भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 188
* ब्राह्मपर्व *१७७

उस महनीय तेजःस्वरूप भगवान् भास्करकी देवगण पृथक्-पृथक् वन्दना करने लगे।

ब्रह्माजीकी स्तुतिका भाव इस प्रकार है$^१$— हे देवदेवेश! आप सहस्रों किरणोंसे प्रकाशमान हैं। कोणवल्लभ! आप संसारके लिये दीपक हैं, आपको नमस्कार है। अन्तरिक्षमें स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वको प्रकाशित करनेवाले भगवान् भास्कर, विष्णु, कालचक्र, अमित तेजस्वी, सोम, काल, इन्द्र, वसु, अग्नि, खग, लोकनाथ तथा एकचक्रवाले रथसे युक्त—ऐसे नामोंवाले आपको नमस्कार है। आप अमित तेजस्वी एवं संसारके कल्याण तथा मङ्गलकारक हैं, आपका सुन्दर रूप अन्धकारको नष्ट करनेवाला है, आप तेजकी निधि हैं, आपको नमस्कार है। आप धर्मादि चतुर्वर्गस्वरूप हैं तथा अमित तेजस्वी हैं, क्रोध-लोभसे रहित हैं, संसारकी स्थितिमें कारण हैं, आप शुभ एवं मङ्गलस्वरूप हैं तथा शुभ एवं मङ्गलके प्रदाता हैं, आप परम शान्तस्वरूप हैं तथा ब्राह्मण एवं ब्रह्मरूप हैं, ऐसे हे परब्रह्म परमात्मा जगत्पते! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइये, आपको नमस्कार है।

ब्रह्माजीके बाद शिवजीने महातेजस्वी सूर्यनारायणको प्रणामकर उनकी स्तुति की—

विश्वकी स्थितिके कारण-स्वरूप भगवान् सूर्यदेव! आपकी जय हो। अजेय, हंस, दिवाकर, महाबाहु, भूधर, गोचर, भाव, खग, लोकप्रदीप, जगत्पति, भानु, काल, अनन्त, संवत्सर तथा शुभानन! आपकी जय हो। कश्यपके आनन्दवर्धन, अदितिपुत्र, सप्ताश्ववाहन, सतेश, अन्धकारको दूर करनेवाले, ग्रहोंके स्वामी, कान्तीश, कालेश, शंकर, धर्मादि चतुर्वर्गके स्वामी! आपकी जय हो। वेदाङ्गरूप, ग्रहरूप, सत्यरूप, सुरूप, क्रोधादिके विनाशक, कल्माषपक्षिरूप तथा यतिरूप! आपकी जय हो। प्रभो! आप विश्वरूप, विश्वकर्मा, ओंकार, वषट्कार, स्वाहाकार तथा स्वधारूप हैं और आप ही अश्वमेधरूप, अग्नि एवं अर्यमारूप हैं, संसाररूपी सागरसे मोक्ष दिलानेवाले हे जगत्पते! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ, मुझे अपने हाथका अवलम्बन दीजिये, आपकी जय हो$^२$।

भगवान् विष्णुने सूर्यनारायणको श्रद्धा और


१-नमस्ते देवदेवेश सहस्रकिरणोज्ज्वल। लोकदीप नमस्तेऽस्तु नमस्ते कोणवल्लभ॥
भास्कराय नमो नित्यं खखोल्काय नमो नमः। विष्णवे कालचक्राय सोमायामिततेजसे॥
नमस्ते पञ्चकालाय इन्द्राय वसुरेतसे। खगाय लोकनाथाय एकचक्ररथाय च॥
जगद्धिताय देवाय शिवायामिततेजसे। तमोघ्नाय सुरूपाय तेजसां निधये नमः॥
अर्थाय कामरूपाय धर्मायामिततेजसे। मोक्षाय मोक्षरूपाय सूर्याय च नमो नमः॥
क्रोधलोभविहीनाय लोकानां स्थितिहेतवे। शुभाय शुभ्ररूपाय शुभदाय शुभात्मने॥
शान्ताय शान्तरूपाय शान्तयेऽस्मासु वै नमः। नमस्ते ब्रह्मरूपाय ब्राह्माणाय नमो नमः॥
ब्रह्मदेवाय ब्रह्मरूपाय ब्रह्मणे परमात्मने। ब्रह्मणे च प्रसादं वै कुरु देव जगत्पते॥ (ब्राह्मपर्व १५३।५०-५७)

२-जय भाव जयाजेय जय हंस दिवाकर। जय शम्भो महाबाहो खग गोचर भूधर॥
जय लोकप्रदीपाय जय भानो जगत्पते। जय कालजयानन्त संवत्सर शुभानन॥
जय देवादितेः पुत्र कश्यपानन्दवर्धन। तमोघ्न जय सतेश जय सप्ताश्ववाहन॥
ग्रहेश जय कान्तीश जय कालेश शङ्कर। अर्थकामेश धर्मेश जय मोक्षेश शर्मद॥
जय वेदाङ्गरूपाय ग्रहरूपाय वै नमः। सत्याय सत्यरूपाय सुरूपाय शुभाय च॥
क्रोधलोभविनाशाय कामनाशाय वै जय। कल्माषपक्षिरूपाय यतिरूपाय शम्भवे॥
विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्मार्य वै जय। जयोंकार वषट्कार स्वाहाकार स्वधामय॥
जयाश्वमेधरूपाय चाग्निरूपार्यमाय च। संसारार्णवपीताय मोक्षद्वारप्रदाय च॥
संसारार्णवमग्नस्य मम देव जगत्पते। हस्तावलम्बनो देव भव त्वं गोपतेऽद्धुत॥ (ब्राह्मपर्व १५३।६०-६८)