक गये और उन्होंने अदितिकी बातें ब्रह्माजीको बतलाई।’
ब्रह्माजीने कहा—पुत्र! हमें भगवान् भास्करके परम दुर्लभ स्थानपर चलना चाहिये। यह कहकर ब्रह्मा कश्यप और अदितिके साथ विमानपर आरूढ़ होकर सूर्यदेवके भवनको गये। उस समय सूर्यलोककी सभामें कहीं वेद-ध्वनि हो रही थी, कहीं यज्ञ हो रहा था। ब्राह्मण वेदकी शिक्षा दे रहे थे। अठारह पुराणोंके ज्ञाता, विद्याविशारद, मीमांसक, नैय्यायिक, वेदान्तविद, लोकायतिक आदि सभी सूर्यकी उपासनामें लगे हुए थे। विद्वान् ब्राह्मण जप, तप, हवन आदिमें संलग्न थे। उस सभामें रश्मिमाली भगवान् दिवाकरको महर्षि कश्यप आदिने देखा। देवताओंके गुरु बृहस्पति, असुरोंके गुरु शुक्राचार्य आदि भी वहाँपर भगवान् सूर्यकी उपासना कर रहे थे। दक्ष, प्रचेता, पुलह,
मरीचि, भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, नारद, अन्तरिक्ष, तेज, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रकृति, विकृति, अङ्ग-उपाङ्गोंसहित चारों वेद और लब्ध, ऋतु, संकल्प, प्रणव आदि बहुत-से मूर्तिमान् होकर भगवान् भास्करकी स्तुति-उपासना कर रहे थे। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, द्वेष, हर्ष, मोह, मत्सर, मान, वैष्णव, माहेश्वर, सौर, मारुत, विश्वकर्मा तथा अश्वनीकुमार आदि सुन्दर-सुन्दर वचनोंसे भगवान् सूर्यका गुणगान कर रहे थे।
ब्रह्माजीने भगवान् भास्करसे निवेदन किया—भगवन्! आप देवमाता अदितिके गर्भसे उत्पन्न होकर लोकका कल्याण कीजिये। इस त्रैलोक्यको अपने तेजसे प्रकाशित कीजिये। देवताओंको शरण दीजिये। असुरोंका विनाश एवं अदिति-पुत्रोंको रक्षा कीजिये।
भगवान् सूर्यने कहा—आप जैसा कह रहे हैं, वैसा ही होगा। प्रसन्न होकर महर्षि कश्यप, देवी अदितिके साथ अपने आश्रममें चले आये और ब्रह्माजी भी अपने लोकको चले गये।
सुमन्तु मुनि बोले—महाराज! कालान्तर्गत भगवान् सूर्य अदितिके गर्भसे उत्पन्न हुए, जिससे तीनों लोकोंमें सुख छा गया और दैत्योंका विनाश हो गया, देवताओंकी वृद्धि हुई तथा उनके प्रभावसे सभी लोगोंमें परम आनन्द व्याप्त हो गया।
इस प्रकार देवमाता अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यके जन्म ग्रहण करनेपर आकाशमें दुन्दुभिय बजने लगीं, गन्धर्वगण गान करने लगे। द्वादशान्म भगवान् सूर्यकी सभी देवगण, ऋषि-महर्षि तथा दक्ष प्रजापति आदि स्तुति करने लगे। उस समय एकादश रुद्र, अश्वनीकुमार, आठों वसु, महाबल, गरुड, विश्वेदेव, साध्य, नागराज वासुकि तथा अन्य बहुत-से नाग और राक्षस भी हाथ जोड़े खड़े थे। पितामह ब्रह्मा भी स्वयं पृथ्वीपर आये
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
और सभी देवता एवं ऋषि-महर्षियोंसे बोले—‘देवर्षिगण! जिस प्रकार बालकरूपमें उत्पन्न होकर ये सभीको देख रहे हैं, उसी प्रकार ये लोकेश्वर श्रीमान् और विवस्वान्-रूपमें विख्यात होंगे। देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व आदिके जो कारण हैं वे ही आदिदेव भगवान् आदित्य हैं।’ इस प्रकार कहकर पितामह ब्रह्मणे देवताओं और ऋषियोंसहित उन्हें नमस्कार कर विधिपूर्वक उनकी अर्चना की तत्पश्चात् वे अपने-अपने लोकोंको चले गये।
वेदोंद्वारा गेय तथा इन्द्रादि बारह नामोंसे युक्त भगवान् सूर्यको पुत्ररूपमें प्राप्तकर महर्षि कश्यप
अदितिके साथ परम संतुष्ट हो गये एवं सारा विश्व हर्षसे व्याप्त हो गया तथा सभी राक्षस भयभीत हो गये।
भगवान् सूर्य बोले— महर्षे! आपके पुत्र नष्ट हो जाते थे, इसलिये गर्भकी सिद्धिके लिये मैं आपके यहाँ पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ हूँ।
सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! इस प्रकार भगवान् भास्करकी आराधना करके ब्रह्माजीने सृष्टि करनेका वर प्राप्त किया और कश्यपमुनिने भी भगवान् भास्करको प्रसन्नकर उन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त कर लिया।
(अध्याय १५७ — १५९)
ब्रह्मादि देवताओंद्वारा सूर्यके विराट्-रूपका दर्शन
महाराज शतानीकने कहा— मुने! आपने भगवान् सूर्यके अद्भुत चरित्रका वर्णन किया है, जिनका पूजन ब्रह्मा आदि देवता प्रतिदिन विधिपूर्वक करते रहते हैं तथा जिस ब्रह्मकी ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता आराधना करते रहते हैं, उसे आप बतायें।
सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! एक बार भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी हिमाचलपर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान् शिव सिरपर अर्धचन्द्र धारण किये भगवान् विवस्वान्की पूजा कर रहे हैं। ब्रह्मा और विष्णुको वहाँ आये देखकर शिवजीने उन्हें प्रणाम किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा की तथा उनसे कहा—‘भगवन्! आपलोगोंने भगवान् सूर्यकी आराधना कर उनके किस स्वरूपका दर्शन किया है। मुझे उनके परम रूपको जाननेकी बड़ी ही अभिलाषा है, उसे आप बतायें।’
इसपर वे दोनों बोले—हमलोगोंने भी उस परम अद्भुत रूपको नहीं देखा है। हमें उस परम अद्भुत रूपकी आराधनाके लिये सुवर्णके समान उज्ज्वल पवित्र उदयगिरिपर एक साथ चलना
