भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हे खगश्रेष्ठ ! अब मेरे मण्डलके विषयमें सुनो । मेरा कल्याणमय मण्डल खखोलक नामसे विख्यात है । यह तीनों देवों एवं तीनों गुणोंसे परे एवं सर्वज्ञ है । यह सर्वशक्तिमान् है । 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रमें यह मण्डल अवस्थित है । जैसे घोर संसार-सागर अनादि है वैसे ही खखोलक भी अनादि और संसार-सागरका शोधक है । जैसे व्याधियोंके लिये औषधि होती है वैसे ही यह संसार-सागरके लिये औषधि है । मोक्ष चाहनेवालोंके लिये मुक्तिका साधन और सभी अर्थोंका साधक है । खखोलक नामका यह मेरा मन्त्र सदा उच्चारण एवं स्मरण करने योग्य है । जिसके हृदयमें यह 'ॐ नमः खखोलकाय' मन्त्र स्थित है, उसीने सब कुछ पढ़ा है, सुना है और सब कुछ अनुष्ठित किया है—ऐसा समझना चाहिये ।
मनीषियोंने इस खखोलकको मार्तण्डके नामसे कहा है । उसके प्रति श्रद्धायुक्त होनेपर पुण्य प्राप्त होता है और अश्रद्धासे अधःपतन होता है । सूर्य-सम्बन्धी वचनको कहनेवाले गुरुकी सूर्यके समान पूजा करनी चाहिये । वह गुरु भवसागरमें निमग्न व्यक्तिका उद्धार कर देता है । सौरधर्मरूपी शीतल जलके द्वारा जो अज्ञानरूपी वहिसे संतप्त मनुष्यको शान्त करता है, उसके समान गुरु कौन होगा ? जो भक्तोंको ज्ञानरूपी अमृतसे आप्लावित करते हैं, भला उनकी कौन पूजा नहीं करेगा । स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष)-की प्राप्तिके लिये देवाधिदेव सूर्यके द्वारा जो वाक्य कहे गये हैं, वे अतिशय कल्याणकारी हैं । राग, द्वेष, अक्षमा, क्रोध, काम, तृष्णाका अनुसरण करनेवाले व्यक्तिका कहा हुआ वाक्य नरकका साधन होनेसे दुर्भाषित कहा जाता
है । अविद्यात्मक संसारके क्लेश-साधक मुदुल आलापवाले संस्कृत वाक्यसे भी क्या लाभ है ? जिस वाक्यके सुननेसे राग-द्वेष आदिका नाश एवं पुण्य प्राप्त होता है, वह कठोर वाक्य भी अतिशय शोभाजनक है । स्मृतियाँ, महाभारत, वेद, महान् शास्त्र यदि धर्म-साधक न बन सकें तो इनका अध्ययनमात्र अपनी आयुके व्यतीत करनेके लिये ही है । सहस्रों वर्षकी आयु प्राप्त करनेपर भी शास्त्रका अन्त नहीं मिलता । अतः सभी शास्त्रोंको छोड़कर अक्षर तन्मात्र (परमात्मा)-का ज्ञान कर परलोकके अनुरूप आचरण करना चाहिये । मनुष्योंके समर्थ शरीरसे भी क्या लाभ है जो पारलौकिक पुण्य-भारको वहन करनेमें असमर्थ है । जो सौर-ज्ञानके माहात्म्यको उच्चारण करनेमें असमर्थ है, वह शक्तिसम्पन्न और पण्डित होते हुए भी मूर्ख है । इसलिये जो सौर-ज्ञानके सद्भावकी महिमामें तत्पर रहता है, वही पण्डित, समर्थ, तपस्वी और जितेन्द्रिय है । जो नृप गुरुको सम्पूर्ण पृथिवी, धन और सुवर्ण आदि देकर भी यदि अन्यायपूर्वक सौर-ज्ञानकी जिज्ञासा करता है अर्थात् अन्यायाचरण करते हुए पूछता है तो उसे षडक्षर-मन्त्रका उपदेश गुरुको नहीं देना चाहिये । जो भगवान् सूर्यके धर्मको न्यायपूर्वक विनम्र भावसे सुनता है और कहता है, वह उचित स्थानको प्राप्त करता है, अन्यथा उसके विपरीत नरकको जाता है ।
जो भगवान् सूर्यके षडक्षर-मन्त्रसे विधानपूर्वक गोदुग्धद्वारा सूर्यकी पूजा करता है वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ है । देवासुरोंद्वारा मन्थन करनेपर क्षीरसागरसे सभी लोकोंकी मातृस्वरूपा पाँच गौएँ उत्पन्न हुईं—नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुमना तथा शोभनावती ।
कायकलेशीर्न बहुभिर्न चैवार्थस्य राशिभिः । धर्मः सम्प्राप्यते सूक्ष्मः श्रद्धाहीनेः सुरैरपि ॥
श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा यज्ञाहुतं तपः । श्रद्धा मोक्षश्च स्वर्गश्च श्रद्धा सर्वमिदं जगत् ॥
सर्वस्व जीवितं वापि दद्यादश्रद्धया च यः । नागृह्यात् स फलं किंचित् तस्माच्छ्रद्धापरो भवेत् ॥ (ब्राह्मपर्व १८७।१-१३)
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