भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • ब्राह्मपर्व *

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सपिण्डमें दस दिन, बारह दिन अथवा पंद्रह दिन और एक मासमें प्रेत-शुद्धि हो जाती है। सूतकाशौच तथा मरणाशौचमें दस दिनेके भीतर किसी व्यक्तिके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये। दशगात्र एवं एकादशाहके बीत जानेपर बारहवें दिन स्नान करनेसे शुद्धि हो जाती है। संवत्सर पूर्ण हो जानेपर स्नान-मात्रसे ही शुद्धि हो जाती है। सपिण्डमें जन्म और मृत्यु होनेपर अशौच लगता है। दाँत आनेतकके बालककी मृत्यु हो जानेपर सद्यः शुद्धि हो जाती है। चूडाकरणके पहले बालककी मृत्यु हो जानेपर एक दिन-रातकी अशुद्धि होती है तथा चूडाकरणके बाद और यज्ञोपवीत लेनेके पहले मृत्यु होनेपर त्रिरात्र अशुद्धि होती है और इसके अनन्तर दशरात्रकी

अशुद्धि होती है। गर्भस्नाव हो जानेपर तीन रात्रिके पश्चात् जलसे स्नान करनेके बाद शुद्धि होती है। असपिण्ड (एवं सगोत्री)-की मृत्यु होनेपर तीन अहोरात्रके बाद शुद्धि होती है। यदि केवल शव-यात्रा करता है तो स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है। द्रव्यकी शुद्धि आगमें तपाने, मिट्टी और जलसे धोने तथा मल हटाने, प्रक्षालन करने, स्पर्श और प्रोक्षण करनेसे होती है। द्रव्य-शुद्धिके पश्चात् स्नान करनेसे शुद्धि होती है। प्रातःकालका स्नान नित्य-स्नान है, ग्रहणमें स्नान करना काम्य-स्नान है तथा क्षौर और शौचादिके पश्चात् जो स्नान किया जाता है वह नैमित्तिक स्नान है, इससे पापादिकी निवृत्ति होती है।

(अध्याय १८६)

श्रद्धाकी महिमा, खखोल्ल-मन्त्रका माहात्म्य तथा गौकी महिमा

अरुणने पूछा—भगवन्! आदित्यदेव! मनुष्य किस पुण्यकर्मका सम्पादन कर स्वर्ग जाते हैं? कर्मयज्ञ, तपोयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ध्यानयज्ञ और ज्ञानयज्ञ—इन पाँच यज्ञोंमें सर्वोत्तम यज्ञ कौन है? इन यज्ञोंका क्या फल है और इनसे कौन-सी गति प्राप्त होती है? धर्म और अधर्मके कितने भेद कहे गये हैं? उनके साधन क्या हैं और उनसे कौन-सी गति होती है। नारकी पुरुषोंके पुनः पृथ्वीपर आनेपर भोगसे शेष कर्मोंके कौन-कौनसे चिह्न उपलब्ध रहते हैं। इस धर्माधर्मसे व्याप्त भवसागर तथा गर्भमें आगमनरूपी दुःखसे कैसे मुक्ति प्राप्त होती है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् सूर्य बोले—अरुण! स्वर्ग और अपर्ग (मोक्ष)-के फलको देनेवाले तथा नरकरूपी समुद्रसे पार करानेवाले, पापहारी एवं पुण्यप्रद धर्मको सुनो।

धर्मके पूर्वमें तथा मध्यमें और उसके अन्तमें श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धानिष्ठ ही धर्म प्रतिष्ठित होता है, अतः धर्म श्रद्धामूलक ही है। वेद-मन्त्रोंके अर्थ अतीव गूढतम हैं। उनमें प्रधान पुरुष परमेश्वर अधिष्ठित हैं, अतः इन्हें श्रद्धाके आश्रयसे ही ग्रहण किया जा सकता है। ये इस बाह्य चक्षुसे नहीं देखे जाते। श्रद्धारहित देवता भी भाँति-भाँतिके शरीरको कष्ट देनेपर तथा अत्यधिक अर्थव्यय करनेपर भी धर्मके सूक्ष्मरूप वेदमय परमात्माको नहीं प्राप्त कर सकते। श्रद्धा परम सूक्ष्म धर्म है, श्रद्धा यज्ञ है, श्रद्धा हवन, श्रद्धा तप, श्रद्धा ही स्वर्ग और मोक्ष है। यह सम्पूर्ण जगत् श्रद्धामय ही है, अश्रद्धासे सर्वस्व जीवन देनेपर भी कुछ फल नहीं होता। बिना श्रद्धाके किया गया कार्य सफल नहीं होता। अतः मानवको श्रद्धा-सम्पन्न होना चाहिये*।

  • श्रद्धापूर्वः सदा धर्मः श्रद्धामध्यान्तसंस्थितः । श्रद्धानिष्ठप्रतिष्ठश्च धर्मः श्रद्धा प्रकीर्तिता ॥ श्रुतिमन्त्रसः सूक्ष्माः प्रधानपुरुषेश्वरः । श्रद्धामात्रेण गूढन्ते न परेण च चक्षुषा ॥

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