चाहिये। अनन्तर तीनों देव तीव्र गतिसे पर्वतश्रेष्ठ उदयाचलपर गये और वहाँ भगवान् सूर्यनारायणकी विधिपूर्वक आराधना करने लगे। सहस्रों दिव्य वर्षतक पद्मासन लगाकर ब्रह्माजी निश्चलरूपसे स्थिर हो, ऊपर हाथ करके त्रिलोचन भगवान् शङ्कर और सिर नीचे करके पञ्चाग्निका सेवन करते हुए भगवान् विष्णु सूर्यदेवका दर्शन प्राप्त करनेके लिये कठोर तप करने लगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिवजीके उत्तम तपसे संतुष्ट हो भगवान् सूर्यनारायणने प्रकट होकर उनसे कहा—‘आपलोग क्या चाहते हैं? मैं आपलोगोंसे संतुष्ट हूँ और वर देनेके लिये उपस्थित हुआ हूँ।’
उन्होंने कहा—गोपते! हमलोग आपके दर्शनसे कृतकृत्य हो गये हैं। पहले ही आपकी आराधना करके हमलोगोंने शुभ वरोंको प्राप्त कर लिया है। आपकी दयासे हमलोग उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेमें समर्थ हैं, इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है, किंतु देवदेवेश! हमलोग आपके परम दुर्लभ रूपका दर्शन करना चाहते हैं।
उनके वचनोंको सुनकर लोकपूजित भगवान्
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- ब्राह्मपर्व *
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सूर्यने उन्हें अपना परम दुर्लभ तेजस्वी अद्भुत विराट्-रूप दिखलाया। इनके अनेक सिर तथा अनेक मुख हैं, सभी देव तथा सभी लोक उसमें स्थित हैं। पृथ्वी पैर, स्वर्ग सिर, अग्नि नेत्र, पैरकी अँगुलियाँ पिशाच, हाथकी अँगुलियाँ गुह्यक, विश्वदेव जंघा, यज्ञ कुक्षि, अप्सरागण केश तथा तारागण ही इनके रोमरूपमें हैं। दसों दिशाएँ इनके कान और दिक्पालगण इनकी भुजाएँ हैं। वायु नासिका, प्रसाद ही क्षमा तथा धर्म ही मन है। सत्य इनकी वाणी, देवी सरस्वती जिह्वा, ग्रीवा महादेवी अदिति और तालु वीर्यवान् रुद्र हैं। स्वर्गका द्वार नाभि, वैश्वानर अग्नि मुख, भगवान् ब्रह्मा हृदय और उदर महर्षि कश्यप हैं, पीठ आठों वसु तथा सभी संधियाँ मरुददेव हैं। समस्त छन्द दाँत एवं ज्योतियाँ निर्मल प्रभा हैं। महादेव रुद्र प्राण, कुक्षियाँ समुद्र हैं। इनके उदरमें गन्धर्व और नाग हैं। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति तथा सभी विद्याएँ इनके कटिदेशमें स्थित हैं। इनका ललाट ही परमात्माका परमपद है। दो स्तन, दो कुक्षि और चार वेद ये आठ ही
इनके यज्ञ हैं।
सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! सर्वदेवमय भगवान् सूर्यके इस विराट् रूपको देखकर ब्रह्मा, शिव और भगवान् विष्णु परम विस्मित हो गये। उन्होंने बड़ी श्रद्धासे भगवान् सूर्यको प्रणाम किया।
भगवान् सूर्यने कहा— देवो! आप सबकी कठिन तपस्यासे प्रसन्न होकर आप सबके कल्याणके लिये मैंने योगियोंके द्वारा समाधिगम्य अपने इस विराट्-रूपको दिखलाया है। इसपर वे बोले—भगवन्! आपने जो कहा है, उसमें कोई भी संदेह नहीं है। इस विराट्-रूपका दर्शन पाना योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। आपकी आराधना करने तथा आपका दर्शन करनेपर कुछ अप्राप्य नहीं है। आपके समान इस लोकमें दूसरा कोई देव नहीं है।
राजन्! ब्रह्मादि देवता परम उत्कृष्ट इस रूपका दर्शन कर हर्षित हो गये और उन्होंने भगवान् सूर्यका पूजन-आराधन कर परम सिद्धि प्राप्त की। (अध्याय १६०)
सूर्योपासनाका फल
शतानीकने पूछा— मुने! आपने भगवान् सूर्यके विषयमें जो कहा, वह सत्य ही है, संसारके मूल कारण तथा परम दैवत भगवान् सूर्य ही हैं, सभीको यही तेज प्रदान करते हैं। भगवान् सूर्यनारायणके पूजनसे जो फल प्राप्त होता है, आप उसे बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! जो व्यक्ति सर्वदेवमय भगवान् सूर्यकी प्रतिष्ठा कर पूजन करता है, वह अमरत्व तथा भगवान् सूर्यका सामीप्य प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति भगवान् सूर्यका तिरस्कार कर सभी देवताओंका पूजन करता है, उस व्यक्तिके साथ भाषण करनेवाला व्यक्ति भी
नरकगामी होता है। जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी प्रतिष्ठा कर पूजन-अर्चन करता है, उसे यज्ञ, तप, तीर्थ-यात्रा आदिकी अपेक्षा कोटि गुना अधिक फल प्राप्त होता है तथा उसके मातृकुल, पितृकुल एवं स्त्रीकुल—इन तीनोंका उद्धार हो जाता है और वह इन्द्रलोकमें पूजित होता है तथा वहाँ ज्ञानयोगके आश्रयणसे वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है अथवा जो राज्य चाहता है वह दूसरे जन्ममें सप्तद्वीपवती वसुमतीका राजा होता है। जो व्यक्ति मिट्टीका सर्वदेवमय व्योम बनाकर भगवान् सूर्यका पूजन-अर्चन करता है, वह तीनों लोकोंमें पूजित एवं इस लोकमें धन-
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
धान्यसे परिपूर्ण होकर अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है।
जो व्यक्ति भगवान् सूर्यके पिष्टमय व्योमकी रचना कर गन्ध, धूप, पुष्प, माला, चन्दन, फल आदि उपचारोंसे पूजा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और कोई क्लेश नहीं पाता। वह भगवान् सूर्यके समान प्रतापपूर्ण हो अव्यय पदको प्राप्त करता है। अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यका मन्दिर निर्माण करानेवाला स्वर्णमय विमानपर आरूढ़ होकर भगवान् सूर्यके साथ विहार करता है। यदि साधन-सम्पन्न होनेपर भी श्रद्धा-भक्तिके शून्य होकर मन्दिर आदिका निर्माण करता
