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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

* ब्राह्मपर्व * १९५

वे इस लोकमें सुख प्राप्त करके परम पदको प्राप्त हो जाते हैं। सर्वप्रथम ब्रह्माजीने अपने परम प्रहृष्ट अन्तरात्मासे भगवान् सूर्यकी पूजा कर अञ्जलि बाँधकर जो स्तोत्र* कहा था, उसका भाव इस प्रकार है—

‘षडैश्वर्यसम्पन्न, शान्त-चित्तसे युक्त, देवोंके मार्ग-प्रणेता एवं सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान् सूर्यको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जो देवदेवेश शाश्वत, शोभन, शुद्ध, दिवस्पति, चित्रभानु, दिवाकर और ईशोंके भी ईश हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। समस्त दुःखोंके हर्ता, प्रसन्नवदन, उत्तमाङ्ग, वरके स्थान, वर-प्रदाता, वरद तथा वरेण्य भगवान् विभावसुको मैं प्रणाम करता हूँ। अर्क, अर्यमा, इन्द्र, विष्णु, ईश, दिवाकर, देवेश्वर, देवरत और विभावसु नामधारी भगवान् सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ।’ इस स्तुतिका जो नित्य श्रवण करता है, वह परम कीर्तिको प्राप्तकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १७३-१७४)


सौर-धर्ममें शान्तिक कर्म एवं अभिषेक-विधि

गरुडजीने पूछा— अरुण! जो आधि-व्याधिसे पीड़ित एवं रोगी, दुष्ट ग्रह तथा शत्रु आदिसे उत्पीड़ित और विनायकसे गृहीत हैं, उन्हें अपने कल्याणके लिये क्या करना चाहिये? आप इसे बतलानेकी कृपा करें।

अरुणजी बोले— विविध रोगोंसे पीड़ित, शत्रुओंसे संतप्त व्यक्तियोंके लिये भगवान् सूर्यकी आराधनाके अतिरिक्त अन्य कोई भी कल्याणकारी उपाय नहीं है, अतः ग्रहोंके घात और उपघातके नाशक, सभी रोगों एवं राज-उपद्रवोंको शमन करनेवाले भगवान् सूर्यकी आराधना करनी चाहिये।

गरुडजीने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मवादिनीके शापसे मैं पंखविहीन हो गया हूँ, आप मेरे इन अङ्गोंको देखें। मेरे लिये अब कौन-सा कार्य उपयुक्त है? जिससे मैं पुनः पंखयुक्त हो जाऊँ।

अरुणजी बोले— गरुड! तुम शुद्ध-चित्तसे अन्धकारको दूर करनेवाले जगन्नाथ भगवान् भास्करकी पूजा एवं हवन करो।

गरुडजीने कहा— मैं विकलांग होनेसे भगवान् सूर्यकी पूजा एवं अग्निकार्य करनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये मेरी शान्तिके लिये अग्निका कार्य आप सम्पादित करें।

अरुणजी बोले— विनतानन्दन! महाव्याधिसे प्रपीड़ित होनेके कारण तुम इसके सम्पादनमें समर्थ नहीं हो, अतः मैं तुम्हारे रोगकी शान्तिके लिये पावकार्चन (अग्निहोम) करूँगा। यह लक्ष-होम सभी पापों, विघ्नों तथा व्याधियोंका नाशक, महापुण्यजनक, शान्ति प्रदान करनेवाला, अपमृत्यु-निवारक, महान् शुभकारी तथा विजय प्रदान करनेवाला है। यह सभी देवोंको तृप्ति प्रदान करनेवाला तथा भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है।

इस पावकार्चनमें सूर्य-मन्दिरके अग्निकोणमें गोमयसे भूमिको लीपकर अग्निकी स्थापना करे


* भगवन्तं भगकरं शान्तचित्तमनुत्तमम्। देवमार्गप्रणेतारं प्रणतोऽस्मि रविं सदा॥
शाश्वतं शोभनं शुद्धं चित्रभानुं दिवस्पतिम्। देवदेवेशमीशेशं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥
सर्वदुःखहरं देवं सर्वदुःखहरं रविम्। वराननं वराङ्गं च वरस्थानं वरप्रदम्॥
वरेण्यं वरदं नित्यं प्रणतोऽस्मि विभावसुम्। अर्कमर्यमणं चेन्द्रं विष्णुमीशं दिवाकरम्॥
देवेश्वरं देवरतं प्रणतोऽस्मि विभावसुम्। य इदं शृणुयान्नित्यं ब्रह्मणोक्तं स्तवं परम्।
स हि कीर्तिं परां प्राप्य पुनः सूर्यपुरं व्रजेत्॥ (ब्राह्मपर्व १७४। ३६-४०)

१९६ * संक्षिप्त भविष्यपुराण * और सर्वप्रथम दिक्पालोंको आहुति प्रदान करे१। | सभी प्रकारकी शान्तिके लिये उपयोगी है। खगश्रेष्ठ ! इस प्रकार विधिपूर्वक आहुतियाँ | हवनके अनन्तर शान्तिके लिये निर्दिष्ट मन्त्रोंका प्रदान करनेके अनन्तर 'ॐ भूर्भुवः स्वाहा' इसके | पाठ करते हुए अभिषेक करना चाहिये। सर्वप्रथम द्वारा लक्ष हवनका सम्पादन करे। सौर-महाहोममें | ग्रहोंके अधिपति भगवान् सूर्य तथा सोमादि ग्रहोंसे यही विधि कही गयी है। भगवान् भास्करके | शान्तिकी प्रार्थना करे२। उद्देश्यसे इस अग्निकार्यको करे। यह सभी लोकोंकी | 'रक्त कमलके समान नेत्रोंवाले, सहस्र १- आरक्तदेहरूपाय रक्ताक्षाय महात्मने । धराधराय शान्ताय सहस्राक्षशिराय च ॥ 'अधोमुखाय श्वेताय स्वाहा'- इससे प्रथम आहुति दे। चतुर्मुखाय शान्ताय पद्मासनगताय च ॥ पद्मवर्णाय वेधाय कमण्डलुधराय च। 'ऊर्ध्वमुखाय स्वाहा'- इससे द्वितीय आहुति दे। हेमवर्णाय देहाय ऐरावतगजाय च । सहस्राक्षशरीराय पूर्वदिश्युन्मुखाय च ॥ देवाधिपाय चेन्द्राय विहस्ताय शुभाय च। 'पूर्ववदनाय स्वाहा'- इससे तृतीय आहुति दे। दीप्ताय व्यक्तदेहाय ज्वालामालाकुलाय च । इन्द्रनीलाभदेहाय सर्वरोग्यकराय च ॥ यमाय धर्मराजाय दक्षिणाशामुखाय च। 'कृष्णाम्बरधराय स्वाहा'- इससे चौथी आहुति दे। नीलजीमूतवर्णाय रक्ताम्बरधराय च । मुक्ताफलशरीराय पिङ्गाक्षाय महात्मने ॥ शुक्लवस्त्राय पीताय दिव्यपाशधराय च। 'पश्चिमाभिमुखाय स्वाहा' - इससे पाँचवीं आहुति दे। कृष्णपिङ्गलनेत्राय वायव्याभिमुखाय च । नीलध्वजाय वीराय तथा चेन्द्राय वेधसे ॥ 'पवनाय स्वाहा' - इस मन्त्रसे छठी आहुति दे। गदाहस्ताय सूर्याय चित्रस्रग्भूषणायच ॥ महोदराय शान्ताय स्वाहाधिपतये तथा। 'उत्तराभिमुखाय महादेवप्रियाय स्वाहा'- इससे सातवीं आहुति दे। श्वेताय श्वेतवर्णाय चित्राक्षायमहात्मने । शान्ताय शान्तरूपाय पिनाकवरधारिणे ॥ 'ईशानाभिमुखायेशाय स्वाहा' - इससे आठवीं आहुति दे। (ब्राह्मपर्व १७५। १८-३२) [यह दश दिक्पाल-होम प्रतीत होता है, किंतु पाठकी गड़बड़ीसे आग्नेय तथा नैर्ऋत्यकोणकी आहुतियोंका स्वरूप अस्पष्ट है] २- शान्त्यर्थं सर्वलोकानां ततः शान्तिकमाचरेत् । सिन्दूरासनरक्ताभो रक्तपद्माभलोचनः ॥ सहस्रकिरणो देवः सप्ताश्वरथवाहनः । गभस्तिमाली भगवान् सर्वदेवनमस्कृतः ॥ करोतु ते महाशान्तिग्रहपीडानिवारिणीम् । त्रिचक्ररथमारूढ अपां सारमयं तु यः ॥ दशाश्ववाहनो देव आत्रेयश्चामृतस्रवः । शीतांशुरामृतात्मा च क्षयवृद्धिसमन्वितः । सोमः सौम्येन भावेन ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ पद्मरागनिभो भौमो मधुपिङ्गललोचनः । अङ्गारकोऽग्निसदृशो ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ पुष्परागनिभेनेह देहेन परिपिङ्गलः । पीतमाल्याम्बरधरो बुधः पीडां व्यपोहतु ॥ तप्तगैरिकसंकाशः सर्वशास्त्रविशारदः । सर्वदेवगुरुर्विप्रो ह्यथर्वणवरो मुनिः ॥ बृहस्पतिरिति ख्यात अर्थशास्त्रपरश्रयः । शान्तेन चेतसा सोऽपि परेण सुसमाहितः ॥ ग्रहपीडां विनिर्जित्य करोतु तवशाम्तिकम् । सूर्यार्चनपरो नित्यं प्रसादाद्भास्करस्य तु ॥ हिमकुन्देन्दुवर्णाभो दैत्यदानवपूजितः । महेश्वरस्ततो धीमान् महासौरौ महामतिः ॥ सूर्यार्चनपरो नित्यं शुक्रःशुक्लनभस्तदा । नीतिशास्त्रपरो नित्यं ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ नानारूपधरोऽव्यक्त अविज्ञातगतिश्चयः । नोत्पत्तिर्जायते यस्य नोदयपीडितैरपि ॥ एकचूलो द्विचूलश्च त्रिशिखःपञ्चचूलकः । सहस्रशिररूपस्तु चन्द्रकेतुरिव स्थितः ॥ सूर्यपुत्रोऽग्निपुत्रस्तु ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः । अनेकशिखरः केतुः स ते पीडां व्यपोहतु ॥ एते ग्रहा महात्मानः सूर्यार्चनपराःसदा । शान्तिं कुर्वन्तु ते हृष्टाः सदाकालं हितेक्षणाः ॥ (ब्राह्मपर्व १७५। ३६-५०) 584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_8_2_Back In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

  • ब्राह्मपर्व *

११७

किरणोंवाले, सात अक्षोंसे युक्त रथपर आरूढ़, सिन्दूरके समान रक्त आभावाले, सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत भगवान् सूर्य ग्रहपीडा निवारण करनेवाली महाशान्ति आपको प्रदान करें। शीतल किरणोंसे युक्त, अमृतात्मा, अत्रिके पुत्र चन्द्रदेव सौम्यभावसे आपकी ग्रहपीडा दूर करें। पद्मरागके समान वर्णवाले, मधुके समान पिङ्गल नेत्रवाले, अग्निसदृश अङ्गारक, भूमिपुत्र भौम आपकी ग्रहपीडा दूर करें। पुष्परागके समान आभायुक्त, पिङ्गल वर्णवाले, पीत माल्य तथा वस्त्र धारण करनेवाले बुध आपकी पीडा दूर करें। तप्त स्वर्णके समान आभायुक्त, सर्वशास्त्रविशारद, देवताओंके गुरु बृहस्पति आपकी ग्रहपीडा दूर कर आपको शान्ति प्रदान करें। हिम, कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमाके समान स्वच्छ वर्णवाले, दैत्य तथा दानवोंसे पूजित, सूर्यार्चनमें तत्पर रहनेवाले, महामति, नीतिशास्त्रमें पारङ्गत शुक्राचार्य आपकी ग्रहपीडा दूर करें। विविध रूपोंको धारण करनेवाले, अविज्ञात-गतियुक्त, सूर्यपुत्र शनैश्चर, अनेक शिखरोंवाले केतु एवं राहु आपकी पीडा दूर करें। सर्वदा कल्याणकी दृष्टिसे देखनेवाले तथा भगवान् सूर्यकी नित्य अर्चना करनेमें तत्पर ये सभी ग्रह

प्रसन्न होकर आपको शान्ति प्रदान करें।'

तदनन्तर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश—इन त्रिदेवोंसे इस प्रकार शान्तिकी प्रार्थना करें१—

‘पद्मासनपर आसीन, पद्मवर्ण, पद्मपत्रके समान नेत्रवाले, कमण्डलुधारी, देव-गन्धर्वोंसे पूजित, देवशिरोमणि, महातेजस्वी, सभी लोकोंके स्वामी, सूर्यार्चनमें तत्पर चतुर्मुख, दिव्य ब्रह्म शब्दसे सुशोभित ब्रह्माजी आपको शान्ति प्रदान करें। पीताम्बर धारण करनेवाले, शङ्खु, चक्र, गदा तथा पद्म धारण करनेवाले चतुर्भुज, श्यामवर्णवाले, यज्ञस्वरूप, आत्रेयीके पति और सूर्यके ध्यानमें तल्लीन माधव मधुसूदन विष्णु आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। चन्द्रमा एवं कुन्दपुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले, सर्पादि विशिष्ट आभरणोंसे अलंकृत, महातेजस्वी, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, समस्त विश्वमें व्याप्त, श्मशानमें रहनेवाले, दक्ष-यज्ञ विध्वंस करनेवाले, वरणीय, आदित्यके देहसे सम्भूत, वरदानी, देवाधिदेव तथा भस्म धारण करनेवाले महेश्वर आपको शान्ति प्रदान करें।’

