भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनकी स्तुति की, भाव इस प्रकार है—
भूतभावन देवदेवेश! आप दिवाकर, रवि, भानु, मार्तण्ड, भास्कर, भग, इन्द्र, विष्णु, हरि, हंस, अर्क—इन रूपोंमें प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है। लोकगुरो! आप विभु, त्रिनेत्रधारी, त्र्यक्षराम्भक, त्र्यङ्गात्मक, त्रिमूर्ति, त्रिगति हैं, आप छः मुख, चौबीस पाद तथा बारह हाथवाले हैं, आप समस्त लोकों तथा प्राणियोंके अधिपति हैं, देवताओं तथा वणोंके भी आप ही अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। जगत्स्वामिन्! आप ही ब्रह्मा, रुद्र, प्रजापति, सोम, आदित्य, ओंकार, बृहस्पति, बुध, शुक्र, अग्नि, भग, वरुण, कश्यपात्मज हैं। आपसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है, देवता, असुर तथा मानव आदि सभी आपसे ही उत्पन्न हैं, अनघ! कल्पके आरम्भमें संसारकी उत्पत्ति, पालन एवं संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उत्पन्न हुए हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप ही वेदरूप, दिवसस्वरूप, यज्ञ एवं ज्ञानरूप हैं। किरणोज्ज्वल! भूतेश! गोपते! संसारमें निमग्न हुए हमपर आप प्रसन्न होइये, आप वेदान्त एवं यज्ञ-कलात्मक रूप हैं, आपकी जय हो, आपको नित्य नमस्कार है *।
ब्रह्मादि देवताओंकी स्तुतिसे भगवान् सूर्य बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु
तथा महादेवको अपनी अखण्ड भक्ति तथा अपना अनुग्रह प्राप्त करनेका वर प्रदान करते हुए कहा— हे विष्णो! आप देव, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व आदि सभीपर विजय प्राप्त कर अजेय रहेंगे। सम्पूर्ण संसारका पालन करते हुए आपकी मेरे ऊपर अचल भक्ति बनी रहेगी। ब्रह्मा भी इस जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ होंगे और मेरे प्रसादसे शंकर भी इस संसारका संहार कर सकेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। मेरी पूजाके फलस्वरूप आपलोग ज्ञानियोंमें उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर लेंगे।
भगवान् सूर्यके इन वचनोंको सुनकर महादेवजी बोले—भगवन्! हमलोग आपकी आराधना किस प्रकार करें, उसे आप बतायें। हमें आपकी परम पूजनीय मूर्ति तो दिखायी नहीं दे रही है, केवल प्रकाशकी आकृति और मात्र तेज ही दिखायी पड़ रहा है, यह तेज आकारविहीन होनेके कारण हृदयमें स्थान नहीं पा रहा है। जबतक मन किसी विषय-वस्तुमें नहीं लगता, तबतक किसी भी व्यक्तिकी भक्ति या इच्छा उस विषय-वस्तुको प्राप्त करनेकी नहीं होती। जबतक भक्ति उत्पन्न नहीं होगी, तबतक पूजन आदि करनेमें कोई भी समर्थ नहीं होगा। इसलिये आप साकाररूपमें प्रकट हों, जिससे कि हमलोग उस साकाररूपका पूजन-अर्चन कर सिद्धिको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जायें।
- नमामि देवदेवेशं भूतभावनमव्ययम् । दिवाकरं रविं भानुं मार्तण्डं भास्करं भगम् ॥ इन्द्रं विष्णुं हरिं हंसमर्कं लोकगुरुं विभुम् । त्रिनेत्रं त्र्यक्षं त्र्यङ्गं त्रिमूर्तिं त्रिगतिं शुभम् ॥ षण्मुखाय नमो नित्यं त्रिनेत्राय नमो नमः । चतुर्विंशतिपादाय नमो द्वादशपाणये ॥ नमस्ते भूतपतये लोकानां पतये नमः । देवानां पतये नित्यं वणानां पतये नमः ॥ त्वं ब्रह्मा त्वं जगन्नाथो रुद्रस्त्वं च प्रजापतिः । त्वं सोमस्त्वं तथादित्यस्त्वमोकारक एव हि ॥ बृहस्पतिर्बुधस्त्वं हि त्वं शुक्रस्त्वं विभावसुः । यमस्त्वं वरुणस्त्वं हि नमस्ते कश्यपात्मज ॥ त्वया तत्तमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । त्वत्त एव समुत्पन्नं सदेवासुरमानुषम् ॥ ब्रह्मा चार्ह च रुद्रश्च समुत्पन्नो जगत्पते । कल्पादी तु पुरा देव स्थितये जगतोऽनघ ॥ नमस्ते वेदरूपाय अहोरूपाय वै नमः । नमस्ते ज्ञानरूपाय यज्ञाय च नमो नमः ॥ प्रसीदास्मासु देवेश भूतेश किरणोज्ज्वल । संसाराण्यवमग्नानां प्रसादं कुरु गोपते । वेदान्ताय नमो नित्यं नमो यज्ञकलाय च ॥
(ब्राह्मपर्व १५३।७१-८०)
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