है तो उसे कोई फल नहीं होता। इसलिये अपने धनका तीन भाग करना चाहिये, उसमेंसे दो भाग धर्म तथा अर्थोपार्जनमें व्यय करे और एक भागसे जीवन-यापन करे। धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न रहनेपर भी यदि कोई बिना भक्तिके अपना सर्वस्व भगवान् सूर्यके लिये अर्पण कर दे, तब भी वह धर्मका भागी नहीं होता, क्योंकि इसमें भक्तिकी ही प्रधानता है*। मानव संसारमें दुःख और शोकसे व्याकुल होकर तबतक भटकता है, जबतक भगवान् सूर्यकी पूजा नहीं करता। संसारमें आसक्त प्राणियोंको भगवान् सूर्यके अतिरिक्त और कौन ऐसा देवता है जो बन्धनसे छुटकारा दिला सके। (अध्याय १६१-१६२)
विभिन्न पृष्णोंद्वारा सूर्य-पूजनका फल
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अमित तेजस्वी भगवान् सूर्यको स्नान कराते समय 'जय' आदि माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करना चाहिये तथा शङ्खु, भेरी आदिके द्वारा मङ्गल-ध्वनि करनी चाहिये। तीनों संध्याओंमें वैदिक ध्वनियोंसे श्रेष्ठ फल होता है। शङ्खु आदि माङ्गलिक वाद्योंके सहारे नीराजन करना चाहिये। जितने क्षणोंतक भक्त नीराजन करता है, उतने युग सहस्र वर्ष वह दिव्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। भगवान् सूर्यको कपिला गौके पञ्चगव्यसे और मन्त्रपूत कुशयुक्त जलसे स्नान करानेको ब्रह्मस्नान कहते हैं। वर्षमें एक बार भी ब्रह्मस्नान करानेवाला व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
जो पितरोंके उद्देश्यसे शीतल जलसे भगवान् सूर्यको स्नान करता है, उसके पितर नरकोंसे मुक्त होकर स्वर्ग चले जाते हैं। मिट्टीके कलशकी अपेक्षा ताम्र-कलशसे स्नान कराना सौ गुना श्रेष्ठ
होता है। इसी प्रकार चाँदी आदिके कलशद्वारा स्नान करानेसे और अधिक फल प्राप्त होता है। भगवान् सूर्यके दर्शनसे स्पर्श करना श्रेष्ठ है और स्पर्शसे पूजा श्रेष्ठ है तथा घृतस्नान कराना उससे भी श्रेष्ठ है। इस लोक और परलोकमें प्राप्त होनेवाले पापोंके फल भगवान् सूर्यको घृतस्नान करानेसे नष्ट हो जाते हैं एवं पुराण-श्रवणसे सात जन्मोंके पाप दूर हो जाते हैं।
एक सौ पल (लगभग छः किलो बीस ग्राम) प्रमाणसे (जल, पञ्चामृत आदिसे) स्नान कराना 'स्नान' कहलाता है। पचीस पल (लगभग डेढ़ किलो)-से स्नान कराना 'अभ्यङ्ग-स्नान' कहलाता है और दो हजार पल (लगभग एक सौ चौबीस किलो)-से स्नान करानेको 'महास्नान' कहते हैं।
जो मानव भगवान् सूर्यको पुष्प-फलसे युक्त अर्घ्य प्रदान करता है, वह सभी लोकोंमें पूजित होता है और स्वर्गलोकमें आनन्दित होता है। जो
- सर्वस्वमपि यो दद्यादकं भक्तिविर्जितः । न तेन धर्मभागी स्याद्वक्तिकैवात्र कारणम् ॥ (ब्राह्मपर्व १६२।२९)
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- ब्राह्मपर्व *
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अष्टाङ्ग अर्घ—जल, दूध, कुशका अग्रभाग, घी, दही, मधु, लाल कनेरका फूल तथा लाल चन्दन—बनाकर भगवान् सूर्यको निवेदित करता है, वह दस हजार वर्षतक सूर्यलोकमें विहार करता है। यह अष्टाङ्ग अर्घ भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है*।
बाँसके पात्रसे अर्घ—दान करनेसे सौ गुना फल मिट्टीके पात्रसे होता है, मिट्टीके पात्रसे सौ गुना फल ताम्रके पात्रसे होता है और पलाश एवं कमलके पत्तोंसे अर्घ देनेपर ताम्रपात्रका फल प्राप्त होता है। रजतपात्रके द्वारा अर्घ प्रदान करना लाख गुना फल देता है। सुवर्णपात्रके द्वारा दिया गया अर्घ कोटि गुना फल देनेवाला होता है। इसी प्रकार स्नान, अर्घ, नैवेद्य, धूप आदिका क्रमशः विभिन्न पात्रोंकी विशेषतासे उत्तरोत्तर श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है।
धनिक या दरिद्र दोनोंको समान ही फल मिलता है, किंतु जो भगवान् सूर्यके प्रति भक्ति-भावनासे सम्पन्न रहता है, उसे अधिक फल मिलता है। वैभव रहनेपर भी मोहवश जो पूर्व विधि-विधानके साथ पूजन आदि नहीं करता, वह लोभसे आक्रान्त-चित्त होनेके कारण उसका फल नहीं प्राप्त कर पाता। इसलिये मन्त्र, फल, जल तथा चन्दन आदिसे विधिपूर्वक सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। इससे वह अनन्त फलको प्राप्त करता है। इस अनन्त फल-प्राप्तिसमें भक्ति ही मुख्य हेतु है। भक्तिपूर्वक पूजा करनेसे वह सौ दिव्य कोटि वर्ष सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
राजन्! सूर्यको भक्तिपूर्वक तालपत्रका पंखा समर्पित करनेवाला दस हजार वर्षतक सूर्यलोकमें निवास करता है। मयूर-पंखका सुन्दर पंखा सूर्यको
समर्पित करनेवाला सौ कोटि वर्षोंतक सूर्यलोकमें निवास करता है।
नरश्रेष्ठ! हजारों पुष्पोंसे कनेरका पुष्प श्रेष्ठ है, हजारों बिल्वपत्रोंसे एक कमल-पुष्प श्रेष्ठ है। हजारों कमल-पुष्पोंसे एक अगस्त्य-पुष्प श्रेष्ठ है, हजारों अगस्त्य-पुष्पोंसे एक मोंगरा-पुष्प श्रेष्ठ है, सहस्र कुशाओंसे शमीपत्र श्रेष्ठ है तथा हजार शमी-पत्रोंसे नीलकमल श्रेष्ठ है। सभी पुष्पोंमें नीलकमल ही श्रेष्ठ है। लाल कनेरके द्वारा जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह अनन्त कल्पोंतक सूर्यलोकमें सूर्यके समान श्रीमान् तथा पराक्रमी होकर निवास करता है। चमेली, गुलाब, विजय, श्वेत मदार तथा अन्य श्वेत पुष्प भी श्रेष्ठ माने गये हैं। नाग-चम्पक, सदाबहार-पुष्प, मुद्गर (मोंगरा) ये सब समान ही माने गये हैं। गन्धयुक्त किंतु अपवित्र पुष्पोंको देवताओंपर नहीं चढ़ाना