तदनन्तर सभी मातृकाओंसे शान्तिके लिये प्रार्थना करें२—

१- पद्मासनः पद्मवर्णः पद्मपत्रनिभेक्षणः। कमण्डलुधरः श्रीमान् देवगन्धर्वपूजितः॥

चतुर्मुखो देवपतिः सूर्यार्चनपरः सदा।

सुरज्येष्ठो महातेजाः सर्वलोकप्रजापतिः। ब्रह्मशब्देन दिव्येन ब्रह्मा शान्तिं करोतु ते॥

पीताम्बरधरो देव आत्रेयीदयितः सदा। शङ्खुचक्रगदापाणिः श्यामवर्णश्चतुर्भुजः॥

यज्ञदेहः क्रमो देव आत्रेयीदयितः सदा। शङ्खुचक्रगदापाणिर्माधवो मधुसूदनः॥

सूर्यभक्तान्वितो नित्यं विगतर्विगतत्रयः। सूर्यध्यानपरो नित्यं विष्णुः शान्तिं करोतु ते॥

शशिकुन्देन्दुसंकाशो विश्रुताभरणेरिह। चतुर्भुजो महातेजाः पुष्पार्धकृतशेखरः॥

चतुर्मुखो भस्मधरः श्मशाननिलयः सदा। गोत्रादिरिर्विंशनिलयस्तथा च क्रतुदूषणः॥

वरो वरेण्यो वरदो देवदेवो महेश्वरः। आदित्यदेहसम्भूतः स ते शान्तिं करोतु वै॥

(ब्राह्मपर्व १७६। १-८)

२- पद्मरागप्रभा देवी चतुर्वदनपङ्कजा। अक्षमालार्पितकरा कमण्डलुधरा शुभा॥

ब्रह्माणी सौम्यवदना आदित्याराधने रता। शान्तिं करोतु सुप्रीता आशीर्वादपरा खग॥

महाश्वेतैति विख्याता आदित्यदयिता सदा। हिमकुन्देन्दुसदृशा महावृषभवाहिनी॥

त्रिशूलहस्ताभरणा विश्रुताभरणा सती। चतुर्भुजा चतुर्वक्त्रा त्रिनेत्रा पापनाशिनी।

वृषध्वजार्चनरता रुद्राणी शान्तिदा भवेत्॥

मयूरवाहना देवी सिन्दूरारुणविग्रहा। शक्तिहस्ता महाकाया सर्वालंकारभूषिता॥

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१९८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पद्मरागके समान आभावाली, अक्षमाला एवं कमण्डलु धारण करनेवाली, आदित्यकी आराधनामें तथा आशीर्वाद देनेमें तत्पर, सौम्यवदनवाली ब्रह्माणी प्रसन्न होकर तुम्हें शान्ति प्रदान करें। हिम, कुन्द-पुष्प तथा चन्द्रमाके समान वर्णवाली, महावृषभपर आरूढ़, हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाली, आश्चर्यजनक आभरणोंसे विश्रुत, चतुर्भुजा चतुर्वक्रा तथा त्रिनेत्रधारिणी पापोंका नाश करनेवाली, वृषभध्वज शंकरकी अर्चनामें तत्पर, महाश्वेता नामसे विख्यात आदित्यदयिता रुद्राणी आपको शान्ति प्रदान करें। सिन्दूरके समान अरुण विग्रहवाली, सभी अलंकारोंसे विभूषित, हाथमें शक्ति धारण करनेवाली, सूर्यकी अर्चनामें तत्पर, महान् पराक्रमशालिनी, वरदायिनी, मयूरवाहिनी देवी कौमारी आपको शान्ति प्रदान करें। गदा एवं चक्रको धारण करनेवाली, पीताम्बरधारिणी, सूर्यार्चनमें नित्य तत्पर रहनेवाली,

असुरमर्दिनी, देवताओंके द्वारा पूजित चतुर्भुजा देवी वैष्णवी आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। ऐरावतपर आरूढ़, हाथमें वज्र धारण करनेवाली, महाबलशालिनी, सिद्ध-गन्धर्वोंसे सेवित, सभी अलंकारोंसे विभूषित, चित्र-विचित्र अरुणवर्णवाली, सर्वत्रलोचना देवी इन्द्राणी आपको शान्ति प्रदान करें। वराहके समान नासिकावाली, श्रेष्ठ वराहपर आरूढ़, विकटा, शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाली, श्यामावदाता, तेजस्विनी, प्रतिक्षण भगवान् सूर्यकी आराधना करनेवाली, वरदायिनी देवी वाराही आपको शान्ति प्रदान करें।

क्षाम-कटि-प्रदेशवाली, मांसरहित कंकाल-स्वरूपिणी, कराल-वदना, भयंकर तलवार, घंटा, खट्वाङ्ग और वरमुद्रा धारण करनेवाली, क्रूर, लाल-पीले नेत्रोंवाली, गजचर्मधारिणी, गोश्रुताभरणा, प्रेतस्थानमें निवास करनेवाली, देखनेमें भयंकर परंतु

सूर्यभक्ता महावीर्या सूर्यार्चनरता सदा । कौमारी वरदा देवी शान्तिमाशु करोतु ते ॥ गदाचक्रधरा श्यामा पीताम्बरधरा खग । चतुर्भुजा हि सा देवी वैष्णवी सुरपूजिता ॥ सूर्यार्चनपरा नित्य सूर्यकगतमानसा । शान्तिं करोतु ते नित्यं सर्वासुरविमर्दिनी ॥ ऐरावतगजारूढ़ा वज्रहस्ता महाबला । सर्वत्रलोचना देवी वर्णतः कर्बुरारुणा ॥ सिद्धगन्धर्वनिमिता सर्वालंकारभूषिता । इन्द्राणी ते सदा देवी शान्तिमाशु करोतु वै ॥ वराहघोणा विकटा वराहवरवाहिनी । श्यामावदाता या देवी शङ्खचक्रगदाधरा ॥ तेजयन्तीति निमिषान् पूजयन्ती सदा रविम् । वाराही वरदा देवी तव शान्तिं करोतु वै ॥ अर्धकोशा कटीक्षामा निर्मासा स्नायुबन्धना । करालवदना घोरा खट्वाङ्गघटोद्गता सती ॥ कपालमालिनी क्रूर खट्वाङ्गवरधारिणी । आरक्ता पिङ्गनयना गजचर्मवगुण्डिता ॥ गोश्रुताभरणा देवी प्रेतस्थाननिवासिनी । शिवारूपेण घोरिण शिवरूपभयंकरि ॥ चामुण्डा चण्डरूपेण सदा शान्तिं करोतु ते ॥

चण्डमुण्डकरा देवी मुण्डदेहगता सती । कपालमालिनी क्रूर खट्वाङ्गवरधारिणी ॥ आकाशमातरो देव्यस्तथान्या लोकमातरः । भूतानां मातरः सर्वास्तथान्याः पितृमातरः ॥ वृद्धिश्राद्धेषु पूज्यन्ते यास्तु देव्यो मनीषिभिः । मात्रे प्रमात्रे तन्मात्रे इति मातृमुख्यास्तथा ॥ पितामही तु तन्माता वृद्धा या चपितामही । इत्येत्यास्तु पितामह्यः शान्तिं ते पितृमातरः ॥ सर्वा मातृमहादेव्यः सायुधा व्यग्रपाण्यः । जगद्व्याप्य प्रतिष्ठन्त्यो बलिकामा महोदयाः ॥ शान्तिं कुर्वन्तु ता नित्यमादित्याराधने रताः । शान्तैन चेत्सा शान्त्यः शान्तये तव शान्तिदा ॥ सर्वावयवमुख्येन गात्रेण च सुमध्यमा । पीतश्यामातिसीम्येन स्निग्धवर्णेन शोभना ॥ ललाटतिलकोपेता चन्द्ररेखाधरिणी । चित्राम्बरधरा देवी सर्वाभरणभूषिता ॥ वरा स्त्रीमयरूपाणां शोभा गुणसुसम्पदाम् । भावनामात्रसंतुष्टा उमा देवी वरप्रदा ॥ साक्षादागत्य रूपेण शान्तैनामिततेजसा । शान्तिं करोतु ते प्रीता आदित्याराधने रता ॥

(ब्राह्मपर्व १७७ । १—२५)

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  • ब्राह्मपर्व *

११९

शिवस्वरूपा, हाथमें चण्ड-मुण्डके कपाल धारण किये हुए तथा कपालकी माला पहने चन्द्ररूपिणी देवी चामुण्डा तुम्हें शान्ति प्रदान करें१—

आकाशमातुकाएँ, लोकमातुकाएँ तथा अन्य लोकमातुकाएँ, भूतमातुकाएँ, अन्य पितृ-मातुकाएँ, वृद्धि-श्राद्धोंमें जिनकी पूजा होती है वे पितृमातुकाएँ, माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता—ये मातृ-मातुकाएँ, शान्त चित्तसे आपको शान्ति प्रदान करें। ये सभी मातुकाएँ अपने हाथोंमें आयुध धारण करती हैं और संसारको व्याप्त करके प्रतिष्ठित रहती हैं तथा भगवान् सूर्यकी आराधनामें तत्पर रहती हैं। सुन्दर अङ्ग-प्रत्यङ्गवाली तथा सुन्दर कटि-प्रदेशवाली, पीत एवं श्याम वर्णवाली, स्निग्ध आभावाली, तिलकसे सुशोभित

ललाटवाली, अर्धचन्द्ररेखा धारण करनेवाली, सभी आभरणोंसे विभूषित, चित्र-विचित्र वस्त्र धारण करनेवाली, सभी स्त्रीस्वरूपोंमें गुण और सम्पत्तियोंके कारण सर्वश्रेष्ठ शोभावाली, आदित्यकी आराधनामें तत्पर, केवल भावनामात्रसे संतुष्ट होनेवाली वरदायिनी भगवती उमादेवी अपने अमित तेजस्वी एवं शान्त-रूपसे प्रत्यक्ष प्रकट होकर प्रसन्न हो आपको शान्ति प्रदान करें।'

अनन्तर कार्तिकेय, नन्दीश्वर, विनायक, भगवान् शंकर, जगन्माता, पार्वती, चण्डेश्वर, ऐन्द्री आदि दिशाएँ, दिशाओंके अधिपति, लोकपालोंकी नगरियाँ, सभी देवता, देवी सरस्वती तथा भगवती अपराजितासे इस प्रकार शान्तिकी प्रार्थना करें२—

१-ये सात विश्वमाताएँ कही गयी हैं। शारदातिलकके षष्ठ पटलमें इन सातोंके साथ ही भगवती महालक्ष्मीको भी विश्वमाता कहा गया है।

२- अबलो बालरूपेण खट्वाङ्गशिखिवाहनः। पूर्वेण वदनः श्रीमांस्त्रिशिखः शक्तिसंयुतः ॥

कृतिकायाश्च रुद्रस्य चाङ्गोद्भूतः सुराचितः। कार्तिकेयो महातेजा आदित्यवरदपितः ॥

शान्तिं करोतु ते नित्यं बलं सौख्यं च तेजसा ॥

आत्रेयो बलवान् देव आरोग्यं च खागाधिप। श्वेतवस्त्रपरीधानस्यश्चः कनकसुप्रभः ॥

शूलहस्तो महाप्राज्ञो नन्दीशो रविभाषितः। शान्तिं करोतु ते शान्तो धर्मं च मतिमुत्तमाम् ॥

धर्मतरावुभी नित्यमचलः सम्प्रयच्छतु। महोदरो महाकायः स्निग्धाञ्जनसमप्रभः ॥

एकदंष्ट्रोल्कटी देवो गजवक्रो महाबलः। नागयज्ञोपवीतेन नानाभरणभूषितः ॥

सर्वार्थसम्पद्भूद्वारो गणाध्यक्षो वरप्रदः।

भीमस्य तनयो देवो नायकोऽथ विनायकः। करोतु ते महाशान्तिं भास्करार्चनतत्परः ॥

इन्द्रनीलनिभस्यश्चो दीप्तशूलायुधोद्यतः। रक्ताम्बरधरः श्रीमान् कृष्णाङ्गो नागभूषणः ॥

