भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
संसारके सूर्यभक्तों एवं सभी प्राणियोंको सर्वदा शान्ति प्रदान करें।
अन्धकार दूर करनेवाले तथा जय प्रदान करनेवाले विवस्वान् भगवान् भास्करकी सदा जय हो। ग्रहोंमें उत्तम तथा कल्याण करनेवाले, कमलको विकसित करनेवाले भगवान् सूर्यकी जय हो, ज्ञानस्वरूप भगवान् सूर्य! आपको नमस्कार है। शान्ति एवं दीसिका विधान करनेवाले, तमोहन्ता भगवान् अजित! आपको नमस्कार है, आपकी जय हो। सहस्र-किरणोज्ज्वल, दीसिस्वरूप, संसारके निर्माता आपको बार-बार नमस्कार है, आपकी जय हो। गायत्रीस्वरूपवाले, पृथ्वीको धारण करनेवाले सावित्री-प्रिय मार्तण्ड भगवान् सूर्यदेव! आपको बार-बार नमस्कार है, आपकी जय हो।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस विधानसे अरुणके द्वारा वैन्तेय गरुडके कल्याणके लिये शान्ति-विधान करते ही वे सुन्दर पंखोंसे समन्वित हो गये। वे तेजमें बुधके समान देदीप्यमान और बलमें विष्णुके समान हो गये। राजन्! देवाधिदेव सूर्यके प्रसादसे सुपर्णके सभी अवयव पूर्ववत् हो गये।
राजन्! इसी प्रकार अन्य रोगग्रस्त मानवगण इस अग्रिकार्यसे (सौरी-शान्तिसे) नीरोग हो जाते हैं। इसलिये इस शान्ति-विधानको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। ग्रहोपघात, दुर्भिक्ष, सभी उत्पातोंमें तथा अनावृष्टि आदिमें लक्ष-होमसमन्वित सौरसूक्तसे यत्नपूर्वक पूजन कर एवं वारुणसूक्तसे प्रसन्नचित्त हो घी, मधु, तिल, यव एवं मधुके साथ पायससे हवन एवं शान्ति करे और सावधान हो बलि (नैवेद्य) प्रदान करे। ऐसा करनेसे देवतागण मनुष्योंके
कल्याणकी कामना करते हैं एवं उनके लिये लक्ष्मीकी वृष्टि करते हैं। जो मनुष्य भगवान् दिवाकरका ध्यान कर इस शान्ति-अध्यायको पढ़ता या सुनता है, वह रणमें शत्रुपर विजयी हो परम सम्मानको प्राप्त कर एकच्छत्र शासक होकर सदा आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। वह पुत्र-पौत्रोंसे प्रतिष्ठित होकर आदित्यके समान तेजस्वी एवं प्रभासमन्वित व्याधिशून्य जीवन-यापन करता है। वीर! जिसके कल्याणके उद्देश्यसे इस शान्तिकाध्याय (शान्तिकल्प)-का पाठ किया जाता है, वह वात-पित्त, कफजन्म रोगोंसे पीड़ित नहीं होता एवं उसकी न तो सर्पके दंशसे मृत्यु होती है और न अकालमें मृत्यु होती है। उसके शरीरमें विषका प्रभाव भी नहीं होता एवं जड़ता, अन्धत्व, मूकता भी नहीं होती। उत्पत्ति-भय नहीं रहता और न किसीके द्वारा किया गया अभिचार-कर्म सफल होता है। रोग, महान् उत्पात, महाविपैले सर्प आदि सभी इसके श्रवणसे शान्त हो जाते हैं। सभी गङ्गादि तीर्थोंका जो विशेष फल है, उसका कई गुना फल इस शान्तिकाध्यायके श्रवणसे प्राप्त होता है और दस राजसूय एवं अन्य यज्ञोंका फल भी उसे मिलता है। इसे सुननेवाला सौ वर्षतक व्याधिरहित नीरोग होकर जीवनयापन करता है। गोहत्यारा, कृतघ्न, ब्रह्मघाती, गुरुतल्पगामी और शरणागत, दीन, आर्त, मित्र तथा विश्वासी व्यक्तिके साथ घात करनेवाला, दुष्ट, पापाचारी, पितृघातक एवं मातृघातक सभी इसके श्रवणसे निःसंदेह पापमुक्त हो जाते हैं। यह अग्निकार्य अतिशय उत्तम एवं परम पुण्यमय है।
(अध्याय १७५—१८०)
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