चाहिये। गन्धहीन होते हुए भी पवित्र कुशादिकोंको ग्रहण करना चाहिये। पवित्र पुष्प सात्त्विक पुष्प हैं और अपवित्र पुष्प तामसी हैं। रात्रिमें मोंगरा और कदम्बका पुष्प चढ़ाना चाहिये। अन्य सभी पुष्पोंको दिनमें ही समर्पित करना चाहिये। अधखिले पुष्प तथा अपक्व पदार्थ भगवान् सूर्यको नहीं चढ़ाने चाहिये। फलोंके न मिलनेपर पुष्प, पुष्प न मिलनेपर पत्र और इनके अभावमें तृण, गुल्म और औषध भी समर्पित किये जा सकते हैं। इन सबके अभावमें मात्र भक्तिपूर्वक पूजन-आराधनसे भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं। जो माघ मासके कृष्णपक्षमें सुगन्धित मुक्ता-पुष्पोंद्वारा सूर्यकी पूजा करता है, उसे अनन्त फल प्राप्त होता है। संयतचित्त होकर करवीर-पुष्पोंसे पूजा करनेवाला सभी पापोंसे रहित हो सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
- आपः क्षीरं कुशाग्राणि घृतं दधिं तथा मधु । रक्तानि करवीराणि तथा रक्तं च चन्दनम् ॥ अष्टाङ्ग एष अर्घो वै ब्रह्मणा परिकीर्तितः । सततं प्रीतिजननो भास्करस्य नराधिप ॥
(ब्राह्मपर्व १६३।३७-३८)
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| १८८ | * संक्षिप्त भविष्यपुराण * |
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अगस्त्यके पुष्पोंसे जो एक बार भी भक्तिपूर्वक सूर्यकी पूजा करता है, वह दस लाख गोदानका फल प्राप्त करता है और उसे स्वर्ग प्राप्त होता है।
मालती, रक्त कमल, चमेली, पुंनाग, चम्पक, अशोक, श्वेत मन्दार, कचनार, अंधुक, करवीर, कल्हार, शमी, तगर, कनेर, केसर, अगस्त्य, बक तथा कमल-पुष्पोंद्वारा यथाशक्ति भगवान् सूर्यकी पूजा करनेवाला कोटि सूर्यके समान देदीप्यमान विमानसे सूर्यलोकको प्राप्त करता है अथवा पृथ्वी या जलमें उत्पन्न पुष्पोंद्वारा श्रद्धापूर्वक पूजन करनेवाला सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
(अध्याय १६३)
सूर्यषष्ठी-व्रतकी महिमा
सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! अब आप भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय सूर्यषष्ठी-व्रतके विषयमें सुनें। सूर्यषष्ठी-व्रत करनेवालेको जितेन्द्रिय एवं क्रोधरहित होकर अयाचित-व्रतका पालन करते हुए भगवान् सूर्यकी पूजामें तत्पर रहना चाहिये। व्रतीको अल्प और सात्त्विक-भोजी तथा रात्रिभोजी होना चाहिये। स्नान एवं अग्निकार्य करते रहने चाहिये और अधःशायी होना चाहिये। मध्याह्नमें देवताओंद्वारा, पूर्वाह्णमें ऋषियोंद्वारा, अपराह्णमें पितरोंद्वारा और संध्यामें गुह्यकोंद्वारा भोजन किया जाता है। अतः इन सभी कालोंका अतिक्रमण कर सूर्यव्रतीके भोजनका समय रात्रि ही माना गया है। मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीसे यह व्रत आरम्भ करना चाहिये। इस दिन भगवान् सूर्यकी ‘अंशुमान्’ नामसे पूजा करनी चाहिये तथा रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर निराहार हो विश्राम करना चाहिये। ऐसा करनेवाला व्यक्ति अतिरात्र-यज्ञका फल प्राप्त करता है। इसी प्रकार पौषमें भगवान् सूर्यकी ‘सहस्त्रांशु’ नामसे पूजा करे तथा घृतका प्राशन करे, इससे वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है। माघ मासमें कृष्ण पक्षकी षष्ठीको रात्रिमें गोदुग्ध-पान करे। सूर्यकी पूजा ‘दिवाकर’ नामसे करे, इससे महान् फल प्राप्त होता है। फाल्गुन मासमें ‘मार्तण्ड’ नामसे पूजाकर, गोदुग्धका पान करनेसे अनन्त कालतक सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। चैत्र मासमें भास्करकी ‘विवस्वान्’ नामसे भक्तिपूर्वक पूजाकर हविष्य-भोजन करनेवाला सूर्यलोकमें अप्सराओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। वैशाख मासमें ‘चण्डकिरण’ नामसे सूर्यकी पूजा करनेसे दस हजार वर्षोंतक सूर्यलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। इसमें पयोव्रती होकर रहना चाहिये। ज्येष्ठ मासमें भगवान् भास्करकी ‘दिवस्पति’ नामसे पूजा कर गो-शृङ्गका जल-पान करना चाहिये। ऐसा करनेसे कोटि गोदानका फल प्राप्त होता है। आषाढ़ मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीको ‘अर्क’ नामसे सूर्यकी पूजा कर, गोमयका प्राशन करनेसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। श्रावण मासमें ‘अर्यमा’ नामसे सूर्यका पूजन कर दुग्ध-पान करे, ऐसा करनेवाला सूर्यलोकमें दस हजार वर्षोंतक आनन्दपूर्वक रहता है। भाद्रपद मासमें ‘भास्कर’ नामसे सूर्यकी पूजा कर पञ्चगव्य-प्राशन करे, इससे सभी यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीमें ‘भग’ नामसे सूर्यकी पूजा करे, इसमें एक पल गोमूत्रका प्राशन करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। कार्तिक मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीको ‘शक्र’ नामसे सूर्यकी पूजाकर दूर्वाङ्कुरका एक बार भोजन करनेसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त होता है।
वर्षके अन्तमें सूर्य-भक्तिपरायण ब्राह्मणोंको मधुसंयुक्त पायसका भोजन कराये तथा यथाशक्ति स्वर्ण और वस्त्रादि समर्पित करे। भगवान् सूर्यके
- ब्राह्मपर्व *
१८९
लिये काले रंगकी दूध देनेवाली गाय देनी चाहिये। जो इस व्रतका एक वर्षतक निरन्तर विधिपूर्वक सम्पादन करता है, वह सभी पापोंसे विनिर्मुक्त हो जाता है एवं सभी कामनाओंसे पूर्ण होकर शाश्वत कालतक सूर्यलोकमें आनन्दित रहता है।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस कृष्ण-षष्ठी-