पापापनोदमतुलमलक्ष्यो मलनाशनः। करोतु ते महाशान्तिं प्रीतः प्रीतेन चेतसा ॥

वराम्बरधरा कन्या नानालंकारभूषिता। त्रिदशानां च जननी पुण्या लोकनमस्कृता ॥

सर्वसिद्धिकरा देवी प्रसादपरमास्पदा। शान्तिं करोतु ते माता भुवनस्य खागाधिप ॥

स्निग्धश्यामेन वर्णेन महामहिषमर्दिनी। धनुश्चक्रप्रहरणा खड्गपट्टिशधारिणी ॥

आतर्जन्व्यायतकरा सर्वोपद्रवनाशिनी। शान्तिं करोतु ते दुर्गा भवानी च शिवा तथा ॥

अतिसूक्ष्मो ह्यतिक्रोधस्यश्चो भुङ्क्विरिटिर्महन्।

सूर्यात्मको महावीरः सर्वोपद्रवनाशनः। सूर्यभक्तिपरो नित्यं शिवं ते सम्प्रयच्छतु ॥

प्रचण्डगणसैन्येशो महाघण्टाक्षधारकः। अक्षमालार्पितकरश्चाथ चण्डेश्वरो वरः ॥

चण्डपापहरो नित्यं ब्रह्महत्याविनाशनः।

शान्तिं करोतु ते नित्यमादित्यराधने रतः। करोतु च महायोगी कल्याणानां परम्पराम् ॥

आकाशमातरो दिव्यास्तथान्या देवमातरः।

सूर्यार्चनपरा देव्यो जगद्व्याप्य व्यवस्थिताः। शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं मातरः सुरपूजिताः ॥

ये रुद्रा रौद्रकर्माणो रौद्रस्थाननिवासिनः। मातरो रुद्ररूपाश्च गणानामधिपाश्च ये ॥

विघ्नभूतास्तथा चान्ये दिग्विदिधु समाश्रिताः।

सर्वं ते प्रीतमनसः प्रतिगृह्णन्तु मे बलिम्। सिद्धिं कुर्वन्तु ते नित्यं भयेभ्यः पान्तु सर्वतः ॥

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२००

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

खट्वाङ्ग धारण किये हुए, शक्तिसे युक्त, मयूरवाहन, कृतिका और भगवान् रुद्रसे उद्भूत, समस्त देवताओंसे अर्चित तथा आदित्यसे वरप्राप्त भगवान् कार्तिकेय अपने तेजसे आपको बल, सौख्य एवं शान्ति प्रदान करें। हाथमें शूल एवं श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, स्वर्ण-आभायुक्त, भगवान् सूर्यकी आराधना करनेवाले, तीन नेत्रोंवाले नन्दीश्वर आपको

धर्ममें उत्तम बुद्धि, आरोग्य एवं शान्ति प्रदान करें। चिकने अञ्जनके समान आभायुक्त, महोदर तथा महाकाय नित्य अचल आरोग्य प्रदान करें। नाना आभूषणोंसे विभूषित नागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण किये हुए, समस्त अर्थ-सम्पत्तियोंके उद्धारक, एकदन्त, उत्कट-स्वरूप, गजवक्त्र, महाबलशाली, गणोंके अध्यक्ष, वरप्रदाता, भगवान् सूर्यकी अर्चनामें

ऐन्द्रादयो गणा ये तु वज्रहस्ता महाबलाः । हिमकुन्देन्दुसदृशा नीलकृष्णाङ्गलोहिताः ॥ दिव्यान्तरिक्षा भौमाश्च पातालतलवासिनः । ऐन्द्राः शान्तिं प्रकुर्वन्तु भद्राणि च पुनः पुनः ॥ आग्नेय्यां ये भूताः सर्वे ध्रुवहत्यानुषङ्गिनः । सूर्यानुरक्ता रक्ताभा जगसुमनिभास्तथा ॥ विरकलोहिता दिव्या आग्नेय्यां भास्करादयः । आदित्याराधनपरा आदित्यगतमानसाः ॥ शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं प्रयच्छन्तु बलिं मम ।

भयादित्यसमा ये तु सततं दण्डपाणयः । आदित्याराधनपराः शं प्रयच्छन्तु ते सदा ॥ ऐशान्यां संस्थिता ये तु प्रशान्ताः शूलपाणयः । भस्मोद्भूतदेहाश्च नीलकण्ठा विलोहिताः ॥ दिव्यान्तरिक्षा भौमाश्च पातालतलवासिनः । सूर्यपूजाकरा नित्यं पूजयित्वांशुमालिनम् ॥ ततः सुप्रीतमनसो लोकपालैः समन्विताः । शान्तिं कुर्वन्तु मे नित्यं शं प्रयच्छन्तु पूजिताः ॥ अमरावती पुरी नाम पूर्वभागे व्यवस्थिता । विद्याधरगणाकीर्णा सिद्धगन्धर्वसेविता ॥ रत्नप्राकाररुचिरा महारत्नोपशोभिता ।

तत्र देवपतिः श्रीमान् वज्रपाणिर्महाबलः । गोपतिर्गोसहस्रेषु शोभमानेन शोभते ॥ ऐरावतगजारूढो गैरिकाभो महाद्युतिः । देवेन्द्रः सततं हृष्ट आदित्याराधने रतः ॥ सूर्यज्ञानैकपरमः सूर्यभक्तिसमन्वितः । सूर्यप्रणामः परमां शान्तिं तेष्व प्रयच्छतु ॥ आग्नेयदिग्विभगो तु पुरी तेजस्वती शुभा । नानादेवगणाकीर्णा नानारत्नोपशोभिता ॥ तत्र ज्वालासमाकोर्णा दीप्ताङ्गारसमद्युतिः । पुरगो दहनो देवो ज्वलनः पापनाशनः ॥ आदित्याराधनरत आदित्यगतमानसः । शान्तिं करोतु ते देवस्तथा पापपरिक्षयम् ॥ वैवस्वती पुरी रम्या दक्षिणेन महात्मनः । सुरासुरशताकीर्णा नानारत्नोपशोभिता ॥ तत्र कुन्देन्दुसंकाशो हरिपिङ्गललोचनः । महामहिषमारुढः कृष्णस्वस्वरूपभूषणः ॥ अन्तकोऽथ महातेजाः सूर्यधर्मपरायणः । आदित्याराधनपरः क्षेमारोग्ये ददातु ते ॥ नैऋते दिग्विभगो तु पुरी कृष्णोति विश्रुता । महारक्षोगणाशीचपिशाचप्रेतसंकुला ॥ तत्र कुन्दनिभो देवो रक्तस्वस्वरूपभूषणः । खड्गपाणिर्महातेजाः करालवदनीज्ज्वलः ॥ रक्षेन्द्रो वसते नित्यमादित्याराधने रतः । करोतु मे सदा शान्तिं धनं धान्यं प्रयच्छतु ॥ पश्चिमे तु दिशो भागे पुरी शुद्धवती सदा । नानाभोगिसमाकोर्णा नानाकिन्नरसेविता ॥ तत्र कुन्देन्दुसंकाशो हरिपिङ्गललोचनः । शान्तिं करोतु मे प्रीतः शान्तः शान्तेन चेतसा ॥ यशोवती पुरी रम्या ऐशान्यां दिशमाश्रिता । नानागणसमाकीर्णा नानाकृतशुभालया । तेजःप्रकारपर्यन्ता अनौपम्या सदोज्ज्वला ॥ तत्र कुन्देन्दुसंकाशश्चाम्बुजाक्षो विभूषितः ।

त्रिनेत्रः शान्तरूपात्मा अक्षमालाधराधरः । ईशानः परमो देवः सदा शान्तिं प्रयच्छतु ॥ भूलोके तु भुवलोके निवसन्ति च ये सदा । देवादेवाः शुभायुक्ताः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ जनलोके महलोक परलोक गताश्च ये । ते सर्वे मुदिता देवाः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ सरस्वती सूर्यभक्ता शान्तिदा विदधातु मे ।

चारुचामीकरस्था या सरोजकरपल्लवा । सूर्यभक्त्याश्रिता देवी विभूतिं ते प्रयच्छतु ॥ हारेण सुविचित्रेण भास्वत्कनकमेखला । अपराजिता सूर्यभक्ता करोतु विजयं तव ॥

(ब्राह्मपर्व १७८ । १-४८)

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  • ब्राह्मपर्व *

२०१

तत्पर, शंकरपुत्र विनायक आपको महाशान्ति प्रदान करें। इन्द्रनीलके समान आभावाले, त्रिनेत्रधारी, प्रदीप्त त्रिशूल धारण करनेवाले, नागोंसे विभूषित, पापोंको दूर करनेवाले तथा अलक्ष्य रूपवाले, मलोंके नाशक भगवान् शंकर प्रसन्नचित्तसे आपको महाशान्ति प्रदान करें। नाना अलंकारोंसे विभूषित, सुन्दर वस्त्रोंको धारण करनेवाली, देवताओंकी जननी, सारे संसारसे नमस्कृत, समस्त सिद्धियोंकी प्रदायिनी, प्रसाद-प्राप्तिकी एकमात्र स्थान जगन्माता भगवती पार्वती आपको शान्ति प्रदान करें। स्निग्ध श्यामल वर्णवाली, धनुष-चक्र, खड्ग तथा पट्टिश आयुधोंको धारण की हुई, सभी उपद्रवोंका नाश करनेवाली, विशाल बाहुओंवाली, महामहिष-मर्दिनी भगवती भवानी दुर्गा आपको शान्ति प्रदान करें। अत्यन्त सूक्ष्म, अतिक्रोधी, तीन नेत्रोंवाले, महावीर, सूर्यभक्त भूमिरिटि आपको नित्य कल्याण करें। विशाल घण्टा तथा रुद्राक्ष-माला धारण किये हुए, ब्रह्महत्यादि उत्कट पापोंका नाश करनेवाले, प्रचण्डगणोंके सेनापति, आदित्यकी आराधनामें तत्पर महायोगी चण्डेश्वर आपको शान्ति एवं कल्याण प्रदान करें। दिव्य आकाश-मातृकाएँ, अन्य देव-मातृकाएँ, देवताओंद्वारा पूजित मातृकाएँ जो संसारको व्याप्त करके अवस्थित हैं और सूर्यार्चनमें तत्पर रहती हैं, वे आपको शान्ति प्रदान करें। रौद्र कर्म करनेवाले तथा रौद्र स्थानमें निवास करनेवाले रुद्रगण, अन्य समस्त गणाधिप, दिशाओं तथा विदिशाओंमें जो विघ्नरूपसे अवस्थित रहते हैं, वे सभी प्रसन्नचित्त होकर मेरे द्वारा दी गयी इस बलि (नैवेद्य)-को ग्रहण करें। ये आपको नित्य सिद्धि प्रदान करें और आपकी भयोंसे रक्षा करें।

हाथोंमें वज्र लिये हुए, महाबलशाली, सफेद, नीले, काले तथा लाल वर्णवाले, पृथ्वी, आकाश, पाताल तथा अन्तरिक्षमें रहनेवाले ऐन्द्रगण निरन्तर

आपका कल्याण करें और शान्ति प्रदान करें। आग्नेय दिशामें रहनेवाले निरन्तर ज्वलनशील, जपाकुसुमके समान लाल तथा लोहित वर्णवाले, हाथमें निरन्तर दण्ड धारण करनेवाले सूर्यके भक्त भास्कर आदि मेरे द्वारा दिये गये बलि (नैवेद्य)-को ग्रहण करें और आपको नित्य शान्ति एवं कल्याण प्रदान करें। ईशानकोणमें अवस्थित शान्ति-स्वभावयुक्त, त्रिशूलधारी, अङ्गोंमें भस्म धारण किये हुए, नीलकण्ठ, रक्तवर्णवाले, सूर्य-पूजनमें तत्पर, अन्तरिक्ष, आकाश, पृथ्वी तथा स्वर्गमें निवास करनेवाले रुद्रगण आपको नित्य शान्ति एवं कल्याण प्रदान करें।

रत्नोंके प्राकारों एवं महारत्नोंसे शोभित, विद्याधर एवं सिद्ध-गन्धर्वोंसे सुसेवित पूर्वदिशामें अवस्थित अमरावती नामवाली नगरीमें महाबली, वज्रपाणि, देवताओंके अधिपति इन्द्र निवास करते हैं। वे ऐरावतपर आरूढ़ एवं स्वर्णकी आभाके समान प्रकाशमान हैं, सूर्यकी आराधनामें तत्पर तथा नित्य प्रसन्न-चित्त रहनेवाले हैं, वे परम शान्ति प्रदान करें। विविध देवगणोंसे व्याप्त, भाँति-भाँतिके रत्नोंसे शोभित, अग्रिकोणमें अवस्थित तेजस्वती नामकी पुरी है, उसमें स्थित जलते हुए अंगारोंके समान प्रकाशवाले, ज्वालमालाओंसे व्याप्त, निरन्तर ज्वलन एवं दहनशील, पापनाशक, आदित्यकी आराधनामें तत्पर अग्निदेव आपके पापोंका सर्वथा नाश करें एवं शान्ति प्रदान करें। दक्षिण दिशामें संयमनीपुरी स्थित है, वह नाना रत्नोंसे सुशोभित एवं सैकड़ों सुरासुरोंसे व्याप्त है, उसमें रहनेवाले हरित-पिङ्गल नेत्रोंवाले महामहिषपर आरूढ़, कृष्ण वस्त्र एवं मालासे विभूषित, सूर्यकी आराधनामें तत्पर महातेजस्वी यमराज आपको क्षेम एवं आरोग्य प्रदान करें। नैऋत्यकोणमें स्थित कृष्णा नामकी पुरी है, जो महान् रक्षोगण, प्रेत

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२०२ * संक्षिप्त भविष्यपुराण *


