भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मपर्व * १९५
वे इस लोकमें सुख प्राप्त करके परम पदको प्राप्त हो जाते हैं। सर्वप्रथम ब्रह्माजीने अपने परम प्रहृष्ट अन्तरात्मासे भगवान् सूर्यकी पूजा कर अञ्जलि बाँधकर जो स्तोत्र* कहा था, उसका भाव इस प्रकार है—
‘षडैश्वर्यसम्पन्न, शान्त-चित्तसे युक्त, देवोंके मार्ग-प्रणेता एवं सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान् सूर्यको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जो देवदेवेश शाश्वत, शोभन, शुद्ध, दिवस्पति, चित्रभानु, दिवाकर और ईशोंके भी ईश हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। समस्त दुःखोंके हर्ता, प्रसन्नवदन, उत्तमाङ्ग, वरके स्थान, वर-प्रदाता, वरद तथा वरेण्य भगवान् विभावसुको मैं प्रणाम करता हूँ। अर्क, अर्यमा, इन्द्र, विष्णु, ईश, दिवाकर, देवेश्वर, देवरत और विभावसु नामधारी भगवान् सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ।’ इस स्तुतिका जो नित्य श्रवण करता है, वह परम कीर्तिको प्राप्तकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १७३-१७४)
सौर-धर्ममें शान्तिक कर्म एवं अभिषेक-विधि
गरुडजीने पूछा— अरुण! जो आधि-व्याधिसे पीड़ित एवं रोगी, दुष्ट ग्रह तथा शत्रु आदिसे उत्पीड़ित और विनायकसे गृहीत हैं, उन्हें अपने कल्याणके लिये क्या करना चाहिये? आप इसे बतलानेकी कृपा करें।
अरुणजी बोले— विविध रोगोंसे पीड़ित, शत्रुओंसे संतप्त व्यक्तियोंके लिये भगवान् सूर्यकी आराधनाके अतिरिक्त अन्य कोई भी कल्याणकारी उपाय नहीं है, अतः ग्रहोंके घात और उपघातके नाशक, सभी रोगों एवं राज-उपद्रवोंको शमन करनेवाले भगवान् सूर्यकी आराधना करनी चाहिये।
गरुडजीने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मवादिनीके शापसे मैं पंखविहीन हो गया हूँ, आप मेरे इन अङ्गोंको देखें। मेरे लिये अब कौन-सा कार्य उपयुक्त है? जिससे मैं पुनः पंखयुक्त हो जाऊँ।
अरुणजी बोले— गरुड! तुम शुद्ध-चित्तसे अन्धकारको दूर करनेवाले जगन्नाथ भगवान् भास्करकी पूजा एवं हवन करो।
गरुडजीने कहा— मैं विकलांग होनेसे भगवान् सूर्यकी पूजा एवं अग्निकार्य करनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये मेरी शान्तिके लिये अग्निका कार्य आप सम्पादित करें।
अरुणजी बोले— विनतानन्दन! महाव्याधिसे प्रपीड़ित होनेके कारण तुम इसके सम्पादनमें समर्थ नहीं हो, अतः मैं तुम्हारे रोगकी शान्तिके लिये पावकार्चन (अग्निहोम) करूँगा। यह लक्ष-होम सभी पापों, विघ्नों तथा व्याधियोंका नाशक, महापुण्यजनक, शान्ति प्रदान करनेवाला, अपमृत्यु-निवारक, महान् शुभकारी तथा विजय प्रदान करनेवाला है। यह सभी देवोंको तृप्ति प्रदान करनेवाला तथा भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है।
इस पावकार्चनमें सूर्य-मन्दिरके अग्निकोणमें गोमयसे भूमिको लीपकर अग्निकी स्थापना करे
* भगवन्तं भगकरं शान्तचित्तमनुत्तमम्। देवमार्गप्रणेतारं प्रणतोऽस्मि रविं सदा॥
शाश्वतं शोभनं शुद्धं चित्रभानुं दिवस्पतिम्। देवदेवेशमीशेशं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥
सर्वदुःखहरं देवं सर्वदुःखहरं रविम्। वराननं वराङ्गं च वरस्थानं वरप्रदम्॥
वरेण्यं वरदं नित्यं प्रणतोऽस्मि विभावसुम्। अर्कमर्यमणं चेन्द्रं विष्णुमीशं दिवाकरम्॥
देवेश्वरं देवरतं प्रणतोऽस्मि विभावसुम्। य इदं शृणुयान्नित्यं ब्रह्मणोक्तं स्तवं परम्।
स हि कीर्तिं परां प्राप्य पुनः सूर्यपुरं व्रजेत्॥ (ब्राह्मपर्व १७४। ३६-४०)