व्रतको भगवान् सूर्यने अरुणसे कहा था। यह व्रत सभी पापोंका नाश करनेवाला है। भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा करनेवाला मनुष्य अमित तेजस्वी भगवान् भास्करके अमित स्थानको प्राप्त करता है।
(अध्याय १६४)
उभयससमी-व्रतका वर्णन
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! अब मैं आपको धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इस चतुर्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले भगवान् सूर्यके उत्तम व्रतको बतलाता हूँ। पौष मासके उभयपक्षकी सप्तमियोंको जो शालि (धान) गेहूँके आटेसे बने पक्का तथा दूधका रात्रिमें भोजन करता है और जितेन्द्रिय रहता है, सत्य बोलता है तथा दिनभर उपवास करता है, तीनों संध्याओंमें भगवान् सूर्य तथा अग्निकी उपासना करता है, सभी भोग-पदार्थोंका परित्याग कर भूमिपर शयन करता है, मास बीतनेपर ससमीको घृतादिके द्वारा भगवान् सूर्यको स्नान कराता है तथा उनकी पूजा करता है, नैवेद्यमें मोदक, पका दूध तथा पक्का निवेदित करता है, आठ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और भगवान् को कपिला गाय निवेदित करता है, वह कोटि सूर्योंके समान देदीप्यमान उत्तम विमानमें आरूढ़ होकर भगवान् अंशुमालीके परम स्थानको प्राप्त करता है। कपिला गौके तथा उसकी संततियोंके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने हजार युग वर्षोंतक वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता
है। अपने इक्कीस कुलोंके साथ वह यथेच्छ भोगोंका उपभोग कर अन्तमें ज्ञानयोगका समाश्रयण कर मुक्त हो जाता है।
राजन्! इस प्रकार मैंने आपको इस संसार-समुद्रसे पार उतारनेवाले सौरधर्ममें मोक्ष-क्रमके उपाय बतलाये। यह विद्वानोंके लिये समाश्रयणीय है।
इसी प्रकार अन्य महिनोंमें (माघसे मार्गशीर्षतक) निर्दिष्ट नियमोंका पालन करते हुए व्रत और भगवान् सूर्यकी पूजा करनेसे विभिन्न कामनाओंकी पूर्ति होती है तथा सूर्यलोककी प्राप्ति होती है।
कुरुन्दन! अहिंसा, सत्य-वचन, अस्तेय, शान्ति, क्षमा, ऋजुता, तीनों कालोंमें स्नान तथा हवन, पृथ्वी-शयन, रात्रिभोजन—इनका पालन सभी व्रतोंमें करना चाहिये। इन गुणोंका आश्रयणकर उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले व्यक्तिके सभी पाप और भय नष्ट हो जाते हैं एवं रोगोंका नाश हो जाता है और सभी कामनाओंके अनुरूप फलकी प्राप्ति होती है। इस प्रकारका सूर्यव्रती व्यक्ति अमित तेजस्वी होकर सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय १६५)
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१९०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
निक्षुभार्क-ससमी तथा निक्षुभार्क-चतुष्टय-व्रत-माहात्म्य-वर्णन
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो स्त्री उत्तम पुत्रकी आकाङ्क्षा रखती है, उसे निक्षुभार्क नामका व्रत करना चाहिये। यह व्रत स्त्री एवं पुरुषमें परस्पर प्रीतिवर्धक, अवियोगकारक और धर्म, अर्थ तथा कामका साधक है। इस व्रतको षष्ठी, ससमी, संक्रान्ति या रविवारके दिन करना चाहिये। भगवान् सूर्यके सहित उनकी पत्नी महादेवी निक्षुभाकी द्यौ-रूपमें कांस्य, रजत तथा सुवर्णकी सुन्दर प्रतिमा बनवाये। उसे घृतादिसे स्नान कराकर गन्ध-माल्यादि तथा वस्त्रोंसे अलंकृत करे। अनन्तर प्रतिमा स्थापित किये उस वितान और छत्रसे शोभित पात्रको सिरपर रखकर भगवान् सूर्यके मन्दिरमें ले जाय। उस प्रतिमाको एक वेदीपर स्थापित करे और प्रदक्षिणापूर्वक उसे नमस्कार कर क्षमा-याचना करे एवं उपवास रहकर हविके द्वारा हवन करे। फिर सूर्य-भक्त ब्राह्मणोंको शुक्ल वस्त्र पहनाकर भोजन कराये। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति देदीप्यमान महायानसे सूर्यलोकमें सूर्यभक्तोंके साथ आनन्द प्राप्त करता है, फिर वह अनन्त वर्षोंतक विष्णुलोकमें आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो स्त्री सौभाग्यकी आकाङ्क्षासे संयतेन्द्रिय होकर षष्ठी अथवा ससमीको एक वर्षतक भोजन नहीं करती और वर्षके अन्तमें निक्षुभा तथा सूर्यकी प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक स्नानादि पूर्वोक्त क्रियाएँ करती है, वह पूर्वोक्त फलोंको प्राप्त करती है तथा चारों द्वारोंसे सुशोभित स्वर्णमय यानके द्वारा रमणीय
सूर्यलोकमें जाकर सभी फलोंको प्राप्तकर सौर आदि सभी लोकोंमें अभीप्सित फलका उपभोग कर इस लोकमें जन्म ग्रहण करती है तथा राजाको पतिरूपमें प्राप्त करती है।
इसी प्रकार जो नारी कृष्ण पक्षकी ससमीको उपवास कर वर्षके अन्तमें शालिके चूर्णसे सुन्दर निक्षुभार्ककी प्रतिमाका निर्माण करके पीत रंगकी मालासे और पीत वस्त्रोंसे उनकी पूजा करती है तथा ये सभी कर्म सूर्यको निवेदित करती है, वह हाथी-दाँतके समान कान्तिवाले महायानसे सातों लोकोंमें गमनकर, सौ करोड़ वर्षतक सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होती है। नरश्रेष्ठ! सौर आदि लोकोंमें भोगोंका उपभोगकर क्रमशः इस लोकमें जन्म ग्रहण करती तथा अभीप्सित धन-धान्य-समन्वित मनोऽनुकूल पतिको प्राप्त करती है*।