तथा पिशाच आदिसे व्याप्त है, उसमें रहनेवाले रक्त माला और वस्त्रोंसे सुशोभित हाथमें तलवार लिये, करालवदन, सूर्यकी आराधनामें तत्पर राक्षसोंके अधिपति निर्ऋतिदेव शान्ति एवं धन-धान्य प्रदान करें। पश्चिम दिशामें शुद्धवती नामकी नगरी है, वह अनेक किंनरोंसे सेवित तथा भोगिगंणोंसे व्याप्त है। वहाँ स्थित हरित तथा पिङ्गल वर्णके नेत्रवाले वरुणदेव प्रसन्न होकर आपको शान्ति प्रदान करें। ईशान-कोणमें स्थित यशोवती नामकी अनुपम पुरीमें रहनेवाले त्रिनेत्रधारी शान्तात्मा रुद्राक्ष-मालाधारी परमदेव ईशान (भगवान् शंकर) आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। भूः, भुवन्, महर् एवं जन आदि लोकोंमें रहनेवाले प्रसन्नचित्त देवता आपको शान्ति प्रदान करें।

सूर्यभक्ता सरस्वती आपको शान्ति प्रदान करें। हाथमें कमल धारण करनेवाली तथा सुन्दर स्वर्ण-सिंहासनपर अवस्थित, सूर्यकी आराधनामें तत्पर भगवती महालक्ष्मी आपको ऐश्वर्य प्रदान करें और आदित्यकी आराधनामें तल्लीन, विचित्र वर्णके सुन्दर हार एवं कनकमेखला धारण करनेवाली सूर्यभक्ता भगवती अपराजिता आपको विजय प्रदान करें।'

इसके अनन्तर सत्ताईस नक्षत्रों, मेषादि द्वादश राशियों, सप्तर्षियों, महातपस्वियों, ऋषियों, सिद्धों, विद्याधरों, दैत्येन्द्रों तथा अष्ट नागोंसे शान्तिकी प्रार्थना करे*।


* कृत्तिका परमा देवी रोहिणी च वरानना। श्रीमन्मृगशिरा भद्रा आर्द्रा चाप्यपरोज्ज्वला ॥
पुनर्वसुस्तथा पुष्य आश्लेषा च तथाधिप । सूर्यार्चनरता नित्यं सूर्यभावानुभाविताः ॥
अर्चयन्ति सदा देवमादित्यं सुरते सदा । नक्षत्रमातरो ह्येताः प्रभामालाविभूषिताः ॥
मघा सर्वगुणोपेता पूर्वा चैव तु फाल्गुनी । स्वाती विशाखा वरदा दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥
अर्चयन्ति सदा देवमादित्यं सुरपूजितम् । तवापि शान्तिकं द्योतं कुर्वन्तु गगनोदिताः ॥
अनुराधा तथा ज्येष्ठा मूलं सूर्यपुरःसरा । पूर्वाषाढा महावीर्या आषाढा चोत्तरा तथा ॥
अभिजिन्नम नक्षत्रं श्रवणं च बहुश्रुतम् । एताः पश्चात्तो दीप्ता राजन्ते चानुमूर्तयः ॥
भास्करं पूजयन्त्येताः सर्वकालं सुभाषिताः । शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं विभूतिं च महर्द्धिकाम् ॥
धनिष्ठा शतभिषा तु पूर्वभाद्रपदा तथा ॥
उत्तराभाद्ररेवत्यौ चाश्विनी च महामते । भरणी च महादेवी नित्यमुत्तरतः स्थिताः ॥
सूर्यार्चनरता नित्यमादित्यगतमानसाः । शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं विभूतिं च महर्द्धिकाम् ॥
मेषो मृगाधिपः सिंहो धनुर्दीप्तिमतां वरः । पूर्वेण भासयन्त्येते सूर्ययोगपराः शुभाः ॥
शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं भक्त्या सूर्यपदाम्बुजे । वृषः कन्या च परमा मकरश्चापि बुद्धिमान् ॥
एते दक्षिणभागे तु पूजयन्ति रविं सदा । भक्त्या परमया नित्यं शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥
मिथुनं च तुला कुम्भः पश्चिमे च व्यवस्थिताः । जपन्त्येते सदाकालमादित्यं ग्रहनायकम् ॥
शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं खखोल्कज्ञानतत्पराः । सगन्धोदकपुष्पाभ्यां ये स्मृता सततं बुधैः ॥
ऋषयः सप्त विख्याता ध्वान्ताः परसोज्ज्वलाः । भानुप्रसादात् सम्पन्नाः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥
कश्यपो गालवो गार्ग्यो विश्वामित्रो महामुनिः । मुनिर्दक्षो वसिष्ठश्च मार्कण्डः पुलहः क्रतुः ॥
नारदो भृगुरात्रेयो भारद्वाजश्च वै मुनिः । वाल्मीकिः कौशिको वात्स्यः शाकल्योऽथ पुनर्वसुः ॥
शालंकायन इत्येते ऋषयोऽथ महातपाः । सूर्यध्यानेकपरमाः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥
मुनिकन्या महाभागा ऋषिकन्याः कुमारिकाः । सूर्यार्चनरता नित्यं शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥
सिद्धाः समृद्धतपसो ये चान्ये वै महातपाः । विद्याधरा महात्मानो गरुडश्च त्वया सह ॥
आदित्यपरमा होते आदित्याराधने रताः । सिद्धिं ते सम्प्रयच्छन्तु आशीर्वादपरायणाः ॥
नमुचिदैत्यराजेन्द्रः शंकुकर्णो महाबलः । महानाथोऽथ विख्यातो दैत्यः परमवीर्यवान् ॥
ग्रहाधिपस्य देवस्य नित्यं पूजापरायणाः । बलं वीर्यं च ते ऋद्धिमरोग्यं च ब्रुवन्तु ते ॥
महाढ्यो यो हयग्रीवः प्रह्लादः प्रभयान्वितः । अग्निमुखो महान् दैत्यः कालनेमिर्महाबलः ॥

  • ब्राह्मपर्व *

२०३

‘परमश्रेष्ठ कृतिका, वरानना रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य तथा आश्लेषा (पूर्व दिशामें रहनेवाली) ये सभी नक्षत्र-मातुकाएँ सूर्याचनमें रत हैं और प्रभा-मालासे विभूषित हैं। मघा, पूर्वा तथा उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा—ये दक्षिण दिशाका आश्रय ग्रहण कर भगवान् सूर्यकी पूजा करती रहती हैं। आकाशमें उदित होनेवाली ये नक्षत्र-मातुकाएँ आपको शान्ति प्रदान करें। पश्चिम दिशामें रहनेवाली अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा तथा उत्तराषाढा, अभिजित् एवं श्रवण—ये नक्षत्र-मातुकाएँ निरन्तर भगवान् भास्करकी पूजा करती रहती हैं, ये आपको वर्धनशील ऐश्वर्य एवं शान्ति प्रदान करें। उत्तर दिशामें अवस्थित धनिष्ठा, शतभिष, पूर्व तथा उत्तरभाद्रपद, रेवती, अश्विनी एवं भरणी नामकी नक्षत्र-मातुकाएँ नित्य सूर्यकी पूजा करती रहती हैं, ये आपको नित्य वर्धनशील ऐश्वर्य एवं शान्ति प्रदान करें।

पूर्व दिशामें अवस्थित तथा भगवान् सूर्यके चरणकमलोंमें भक्तिपूर्वक आराधना करनेवाली मेष, सिंह और धनु राशियाँ आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। दक्षिण दिशामें स्थित रहनेवाली, भगवान् सूर्यकी अर्चना करनेवाली वृष, कन्या तथा मकर राशियाँ परमा भक्तिके साथ आपको शान्ति प्रदान करें। पश्चिम दिशामें स्थित एवं निरन्तर ग्रहनायक भगवान् आदित्यकी आराधना करनेवाली मिथुन, तुला तथा कुम्भ राशियाँ आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। [कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियाँ जो उत्तर दिशामें स्थित रहती हैं तथा भगवान् सूर्यकी भक्ति करती हैं, आपको शान्ति प्रदान करें।]

भगवान् सूर्यके अनुग्रहसे सम्पन्न ध्रुव-मण्डलमें रहनेवाले सप्तर्षिगण आपको शान्ति प्रदान करें। कश्यप, गाल्व, गार्ग्य, विश्वामित्र, दक्ष, वसिष्ठ, मार्कण्डेय, क्रतु, नारद, भृगु, आत्रेय, भारद्वाज, वाल्मीकि, कौशिक, वात्स्य, शाकल्य, पुनर्वसु

एते दैत्या महात्मानः सूर्यभावेन भाविताः । तुष्टिं बलं तथाऽरोग्यं प्रयच्छन्तु सुररायः ॥ वैरोचनो हिरण्याक्षस्तुर्वसुश्च सुलोचनः । मुचुकुन्दो मुकुन्दश्च दैत्यो रैवतकस्तथा ॥ भावेन परमेणैव यजन्ते सततं रविम् । सततं च शुभ्रात्मानः पुष्टिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ दैत्यपत्न्यो महाभागो दैत्यानां कन्यकाः शुभाः । कुमार ये च दैत्यानां शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ आरुहेन शरीरेण रक्तान्तायतलोचनाः । महाभागः कृताटोपाः शङ्खाद्याः कृतलक्षणाः ॥ अनन्तो नागराजेन्द्र आदित्याराधने रतः । महापापविषं हत्वा शान्तिमाशु करोतु ते ॥ अतिपीतेन देहेन विस्फुरद्भोगसम्पदा । तेजसा चातिदीप्तेन कृतस्वस्तिकलाञ्छनः ॥ नागराट् तक्षकः श्रीमान् नागकोट्या समन्वितः । करोतु ते महाशान्तिं सर्वदोषविषापहाम् ॥ अतिकृष्णेन वर्णेन स्फुरिताधिकमस्तकः । कण्ठरेखात्रयोपेतो घोरदंष्ट्रायुभोद्यतः ॥ कर्काटको महानागो विषदर्पबलान्वितः । विपशस्त्राग्निनसंतापं हत्वा शान्तिं करोतु ते ॥ पद्मवर्णः पद्मकान्तिः फुल्लपद्मायतेक्षणः । ख्यातः पद्मो महानागो नित्यं भास्करपूजकः ॥ स ते शान्तिं शुभं शीघ्रमचलं सम्प्रयच्छतु । श्यामेन देहभारेण श्रीमत्कमललोचनः ॥ विषदर्पबलोन्मत्तो ग्रीवायां रेखयान्वितः । शङ्खपालश्रिया दीप्तः सूर्यपादाब्जपूजकः ॥ महाविषं गरश्रेष्ठं हत्वा शान्तिं करोतु ते । अतिगिरेण देहेन चन्द्रार्धकृतशेखरः ॥ दीपभागे कृताटोपशुभलक्षणलक्षितः ।

कुलिको नाम नागेन्द्रो नित्यं सूर्यपरायणः । अग्रहृत्य विषं घोरं करोतु तव शान्तिकम् ॥ अन्तरिक्षे च ये नागा ये नागाः स्वर्गसंस्थिताः । गिरिकन्दरदुर्गेषु ये नागा भुवि संस्थिताः ॥ पाताले ये स्थिता नागाः सर्वे यत्र समाहिताः । सूर्यपादाचनसक्ताः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ नागिन्यो नागकन्याश्च तथा नागकुमारकाः । सूर्यभक्ताः सुमनसः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ य इदं नागसंस्थानं कीर्तयेच्छृणुयात् तथा । न तं सर्पा विहिंसन्ति न विषं क्रमते सदा ॥

(ब्राह्मपर्व १७९ । १—४४)

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२०४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तथा शालंकायन—ये सभी सूर्य-ध्यानमें तत्पर रहनेवाले महातपस्वी ऋषिगण आपको शान्ति प्रदान करें। सूर्यकी आराधनामें तत्पर ऋषि तथा मुनिकन्याएँ, जो निरन्तर आशीर्वाद प्रदान करनेमें तत्पर रहती हैं, आपको नित्य सिद्धि प्रदान करें।

भगवान् सूर्यकी पूजामें तत्पर दैत्यराजेन्द्र नमुचि, महाबली शङ्कुकर्ण, पराक्रमी महानाथ—ये सभी आपके लिये बल, वीर्य एवं आरोग्यकी प्रासिके लिये निरन्तर कामना करें। महान् सम्पत्तिशाली हयग्रीव, अत्यन्त प्रभाशाली प्रह्लाद, अग्रिमुख, कालनेमि—ये सभी सूर्यकी आराधना करनेवाले दैत्य आपको पुष्टि, बल और आरोग्य प्रदान करें। वैरोचन, हिरण्याक्ष, तुर्वसु, सुलोचन, मुचुकुन्द, मुकुन्द तथा रैवतक—ये सभी सूर्यभक्त आपको पुष्टि प्रदान करें। दैत्यपत्नियाँ, दैत्यकन्याएँ तथा दैत्यकुमार—ये सभी आपकी शान्तिके लिये कामना करें।

नागराजेन्द्र अनन्त, अत्यन्त पीले शरीरवाले, विस्फुरित फणवाले, स्वस्तिक-चिह्ने युक्त तथा अत्यन्त तेजसे उद्दीप्त नागराज तक्षक, अत्यन्त कृष्णवर्णवाले, कण्ठमें तीन रेखाओंसे युक्त, भयंकर आयुधरूपी दंष्ट्रसे समन्वित तथा विषके दर्पसे