जो दृढवती नारी माघ मासके कृष्ण पक्षकी ससमीको सभी भोगोंका परित्याग कर एक वर्षतक प्रत्येक ससमीको उपवास करती और वर्षके अन्तमें गन्धादि पदार्थ निक्षुभार्कको निवेदित करती है तथा मगकी स्त्रियोंको भोजन कराती है, वह गन्धर्वसे सुशोभित विचित्र दिव्य महायानद्वारा सूर्यलोकमें जाकर अनेक सहस्र वर्षोंतक निवास करती है। वहाँ यथेष्ट सभी भोगोंका उपभोग कर इस लोकमें आनेपर राजाको पतिरूपमें वरण करती है।
राजन्! जो स्त्री पाप और भयका नाश करनेवाले इस निक्षुभार्क-व्रतको करती है, वह परमपदको प्राप्त करती है। एक वर्षतक परम श्रद्धाके साथ
- चतुर्वर्गचिन्तामणि (हेमाद्रि)-के व्रत-खण्डमें भविष्यपुराणके नामसे निक्षुभार्क-चतुष्टय नामक इस व्रतका संग्रह हुआ है। उपलब्ध भविष्यपुराणमें पाठका कुछ अंश कम है, जिसे हेमाद्रिके आधारपर यहाँ दिया जा रहा है—
जो नारी एक वर्षतक संयतेन्द्रिय होकर ससमीको निराहार व्रत रखती है और जिसकी कणिकाएँ सुवर्णकी हों ऐसे चाँदीके कमलको, पिष्टमय गजका निर्माणकर उसकी पीठपर स्थापित कर वर्षान्तमें उसका दान करती है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। शेष पूजन पूर्वोक्त विधिसे ही करना चाहिये। इससे वह पुरुषरूपसे सभी सौरादि लोकोंमें भ्रमण करते हुए पृथ्वीलोकमें आकर कुलीन तथा रूपसम्पन्न महाबली राजाको पतिरूपमें प्राप्त करती है।
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- ब्राह्मपर्व *
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इस व्रतको सम्पन्न कर वर्षान्तमें भोजक-दम्पतिको भोजन कराये और गन्ध-माल्य, सुन्दर वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करे। ताम्रमय पात्रमें हीरेसे अलंकृत निक्षुभार्ककी सुवर्णमयी प्रतिमा भोजक-दम्पतिको
निवेदित करे। देवी निक्षुभा भोजकी हैं और अर्क भोजक हैं। अतः उन दोनोंकी विधिवत् श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिये।
(अध्याय १६६-१६७)
कामप्रद स्त्री-व्रतका वर्णन
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो स्त्री कार्तिक मासके दोनों पक्षोंकी षष्ठी एवं सप्तमी तिथियोंमें क्षमा, अहिंसा आदि नियमोंका पालन कर, संयतेन्द्रिय होती हुई एकभुक्त रहती एवं उपवास करती है और गुड़-घीसे युक्त शालि-अन्न श्रद्धाके साथ भगवान् सूर्यको अर्पित करती है तथा करवीरके पुष्प और घृतके साथ गुगुल निवेदित करती है, वह स्त्री इन्द्रनीलके समान सार्वकालिक विमानपर बैठकर दस लाख वर्षोंतक सूर्यलोकमें आनन्दमय जीवन व्यतीत करती है। सभी लोकोंके भोगोंको भोगकर क्रमशः इस लोकमें आकर जन्म ग्रहण करती तथा अभीप्सित पतिको प्राप्त करती है। इस प्रकार वर्षभरके सभी व्रतोंकी विधि समान कही गयी है। एक समय
भोजन और उपवासका समान ही फल होता है। क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, सूर्यपूजा, अग्निहवन, संतोष तथा अचौर्यव्रत—ये दस सभी व्रतोंके लिये सामान्य (आवश्यक) धर्म (अङ्ग) हैं।
इसी तरह मार्गशीर्ष आदि मासोंमें निर्दिष्ट नियमोंका पालन करते हुए सूर्यकी पूजा करनेसे अभ्युदयकी प्राप्ति होती है, साथ ही सहस्रों वर्षोंतक सूर्यलोकका सुख भोगकर वह नारी अन्तमें राजपत्नी बनती है।
जो कोई भी पुरुष या स्त्री अथवा नपुंसक भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यकी उपासना करते हैं वे सभी अपने मनोऽनुकूल फल प्राप्त करते हैं।
(अध्याय १६८)
भगवान् सूर्यके निमित्त गृह एवं रथ आदिके दानका माहात्म्य
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अपने वित्तके अनुसार मिट्टी, लकड़ी, पत्थर तथा पके हुए ईंटोंसे जो मठ या गृहका निर्माण कर उसे सभी उपकरणोंसे युक्त करके भगवान् सूर्यके लिये समर्पित करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। माघ मासमें तन्द्रारहित होकर एक-भुक्तव्रत करे और मासके अन्तमें एक रथका निर्माण करे जो विचित्र वस्त्रसे सुशोभित, चार श्वेत अश्वोंसे अलंकृत, श्वेत ध्वज, पताका एवं छत्र, चामर, दर्पणसे युक्त हो। उस रथपर ढाई सेर चावलके चूर्णसे सूर्यकी प्रतिमाका निर्माण
कर उसे संज्ञा देवीके साथ रथके पिछले भागमें (जहाँ रथी बैठता है) स्थापित कर शङ्ख, भेरी आदि ध्वनियोंके साथ रात्रिमें राजमार्गमें उस रथको घुमाकर क्रमशः धीरे-धीरे सूर्य-मन्दिरमें ले जाय। वहाँ जागरण एवं पूजा करे तथा दीपक एवं दर्पण आदिसे अलंकृत कर रात्रि व्यतीत करे। प्रातः मधु, क्षीर और घृतसे उस प्रतिमाको स्नान कराकर दीन, अन्ध एवं अनाथोंको अपनी शक्तिके अनुसार भोजन कराकर दक्षिणा दे और संवाहनसे युक्त रथ भगवान् भास्करको निवेदित करे तथा अपने बन्धुओंके साथ भोजन करे।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मन्त्र और धर्मसे समन्वित अपने सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ यह सूर्यरथ-व्रत समस्त कामनाओं तथा अर्थकी सिद्धि करनेवाला है। सभी व्रतोंके पुण्य और सभी यज्ञोंके फल इसी व्रतके करनेसे प्राप्त हो
जाते हैं। जो भगवान् सूर्यके निमित्त एक सवत्सा गौ दान करता है, वह सप्तद्वीपवती वसुन्धराके दानका फल प्राप्त करता है।
(अध्याय १६१-१७०)
सौर-धर्ममें सदाचरणका वर्णन