बलान्वित महानाग कर्कोटक, पद्मके समान कान्तिवाले, कमलके पुष्पके समान नेत्रवाले, पद्मवर्णके महानाग पद्म, श्यामवर्णवाले, सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, विषरूपी दर्पसे उन्मत्त तथा ग्रीवामें तीन रेखावाले शोभासम्पन्न महानाग शंखपाल, अत्यन्त गौर शरीरवाले, चन्द्रार्धकृत-शेखर, सुन्दर फणोंसे युक्त नागेन्द्र कुलिक (और नागराज वासुकि) सूर्यकी आराधना करनेवाले—ये सभी अष्टनाग महाविषको नष्ट करके आपको निरन्तर अचल महाशान्ति प्रदान करें। अन्तरिक्ष, स्वर्ग, गिरिकन्दराओं, दुर्गों तथा भूमि एवं पातालमें रहनेवाले, भगवान् सूर्यके अर्चनमें आसक्त समस्त नागगण और नागपत्नियाँ, नागकन्याएँ तथा नागकुमार सभी प्रसन्नचित्त होकर आपको सदा शान्ति प्रदान करें।'

जो इस नाग-शान्तिका श्रवण या कीर्तन करता है, उसे सर्पगण कभी भी नहीं काटते और विषका प्रभाव भी उनपर नहीं पड़ता।

तदनन्तर गङ्गादि पुण्य नदियों, यक्षेन्द्रों, पर्वतों, सागरों, राक्षसों, प्रेतों, पिशाचों, अपस्मारादि ग्रहों, सभी देवताओं तथा भगवान् सूर्यसे शान्तिकी कामनाके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—*

  • गङ्गा पुण्या महादेवी यमुना नर्मदा नदी । गौतमी चापि कावेरी वरुणा देविका तथा ॥

सर्वग्रहपति देवं लोकेशं लोकनायकम् ।

पूजयन्ति सदा नद्यः सूर्यसद्भावभाविताः । शान्तिं कुर्वन्तु ते नित्यं सूर्यध्यानेकमानसाः ॥

निरञ्जना नाम नदी शोणश्चापि महानदः । मन्दाकिनी च परमा तथा संनिहिता शुभा ॥

एताश्चान्याश्च बहवो भुविदिव्यन्तरिक्षके । सूर्यार्चनरता नद्यः कुर्वन्तु तव शान्तिकम् ॥

महावैश्रवणो देवो यक्षराजो महर्षिकः । यक्षकोटिपरीवारो यक्षासंख्येयसंयुतः ॥

महाविभवसम्पन्नः सूर्यपादाचने रतः । सूर्यध्यानेकपरमः सूर्यभावेन भावितः ॥

शान्तिं करोतु ते प्रीतः पद्मपत्रायतेक्षणः । मणिभद्रो महायक्षो मणिरत्नविभूषितः ॥

मनोहरेण हारेण कण्ठलग्नैन राजते ।

यक्षिणीयक्षकन्याभिः परिवारितविग्रहः । सूर्यार्चनसमासक्तः करोतु तव शान्तिकम् ॥

सुचिरो नाम यक्षेन्द्रो मणिकुण्डलभूषितः । ललाटे हेमपटलप्रबद्धेन विराजते ॥

बहुयक्षसमाकीर्णो यक्षैर्नमितविग्रहः । सूर्यपूजापरो युक्तः करोतु तव शान्तिकम् ॥

पाञ्चिको नाम यक्षेन्द्रः कण्ठाभरणभूषितः । कुक्कुटेन विचित्रेण बहुरत्नान्वितेन तु ॥

यक्षवृन्दसमाकीर्णो यक्षकोटिसमन्वितः । सूर्यार्चनपरः श्रीमान् करोतु तव शान्तिकम् ॥

भूतराष्ट्रो महातेजा नानायक्षाधिपः खग । दिव्यपट्टः शुक्लच्छत्रो मणिकाञ्चनभूषितः ॥

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  • ब्राह्मपर्व *

२०५

'ग्रहाधिपति भगवान् सूर्यकी नित्य आराधना करनेवाली पुण्यतोया गङ्गा, महोदेवी यमुना, नर्मदा, गौतमी, कावेरी, वरुणा, देविका, निरञ्जना तथा मन्दाकिनी आदि नदियाँ और महानद शोण, पृथ्वी, स्वर्ग एवं अन्तरिक्षमें रहनेवाली नदियाँ आपको नित्य शान्ति प्रदान करें। यक्षराज कुबेर, महायक्ष मणिभद्र, यक्षेन्द्र सुचिर, पाञ्चिक, महातेजस्वी धृतराष्ट्र, यक्षेन्द्र विरूपाक्ष, कञ्जाक्ष तथा अन्तरिक्ष एवं स्वर्गमें रहनेवाले समस्त यक्षगण, यक्षपत्नियाँ, यक्षकुमार तथा यक्षकन्याएँ जो सभी सूर्यकी आराधनामें तत्पर रहते हैं—ये आपको शान्ति प्रदान करें, नित्य कल्याण, बल, सिद्धि भी शीघ्र प्रदान करें एवं मङ्गलमय बनायें।

भगवान् सूर्यकी आराधना करनेवाले सभी पर्वत, ऋद्धि प्रदान करनेवाले वृक्ष, सभी सागर तथा पवित्रारण्य आपको शान्ति प्रदान करें। पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा पातालमें निवास करनेवाले एवं भगवान् सूर्यकी आराधना करनेवाले महाबलशाली और कामरूप सभी राक्षस, प्रेत, पिशाच एवं सभी दिशाओंमें अवस्थित अपस्मारग्रह तथा ज्वरग्रह आदि आपको नित्य शान्ति प्रदान करें।

जिन भगवान् सूर्यके दक्षिण भागमें विष्णु, वाम भागमें शंकर और ललाटमें ब्रह्मा सदा स्थित रहते हैं, ये सभी देवता उन भगवान् सूर्यके तेजसे सम्पन्न होकर आपको शान्ति प्रदान करें तथा सौर-धर्मको जाननेवाले समस्त देवगण

सूर्यभक्तः सूर्यरतः सूर्यपूजापरायणः । सूर्यप्रसादसम्पन्नः करोतु तव शान्तिकम् ॥ विरूपाक्षश्च यक्षेन्द्रः श्वेतवासा महाद्युतिः । नानाकाञ्चनमालाभिरुपशोभितकन्धरः ॥ सूर्यपूजापरो भक्तः कञ्जाक्षः कञ्जसनिभः । तेजसादित्यसंकाशः करोतु तव शान्तिकम् ॥ अन्तरिक्षगता यक्षा ये यक्षाः स्वर्गगमिनः । नानारूपधरा यक्षाः सूर्यभक्ता दृढब्रताः ॥ तद्भक्तास्तद्व्रतमनसः सूर्यपूजासमुत्सुकाः । शान्तिं कुर्वन्तु ते हृष्टाः शान्ताः शान्तिपरायणाः ॥ यक्षिण्यो विविधाकारास्ताथा यक्षकुमारकाः । यक्षकन्या महाभागाः सूर्याराधनतत्पराः ॥ शान्तिं स्वस्त्ययनं क्षेमं बलं कल्याणमुत्तमम् । सिद्धिं चाशु प्रयच्छन्तु नित्यं च सुसमाहिताः ॥ पर्वताः सर्वतः सर्वे वृक्षाश्चैव महर्हिकाः । सूर्यभक्ताः सदा सर्वे शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ सागराः सर्वतः सर्वे गृहारण्यानि कृत्स्नशः । सूर्यस्याराधनपराः कुर्वन्तु तव शान्तिकम् ॥ राक्षसाः सर्वतः सर्वे चोररूपा महाबलाः । स्थलजा राक्षसा ये तु अन्तरिक्षगताश्च ये ॥ पाताले राक्षसा ये तु नित्यं सूर्यार्चने रताः । शान्तिं कुर्वन्तु ते सर्वे तेजसा नित्यदीपिताः ॥ प्रेताः प्रेतगणाः सर्वे ये प्रेताः सर्वतोमुखाः । अतिदीशाश्च ये प्रेता ये प्रेता रुधिराशनाः ॥ अन्तरिक्षे च ये प्रेतास्ताथा ये स्वर्गवासिनः । पाताले भूतले वापि ये प्रेताः कामरूपिणः ॥ एकचक्ररथो यस्य यस्तु देवो वृषध्वजः । तेजसा तस्य देवस्य शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ ये पिशाचा महावीर्या वृद्धिमन्तो महाबलाः । नानारूपधराः सर्वे सर्वे च गुणवत्तराः ॥ अन्तरिक्षे पिशाचा ये स्वर्गं ये च महाबलाः । पाताले भूतले ये च बहुरूपा मनोज्जाः ॥ यस्याहं सारथिवीरं यस्य त्वं तुरगः सदा । तेजसा तस्य देवस्य शान्तिं कुर्वन्तु तेऽञ्जसा ॥ अपस्मारग्रहाः सर्वे सर्वे चापि ज्वरग्रहाः । ये च स्वर्गस्थिताः सर्वे भूमिगा ये ग्रहोत्तमाः ॥ पाताले तु ग्रहा ये च ये ग्रहाः सर्वतो गताः । दक्षिणे किरणे यस्य सूर्यस्य न स्थितो हरिः ॥ हरो यस्य सदा वामे ललाटे कञ्जजः स्थितः । तेजसा तस्य देवस्य शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥ इति देवादयः सर्वे सूर्ययज्ञविधायिनः । कुर्वन्तु जगतः शान्तिं सूर्यभक्तेषु सर्वदा ॥ जय सूर्याय देवाय तमोहन्रे विवस्वते । जयप्रदाय सूर्याय भास्कराय नमोऽस्तु ते ॥ ग्रहोत्तमाय देवाय जय कल्याणकारिणे । जय पद्मविकाशाय वुधरूपाय ते नमः ॥ जय दीप्तिविधानाय जय शान्तिविधायिने । तमोभ्राय जयार्थैव अजिताय नमो नमः ॥ जयार्कं जय दीसीश सहस्रकिरणोज्ज्वल । जय निर्मितलोकस्त्वमजिताय नमो नमः ॥ गायत्रीदेहरूपाय सावित्रीदीयिताय च । धराधराय सूर्याय मार्तण्डाय नमो नमः ॥

(ब्राह्मपर्व १८०।१—३९)

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२०६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

संसारके सूर्यभक्तों एवं सभी प्राणियोंको सर्वदा शान्ति प्रदान करें।

अन्धकार दूर करनेवाले तथा जय प्रदान करनेवाले विवस्वान् भगवान् भास्करकी सदा जय हो। ग्रहोंमें उत्तम तथा कल्याण करनेवाले, कमलको विकसित करनेवाले भगवान् सूर्यकी जय हो, ज्ञानस्वरूप भगवान् सूर्य! आपको नमस्कार है। शान्ति एवं दीसिका विधान करनेवाले, तमोहन्ता भगवान् अजित! आपको नमस्कार है, आपकी जय हो। सहस्र-किरणोज्ज्वल, दीसिस्वरूप, संसारके निर्माता आपको बार-बार नमस्कार है, आपकी जय हो। गायत्रीस्वरूपवाले, पृथ्वीको धारण करनेवाले सावित्री-प्रिय मार्तण्ड भगवान् सूर्यदेव! आपको बार-बार नमस्कार है, आपकी जय हो।

सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस विधानसे अरुणके द्वारा वैन्तेय गरुडके कल्याणके लिये शान्ति-विधान करते ही वे सुन्दर पंखोंसे समन्वित हो गये। वे तेजमें बुधके समान देदीप्यमान और बलमें विष्णुके समान हो गये। राजन्! देवाधिदेव सूर्यके प्रसादसे सुपर्णके सभी अवयव पूर्ववत् हो गये।

राजन्! इसी प्रकार अन्य रोगग्रस्त मानवगण इस अग्रिकार्यसे (सौरी-शान्तिसे) नीरोग हो जाते हैं। इसलिये इस शान्ति-विधानको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। ग्रहोपघात, दुर्भिक्ष, सभी उत्पातोंमें तथा अनावृष्टि आदिमें लक्ष-होमसमन्वित सौरसूक्तसे यत्नपूर्वक पूजन कर एवं वारुणसूक्तसे प्रसन्नचित्त हो घी, मधु, तिल, यव एवं मधुके साथ पायससे हवन एवं शान्ति करे और सावधान हो बलि (नैवेद्य) प्रदान करे। ऐसा करनेसे देवतागण मनुष्योंके

कल्याणकी कामना करते हैं एवं उनके लिये लक्ष्मीकी वृष्टि करते हैं। जो मनुष्य भगवान् दिवाकरका ध्यान कर इस शान्ति-अध्यायको पढ़ता या सुनता है, वह रणमें शत्रुपर विजयी हो परम सम्मानको प्राप्त कर एकच्छत्र शासक होकर सदा आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। वह पुत्र-पौत्रोंसे प्रतिष्ठित होकर आदित्यके समान तेजस्वी एवं प्रभासमन्वित व्याधिशून्य जीवन-यापन करता है। वीर! जिसके कल्याणके उद्देश्यसे इस शान्तिकाध्याय (शान्तिकल्प)-का पाठ किया जाता है, वह वात-पित्त, कफजन्म रोगोंसे पीड़ित नहीं होता एवं उसकी न तो सर्पके दंशसे मृत्यु होती है और न अकालमें मृत्यु होती है। उसके शरीरमें विषका प्रभाव भी नहीं होता एवं जड़ता, अन्धत्व, मूकता भी नहीं होती। उत्पत्ति-भय नहीं रहता और न किसीके द्वारा किया गया अभिचार-कर्म सफल होता है। रोग, महान् उत्पात, महाविपैले सर्प आदि सभी इसके श्रवणसे शान्त हो जाते हैं। सभी गङ्गादि तीर्थोंका जो विशेष फल है, उसका कई गुना फल इस शान्तिकाध्यायके श्रवणसे प्राप्त होता है और दस राजसूय एवं अन्य यज्ञोंका फल भी उसे मिलता है। इसे सुननेवाला सौ वर्षतक व्याधिरहित नीरोग होकर जीवनयापन करता है। गोहत्यारा, कृतघ्न, ब्रह्मघाती, गुरुतल्पगामी और शरणागत, दीन, आर्त, मित्र तथा विश्वासी व्यक्तिके साथ घात करनेवाला, दुष्ट, पापाचारी, पितृघातक एवं मातृघातक सभी इसके श्रवणसे निःसंदेह पापमुक्त हो जाते हैं। यह अग्निकार्य अतिशय उत्तम एवं परम पुण्यमय है।

(अध्याय १७५—१८०)

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  • ब्राह्मपर्व *

२०७

विविध स्मृति-धर्मो तथा संस्कारोंका वर्णन

राजा शतानीकने कहा—ब्रह्मन्! पाँच प्रकारके जो स्मृति आदि धर्म हैं, उन्हें जाननेकी मुझे बड़ी ही अभिलाषा है। कृपापूर्वक आप उनका वर्णन करें।

सुमन्तुजी बोले—महाराज! भगवान् भास्करने अपने सारथि अरुणसे जिन पाँच प्रकारके धर्मोंको बतलाया था, मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, आप उन्हें सुनें।

भगवान् सूर्यने कहा—गरुडाग्रज! स्मृतिप्रोक्त धर्मका मूल सनातन वेद ही है। पूर्वानुभूत ज्ञानका स्मरण करना ही स्मृति है। स्मृत्यादि धर्म पाँच प्रकारके होते हैं। इन धर्मोंका पालन करनेसे स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है तथा इस लोकमें सुख, यश और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। पहला वेद-धर्म है। दूसरा है आश्रम-धर्म अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। तीसरा है वर्णाश्रम-धर्म अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। चौथा है गुणधर्म और पाँचवाँ है नैमित्तिक धर्म—ये ही स्मृत्यादि पाँच प्रकारके धर्म कहे गये हैं। वर्ण और आश्रमधर्मके अनुसार अपने कर्तव्योंका निर्वाह करते हुए कर्मोंको सम्पादित करना ही वर्णाश्रम और आश्रमधर्म कहलाता है। जिस धर्मका प्रवर्तन गुणके द्वारा होता है, वह गुणधर्म कहलाता है। किसी निमित्तको लेकर जो धर्म प्रवर्तित होता है, उसे नैमित्तिक धर्म कहते हैं। यह नैमित्तिक धर्म जाति, द्रव्य तथा गुणके आधारपर होता है।

निषेध और विधिरूपमें शास्त्र दो प्रकारके होते हैं। स्मृतियाँ पाँच प्रकारकी हैं—दृष्ट-स्मृति, अदृष्ट-स्मृति, दृष्टादृष्ट-स्मृति, अनुवाद-स्मृति और अदृष्टादृष्ट-स्मृति। सभी स्मृतियोंका मूल वेद ही है। स्मृतिधर्मके साधन-स्थान ब्रह्मावर्त, मध्यक्षेत्र, मध्यदेश, आर्यावर्त तथा यज्ञिय आदि देश हैं।

सरस्वती और दृष्टद्वती (कुरुक्षेत्रके दक्षिण सीमाकी एक नदी) इन दो देव-नदियोंके बीचका जो देश है वह देव-निर्मित देश ब्रह्मावर्त नामसे कहा जाता है। हिमाचल और विन्ध्यपर्वतके बीचके देशको जो कुरुक्षेत्रके पूर्व और प्रयागके पश्चिममें स्थित है, उसे मध्यदेश कहा जाता है। पूर्व-समुद्र तथा पश्चिम-समुद्र, हिमालय तथा विन्ध्याचल पर्वतके बीचके देशको आर्यावर्तदेश कहा जाता है। जहाँ कृष्णसार मृग (कस्तूरी मृग) विचरण करते हैं और स्वभावतः निवास करते हैं, वह यज्ञियदेश है। इनके अतिरिक्त दूसरे अन्य देश म्लेच्छदेश हैं जो यज्ञ आदिके योग्य नहीं हैं। द्विजातियोंको चाहिये कि विचारपूर्वक इन देशोंमें निवास करें।

भगवान् आदित्यने पुनः कहा—खगराज! अब मैं आश्रमधर्म बतला रहा हूँ। ब्रह्मचर्याश्रम-धर्म, गृहस्थाश्रम-धर्म, वानप्रस्थाश्रम-धर्म और संन्यासाश्रम-धर्म—क्रमसे इन चार प्रकारसे जीवन-यापन करनेको आश्रमधर्म कहा जाता है। एक ही धर्म चार प्रकारसे विभक्त हो जाता है। ब्रह्मचारीको गायत्रीकी उपासना करनी चाहिये। गृहस्थको संतानोत्पत्ति और ब्राह्मण, देव आदिकी पूजा करनी चाहिये। वानप्रस्थीको देवव्रत-धर्मका और संन्यासीको नैष्ठिक धर्मका पालन करना चाहिये। इन चारों आश्रमोंके धर्म वेदमूलक हैं। गृहस्थको ऋतुकालमें मन्त्रपूर्वक गर्भाधान-संस्कार करना चाहिये। तीसरे मासमें पुंसवन तथा छठे अथवा सातवें मासमें सीमन्तोन्नयन-संस्कार करना चाहिये। जन्मके समय जातकर्म-संस्कार करना चाहिये। जातक (शिशु)-को स्वर्ण, घी, मधुका मन्त्रोंद्वारा प्राशन कराना चाहिये। जन्मसे दसवें, ग्यारहवें या बारहवें दिन शुभ मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, योग आदि

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२०८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

देखकर नामकरण-संस्कार करना चाहिये। शास्त्रानुसार छठे मासमें अन्नप्राशन करना चाहिये। सभी द्विजाति बालकोंका चूड़ाकरण-संस्कार एक वर्ष अथवा तीसरे वर्षमें करना चाहिये। ब्राह्मण-बालकका आठवें वर्षमें, क्षत्रियका ग्यारहवें और वैश्यका बारहवें वर्षमें यज्ञोपवीत-संस्कार करना उत्तम होता है। गुरुसे गायत्रीकी दीक्षा ग्रहण कर वेदाध्ययन करना चाहिये। विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुकी आज्ञा प्राप्तकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये और गुरुको यथेष्ट सुवर्णादि देकर प्रसन्न करना चाहिये। गृहस्थाश्रममें प्रवेश कर अपने समान वर्णवाली उत्तम गुणोंसे युक्त कन्यासे विवाह करना चाहिये। जो कन्या माता-पिताके कुलसे सात पीढ़ीतककी न हो और समान गोत्रकी न हो ऐसी अपने वर्णकी कन्यासे विवाह

करना चाहिये।

विवाह आठ प्रकारके होते हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। वर और कन्याके गुण-दोषको भलीभाँति परखनेके बाद ही विवाह करना चाहिये। कन्याएँ अवस्था-भेदसे चार प्रकारकी होती हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं—गौरी, नग्निका, देवकन्या तथा रोहिणी। सात वर्षकी कन्या गौरी, दस वर्षकी नग्निका, बारह वर्षकी देवकन्या तथा इससे अधिक आयुकी कन्या रोहिणी (रजस्वला) कहलाती है। निन्दित कन्याओंसे विवाह नहीं करना चाहिये। द्विजातियोंको अग्निके साक्ष्यमें विवाह करना चाहिये। स्त्री-पुरुषके परस्पर मधुर एवं दृढ़ सम्बन्धोंसे धर्म, अर्थ और कामकी उत्पत्ति होती है और वही मोक्षका कारण भी है। (अध्याय १८१-१८२)

श्राद्धके विविध भेद तथा वैश्वदेव-कर्मकी महिमा

भगवान् सूर्यने अनूठ (अरुण)-से कहा—अरुण! द्विजमात्रको विधिपूर्वक पञ्चमहायज्ञ—भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, दैवयज्ञ और मनुष्ययज्ञ करना चाहिये। बलिवैश्वदेव करना भूतयज्ञ, तर्पण करना पितृयज्ञ, वेदका अध्ययन और अध्यापन करना ब्रह्मयज्ञ, हवन करना देवयज्ञ तथा घरपर आये हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन आदिसे संतुष्ट करना मनुष्ययज्ञ कहा जाता है।

श्राद्ध बारह प्रकारके होते हैं—नित्य-श्राद्ध, नैमित्तिक-श्राद्ध, काम्य-श्राद्ध, वृद्धि-श्राद्ध, सपिण्डन-श्राद्ध, पार्वण-श्राद्ध, गोष्ठ-श्राद्ध, शुद्धि-श्राद्ध, कर्माङ्ग-श्राद्ध, दैविक श्राद्ध, औपचारिक श्राद्ध तथा सांवत्सरिक श्राद्ध। तिल, व्रीहि (धान्य), जल, दूध, फल, मूल, शाक आदिसे पितरोंकी संतुष्टिके लिये प्रतिदिन श्राद्ध करना चाहिये। जो श्राद्ध प्रतिदिन किया जाता है, वह नित्य-श्राद्ध है। एकोद्वि श्राद्धको नैमित्तिक-

श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्धको विधिपूर्वक सम्पन्न कर अयुग्म (विषम संख्या) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। जो श्राद्ध कामनापरक किया जाता है, वह काम्य-श्राद्ध है। इसे पार्वण-श्राद्धकी विधिसे करना चाहिये। वृद्धिके लिये जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि-श्राद्ध कहते हैं। ये सभी श्राद्धकर्म पूर्वाह्न-कालमें उपवीती होकर करने चाहिये। सपिण्डन-श्राद्धमें चार पात्र बनाने चाहिये। उनमें गन्ध, जल और तिल छोड़ना चाहिये। प्रेत-पात्रका जल पितृ-पात्रमें छोड़े। इसके लिये 'ये समानाः०' (यजु० १९।४५-४६) मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये। स्त्रीका भी एकोद्वि-श्राद्ध करना चाहिये। अमावास्या तथा किसी पर्वपर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे पार्वण-श्राद्ध कहते हैं। गौओंके लिये किया जानेवाला श्राद्ध-कर्म गोष्ठ-श्राद्ध कहा जाता है। पितरोंकी तृसिके लिये, सम्पत्ति और सुखकी प्राप्ति-हेतु तथा

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  • ब्राह्मपर्व *

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विद्वानोंकी संतुष्टिके निमित्त जो ब्राह्मणोंको भोजन कराया जाता है, वह शुद्धचर्य-श्राद्ध है। गर्भाधान, सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन-संस्कारोंके समय किया गया श्राद्ध कर्माङ्ग-श्राद्ध है। यात्रा आदिके दिन देवताके उद्देश्यसे घीके द्वारा किया गया हवनादि कार्य दैविक श्राद्ध कहलाता है। शरीरकी वृद्धि, शरीरकी पुष्टि तथा अश्ववृद्धिके निमित्त किया गया श्राद्ध औपचारिक श्राद्ध कहलाता है। सभी श्राद्धोंमें सांवत्सरिक श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ है। इसे मृत व्यक्तिकी तिथिपर करना चाहिये। जो व्यक्ति सांवत्सरिक श्राद्ध नहीं करता, उसकी पूजा न मैं ग्रहण करता हूँ, न विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र एवं अन्य देवगण ही ग्रहण करते हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक प्रत्येक वर्ष मृत व्यक्तिकी तिथिपर सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये। जो व्यक्ति माता-पिताका वार्षिक श्राद्ध नहीं करता, वह घोर तामिस्त्र नामक नरकको प्राप्त करता है और अन्तमें सूकर-योनिमें उत्पन्न होता है।

अरुणने पूछा— भगवन्! जो व्यक्ति माता-पिताकी मृत्युकी तिथि, मास और पक्षको नहीं जानता, उस व्यक्तिको किस दिन श्राद्ध करना चाहिये? जिससे वह नरकभागी न हो?