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब मैं सौरधर्मसे सम्बद्ध सदाचारोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। सूर्य-उपासकको भूखे-प्यासे, दीन-दुःखी, थके हुए, मलिन तथा रोगी व्यक्तिका अपनी शक्तिके अनुसार पालन और रक्षण करना चाहिये, इससे सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। पतित, नीच तथा चाण्डाल और पक्षी आदि सभी प्राणियोंको अपनी शक्तिके अनुसार दी गयी थोड़ी भी वस्तु करुणाके कारण दिये जानेसे अक्षय-फल प्रदान करती है, अतः सभी प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। जो मधुर वाणी बोलता है, उसे इस लोक तथा परलोकमें सभी सुख प्राप्त होते हैं। अमृत प्रवाहित करनेवाली प्रिय वाणी चन्दनके स्पर्शके समान शीतल होती है। धर्मसे युक्त वाणी बोलनेवालेको अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है। प्रिय वाणी स्वर्गका अचल सोपान है, इसकी तुलनामें दान, पूजन, अध्यापन आदि सब व्यर्थ हैं। अतिथिके आनेपर सादर उससे कुशल-प्रश्न करना चाहिये और यात्राके समय 'आपका मार्ग मङ्गलमय हो, आपको सभी कार्यके साधक सुख नित्य प्राप्त हों'—ऐसा कहना चाहिये। सभी समय ऐसे आशीर्वादात्मक वचन बोलने चाहिये। नमस्कारात्मक वाक्यमें 'स्वस्ति', मङ्गल-वचन
तथा सभी कर्मोंमें 'आपका नित्य कल्याण हो', ऐसा कहना चाहिये। इस प्रकारके आचरणोंका अनुष्ठान करके व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मनुष्योंको जैसी भक्ति भगवान् सूर्यमें हो वैसी ही भक्ति सूर्यभक्तोंके प्रति भी रखनी चाहिये। किसीके द्वारा आक्रोश करने या ताड़ित होनेपर जो न आक्रोश करता है, न ताड़न करता है, वाणीमें अधिकार होनेके कारण ऐसा क्षमाशील एवं शान्त व्यक्ति सदा दुःखसे रहित होता है। सभी तीर्थोंमें क्षमा सबसे श्रेष्ठ है, इसलिये सभी क्रियाओंमें क्षमा धारण करना चाहिये। ज्ञान, योग, तप एवं यज्ञ-दानादि सत्क्रियाएँ क्रोधी व्यक्तिके लिये व्यर्थ हो जाती हैं, इसलिये क्रोधका परित्याग कर देना चाहिये। अप्रिय वाणी मर्म, अस्थि, प्राण तथा हृदयको जलानेवाली होती है, इसलिये अप्रिय वाणीका कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्षमा, दान, तेजस्विता, सत्य, शम, अहिंसा—ये सब भगवान् सूर्यकी कृपासे ही प्राप्त होते हैं।
सुमन्तु मुनि पुनः बोले—महाराज! अब आप आदित्यसम्मत सौर-धर्मको पुनः सुनें। यह सौर-धर्म पापनाशक, भगवान् सूर्यको प्रिय तथा परम पवित्र है। यदि मार्गमें कहीं रविकी पूजा-अर्चा
१-न हीदृक् स्वर्ग्यानाय यथा लोके प्रियं वचः । इहामुत्र सुखं तेषां वाग्येषां मधुरा भवेत् ॥
अमृतस्वन्दिनीं वाचं चन्दनस्पर्शशीतलाम् । धर्माविरोधिनीमुक्त्वा सुखमक्षय्यमायुयात् ॥ (ब्राह्मपर्व १७१ । ३८-३९)
२-सर्वेषामेव तीर्थानां क्षान्तिः परमपूजिता । तस्मात्पूर्वं प्रयनेन क्षान्तिः कार्या क्रियासु वै ॥
ज्ञानयोगतपो यस्य यज्ञदानानि सत्क्रिया । क्रोधनस्य वृथा यस्मात् तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत् ॥ (ब्राह्मपर्व १७१ । ४७-४८)
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- ब्राह्मपर्व *
११३
होती देखे तो यह समझना चाहिये कि वहाँ भगवान् सूर्यदेव स्वयं प्रत्यक्ष उपस्थित हैं। भगवान् सूर्यका मन्दिर देखकर वहाँ भगवान् सूर्यको नमस्कार करके ही वहाँसे आगे जाना चाहिये। देव-पर्व, उत्सव, ब्राह्म तथा पुण्य दिनोंमें विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। देवगण तथा पितृगण सूर्यका आश्रयण करके ही स्थित हैं। भगवान् सूर्यके प्रसन्न होनेपर निःसंदेह सभी प्रसन्न हो जाते हैं। सौर-धर्मके अनुष्ठानसे ज्ञान प्राप्त होता है तथा उससे वैराग्य। ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न व्यक्तिकी सूर्ययोगमें प्रवृत्ति होती है। सूर्यके योगसे वह सर्वज्ञ एवं परिपूर्ण हो जाता है तथा अपनी आत्मामें अवस्थित होकर सूर्यके समान स्वर्गमें आनन्द-लाभ करता है।
ब्रह्मचर्य, तप, मौन, क्षमा तथा अल्पाहार—ये तपस्वियोंके पाँच विशिष्ट गुण हैं। भाग्य या अन्य विशिष्ट मार्गसे तथा न्यायपूर्वक प्राप्त धन गुणवान् व्यक्तिको देना ही दान है। हजारों सस्य-राशियोंको उत्पन्न करनेवाली जल-युक्त उर्वरा भूमिका दान भूमिदान कहा जाता है। सभी दोषोंसे रहित, कुलीन अलंकृता कन्या निर्धन
विद्वान् द्विजको देना कन्यादान कहा जाता है। मध्यम या उत्तम नवीन वस्त्रका दान वस्त्रदान कहा जाता है। एक मासमें दो सौ चालीस ग्रासोंका१ भक्षण करना चान्द्रायण२-व्रत कहलाता है। सभी शास्त्रोंके ज्ञाता तथा तपस्यापरायण जितेन्द्रिय ऋषियों एवं देवोंसे सेवित जल-स्थान तीर्थ कहा जाता है। सूर्यसम्बन्धी स्थानोंको पुण्य-क्षेत्र कहा जाता है। उन सूर्यसम्बन्धी क्षेत्रोंमें मरनेवाला व्यक्ति सूर्य-सायुज्यको प्राप्त करता है। तीर्थोंमें दान-देनेसे, उद्यान लगाने एवं देवालय, धर्मशाला आदि बनवानेसे अक्षय फल प्राप्त होता है। क्षमा एवं निःस्पृहता, दया, सत्य, दान, शील, तप तथा अध्ययन—इन आठ अङ्गोंसे युक्त व्यक्ति श्रेष्ठ पात्र कहा जाता है। भगवान् सूर्यमें भक्ति, क्षमा, सत्य, दसों इन्द्रियोंका विनिग्रह तथा सभीके प्रति मैत्रीभाव रखना सौर-धर्म है।
जो भक्तिपूर्वक भविष्यपुराण लिखवाता है, वह सौ कोटि युग वर्षांतक सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो सूर्यमन्दिरका निर्माण करवाता है, उसे उत्तम स्थानकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १७१-१७२)