भगवान् आदित्यने कहा— पक्षिराज अरुण! जो व्यक्ति माता-पिताके मृत्युके दिन, मास और

पक्षको नहीं जानता, उस व्यक्तिको अमावास्याके दिन सांवत्सरिक नामक श्राद्ध करना चाहिये। जो व्यक्ति मार्गशीर्ष और माघमें पितरोंके उद्देश्यसे विशिष्ट भोजनादिद्वारा मेरी पूजा-अर्चना करता है, उसपर मैं अति प्रसन्न होता हूँ और उसके पितर भी संतुष्ट हो जाते हैं। पितर, गौ तथा ब्राह्मण—ये मेरे अत्यन्त इष्ट हैं। अतः विशेष भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये।

वेद-विक्रयद्वारा और स्त्रीद्वारा प्राप्त किया गया धन पितृकार्य और देव-पूजनादिमें नहीं लगाना चाहिये। वैश्वदेव कर्मसे हीन और भगवान् आदित्यके पूजनसे हीन वेदवेत्ता ब्राह्मणको भी निन्द्य समझना चाहिये। जो वैश्वदेव किये बिना ही भोजन कर लेता है वह मूर्ख नरकको प्राप्त करता है, उसका अन्न-पाक व्यर्थ है। प्रिय हो या अप्रिय, मूर्ख हो या विद्वान्, वैश्वदेव कर्मके समय आया हुआ व्यक्ति अतिथि होता है और वह अतिथि स्वर्गका सोपानरूप होता है। जो बिना तिथिका विचार किये ही आता है उसे अतिथि कहते हैं। वैश्वदेव-कर्मके समय जो न तो पहले कभी आया हो और न ही उसके पुनः आनेकी सम्भावना हो तो उस व्यक्तिको अतिथि जानना चाहिये। उसे साक्षात् विश्वेदेवके रूपमें ही समझना चाहिये। (अध्याय १८३-१८४)

मातृ-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि

भगवान् आदित्यने कहा— अरुण! रात्रिमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। रात्रिमें किया गया श्राद्ध राक्षसी श्राद्ध कहा जाता है। दोनों संध्याओंमें और सूर्यके अस्त होनेपर भी श्राद्ध करना निषिद्ध है।

अरुणने पूछा— भगवन्! माताका श्राद्ध किस प्रकार करना चाहिये और माता किन्हें माना गया है? नान्दीमुख-पितरोंका पूजन किस प्रकार करना

चाहिये, इन्हें मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् आदित्यने कहा— खगशार्दूल! मैं मातृ-श्राद्धकी विधि बतला रहा हूँ, उसे सुनिये।

मातृ-श्राद्धमें पूर्वहृ-कालमें आठ विद्वान् ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये तथा एक और अन्य नवम सर्वदैवत्य ब्राह्मणको भी भोजन देना चाहिये। इस प्रकार नौ ब्राह्मणोंको भोजन कराना

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

चाहिये। यव, तिल, दधि, गन्ध-पुष्पादिसे युक्त अर्घ्यद्वारा सबकी पूजा करनी चाहिये तथा सभी ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको मधुर मिष्ठान् भोजन कराना चाहिये। भोजनमें कटु पदार्थ नहीं होने चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पिण्डदान देना चाहिये। दही-अक्षतका पिण्ड बनाये। एक चौंस मण्डप बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करे। सव्य होकर हाथसे पूर्वाग्र कुशों तथा पुष्पोंको चढ़ाना चाहिये। माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता, पितामही, प्रपितामही, वृद्धप्रपितामही तथा अन्य अपने कुलमें जो भी माताएँ हों, उन्हें आदरपूर्वक निमन्त्रित करना चाहिये। इस प्रकार माताओंको उद्दिष्ट कर छः पिण्ड बनाकर पूजन

करना चाहिये। नान्दीमुखको उद्दिष्ट कर पाँच उत्तम ब्राह्मणोंको पाँच पितरोंके रूपमें भोजन कराना चाहिये। नान्दीमुख-श्राद्धमें ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये।

खगपते! श्राद्धमें दौहित्र अर्थात् नाती, कुतुप वेला (एक बजे दिनका समय) और तिल—ये तीन पवित्र माने गये हैं तथा तीन प्रशंसायोग्य कहे गये हैं—शुद्धि, अक्रोध और शीघ्रता न करना। एक वस्त्र धारण कर देव-पूजन और पितरोंके कर्म नहीं करने चाहिये। बिना उत्तरीय वस्त्र धारण किये पितर, देवता और मनुष्योंका पूजन, अर्चन तथा भोजन आदि सब कार्य निष्फल होता है। (अध्याय १८५)

सौर-धर्ममें शुद्धि-प्रकरण

भगवान् भास्करने कहा—खगाधिप! ब्राह्मणोंको नित्य पवित्र तथा मधुरभाषी होना चाहिये, उन्हें प्रतिदिन स्नानादिसे पवित्र हो चन्दनादि सुगन्धित द्रव्योंको धारणकर देवताओंका पूजन आदि करना चाहिये। सूर्यको निष्प्रयोजन नहीं देखना चाहिये और नग्न स्त्रीको भी नहीं देखना चाहिये। मैथुनसे दूर रहना चाहिये। जलमें मूत्र तथा विष्टाका परित्याग नहीं करना चाहिये। शास्त्रोक्त नियमोंके अनुसार कर्म करने चाहिये। शास्त्र-वर्णित कर्मानुष्ठानके अतिरिक्त कोई भी व्रतादि नहीं करने चाहिये।

खगाधिपते! अभक्ष्य-भक्षण सभी वर्णोंके लिये वर्जित है। द्रव्यकी शुद्धि होनेपर ही कर्मकी शुद्धि होती है अन्यथा कर्मके फलकी प्राप्तिमें संशय ही बना रहता है। जातिसे दुष्ट, क्रियासे दुष्ट, कालसे दुष्ट, संसर्गसे दुष्ट, आश्रयसे दुष्ट तथा सहल्लेख (स्वभावतः निन्दित एवं अभक्ष्य) पदार्थमें अथवा दूषित हृदयके एवं कपटी व्यक्तिके स्वभावमें परिवर्तन नहीं होता। लहसुन, गाजर, प्याज, कुकुरमुत्ता,

बैंगन (सफेद) तथा मूली (लाल) आदि जाल्या दूषित हैं। इनका भक्षण नहीं करना चाहिये। जो वस्तु क्रियाके द्वारा दूषित हो गयी हो अथवा पतितोंके संसर्गसे दूषित हो गयी हो, उसका प्रयोग न करे। अधिक समयतक रखा गया पदार्थ कालदूषित कहलाता है, वह हानिकर होता है, पर दही तथा मधु आदि पदार्थ कालदूषित नहीं होते। सुरा, लहसुन तथा सात दिनके अंदर ब्यायी हुई गायके दूधसे युक्त पदार्थ और कुत्तेद्वारा स्पर्श किये गये पदार्थ संसर्ग-दुष्ट कहे जाते हैं। इन पदार्थोंका परित्याग करना चाहिये। शूद्रसे तथा विकलाङ्ग आदिसे स्मृष्ट पदार्थ आश्रय-दूषित कहा जाता है। जिस वस्तुके भक्षण करनेमें मनमें स्वभावतः घृणा उत्पन्न हो जाती है, जैसे पुरीष (विष्टा)-के प्रति स्वभावतः घृणा उत्पन्न होती है—उसे ग्रहण नहीं करना चाहिये। वह सहल्लेख दोषयुक्त पदार्थ कहा गया है। खीर, दूध, पाकादिका भक्षण शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ही करना चाहिये।

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  • ब्राह्मपर्व *

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सपिण्डमें दस दिन, बारह दिन अथवा पंद्रह दिन और एक मासमें प्रेत-शुद्धि हो जाती है। सूतकाशौच तथा मरणाशौचमें दस दिनेके भीतर किसी व्यक्तिके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये। दशगात्र एवं एकादशाहके बीत जानेपर बारहवें दिन स्नान करनेसे शुद्धि हो जाती है। संवत्सर पूर्ण हो जानेपर स्नान-मात्रसे ही शुद्धि हो जाती है। सपिण्डमें जन्म और मृत्यु होनेपर अशौच लगता है। दाँत आनेतकके बालककी मृत्यु हो जानेपर सद्यः शुद्धि हो जाती है। चूडाकरणके पहले बालककी मृत्यु हो जानेपर एक दिन-रातकी अशुद्धि होती है तथा चूडाकरणके बाद और यज्ञोपवीत लेनेके पहले मृत्यु होनेपर त्रिरात्र अशुद्धि होती है और इसके अनन्तर दशरात्रकी

अशुद्धि होती है। गर्भस्नाव हो जानेपर तीन रात्रिके पश्चात् जलसे स्नान करनेके बाद शुद्धि होती है। असपिण्ड (एवं सगोत्री)-की मृत्यु होनेपर तीन अहोरात्रके बाद शुद्धि होती है। यदि केवल शव-यात्रा करता है तो स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है। द्रव्यकी शुद्धि आगमें तपाने, मिट्टी और जलसे धोने तथा मल हटाने, प्रक्षालन करने, स्पर्श और प्रोक्षण करनेसे होती है। द्रव्य-शुद्धिके पश्चात् स्नान करनेसे शुद्धि होती है। प्रातःकालका स्नान नित्य-स्नान है, ग्रहणमें स्नान करना काम्य-स्नान है तथा क्षौर और शौचादिके पश्चात् जो स्नान किया जाता है वह नैमित्तिक स्नान है, इससे पापादिकी निवृत्ति होती है।

(अध्याय १८६)

श्रद्धाकी महिमा, खखोल्ल-मन्त्रका माहात्म्य तथा गौकी महिमा

अरुणने पूछा—भगवन्! आदित्यदेव! मनुष्य किस पुण्यकर्मका सम्पादन कर स्वर्ग जाते हैं? कर्मयज्ञ, तपोयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ध्यानयज्ञ और ज्ञानयज्ञ—इन पाँच यज्ञोंमें सर्वोत्तम यज्ञ कौन है? इन यज्ञोंका क्या फल है और इनसे कौन-सी गति प्राप्त होती है? धर्म और अधर्मके कितने भेद कहे गये हैं? उनके साधन क्या हैं और उनसे कौन-सी गति होती है। नारकी पुरुषोंके पुनः पृथ्वीपर आनेपर भोगसे शेष कर्मोंके कौन-कौनसे चिह्न उपलब्ध रहते हैं। इस धर्माधर्मसे व्याप्त भवसागर तथा गर्भमें आगमनरूपी दुःखसे कैसे मुक्ति प्राप्त होती है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् सूर्य बोले—अरुण! स्वर्ग और अपर्ग (मोक्ष)-के फलको देनेवाले तथा नरकरूपी समुद्रसे पार करानेवाले, पापहारी एवं पुण्यप्रद धर्मको सुनो।

धर्मके पूर्वमें तथा मध्यमें और उसके अन्तमें श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धानिष्ठ ही धर्म प्रतिष्ठित होता है, अतः धर्म श्रद्धामूलक ही है। वेद-मन्त्रोंके अर्थ अतीव गूढतम हैं। उनमें प्रधान पुरुष परमेश्वर अधिष्ठित हैं, अतः इन्हें श्रद्धाके आश्रयसे ही ग्रहण किया जा सकता है। ये इस बाह्य चक्षुसे नहीं देखे जाते। श्रद्धारहित देवता भी भाँति-भाँतिके शरीरको कष्ट देनेपर तथा अत्यधिक अर्थव्यय करनेपर भी धर्मके सूक्ष्मरूप वेदमय परमात्माको नहीं प्राप्त कर सकते। श्रद्धा परम सूक्ष्म धर्म है, श्रद्धा यज्ञ है, श्रद्धा हवन, श्रद्धा तप, श्रद्धा ही स्वर्ग और मोक्ष है। यह सम्पूर्ण जगत् श्रद्धामय ही है, अश्रद्धासे सर्वस्व जीवन देनेपर भी कुछ फल नहीं होता। बिना श्रद्धाके किया गया कार्य सफल नहीं होता। अतः मानवको श्रद्धा-सम्पन्न होना चाहिये*।

  • श्रद्धापूर्वः सदा धर्मः श्रद्धामध्यान्तसंस्थितः । श्रद्धानिष्ठप्रतिष्ठश्च धर्मः श्रद्धा प्रकीर्तिता ॥ श्रुतिमन्त्रसः सूक्ष्माः प्रधानपुरुषेश्वरः । श्रद्धामात्रेण गूढन्ते न परेण च चक्षुषा ॥

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२१२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हे खगश्रेष्ठ ! अब मेरे मण्डलके विषयमें सुनो । मेरा कल्याणमय मण्डल खखोलक नामसे विख्यात है । यह तीनों देवों एवं तीनों गुणोंसे परे एवं सर्वज्ञ है । यह सर्वशक्तिमान् है । 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रमें यह मण्डल अवस्थित है । जैसे घोर संसार-सागर अनादि है वैसे ही खखोलक भी अनादि और संसार-सागरका शोधक है । जैसे व्याधियोंके लिये औषधि होती है वैसे ही यह संसार-सागरके लिये औषधि है । मोक्ष चाहनेवालोंके लिये मुक्तिका साधन और सभी अर्थोंका साधक है । खखोलक नामका यह मेरा मन्त्र सदा उच्चारण एवं स्मरण करने योग्य है । जिसके हृदयमें यह 'ॐ नमः खखोलकाय' मन्त्र स्थित है, उसीने सब कुछ पढ़ा है, सुना है और सब कुछ अनुष्ठित किया है—ऐसा समझना चाहिये ।

मनीषियोंने इस खखोलकको मार्तण्डके नामसे कहा है । उसके प्रति श्रद्धायुक्त होनेपर पुण्य प्राप्त होता है और अश्रद्धासे अधःपतन होता है । सूर्य-सम्बन्धी वचनको कहनेवाले गुरुकी सूर्यके समान पूजा करनी चाहिये । वह गुरु भवसागरमें निमग्न व्यक्तिका उद्धार कर देता है । सौरधर्मरूपी शीतल जलके द्वारा जो अज्ञानरूपी वहिसे संतप्त मनुष्यको शान्त करता है, उसके समान गुरु कौन होगा ? जो भक्तोंको ज्ञानरूपी अमृतसे आप्लावित करते हैं, भला उनकी कौन पूजा नहीं करेगा । स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष)-की प्राप्तिके लिये देवाधिदेव सूर्यके द्वारा जो वाक्य कहे गये हैं, वे अतिशय कल्याणकारी हैं । राग, द्वेष, अक्षमा, क्रोध, काम, तृष्णाका अनुसरण करनेवाले व्यक्तिका कहा हुआ वाक्य नरकका साधन होनेसे दुर्भाषित कहा जाता

है । अविद्यात्मक संसारके क्लेश-साधक मुदुल आलापवाले संस्कृत वाक्यसे भी क्या लाभ है ? जिस वाक्यके सुननेसे राग-द्वेष आदिका नाश एवं पुण्य प्राप्त होता है, वह कठोर वाक्य भी अतिशय शोभाजनक है । स्मृतियाँ, महाभारत, वेद, महान् शास्त्र यदि धर्म-साधक न बन सकें तो इनका अध्ययनमात्र अपनी आयुके व्यतीत करनेके लिये ही है । सहस्रों वर्षकी आयु प्राप्त करनेपर भी शास्त्रका अन्त नहीं मिलता । अतः सभी शास्त्रोंको छोड़कर अक्षर तन्मात्र (परमात्मा)-का ज्ञान कर परलोकके अनुरूप आचरण करना चाहिये । मनुष्योंके समर्थ शरीरसे भी क्या लाभ है जो पारलौकिक पुण्य-भारको वहन करनेमें असमर्थ है । जो सौर-ज्ञानके माहात्म्यको उच्चारण करनेमें असमर्थ है, वह शक्तिसम्पन्न और पण्डित होते हुए भी मूर्ख है । इसलिये जो सौर-ज्ञानके सद्भावकी महिमामें तत्पर रहता है, वही पण्डित, समर्थ, तपस्वी और जितेन्द्रिय है । जो नृप गुरुको सम्पूर्ण पृथिवी, धन और सुवर्ण आदि देकर भी यदि अन्यायपूर्वक सौर-ज्ञानकी जिज्ञासा करता है अर्थात् अन्यायाचरण करते हुए पूछता है तो उसे षडक्षर-मन्त्रका उपदेश गुरुको नहीं देना चाहिये । जो भगवान् सूर्यके धर्मको न्यायपूर्वक विनम्र भावसे सुनता है और कहता है, वह उचित स्थानको प्राप्त करता है, अन्यथा उसके विपरीत नरकको जाता है ।

जो भगवान् सूर्यके षडक्षर-मन्त्रसे विधानपूर्वक गोदुग्धद्वारा सूर्यकी पूजा करता है वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ है । देवासुरोंद्वारा मन्थन करनेपर क्षीरसागरसे सभी लोकोंकी मातृस्वरूपा पाँच गौएँ उत्पन्न हुईं—नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुमना तथा शोभनावती ।

कायकलेशीर्न बहुभिर्न चैवार्थस्य राशिभिः । धर्मः सम्प्राप्यते सूक्ष्मः श्रद्धाहीनेः सुरैरपि ॥

श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा यज्ञाहुतं तपः । श्रद्धा मोक्षश्च स्वर्गश्च श्रद्धा सर्वमिदं जगत् ॥

सर्वस्व जीवितं वापि दद्यादश्रद्धया च यः । नागृह्यात् स फलं किंचित् तस्माच्छ्रद्धापरो भवेत् ॥ (ब्राह्मपर्व १८७।१-१३)

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  • ब्राह्मपर्व *

२१३

गौएँ तेजमें सूर्यके समान हैं। ये सम्पूर्ण संसारका उपकार करनेके लिये एवं देवताओंकी तृप्तिके लिये और मुझे स्नान करानेके लिये उत्पन्न हुई हैं। ये मेरा ही आधार लेकर स्थित हैं। गौओंके सभी अङ्ग पवित्र हैं। उनमें छहों रस निहित हैं। गायके गोबर, मूत्र, गोरोचन, दूध, दही तथा घृत—ये छः पदार्थ परम पवित्र हैं तथा सभी सिद्धियोंको देनेवाले हैं। सूर्यका परम प्रिय बिल्ववृक्ष गोमयसे ही उत्पन्न हुआ है, उस वृक्षपर कमलहस्ता लक्ष्मी विराजमान रहती हैं, अतः यह श्रीवृक्ष कहा जाता है। गोमयसे पङ्क उत्पन्न होता है और उससे कमल उत्पन्न हुए हैं। गोरोचन परम मङ्गलमय, पवित्र और सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। गोमूत्रसे सभी देवोंका आहार-स्वरूप विशेषकर भास्करके लिये भोग्य एवं प्रियदर्शन सुगन्धित गुग्गुल उत्पन्न हुआ है। जगत्के सभी बीज क्षीरसे उत्पन्न हुए हैं। कामनाकी सिद्धिके लिये सभी माङ्गल्य वस्तु दहीसे उत्पन्न समझें। देवोंका अतिशय प्रिय अमृत घृतसे उत्पन्न है, अतः घी, दूध, दहीसे भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। अनन्तर उष्ण जल और कषायसे स्नान कराना चाहिये। फिर शीतल जलसे स्नान कराकर गोरोचनका लेपन एवं बिल्वपत्र, कमल और नीलकमलसे

पूजन करना चाहिये। शर्करायुक्त गुग्गुलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। दूध, दही, भात, मधुके साथ शर्करा एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंको निवेदित करे। इसके बाद भगवान् भास्करकी प्रदक्षिणा कर उनसे क्षमा-याचना करे।

इस विधिसे जो दिनपति भगवान् भानुकी पडङ्ग-पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्तकर अपने कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंको स्वर्गमें ले जाता है तथा उन्हें वहाँ प्रतिष्ठित कर स्वयं ज्योतिष्क नामक स्थानको प्राप्त करता है। भगवान् भास्करकी पूजामें पत्र, पुष्प, फल, जल जो भी अर्पित होता है वह सब तथा सूर्य-सम्बन्धी गौएँ भी सूर्यलोकको प्राप्त करती हैं, इसमें संदेह नहीं है। देश, काल तथा विधिके अनुरूप श्रद्धापूर्वक सुपात्रको दिया गया अल्प भी दान अक्षय होता है। हे वीर! तिलका अर्धपरिमाणमात्र सत्पात्रको दिया गया श्रद्धापूर्वक दान सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। जिसने ज्ञानरूपी जलसे स्नान कर लिया है और शीलरूपी भस्मसे अपनेको शुद्ध कर लिया है, वह सभी पात्रोंमें उत्तम सत्पात्र माना गया है। जप, इन्द्रियदमन और संयम मनुष्यको संसार-सागरसे पार उतारनेवाले साधन हैं। (अध्याय १८७)

पञ्चमहायज्ञ एवं अतिथि-माहात्म्य-वर्णन, सौर-धर्ममें दानकी महत्ता और पात्रापात्रका निर्णय तथा पञ्च महापातक

समाश्रवाहन ( भगवान् सूर्य )-ने कहा—हे वीर! जो प्राणी सूर्य, अग्नि, गुरु तथा ब्राह्मणको निवेदन किये बिना स्वयं जो कुछ भी भक्षण

करता है वह पाप-भक्षण करता है। गृहस्थ मनुष्योंके कृषिकार्यसे, वाणिज्यसे, क्रोध और असत्य आदिके आचरणसे तथा पञ्चसूना*-दोषसे

  • भोजन पकानेका स्थान (चूल्हा), आटा आदि पीसनेका स्थान (चक्की आदि) मसाला आदि कूटने-पीसनेका स्थान (लोढ़ा, सिलवट आदि), जल रखनेका स्थान तथा झाडू देनेका काम—इनमें अनजाने ही हिंसाकी सम्भावना रहती है। अतः गृहस्थके लिये इन्हें ही पञ्चसूना-दोष कहा गया है।

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२१४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पाप होते हैं। सूर्य, गुरु, अग्नि और अतिथि आदिके सेवारूप पञ्चमहायज्ञोंसे ये पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार अन्य पापोंसे भी वह लिस नहीं होता, अतः इनकी नित्य पूजा करनी चाहिये। देवाधिदेव दिवाकरके प्रति जो इस प्रकार भक्ति करता है, वह अपने पितरोंको सभी पापोंसे विमुक्त कर स्वर्ग ले जाता है।

हे खग! भगवान् सूर्यके दर्शनमात्रसे ही गङ्गा-स्नानका फल एवं उन्हें प्रणाम करनेसे सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है तथा सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। संध्या-समयमें सूर्यकी सेवा करनेवाला सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। एक बार भी भगवान् सूर्यकी आराधना करनेसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, पितृगण तथा सभी देवगण एक ही साथ पूजित एवं संतुष्ट हो जाते हैं।

श्राद्धमें भगवान् सूर्यकी पूजा करने तथा सौर-भक्तोंको भोजन करानेसे पितृगण तृप्त हो जाते हैं। पुराणवेत्ताको आते हुए देखकर सभी ओषधियाँ यह कहकर आनन्दसे नृत्य करने लगती हैं कि आज हमें अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा। पितृगण एवं देवगण अतिथिके रूपमें लोकके अनुग्रह और श्रद्धाके परीक्षणके लिये आते हैं, अतः अतिथिको आया हुआ देखकर हाथ जोड़कर उसके सम्मुख जाना चाहिये तथा स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अन्न आदिद्वारा उसकी सेवा करनी चाहिये। अतिथि रूप-सम्पन्न है या कुरूप, मलिन वस्त्रधारी है अथवा स्वच्छ वस्त्रधारी इसपर विद्वान् पुरुषको विचार नहीं करना चाहिये; उसका यथेष्ट स्वागत करना चाहिये।

अरुण! दान सत्पात्रको ही देना चाहिये, जैसे कच्चे मिट्टीके पात्रमें रखा हुआ द्रव—जल आदि पदार्थ नष्ट हो जाता है, जैसे ऊधर-भूमिमें बोया गया बीज और भस्ममें हवन किया गया हव्य

पदार्थ निष्फल हो जाता है, वैसे ही अपात्रको दिया गया दान भी निष्फल हो जाता है।

खगश्रेष्ठ! जो दान करुणापूर्वक श्रद्धाके साथ प्राणियोंको दिया जाता है, वह सभी कर्मोंमें उत्तम है। हीन, अन्ध, कृपण, बाल, वृद्ध तथा आतुरको दिये गये दानका फल अनन्त होता है। साधु पुरुष दाताके दानको अपने स्वार्थका उद्देश्य न रखकर ग्रहण करते हैं। इससे दाताका उपकार होता है। कोई अर्था यदि घरपर आये तो कौन ऐसा व्यक्ति है जो उसका आदर नहीं करेगा। घर-घर याचना करनेवाला याचक पूज्य नहीं होता। कौन दाता है और कौन याचक इसका भेद देने और लेनेवालेके हाथसे ही सूचित हो जाता है। जो दाता व्यक्ति याचकको आया हुआ देखकर दान देनेकी अपेक्षा उसकी पात्रतापर विचार करता है, वह सभी कर्मोंको करता हुआ भी पारमार्थिक दाता नहीं है। संसारमें यदि याचक न हों तो दानधर्म कैसे होगा? इसलिये याचकको 'स्वागत है, स्वागत है'—यह कहते हुए दान देना चाहिये।

याचकको प्रेमपूर्वक आधा ग्रास भी दिया जाय तो वह श्रेष्ठ है, किंतु बिना प्रेमका दिया हुआ बहुत-सा दान भी व्यर्थ है, ऐसा मनीषियोंने कहा है। इसलिये अनन्त फल चाहनेवाले व्यक्तिको सत्कारपूर्वक दान देना चाहिये। इससे मरनेपर भी उसकी कीर्ति बनी रहती है। प्रिय एवं मधुर वचनोंद्वारा दिया गया दान कल्याणकारी है, किंतु कठोरतासे असत्कारपूर्वक दिया गया दान युक्त दान नहीं है। अन्तरात्मासे क्रुद्ध होकर याचकको दान देनेसे न देना अच्छा है। प्रेमसे रहित दान न धर्म है, न धन है, न प्रीति है। दान, प्रदान, नियम, यज्ञ, ध्यान, हवन और तप—ये सभी क्रोधके साथ करनेपर निष्फल हो जाते हैं*।

  • न तद्दानमसत्कारपारुष्यमलिनीकृतम् । वरं न दत्तमर्थिभ्यः संकृद्देनान्तरात्मना ॥ न तद्दानं न च प्रीतिर्न धर्मः प्रियवर्जितः । दानप्रदाननियमयज्ञध्यानं हृतं तपः । यत्नेनापि कृतं सर्वं क्रोधोऽस्य निष्फलं खग ॥ (ब्राह्मपर्व १८९।१९-२०)

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