सौर-धर्मकी महिमाका वर्णन, ब्रह्माकृत सूर्य-स्तुति
राजा शतानीकने कहा—ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप सौर-धर्मका पुनः विस्तारसे वर्णन कीजिये।
सुमन्तु मुनि बोले—महाबाहो! तुम धन्य हो, इस लोकमें सौर-धर्मका प्रेमी तुम्हारे समान अन्य कोई भी राजा नहीं है। इस सम्बन्धमें मैं आपको
प्राचीन कालमें गरुड एवं अरुणके बीच हुए संवादको पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप इसे ध्यानपूर्वक सुनें।
अरुणने कहा—खगश्रेष्ठ! यह सौर-धर्म अज्ञान-सागरमें निमग्न समस्त प्राणियोंका उद्धार करनेवाला
१-शुक्ल पक्षमें प्रतिदिन एक-एक ग्रासकी वृद्धि तथा कृष्ण पक्षमें एक-एक ग्रासकी न्यूनताके नियमका पालन करनेसे दो सौ चालीस ग्रास एक मासमें होते हैं।
२-चान्द्रायणके मुख्य तीन भेद हैं—यव-मध्य, पिपीलिका-मध्य और शिशु-चान्द्रायण। यव-मध्यमें शुक्ल पक्षकी प्रतिपदासे आरम्भ कर पूर्णिमाको पंद्रह ग्राससे लेकर क्रमशः घटाते हुए अमावास्याको समाप्त कर दिया जाता है। पिपीलिकामें पूर्णिमाको प्रारम्भ कर कृष्ण पक्षमें क्रमशः एक-एक ग्रास घटाते हुए अमावास्याको उपवास कर फिर पूर्णिमाको पूरा किया जाता है और शिशु या सामान्य चान्द्रायणमें प्रतिदिन आठ ग्रास लिया जाता है। इस प्रकार तीस दिनोंमें दो सौ चालीस ग्रास हो जाता है।
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१९४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हैं। पक्षिराज! जो लोग भक्तिभावसे भगवान् सूर्यका स्मरण-कीर्तन और भजन करते हैं, वे परमपदको प्राप्त होते हैं। खगाधिप! जिसने इस लोकमें जन्म ग्रहणकर इन देवेश भगवान् भास्करकी उपासना नहीं की, वह संसारके क्लेशोंमें ही निमग्न रहता है। मनुष्य-जीवन परम दुर्लभ है, इसे प्राप्त कर जिसने भगवान् सूर्यका पूजन किया, उसीका जन्म लेना सफल है। जो श्रद्धा-भक्तिसे भगवान् सूर्यका स्मरण करता है, वह कभी किसी प्रकारके दुःखका भागी नहीं होता।
जिन्हें महान् भोगोंके सुख-प्राप्तिकी कामना है तथा जो राज्यासन पाना चाहते हैं अथवा स्वर्गीय सौभाग्य-प्राप्तिके इच्छुक हैं एवं जिन्हें अतुल कान्ति, भोग, त्याग, यश, श्री, सौन्दर्य, जगत्की ख्याति, कीर्ति और धर्म आदिकी अभिलाषा है, उन्हें सूर्यकी भक्ति करनी चाहिये।
जो परम श्रद्धा-भावसे भगवान् सूर्यकी आराधना करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। विविध आकारवाली डाकिनियाँ, पिशाच और राक्षस अथवा कोई भी उसे कुछ भी पीड़ा नहीं दे सकते। इसके अतिरिक्त कोई भी जीव उसे नहीं सता सकते। सूर्यकी उपासना करनेवाले मनुष्यके शत्रुगण नष्ट हो जाते हैं और उन्हें संग्राममें विजय प्राप्त होती है। वीर! वह नीरोग होता है। आपतियाँ उसका स्पर्शतक नहीं कर पातीं। सूर्योपासक मनुष्यकी धन, आयु, यश, विद्या और सभी प्रकारके कल्याण-मङ्गलकी अभिवृद्धि होती रहती है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
ब्रह्माजीने भगवान् सूर्यकी आराधना कर ब्राह्म-पदकी प्राप्ति की थी। देवोंके ईश भगवान् विष्णुने विष्णुत्व-पदको सूर्यके अर्चनसे ही प्राप्त किया है। भगवान् शंकर भी भगवान् सूर्यकी आराधनासे ही जगन्नाथ कहे जाते हैं तथा उनके प्रसादसे ही
उन्हें महादेवत्व-पद प्राप्त हुआ है एवं उनकी ही आराधनासे एक सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्रने भी इन्द्रत्वको प्राप्त किया है। मातुवर्ग, देवगण, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस और सभी सुरोंके नायक भगवान् सूर्यकी सदा पूजा किया करते हैं। यह समस्त जगत् भगवान् सूर्यमें ही नित्य प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यकी पूजा नहीं करता, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अधिकारी नहीं है। पक्षिश्रेष्ठ! आपत्तिग्रस्त होनेपर भी भगवान् सूर्यकी पूजा सदा करणीय है। जो मनुष्य भगवान् सूर्यकी पूजा नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ है। प्रत्येक व्यक्तिको देवाधिदेव भगवान् सूर्यकी पूजा-उपासना करके ही भोजन करना चाहिये। जो सूर्यभक्त हैं, वे समस्त द्वन्द्वोंके सहन करनेवाले, वीर, नीति-विधि-युक्तचित्त, परोपकारपरायण तथा गुरुकी सेवामें अनुरक्त रहते हैं। वे अमानी, बुद्धिमान्, असक्त, अस्पर्धावाले, निःस्पृह, शान्त, स्वात्मानन्द, भद्र और नित्य स्वागतवादी होते हैं। सूर्यभक्त अल्पभाषी, शूर, शास्त्रमर्मज्ञ, प्रसन्नमनस्क, शौचाचारसम्पन्न और दार्क्षिण्ययुक्त होते हैं।
सूर्यके भक्त दम्भ, मत्सरता, तृष्णा एवं लोभसे वर्जित हुआ करते हैं। वे शठ और कुत्सित नहीं होते। जिस प्रकार कमलका पत्र जलसे निलिस रहता है, उसी प्रकार सूर्यभक्त मनुष्य विषयोंमें कभी लिस नहीं होते। जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं होती, तबतक भगवान् सूर्यकी आराधना सम्पन्न कर लेनी चाहिये; क्योंकि मानव असमर्थ होनेपर इसे नहीं कर सकता और यह मानव-जीवन यों ही व्यर्थ चला जाता है। भगवान् सूर्यकी पूजाके समान इस जगत्में अन्य कोई भी धर्मका कार्य नहीं है। अतः देवदेवेश भगवान् सूर्यका पूजन करे। जो मानव भक्तिपूर्वक शान्त, अज, प्रभु, देवदेवेश सूर्यकी पूजा किया करते हैं,
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